मित्र

पलायन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
पलायन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 4 नवंबर 2026

पहाड़ का रक्त रंजित यथार्थ: पौड़ी में वन्यजीवों का आतंक, शासकीय उपेक्षा और टूटती जन-जिजीविषा



उत्तराखंड के पौड़ी जनपद में मांसाहारी एवं रक्तपिपासु वन्यजीवों का आतंक तीव्रतापूर्वक फैल रहा है। आज 4 नवंबर 2026 को देहरादून से प्रसारित होनेवाले लगभग सभी दैनिक समाचार-पत्रों ने पौड़ी जनपद में घर के आँगन से दो बच्चियों को उठाने का समाचार प्रमुखता से प्रकाशित किया है। केवल पौड़ी जनपद में वन्यजीवों के आक्रमण में मरने वाले मनुष्यों की संख्या 57 या संभवतः इससे भी अधिक हो चुकी है। उत्तराखंड के किसी अन्य जनपद में ऐसी स्थितियां नहीं है। यह कांडे (कांटे) इसी जनपद में लगे हुए हैं। सामान्य व्यक्तियों, परिवारों, ग्रामीणों एवं नागरिकों का दुर्भाग्य ये है कि बाघ, चीता, भालू एवं अन्य वन्य जीवों के आक्रमण में उनके मरने तथा घायल होने का राज्य शासन, प्रशासन, जननेता एवं समाज पर कोई प्रभाव नहीं है। प्रदेश के पौड़ी जनपद का ग्रामीण एवं यहां तक कि नगरीय, उपनगरीय व लघुनगरीय जनजीवन शासन-प्रशासन के भरोसे तो किंचित नहीं चल रहा है। यह बड़ी विडंबनाजन्य स्थिति है। 

उत्तराखंड की सुरम्य वादियों, शांत पर्वत श्रृंखलाओं और देवतुल्य आबोहवा के बीच बसा पौड़ी गढ़वाल आज एक ऐसे भयावह मानवीय संकट के दौर से गुजर रहा है, जिसकी कल्पना भी आधुनिक नागरिक समाज में दुस्वप्न जैसी प्रतीत होती है। आज चार नवंबर 2026 को राजधानी देहरादून से प्रकाशित लगभग सभी प्रमुख दैनिक समाचार-पत्रों के प्रथम पृष्ठ पर छपी एक दिल दहला देने वाली खबर ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। पौड़ी जनपद के ग्रामीण अंचल में अपने ही घर के आँगन से दो निर्दोष मासूम बच्चियों को आदमखोर वन्यजीव द्वारा उठाकर ले जाने और उन्हें अपना शिकार बना लेने की घटना केवल एक दुखद दुर्घटना भर नहीं है, बल्कि यह उस क्रूर सत्य का नग्न प्रदर्शन है जिससे पौड़ी का जन-जन प्रतिदिन जूझ रहा है। यह घटना इस बात की चीख-चीख कर गवाही दे रही है कि उत्तराखंड के अन्य जिलों की तुलना में पौड़ी जनपद में मांसाहारी एवं रक्तपिपासु वन्यजीवों—विशेषकर बाघ, गुलदार (चीता) और भालू—का आतंक अत्यंत तीव्र, हिंसक और अनियंत्रित रूप धारण कर चुका है।

आंकड़ों की भयावहता पर दृष्टि डालें तो अब तक केवल पौड़ी जनपद में वन्यजीवों के घातक आक्रमणों में अपनी जान गंवाने वाले इंसानों की संख्या सत्तावन तक पहुँच चुकी है, और स्थानीय स्तर पर यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है। राज्य के किसी भी अन्य जनपद में ऐसी विकट, असुरक्षित और आतंकित स्थितियां विद्यमान नहीं हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि आपदा, भय और मृत्यु के ये तीखे काँटे केवल इसी जनपद के भाग्य में रोपे गए हैं।

