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रविवार, 1 नवंबर 2026

कल्पना, आत्मीयता और आत्मानुभव की दीपावली

 


कल्पना, आत्मीयता और आत्मानुभव की दीपावली 

सत्तर और अस्सी के दशक में जन्मे व्यक्तियों के लिए दीपावली केवल एक कैलेंडर का त्योहार या कृत्रिम रोशनी का प्रदर्शन मात्र नहीं थी, बल्कि वह स्मृतियों की सुगंध और आत्मीयता से रचा-बसा एक अलौकिक पर्व हुआ करता था। आज की पीढ़ी जब दीपावली मनाती है, तो उसका अधिकांश स्वरूप बाजार की चमक-दमक, मॉल के सजे-धजे काउंटर और रेडीमेड इलेक्ट्रॉनिक सामानों के इर्द-गिर्द सिमटा दिखाई देता है। परंतु, उस दौर के बच्चों के लिए यह दीपावली एक "कल्पना आधारित पर्व" हुआ करती थी, जहाँ त्योहार का सच्चा आनंद वस्तुओं के क्रय में नहीं, बल्कि स्वयं के हाथों से सृजन करने में निहित था।

उस कालखंड में समाज बाजारीकरण के आधुनिक जाल से काफी हद तक मुक्त था। उपभोक्तावाद की गति तब इतनी तीव्र नहीं हुई थी कि वह मानवीय संवेदनाओं और मौलिकता को निगल सके। समाज की संरचना में तब 70 प्रतिशत जीवन पूरी तरह से ग्रामीण, परंपरा संचालित और सांस्कृतिक-सामाजिक सरोकारों से ओत-प्रोत था। मात्र 30 प्रतिशत जीवन ही शहरीकरण और बाजारीकरण के आधुनिक तंत्र की सीमाओं में बंधा हुआ था। इसीलिए, तब के बच्चों में बाजार की भौतिक वस्तुओं को पाने की वैसी अकुलाहट या लालसा नहीं थी जैसी आज देखी जाती है। 


उस समय दीपावली के आने की आहट कार्तिक मास के प्रारंभ होते ही गाँव और मोहल्लों की आबोहवा में तैरने लगती थी। मिट्टी के दीयों को पानी में भिगोना, घर की कच्ची या चूने की पुताई में माँ-पिता का हाथ बंटाना, मिट्टी के छोटे-छोटे घरौंदे बनाना और उनके ऊपर रंग-बिरंगी आकृतियाँ उकेरना—ये सभी गतिविधियाँ किसी भव्य अनुष्ठान से कम नहीं हुआ करती थीं। बच्चे हफ्तों पहले से पुराने कागजों, बाँस की तीलियों और रंगीन पन्नियों से अपनी कंदीलें और पतंगें बनाने की कल्पनाओं में लीन रहते थे। वह दीपावली बाजारी मशीनीकृत उत्पादन की नहीं, बल्कि बाल-मन की असीम रचनात्मकता और मौलिकता की दीपावली थी।

उस दौर की दीपावली की अपनी एक पृथक, सौंधी सुगंध हुआ करती थी। खेतों से कटकर आई धान की नई फसल की महक, कच्चे मकानों पर गोबर और पीली मिट्टी के लेपन की खुशबू, और रसोई घर से छनकर आती शुद्ध देसी घी व गुड़ से बने पारम्परिक व्यंजनों की गंध—ये सब मिलकर एक ऐसा अनुपम अनुभव रचते थे जो चहुंओर के वातावरण में रच-बस जाता था। 

इस उत्सव का असली वैभव वस्तुओं की बहुलता में नहीं, बल्कि इंसानों के बीच की मानवीय ऊष्मा में बसता था। लोगों के बीच जो परस्पर संवाद, जीवंत संपर्क और सह-संबंध स्थापित थे, वे दिखावे से कोसों दूर और निष्छल प्रेम पर टिके थे। दीपावली की शाम पूरा गाँव या मोहल्ला एक परिवार की भाँति परस्पर मिलता था। हर घर से आई मिठाइयों का आस्वादन बिना किसी हिचक के किया जाता था और बड़ों का आशीर्वाद केवल औपचारिकता न होकर आत्मिक संबल बनता था। यही मानवीय संवाद और अंतर्संबंध उस पर्व को एक विराट और शाश्वत वैभवशीलता प्रदान करते थे। वह समय ऐसा था जहाँ उत्सव का सीधा संबंध आत्मीयता, सहयोग और सह-अस्तित्व से था, जिसने सत्तर-अस्सी के दशक की पीढ़ी के हृदय में दीपावली को एक अमिट और पावन स्मृति के रूप में सदैव के लिए स्थापित कर दिया।

