दिनभर कंप्यूटर पर बैठे-बैठे पेट से ऊपर का शरीर बुरी तरह टूट जाता है। सोचता हूं कि देर रात तक शांत वातावरण में कुछ विशेष पढ़ूँ या लिखँ पर ऐसा हो नहीं पाता। आंखों पर बहुत बड़ा भार गिरने लगता है। शरीर की थकान मूर्छित करने लगती है। विचार धुंधलाने लगते हैं। आंतरिक शक्तियां परास्त हो जाती है। आत्मा का नाम व प्रतीक भी समाप्त हो जाता है। ऐसी परिस्थितियों में पुराने दिन याद आते हैं। युवावस्था की उर्जा का धुंधला सा अनुभव होता है। नब्बे के दशक याद आता है। सिमटी हुई आधुनिकता में चलता-फिरता 1990 का समय स्मृतियों में उभरता है। वह समय ऐसा था, जब लोगों के पास विशाल हृदय था। तब लोग अत्यंत अधिक उदार थे। उनके पास दूसरे को सुनने, उसके पास बैठने तथा उसके दुःखों को सुनकर उनका निदान करने की इच्छाशक्ति थी। उनके पास दूसरों के सुख में दूसरों की तरह ही खुश रहने व आनंदित होने की अभिलाषा थी। महानगर भी उस समय आकर्षक थे। वे प्राकृतिक थे। वे संस्कारी थे। भीड़ से युक्त नहीं थे। वाहनों के कोलाहल से दबे हुए नहीं थे। टेलीविजन, कंप्यूटर एवं मोबाइल फोन की अनुपस्थिति में अत्यंत संजीवित थे।
नब्बे का दशक: जब रिश्ते स्क्रीन के पार नहीं, आंगन में जिए जाते थे
नब्बे के दशक की शुरुआत भारतीय इतिहास में एक ऐसे चौराहे पर हुई थी, जहाँ एक तरफ परंपराओं की सौंधी महक थी और दूसरी तरफ भूमंडलीकरण (Globalisation) की आहटें सुनाई दे रही थीं। यह वह दौर था जब एलपीजी (LPG - Liberalisation, Privatization, Globalisation) की नीतियों ने देश की अर्थव्यवस्था के द्वार खोले तो जरूर, लेकिन समाज की देहरी पर अभी तकनीक का ताला नहीं लगा था। लोग आधुनिकता की सीढ़ियां चढ़ तो रहे थे, पर उनकी जड़ें आत्मीयता की मिट्टी में गहराई तक धंसी हुई थीं।
उस समय का भारतीय जन-जीवन आज की तरह 'व्यस्तता' के कृत्रिम आवरण से ढका नहीं था। समय के पास एक ठहराव था, एक गति थी जो नदी के प्रवाह जैसी स्वाभाविक थी। सुबह की शुरुआत अलार्म की कर्कश आवाज़ से नहीं, बल्कि चिड़ियों की चहचहाहट, दूर मंदिर से आती घंटियों की गूंज और दूध वाले या अखबार वाले की साइकिल की घंटी से होती थी। घरों के दरवाजे सुबह होते ही खुल जाते थे और सूरज ढलने तक पड़ोसियों का आना-जाना एक सहज पारिवारिक अनुष्ठान की तरह था।
बैठकें और चौपालें: जीवित संवाद का स्वर्णिम काल
आज हमारे हाथों में स्मार्टफोन हैं, जिनमें दुनिया भर के लोगों से जुड़ने के अनगिनत ऐप्स हैं, लेकिन अपनों के लिए एक मिनट का वक्त नहीं है। इसके विपरीत, नब्बे के दशक में महानगरों के छोटे फ्लैट हों या कस्बों-गाँवों के बड़े घर, घरों में एक 'बैठक' जरूर होती थी। वह बैठक केवल एक कमरा नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का केंद्र होती थी।
शाम ढलते ही उस कमरे में या गाँव के किसी नीम के पेड़ के नीचे चौपाल सज जाती थी। लोग दिनभर की भागदौड़ के बाद इकट्ठा होते थे। वहाँ राजनीति पर गर्मागर्म बहसें होती थीं, साहित्यिक चर्चाएँ होती थीं, सुख-दुःख बांटे जाते थे। किसी के घर में यदि कोई संकट आ जाता था, तो पूरा मोहल्ला या पूरा गाँव बिना किसी औपचारिक आमंत्रण के ढाल बनकर खड़ा हो जाता था। वह समय 'मैं' से शुरू होकर 'हम' पर खत्म होता था। किसी के आंसू पोछने के लिए किसी इमोजी की जरूरत नहीं होती थी, बल्कि सामने वाले के कंधे पर रखा गया एक हाथ और सांत्वना के दो बोल ही पर्याप्त मरहम बन जाते थे।
गाँव की चौखट और माटी की सोंधी गंध
यदि हम महानगरों से थोड़ा बाहर निकलकर उस समय के ग्रामीण जीवन की ओर देखें, तो वह अपने आप में कविता जैसा था। गाँव तब आत्मनिर्भरता और सामूहिक संस्कृति के जीवंत प्रतीक थे।
ऋतुओं के संग जीवन: जीवन प्रकृति के चक्र के साथ चलता था। बरसात में मेंढकों की टर्र-टर्र और मिट्टी की सोंधी महक, सर्दियों में गुड़ और बाजरे की रोटियों की खुशबू, और गर्मियों में आम के बागों के नीचे बच्चों की किलकारियां—ऋतुएँ केवल मौसम नहीं बदलती थीं, बल्कि जीवन के उत्सव बदल देती थीं।