सबसे दुखद और विडंबनापूर्ण पहलू यह है कि सामान्य नागरिकों, निरपराध ग्रामीणों, असहाय परिवारों और दैनंदिन जीवन के लिए संघर्षरत लोगों के लिए वन्यजीवों का यह हमला केवल शारीरिक क्षति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनकी मानवीय गरिमा और अस्तित्व पर सीधा प्रहार है। लगातार होती मौतों और घायलों की बढ़ती संख्या के बावजूद, ऐसा लगता है कि राज्य शासन, स्थानीय प्रशासन, जन प्रतिनिधियों और व्यापक समाज की संवेदनाएं पूरी तरह शून्य हो चुकी हैं। जनमानस में यह गहरा मर्मान्तिक बोध बैठ चुका है कि उनकी चीखों, उनके आंसुओं और उनके बिखरते परिवारों का सत्ता के गलियारों पर रत्ती भर भी प्रभाव नहीं पड़ता। पौड़ी का ग्रामीण, नगरीय, उपनगरीय और लघुनगरीय जनजीवन आज पूरी तरह लावारिस स्थिति में है। लोग शासन-प्रशासन के भरोसे तो बिल्कुल नहीं जी रहे हैं, वे तो केवल भाग्य, ईश्वर और दिन बित जाने की आस पर अपनी सांसें गिन रहे हैं। यह एक अत्यंत गंभीर विडंबनाजन्य स्थिति है जो एक आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल सिद्धांतों पर गहरे प्रश्नचिह्न खड़े करती है।

इस पूरे संकट के मूल में जाने पर यह स्पष्ट होता है कि पौड़ी जनपद की भौगोलिक संरचना, कृषि और जनसांख्यिकी में आए बदलावों ने वन्यजीव-मानव संघर्ष को एक विकराल रूप दे दिया है। पिछले कुछ दशकों में पौड़ी के ग्रामीण क्षेत्रों से व्यापक स्तर पर पलायन हुआ है। रोजगार, स्वास्थ्य और शिक्षा की मूलभूत सुविधाओं के अभाव में गाँव के गाँव खाली हो गए हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में भूतहा गाँव कहा जाने लगा है। इन खाली पड़े गाँवों और उनके आसपास के कृषि खेतों में मानव बसाव न होने के कारण झाड़ियों, कंटीली वनस्पतियों और घने जंगलों का साम्राज्य स्थापित हो गया है। जो खेत कभी लहलहाते थे, वे अब हिंसक पशुओं के छिपने और शिकार की प्रतीक्षा करने के सुरक्षित अड्डे बन चुके हैं। मानव आबादी के घटने और प्राकृतिक आवरण के घरों के दरवाजे तक पहुँच जाने से गुलदार और बाघ जैसे हिंसक प्राणी जंगल की सीमाओं से निकलकर सीधे मानव बस्तियों में प्रविष्ट हो चुके हैं। वे अब जंगल में शिकार खोजने के बजाय आसानी से उपलब्ध होने वाले मानव शिशुओं, वृद्धों और पालतु पशुओं को अपना निवाला बना रहे हैं।

इस मानवीय त्रासदी का सबसे कारुणिक और हृदयविदारक पहलू बच्चों और महिलाओं की स्थिति है। पहाड़ी जीवन की दिनचर्या में पानी लाना, मवेशियों के लिए चारा जुटाना, लकड़ी चुनना और खेती-बाड़ी के काम मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा संभाले जाते हैं। वहीं बच्चे घर के आँगन में या स्कूल के रास्तों पर खेलते-पढ़ते हैं। आज पौड़ी के किसी भी गाँव में सूरज ढलने से पहले ही सन्नाटा पसर जाता है। माताएं अपने बच्चों को घर से बाहर भेजने में कांपती हैं। चार नवंबर की घटना, जिसमें दो मासूम बच्चियों को उनके ही घर के आँगन से उठाकर मार डाला गया, यह दर्शाती है कि अब पहाड़ी घरों की चारदीवारी और आँगन भी सुरक्षित नहीं रहे। आँगन, जो किसी भी परिवार के उल्लास, क्रीड़ा और सुरक्षा का केंद्र होता है, अब मृत्यु का जाल बन चुका है। बच्चों की खिलखिलाहट की जगह माताओं की चीत्कार ने ले ली है। जब कोई बच्चा स्कूल के लिए निकलता है, तो उसके माता-पिता के मन में यह आशंका बनी रहती है कि वह सकुशल लौटेगा या नहीं। यह मानसिक प्रताड़ना किसी भी सामान्य समाज को दी जाने वाली सबसे बड़ी सजा है।