अतीत के अनुभवों से आधुनिक यथार्थ तक: जीवन, समाज और अर्थव्यवस्था के विभिन्न आयामों में दीपावली

1. प्रस्तावना और ऐतिहासिक-पौराणिक पृष्ठभूमि

भारतीय मनीषा में दीपावली केवल एक दिन का उत्सव नहीं है; यह तमसो मा ज्योतिर्गमय (अंधकार से प्रकाश की ओर जाने) का शाश्वत संदेश देने वाली एक महाचेतना है। ऐतिहासिक और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, दीपावली का पर्व बहुआयामी सांस्कृतिक आधारों पर टिका हुआ है।

  • श्रीराम का अयोध्या आगमन: त्रेतायुग में चौदह वर्ष के कठिन बनवास के पश्चात, लंकापति रावण का वध कर जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, माता सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे थे, तब अयोध्यावासियों ने कार्तिक अमावस्या की घनघोर काली रात को अपने घरों और पथों पर घी के असंख्य दीपक जलाकर आलोकित कर दिया था। वह केवल राजा का स्वागत नहीं था, बल्कि सत्य, न्याय और धर्म की अधर्म पर विजय का समष्टिगत उत्सव था।

  • समुद्र मंथन और लक्ष्मी प्राकट्य: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कार्तिक अमावस्या के पावन दिन ही क्षीर सागर के मंथन से धन, समृद्धि और वैभव की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था। इसीलिए इस दिन श्रीगणेश और महालक्ष्मी के पूजन की परंपरा विकसित हुई, जहाँ गणेश जी बुद्धि और विवेक का प्रतीक हैं तो लक्ष्मी जी समृद्धि की।

  • विष्णु द्वारा बलि का दमन एवं वामन अवतार: ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु ने वामन रूप धारण कर असुरराज बलि के अहंकार का मर्दन किया और तत्पश्चात दीपावली के समय ही बलि को पाताल लोक का राज्य सौंपकर प्रजा को भयरहित किया था।

  • सिख एवं जैन परंपरा में महत्त्व: जैन धर्म में दीपावली का दिन भगवान महावीर स्वामी के मोक्ष प्राप्ति (निर्वाण) दिवस के रूप में पूज्य है। वहीं सिख परंपरा में इसी दिन छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद साहिब जी ग्वालियर के किले से 52 हिंदू राजाओं को मुगलों की कैद से मुक्त कराकर अमृतसर के हरिमंदिर साहिब पहुँचे थे, जिसे 'बंदी छोड़ दिवस' के रूप में दीपावली की तरह दीपमाला करके मनाया जाता है।

इन पौराणिक एवं ऐतिहासिक संदर्भों से स्पष्ट होता है कि दीपावली का मूल आधार लोक-कल्याण, अधर्म पर धर्म की विजय और अंधकार से उजाले की ओर बढ़ना रहा है।

2. सत्तर-अस्सी के दशक की दीपावली: सादगी, सामाजिकता और स्वावलंबन

सत्तर और अस्सी का दशक भारतीय समाज का वह संक्रमण काल था जहाँ औद्योगिकीकरण के अंकुर फूट तो रहे थे, किंतु जनजीवन की आत्मा पूरी तरह से ग्रामीण और पारंपरिक थी। उस समय की दीपावली का सामाजिक-सांस्कृतिक ताना-बाना आज के समय से सर्वथा भिन्न था।