सामूहिक श्रम (सहयोग): खेतों में कटाई का समय हो या किसी के घर की छत ढलनी हो, पूरा गाँव मिलकर श्रमदान करता था। 'बेगार' या आपसी मदद की यह संस्कृति समाज को आपस में बांधे रखती थी।
मनोरंजन के सरल साधन: तब मनोरंजन के लिए ओटीटी प्लेटफॉर्म या वीडियो गेम नहीं थे। गाँवों में नौटंकी, रासलीला, आल्हा गायन या चौपालों पर होने वाले किस्सागोई के कार्यक्रम महीनों पहले से उत्साह का विषय बन जाते थे। बच्चे कंचे, गिल्ली-डंडा, पिट्ठू और कबड्डी खेलकर पसीना बहाते थे, न कि एसी कमरों में बैठकर स्क्रीन पर उंगलियां चलाते थे।
महानगरों का मानवीय चेहरा
उस दौर के महानगर आज के कंक्रीट के जंगलों जैसे संवेदनहीन नहीं थे। दिल्ली, मुंबई, कलकत्ता या चेन्नई जैसे महानगरों में भी एक सांस्कृतिक आत्मीयता जीवित थी।
पड़ोसियों का परिवार होना: महानगरों की कॉलोनियों में रहने वाले लोग अजनबी नहीं होते थे। दीपावली पर पड़ोसी के घर से आई गुजिया और ईद पर आई सेवइयां केवल मिठाइयां नहीं, बल्कि दिलों के रिश्ते तय करती थीं। बच्चों की देखभाल पूरा मोहल्ला मिलकर करता था। अगर कोई बच्चा गलती करता था, तो किसी भी पड़ोसी को उसे डांटने का नैतिक अधिकार होता था और माता-पिता इसे बुरा मानने के बजाय धन्यवाद देते थे।
साइकिल और सार्वजनिक परिवहन: सड़कों पर कारों का रेला नहीं था। साइकिलों की घंटियां, स्कूटरों का धुआंरहित चलना और डीटीसी या बेस्ट की बसों में सफर करते हुए अजीवियों के बीच होने वाली सहज बातचीत महानगरों को एक मानवीय चेहरा देती थी। लोग सफर में भी अकेले नहीं होते थे; एक-दूसरे से बात करके रास्ता कैसे कट जाता था, पता ही नहीं चलता था।
दूरदर्शन और रेडियो: तकनीक जो जोड़ती थी, काटती नहीं
नब्बे के दशक में तकनीक थी, लेकिन वह हमारे जीवन पर हावी नहीं थी। घरों में एकमात्र 'दूरदर्शन' या रेडियो (विविध भारती) हुआ करता था।
रविवार की सुबह 'महाभारत' या 'शक्तिमान' देखने के लिए पूरा देश थम जाता था। स्ट्रीट लाइट्स के नीचे या एक ही टीवी सेट के सामने पूरा मोहल्ला जमा हो जाता था। वह स्क्रीन हमें बांधती थी, अलग-थलग नहीं करती थी। चित्रों, विज्ञापनों और गानों (जैसे चित्रहार या रंगोली) की अपनी एक मासूमियत थी। लोग पत्र लिखते थे और हफ्तों डाकिए का इंतजार करते थे। वह इंतजार भी अपने आप में एक प्रेम था, एक उम्मीद थी।
पतन की शुरुआत और आज का एकाकीपन
जैसे-जैसे दशक का अंत हुआ और नई शताब्दी ने करवट ली, तकनीक ने हमारे जीवन में पैठ बनानी शुरू की। कंप्यूटर आए, मोबाइल आए और इंटरनेट ने सब कुछ बदल दिया। भौतिक सुख-सुविधाएँ बढ़ीं, बैंक-बैलेंस बढ़े, बड़े-बड़े मॉल और गगनचुंबी इमारतें खड़ी हो गईं, लेकिन इन सबके बीच मनुष्य सिकुड़ता चला गया।
आज हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं जहाँ हमारे पास दुनिया भर की खबरें एक सेकंड में पहुंच जाती हैं, लेकिन पास के कमरे में बैठे अपने ही बेटे या जीवनसाथी के मन की थाह हमें नहीं मिलती। हम आभासी (virtual) दुनिया के राजा हैं, पर वास्तविक जीवन में दरिद्र हो चुके हैं। आज का महानगर कंक्रीट, कांच और कैमरों से लैस है, पर वहां करुणा और संवाद का अकाल है।
निष्कर्ष: स्मृतियों की शरणस्थली
जब शरीर थक जाता है और मन इस मशीनी जीवन से ऊब जाता है, तब नब्बे का वह दशक एक शरणस्थली की तरह मन के क्षितिज पर उभरता है। वह समय हमें याद दिलाता है कि मनुष्य होने का अर्थ केवल सांस लेना या धन कमाना नहीं है, बल्कि महसूस करना है—दूसरों के दुःखों में रोना और सुखों में मुस्कुराना है।
वह दशक इस बात का प्रमाण है कि इंसानियत को जिंदा रखने के लिए महंगे गैजेट्स की नहीं, बल्कि एक खुले दिल और एक-दूसरे के प्रति अगाध प्रेम की आवश्यकता होती है। आज भले ही हम उस समय में वापस नहीं लौट सकते, लेकिन अपनी स्मृतियों में उस दशक के संस्कारों को जीवित रखकर हम अपनी इस यंत्रवत होती जिंदगी में थोड़ी सी आत्मीयता की ऑक्सीजन जरूर घोल सकते हैं।

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