उत्तराखंड के अन्य जनपदों से जब पौड़ी की तुलना की जाती है, तो विषमता और अधिक स्पष्ट हो जाती है। यद्यपि वन्यजीवों की मौजूदगी अन्य पहाड़ी जिलों में भी है, लेकिन पौड़ी में मौतों का यह आंकड़ा न केवल चिंताजनक है बल्कि असामान्य भी है। सवाल उठता है कि क्या पौड़ी का वन विभाग और वन्यजीव प्रबंधन पूरी तरह से निष्क्रिय और अक्षम हो चुका है? क्या इस जनपद में आदमखोर घोषित किए गए हिंसक पशुओं को पकड़ने या ट्रेंकुलाइज करने के लिए आवश्यक संसाधनों और संकल्पशक्ति का अभाव है? उत्तर स्पष्ट रूप से हाँ की ओर इशारा करता है। वन विभाग का रवैया प्रायः घटनाओं के बाद केवल औपचारिक कागजी कार्रवाई करने, मुआवजा बांटने की प्रक्रिया शुरू करने या गश्त लगाने का खोखला दावा करने तक सीमित रह जाता है। जो हिंसक प्राणी एक बार इंसान के खून का स्वाद चख लेता है, वह बार-बार बस्तियों का रुख करता है। इसके बावजूद, ऐसे पशुओं को समय रहते 'आदमखोर' घोषित करने, उन्हें पिंजरे में कैद करने या नियमानुसार समाप्त करने की प्रशासनिक प्रक्रिया इतनी जटिल, सुस्त और संवेदनहीन है कि जब तक निर्णय लिया जाता है, तब तक दो-चार और बेगुनाह लोग अपनी जान गंवा चुके होते हैं।

प्रशासन और शासन की इस संवेदनहीनता ने आम नागरिकों के मन में राज्य व्यवस्था के प्रति गहरा अविश्वास पैदा कर दिया है। राज्य गठन के समय यह सपना देखा गया था कि पर्वतीय क्षेत्रों के निवासियों को अपनी समस्याओं का त्वरित और संवेदनशील समाधान अपनी ही राजधानी से मिलेगा। लेकिन आज पौड़ी का नागरिक खुद को पूरी तरह ठगा हुआ और उपेक्षित महसूस कर रहा है। जन प्रतिनिधियों का रवैया भी इस त्रासदी में अत्यंत निराशाजनक रहा है। चुनाव के समय घर-घर जाकर वोट मांगने वाले नेता और मंत्री ऐसी वीभत्स घटनाओं के बाद केवल औपचारिक संवेदना व्यक्त करने या मृतक के परिजनों को दो-चार लाख रुपये के मुआवजे की घोषणा करने तक सीमित रहते हैं। क्या किसी मासूम बच्ची की जिंदगी, किसी परिवार के मुख्य कमाने वाले सदस्य की मृत्यु की कीमत मुआवजे के कुछ चेक से चुकाई जा सकती है? यह मुआवजा नीति वास्तव में शासन की विफलता को छिपाने का एक संवेदनहीन साधन बन चुकी है, जिसने मानवीय जीवन के मूल्य को कौड़ियों के भाव ला खड़ा किया है।

इस संकट के कारण पौड़ी का केवल ग्रामीण जीवन ही प्रभावित नहीं हो रहा है, बल्कि नगरीय, उपनगरीय और लघुनगरीय क्षेत्र भी इसके सीधे प्रभाव में आ चुके हैं। पौड़ी शहर, कोटद्वार के आसपास के मैदानी व उपनगरीय क्षेत्र, श्रीनगर गढ़वाल के आसपास की बस्तियाँ, सतपुली, रिखणीखाल, थलीसैंण, जहरीखाल, द्वारिखाल और पोखड़ा जैसे छोटे नगरों एवं कस्बों में भी शाम होते ही दहशत का माहौल बन जाता है। लघुनगरीय क्षेत्रों में जहाँ शाम को व्यापारिक गतिविधियाँ चलनी चाहिए, जहाँ बच्चे पार्क या मैदानों में खेलने चाहिए, वहाँ सन्नाटा पसर जाता है। लोग अपने घरों के खिड़की-दरवाजे बंद करके दुबकने को मजबूर हैं। शाम के समय ट्यूशन से लौटने वाले छात्र, दुकानों से लौटने वाले व्यापारी, या काम निपटाकर घर लौटने वाले मजदूर—हर कोई एक अनजाने भय के साये में जीने को मजबूर है। सड़कों पर स्ट्रीट लाइटों का न होना या उनका खराब रहना इस खतरे को कई गुना बढ़ा देता है।