(क) स्वावलंबन और स्व-निर्मित खुशियाँ

उस समय दीपावली की तैयारी हफ्तों पूर्व शुरू होती थी। बाजार से वस्तुएँ खरीदने के स्थान पर लोग घर पर ही वस्तुएँ बनाने में आनंद का अनुभव करते थे। कुम्हारों के चाक से निकली मिट्टी के दीये, दीवाली के दीयों के लिए रुई की बत्तियाँ स्वयं कातना, और गन्ने के रस व नए अनाज से बने पकवान घर की महिलाएँ मिलकर बनाती थीं। बच्चों के लिए पटाखे भी सीमित मात्रा में आते थे, किंतु उनके लिए दीपावली का मुख्य आकर्षण मिट्टी से बने किले (घरौंदे) बनाना, उन्हें रंगों से सजाना और दीयों की कतारें बैठाना होता था।

(ख) साझी सामाजिकता और निष्छल संबंध

उस दौर में गाँव और कस्बों में "निजी स्थान" (Personal Space) की आधुनिक अवधारणा नहीं थी। पूरा मोहल्ला एक विस्तृत परिवार की तरह था। यदि किसी एक घर में पकवान बनते थे, तो उसकी खुशबू और उसका स्वाद पूरे मोहल्ले तक पहुँचता था। दीवाली के दिन शाम को लक्ष्मी पूजन के बाद एक-दूसरे के घर जाकर बड़ों के चरण स्पर्श करना और 'राम-राम' कहना एक अनिवार्य सामाजिक संस्कार था। इस परस्पर मिलन में न तो किसी के प्रति ईर्ष्या का भाव था और न ही अपनी संपत्ति का दंभ।

(ग) प्रकृति के साथ तादात्म्य

उस समय की दीपावली पूरी तरह से पर्यावरण-अनुकूल थी। दीयों में जलने वाला तेल (तिल या सरसों का तेल) और मिट्टी का दीया प्रकृति में बिना कोई प्रदूषण फैलाए पुनः विलीन हो जाते थे। आतिशबाजी का प्रयोग न्यूनतम था और वह भी बारूद से अधिक प्रकाश बिखेरने वाली होती थी। प्रकृति, पशु-पक्षी और मनुष्य सब मिलकर इस त्योहार का हिस्सा बनते थे।

3. बाजारीकरण और वैश्वीकरण का आगमन: बदलाव की बयार

1990 के दशक में भारत द्वारा अपनाई गई उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) की नीतियों ने न केवल भारत की अर्थव्यवस्था को बदला, बल्कि भारतीय त्योहारों के चरित्र और आत्मा को भी गहराई से प्रभावित किया।

(क) 70-30 का अनुपात उलटने की प्रक्रिया

जो समाज 70 प्रतिशत ग्रामीण और पारंपरिक सरोकारों से युक्त था, वह धीरे-धीरे शहरीकरण और उपभोक्तावाद की ओर बढ़ने लगा। कार्यशालाओं, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और नगरों के विस्तार ने लोगों को गाँवों से शहरों की ओर पलायन करने पर मजबूर किया। इसके परिणामस्वरूप, संयुक्त परिवारों का विघटन हुआ और एकाकी परिवार (Nuclear Families) अस्तित्व में आए।

(ग) मिट्टी के दीये से लेकर 'चाइनीज लाइट्स' तक

जैसे-जैसे बाजार ने अपनी पकड़ मजबूत की, वैसे-वैसे दीपावली का स्वदेशी और स्वावलंबी स्वरूप बाजार पर निर्भर होने लगा। हाथ से बनी कंदील की जगह प्लास्टिक की रेडीमेड कंदील ने ले ली। कुम्हारों के मिट्टी के दीयों का स्थान चीन से आयातित सस्ती, रंग-बिरंगी एलईडी (LED) झालरों और प्लास्टिक की मोमबत्तियों ने ले लिया। निर्माण का आनंद धीरे-धीरे केवल क्रय करने की क्षमता (Purchasing Power) में परिवर्तित हो गया।

4. समकालीन समय में दीपावली: आधुनिकता, आभासी संबंध और उपभोक्तावाद

आज की दीपावली सत्तर-अस्सी के दशक की दीपावली से कई मायनों में अलग हो चुकी है। आज त्योहार का अनुभव भौतिक वस्तुओं के उपभोग और डिजिटल माध्यमों के इर्द-गिर्द सिमट गया है।

