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शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

उत्तराखंड की सुलगती चीखें और प्रगति का आत्मघाती रथ


उत्तराखंड
अभिशप्त है। जंगली जानवरों के हमले में आए दिन निर्दोष एवं भोले-भाले मानवों के जीवन समाप्त हो रहे हैं। बृहस्पतिवार, 5 नवंबर 2026 को पुनः एक निर्दोष किशोर, गुलदार के हमले में मृत्यु का ग्रास बन गया। चंपावत की ग्राम पंचायत सुई पऊ के डूंगी तोक में गुलदार ने 13 वर्षीय बालक पर हमला कर उसे मार दिया। यह दुर्घटना घर से केवल 50 मीटर दूर घटी, जहाँ घात लगाकर बैठे हिंसक पशु ने बालक पर हमला किया और उसके घायल शरीर को खींचते हुए झाड़ियों की ओर ले गया। दुर्घटना से पूरे गाँव में भय व्याप्त है। प्रदेश में इस वर्ष अब तक वन्यजीवों के हमले में यह 58वीं मौत है। गांव की सीमा से बाहर दूसरे गांव में ऐसा भय कम है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उस गांव का किशोर थोड़े ही मरा है। इसी प्रकार ऐसे गांवों की सीमा से लगा लघु बाजार भी इस घटना से इतना ही मर्माहत हुआ कि कुछ समय के लिए घटना पर पश्चाताप करके पुनः दीवाली की वस्तुओं को बेचने में व्यस्त हो गया है। इसी प्रकार अन्य गांव, अन्य जनपद, प्रदेश, प्रादेशिक मुख्यमंत्री, वनमंत्री, शासन, प्रशासन तथा प्रदेश के लोगों को भी इस घटना या पूर्व में घटी ऐसी घटनाओं से इतनी ही संवेदना रही कि उन्होंने कृपा करके कुछ क्षण का क्षोभ मनाया तथा पुनः प्रगति की आत्मघाती यात्रा में आगे बढ़ चले।

हिंसक पशुओं के आतंक से त्रस्त ग्रामीणों की वेदनाओं से पूर्णतः पृथक प्रदेश के मुख्यमंत्री से लेकर अन्य मंत्री व शासन-प्रशासन के अनेक पदाधिकारी दीवाली उत्सव की तैयारियों में व्यस्त हैं। वे आम आदमी के पास केवल और केवल वोट माँगने आते हैं। धरातल पर एकदम घटिया ऐसे तथाकथित लोकतंत्र में देवभूमि के ग्रामीण अंचल के लोगों के जीवन का मूल्य क्या है, यह वन्यजीवों द्वारा उन पर किए जा रहे लगातार हमलों के बाद भी अचेतावस्था में पड़ी केंद्र से लेकर प्रदेश स्तर तक की सरकारों के क्रूर उपेक्षापूर्ण व्यवहार से स्पष्ट परिलक्षित होता है। यदि ग्रामीण मनुष्यों के जीवन का कोई मूल्य नहीं है, उनके जीवन मूल्यवान एवं सम्माननीय नहीं हैं, तो मंत्री एवं शासकीय पदाधिकारी बात-बात पर लोगों को लोकतंत्र की व्यर्थ शिक्षा देने एवं चुनावों में सम्मिलित होने का अनुरोध करने, हाथ जोड़े उनके पास क्यों जाते हैं! उन्हें तो उन जंगली जानवरों, हिंसक पशुओं एवं वन्यजीवों से वोट माँगने चाहिए, जिनके लिए तरह-तरह के कठोर वन कानून बना दिए गए हैं। ऐसे कानून बना दिए गए हैं कि मनुष्य यदि आत्मरक्षा के लिए भी वन्यजीवों की जान ले ले तो उस पर कानून तोड़ने का आरोप लगाकर उसे दंडित कर दिया जाता है। यह कैसी विडंबना है! आखिर किसने ऐसी धारणाएँ फैला दीं कि मनुष्य के जीवन के लिए संकट बने वन्यजीवों को मारा नहीं जाना चाहिए, उन्हें पाला-पोसा जाना चाहिए और मनुष्य के लिए संकट नहीं बनने वाले बकरी, भेड़, मुर्गा, गाय, भैंस आदि जीवों का मांसाहार खाया जाना चाहिए! धन्य रे तथाकथित लोकतंत्र! तेरी इन नीतियों पर थूकूँ या फिर मलमूत्र से इन्हें ढक दूँ?

चंपावत के 13 वर्षीय हर्षित के परिजनों के मन की पीड़ा तक कोई पहुँच भी पाएगा? हर्षित जैसे उन 57 दिवंगतों के परिजनों के दुःख को कोई जीवित बचा हुआ संवेदनशील व्यक्ति स्पर्श भी कर सकता है, जिन्हें हर्षित की तरह ही बाघ, गुलदार, भालू या किसी अन्य वन्यजीव ने अपना आखेट बनाया है। कोई भी इनके दुःख को तब तक स्पर्श नहीं कर सकता जब तक इनकी जैसी परिस्थिति से न घिरे। इस निकृष्ट दुनिया के मशीनी लोगों के पास स्वार्थ की अधिकता है। वे केवल बड़ी-बड़ी बातें बनाना जानते हैं। वे पीड़ित व्यक्ति के दुःख-दर्द व वेदनाओं से पूर्णतः अनभिज्ञ हैं। यदि प्रदेश के मुख्यमंत्री के मन, विचारों एवं आत्मा में संवेदनाएँ होतीं तो वे ऐसे दिवंगतों के परिजनों को सांत्वना देने स्वप्रेरणा द्वारा उनसे प्रत्यक्ष भेंट करने जाते तथा उन्हें व शेष ग्रामीण उत्तराखंडी समाज को आश्वस्त करते कि भविष्य में ऐसी दुर्घटनाएँ रोकी जाएँगी। वे उत्तराखंड-वासियों को सुरक्षा की भावना प्रदान करते। उन्हें जंगली जानवरों से सुरक्षित करने के लिए नई नीतियाँ बनाकर उनका क्रांतिकारी क्रियान्वयन करते। किंतु ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिल रहा। डबल इंजन की सरकारें प्रगति की सबसे बड़ी ठेकेदार बनी हुई हैं। इन्होंने प्रगति को ऐसे आयाम तक पहुँचा दिया है, जहाँ प्रगति के पड़ाव में पड़ने वाले उत्सवों की समयावधि में यदि उन्हें जंगली जानवरों के हमलों में मरने वालों के समाचार सुनाई देते हैं तो वे ऐसे समाचारों को सहज ही भूल जाते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि प्रगति के लिए संवेदना की कोई आवश्यकता नहीं है। वे मानते हैं कि प्रगति के मुकुट पर यदि वन्यजीवों के संरक्षण की नीतियों से अधिक तेज चमकता है, तो फिर ऐसे वन्यजीवों द्वारा ग्रामीणों के भक्षण की घटनाएँ उनके लिए व्यर्थ हैं।


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