इस स्थिति ने स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है। कृषि और पशुपालन जो पहाड़ी अर्थव्यवस्था की रीढ़ थे, वे पहले ही वन्यजीवों द्वारा फसलों की बर्बादी और मवेशियों के शिकार के कारण दम तोड़ रहे थे। अब जब इंसानी जान पर बन आई है, तो लोगों ने खेतों की ओर जाना ही छोड़ दिया है। बंजर जमीन का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे वन्यजीवों को बस्तियों के और करीब आने का अवसर मिल रहा है। पशुपालन, जिससे ग्रामीणों को दुग्ध उत्पादन और अतिरिक्त आय होती थी, अब घाटे और खतरे का सौदा बन चुका है। जब मवेशी ही सुरक्षित नहीं हैं और चरवाहे अपनी जान जोखिम में नहीं डालना चाहते, तो पशुपालन का स्वतः अंत होना स्वाभाविक है। इस आर्थिक तंगी और सतत भय के वातावरण ने बचा-खुचा पलायन भी तेज कर दिया है। जो लोग अब तक अपनी मातृभूमि की जड़ों से जुड़े हुए थे, वे भी अब अपने बच्चों की जान बचाने के लिए अपने पुश्तैनी घरों को छोड़कर मैदानी इलाकों में झुग्गियों या किराए के मकानों में रहने को विवश हो रहे हैं। यह स्थिति केवल पौड़ी के लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण उत्तराखंड की पर्वतीय संस्कृति, पहचान और जनसांख्यिकीय संतुलन के लिए एक विनाशकारी संकेत है।

वन्यजीव संरक्षण और मानव अधिकार के बीच का संतुलन भी इस बहस का एक महत्वपूर्ण पहलू है। हमारे देश में पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के लिए अत्यंत कठोर कानून बनाए गए हैं, जो अपने आप में वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए आवश्यक भी हैं। परंतु जब वन्यजीव संरक्षण का जुनून इस सीमा तक पहुँच जाए कि वह इंसानी जीवन से अधिक महत्वपूर्ण मान लिया जाए, तो वहां न्याय और नैतिकता की सीमाएं समाप्त हो जाती हैं। पौड़ी के ग्रामीणों का अक्सर यह कहना होता है कि वन कानून पशुओं की रक्षा तो पूरी तत्परता से करते हैं, लेकिन इंसान की जान की सुरक्षा के मामले में मौन हो जाते हैं। जब कोई हिंसक वन्यजीव बस्तियों में हमला करता है, तो स्थानीय लोग आत्मरक्षा में भी कदम उठाने से डरते हैं, क्योंकि उन पर कानूनी कार्रवाई का शिकंजा कसने का खतरा मंडराता रहता है। वहीं दूसरी ओर, वन विभाग के अधिकारी कानूनी पेचीदगियों और वन्यजीव प्रेमियों की आपत्तियों का हवाला देकर त्वरित कार्रवाई करने से बचते हैं। यह असंतुलन पूरी तरह से तर्कहीन और अन्यायपूर्ण है। किसी भी लोकतांत्रिक और मानवीय समाज में नागरिक का जीने का अधिकार सबसे मौलिक और सर्वोपरि अधिकार होना चाहिए, जिसकी रक्षा करना राज्य का प्राथमिक कर्तव्य है।