(क) आभासी संवेदनाएँ और व्हाट्सएप ग्रीटिंग्स

अतीत में जो आत्मीयता प्रत्यक्ष रूप से गले मिलने, चरण स्पर्श करने और घंटों बैठकर बातचीत करने में थी, वह आज स्मार्टफोन की स्क्रीन पर सिमट गई है। दीपावली की सुबह होते ही फॉरवर्ड किए गए 'कॉपी-पेस्ट' संदेशों और डिजिटल चित्रों की बाढ़ आ जाती है। मानवीय स्पर्श की जो ऊष्मा सत्तर-अस्सी के दशक में पर्व को विराटता देती थी, वह आज डिजिटल नेटवर्क के माध्यम से केवल एक औपचारिकता बनकर रह गई है।

(ख) वस्तु-केंद्रित उत्सव और ब्रांडिंग

आज दीपावली का अर्थ 'शॉपिंग' हो चुका है। बिग बिलियन डेज़, ग्रेट इंडियन फेस्टिवल्स और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स ने यह मानसिकता बना दी है कि जितनी अधिक खरीदारी की जाएगी, दीपावली उतनी ही समृद्ध मानी जाएगी। त्योहार अब आत्मीय संतुष्टि का विषय न होकर सामाजिक प्रतिष्ठा (Status Symbol) के प्रदर्शन का जरिया बन गया है। महंगे उपहारों का आदान-प्रदान, ब्रांडेड मिठाइयाँ और कॉर्पोरेट गिफ्टिंग ने पारंपरिक पकवानों और घर के स्नेह को प्रतिस्थापित कर दिया है।

(ग) पर्यावरणीय चुनौतियाँ

आधुनिक दीपावली के साथ प्रदूषण एक बहुत बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। भारी मात्रा में चलने वाले जहरीले पटाखे, प्लास्टिक का कचरा और अत्यधिक बिजली की खपत ने जहाँ एक ओर पर्यावरण को क्षति पहुँचाई है, वहीं दूसरी ओर 'ग्रीन क्रैकर्स' और पर्यावरण-अनुकूल दीपावली के अभियानों को भी जन्म दिया है।

5. दीपावली और भारतीय अर्थव्यवस्था: बाजार, रोजगार और जीडीपी का आधार

भले ही बाजारीकरण ने त्योहार के पारंपरिक और सामाजिक पक्ष को कुछ सीमा तक प्रभावित किया हो, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आधुनिक भारत की अर्थव्यवस्था में दीपावली का स्थान रीढ़ की हड्डी के समान है। दीपावली केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह देश के आर्थिक चक्र को गति देने वाला सबसे बड़ा 'इकोनॉमिक ड्राइवर' है।

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                       │     दीपावली का आर्थिक चक्र   │
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│ ऑटोमोबाइल│                      │ रिटेल व │                      │ रियल एस्टेट│
│ एवं इलेक्ट्रॉनिक्स              │ ई-कॉमर्स │                      │ एवं आभूषण │
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     │                                │                                │
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                        │ तरलता, रोजगार एवं जीडीपी में योगदान│
                        └───────────────────────────┘

(क) रिटेल और एफएमसीजी (FMCG) क्षेत्र में उछाल

दीपावली के सीजन (धनतेरस से लेकर भाईदूज तक) के दौरान देश भर के खुदरा (Retail) बाजार में लाखों-करोड़ों रुपये का कारोबार होता है। कपड़े, जूते, इलेक्ट्रॉनिक्स, होम अप्लायंसेज और एफएमसीजी क्षेत्र की वार्षिक बिक्री का एक बड़ा हिस्सा इसी एक-दो महीने की अवधि में आता है।

(ख) आभूषण (Bullion & Jewellery) और ऑटोमोबाइल सेक्टर

धनतेरस के पावन अवसर पर सोने-चांदी के सिक्के और आभूषण खरीदना शुभ माना जाता है। इस दौरान भारत का सराफा बाजार रिकॉर्ड कारोबार करता है। इसी प्रकार, ऑटोमोबाइल उद्योग के लिए यह समय सबसे ज्यादा वाहन बेचने का होता है। नए वाहनों की डिलीवरी, दोपहिया से लेकर चारपहिया वाहनों तक की बिक्री, इस दौरान अपने उच्चतम स्तर पर होती है।

(ग) असंगठित क्षेत्र, कुटीर उद्योग और स्थानीय रोजगार

दीपावली का सबसे खूबसूरत आर्थिक पक्ष यह है कि यह धन का पुनर्वितरण (Redistribution of Wealth) करती है। बड़े कॉर्पोरेट घरानों से लेकर छोटे दस्तकारों, कुम्हारों, दर्जियों, सजावटी सामान बनाने वाले कारीगरों और फूलों की खेती करने वाले किसानों तक, हर वर्ग को इस समय रोजगार और आय का बड़ा जरिया मिलता है। 'वोकल फॉर लोकल' और 'आत्मनिर्भर भारत' के अभियानों ने हाल के वर्षों में पुनः मिट्टी के दीयों और स्थानीय उत्पादों की माँग को बढ़ाया है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बल मिल रहा है।

(घ) रियल एस्टेट और बैंकिंग क्षेत्र में तरलता

दीपावली के समय लोग नए घरों की बुकिंग करते हैं, जिससे रियल एस्टेट और कंस्ट्रक्शन सेक्टर को मजबूती मिलती है। बैंकों द्वारा दिए जाने वाले फेस्टिव लोन, क्रेडिट कार्ड स्पेंडिंग और बोनस डिस्ट्रीब्यूशन से बाजार में नकदी (Liquidity) का प्रवाह तेजी से बढ़ता है, जिससे समूची राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को संबल मिलता है।

6. संतुलन की आवश्यकता: परंपरा और आधुनिकता का सामंजस्य

आज जब हम 21वीं सदी के उत्तरार्ध की ओर बढ़ रहे हैं, तो आवश्यकता इस बात की है कि हम सत्तर-अस्सी के दशक की उस मानवीय ऊष्मा, आत्मीयता और सृजनात्मकता को न भूलें, जबकि साथ ही आधुनिकता और आर्थिक समृद्धि के सकारात्मक पहलुओं को भी अंगीकार करें।

  • स्थानीय कारीगरों का समर्थन: हमें अपनी खरीदारी का एक बड़ा हिस्सा स्थानीय कुम्हारों, दस्तकारों और छोटे व्यवसायियों से सामान खरीदने में लगाना चाहिए ताकि त्योहार की समृद्धि केवल बहुराष्ट्रीय कंपनियों तक सीमित न रहकर समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक पहुँचे।

  • संवाद और सजीव उपस्थिति: डिजिटल शुभकामनाओं से इतर, प्रयास यह होना चाहिए कि हम अपने परिजनों, मित्रों और पड़ोसियों से व्यक्तिगत रूप से मिलें और उस मानवीय ऊष्मा को पुनः जीवित करें जो हमारे त्योहारों की वास्तविक आत्मा है।

  • पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता: प्रकाश के इस पर्व को प्रदूषण-मुक्त और हरित (Green) बनाने की दिशा में प्रयास करना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियों को हम एक स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण दे सकें।

7. निष्कर्ष

दीपावली का सफर सत्तर-अस्सी के दशक के "कल्पना आधारित", स्वावलंबी और आत्मीय त्योहार से शुरू होकर आज के अत्यधिक विकसित, बाजारीकृत और आर्थिक रूप से समृद्ध पर्व तक आ पहुँचा है। यद्यपि समय के प्रवाह ने इसके बाहरी आवरण को बदल दिया है, किंतु इसकी मूल आत्मा—अंधकार पर प्रकाश की विजय, भ्रातृत्व भाव और समाज को एक सूत्र में पिरोने की शक्ति—आज भी अटूट है। यदि हम आधुनिक बाजारीकरण के बीच सत्तर-अस्सी के दशक के मानवीय सरोकारों, सादगी और परस्पर संवाद को संजोकर रख सकें, तो यह दीपावली न केवल हमारी अर्थव्यवस्था को समृद्ध करेगी, बल्कि हमारे अंतर्मन और समाज को भी सच्चे अर्थों में आलोकित करती रहेगी।