पौड़ी जनपद में लगातार बढ़ते इस संकट का एक और मुख्य कारण वन विभाग की कार्यप्रणाली में सुधार का न होना और आधुनिक तकनीकों का अभाव है। आज के समय में जब ड्रोन तकनीक, थर्मल इमेजिंग, जीपीएस ट्रैकिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी उन्नत प्रणालियाँ उपलब्ध हैं, तब भी पौड़ी में वनकर्मी पुरानी और पारंपरिक पद्धतियों के सहारे आदमखोरों की तलाश करते नजर आते हैं। घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों में एक हिंसक गुलदार या बाघ को केवल लाठी और पुरानी बंदूकों के सहारे खोजना न केवल अप्रभावी है बल्कि स्वयं वनकर्मियों की जान के लिए भी खतरनाक है। वन विभाग के पास न तो पर्याप्त मात्रा में प्रशिक्षित जनशक्ति है और न ही आधुनिक उपकरण। वन्यजीव राहत दल (रेस्क्यू टीम) की संख्या अत्यंत सीमित है और वे मुख्यालयों से इतनी दूर स्थित होते हैं कि घटना की सूचना मिलने के घंटों बाद मौके पर पहुँचते हैं। तब तक हिंसक पशु अपने शिकार को निगलकर दूर घने जंगलों में गायब हो चुका होता है।

इसके अतिरिक्त, जंगलों में वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और भोजन की कमी भी इस समस्या की एक बड़ी वजह है। उत्तराखंड के जंगलों में बड़े पैमाने पर चीड़ (पाइन) के पेड़ों का विस्तार हुआ है। चीड़ का जंगल जैव विविधता के दृष्टिकोण से अत्यंत निर्धन माना जाता है। चीड़ के पत्तों (पिरुल) के कारण न तो ज़मीन पर हरी घास उगती है और न ही फलदार वृक्ष पनप पाते हैं। इसके परिणामस्वरूप शाकाहारी वन्यजीव जैसे हिरण, सांभर, काकड़ और जंगली सूअर की संख्या में भारी कमी आई है या वे अन्य क्षेत्रों की ओर चले गए हैं। जब जंगल के भीतर मांसाहारी जीवों को भोजन नहीं मिलता, तो वे स्वाभाविक रूप से बस्तियों की ओर रुख करते हैं जहाँ उन्हें आसानी से पालतू मवेशी और इंसान मिल जाते हैं। राज्य सरकार और वन विभाग ने पिछले कई दशकों में जंगलों के इस पारिस्थितिकीय विनाश को रोकने या चौड़ी पत्ती वाले प्राकृतिक वनों (जैसे बांझ, बुरांश) के पुनरुद्धार के लिए कोई ठोस और दीर्घकालिक नीति नहीं बनाई। इस नीतिगत विफलता का भुगतान आज पौड़ी के निर्दोष ग्रामीण अपनी जान देकर कर रहे हैं।

पौड़ी के इस मानवीय संकट पर समाज की खामोशी और बौद्धिक वर्ग की उदासीनता भी कम दुखद नहीं है। जब भी देश के किसी बड़े शहर में या किसी मैदानी राज्य में ऐसी कोई घटना होती है, तो राष्ट्रीय मीडिया, मानवाधिकार संगठन और सामाजिक कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आते हैं और बड़ी-बड़ी बहसें आयोजित की जाती हैं। लेकिन पौड़ी की पहाड़ियों में जब दो मासूम बच्चियों को गुलदार खींच कर ले जाता है या किसी वृद्ध महिला को भालू नोच-नोच कर मार डालता है, तो यह खबर केवल स्थानीय दैनिक समाचार-पत्रों के पन्नों तक सीमित रह जाती है। मुख्यधारा का मीडिया इसे एक छोटी सी क्षेत्रीय दुर्घटना मानकर अनदेखा कर देता है। यह उपेक्षा दर्शाती है कि देश के भौगोलिक और राजनीतिक नक्शे पर दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्रों के नागरिकों का जीवन कितना सस्ता समझ लिया गया है। यह उदासीनता पौड़ी के लोगों के भीतर एक गहरे अलगाव और आक्रोश की भावना को जन्म दे रही है।

आज पौड़ी का ग्रामीण पूरी तरह से असहाय और निराशा के अंधकार में डूब चुका है। जब शासन, प्रशासन, कानून और समाज सभी उनकी रक्षा करने में विफल साबित हो रहे हैं, तो लोग अपनी सुरक्षा के लिए स्वयं छोटे-मोटे प्रयास करने को विवश हैं। ग्रामीण अब समूहों में इकट्ठा होकर लाठियां लेकर रात में पहरा देने को मजबूर हैं। बच्चे झुंड में स्कूल जाने को मजबूर हैं, लेकिन ये अस्थायी और सीमित उपाय किसी खूंखार और आदमखोर मांसाहारी पशु के सामने कितने कारगर हो सकते हैं, यह समझना कठिन नहीं है। एक आदमखोर गुलदार या बाघ अंधेरे का फायदा उठाकर पलक झपकते ही हमला करता है और गायब हो जाता है। ऐसे में निहत्थे ग्रामीणों द्वारा दिया जाने वाला पहरा केवल उनके आत्मसंतोष के लिए है, वास्तविक सुरक्षा के लिए नहीं।

इस भयावह विडंबनाजन्य स्थिति से पौड़ी जनपद को बाहर निकालने के लिए अब केवल कोरी संवेदनाओं, बयानों और मामूली मुआवजों से काम नहीं चलने वाला है। इसके लिए राज्य सरकार और संपूर्ण शासन तंत्र को एक युद्ध स्तर पर व्यापक, कठोर और दीर्घकालिक रणनीति अपनानी होगी। सबसे पहले, पौड़ी जनपद को 'विशेष वन्यजीव आपदा प्रभावित क्षेत्र' घोषित किया जाना चाहिए। जब किसी क्षेत्र में मौतों का आंकड़ा पचास से ऊपर निकल जाए और हर दिन इंसानी जीवन पर संकट बना रहे, तो इसे एक सामान्य कानून-व्यवस्था या वन विभाग का नियमित मामला मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। इसे एक प्राकृतिक आपदा की भांति गंभीरता से लिया जाना चाहिए और त्वरित राहत एवं बचाव कार्य शुरू किए जाने चाहिए।

द्वितीय चरण में, पौड़ी जनपद के अति संवेदनशील और गंभीर रूप से प्रभावित ग्रामीण एवं उपनगरीय क्षेत्रों में तत्काल प्रभाव से आदमखोर वन्यजीवों को पकड़ने के लिए बड़े पैमाने पर रेस्क्यू अभियान चलाया जाना चाहिए। इसके लिए केवल स्थानीय वनकर्मियों के भरोसे रहने के बजाय राष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञों, शूटरों और ट्रैकर्स की सेवाएं ली जानी चाहिए। जो वन्यजीव इंसानों पर हमले करने के आदी हो चुके हैं और जिन्हें ट्रेंकुलाइज करके पकड़ना संभव न हो, उन्हें तुरंत आदमखोर घोषित कर समाप्त करने की सख्त और त्वरित प्रक्रिया लागू की जानी चाहिए। प्रशासनिक लालफीताशाही और कागजी औपचारिकताओं के कारण किसी भी स्थिति में इंसानी जान की बलि नहीं दी जानी चाहिए।

तृतीय चरण में, तकनीकी और बुनियादी ढांचे में क्रांतिकारी बदलाव की आवश्यकता है। पौड़ी के प्रत्येक प्रभावित गाँव और बस्तियों के आसपास सोलर फेंसिंग (सौर ऊर्जा से चलने वाली बाड़बंदी), हाई-मास्ट सोलर लाइटें और थर्मल कैमरों की व्यवस्था की जानी चाहिए। गाँव के रास्तों और घरों के आँगन में पर्याप्त रोशनी होने से हिंसक पशुओं के अचानक हमले की संभावना काफी हद तक कम हो जाती है। इसके अलावा, ड्रोन कैमरों की मदद से बस्तियों के आसपास छिपकर बैठे वन्यजीवों की निगरानी की जानी चाहिए और जैसे ही कोई हिंसक पशु गाँव की सीमा में प्रवेश करे, एक स्वचालित अलार्म प्रणाली के माध्यम से ग्रामीणों को सतर्क कर दिया जाना चाहिए।

चौथे चरण में, वनों के पुनरुद्धार और झाड़ी कटान की एक व्यापक योजना लागू की जानी चाहिए। खाली पड़े भूतहा गाँवों और कृषि भूमि के आसपास उगी घनी झाड़ियों, विशेषकर लांटाना और कंटीली वनस्पतियों की सफाई मनरेगा और अन्य सरकारी योजनाओं के माध्यम से नियमित रूप से कराई जानी चाहिए। जब घरों और रास्तों के आसपास का क्षेत्र साफ रहेगा, तो वन्यजीवों को छिपने की जगह नहीं मिलेगी। साथ ही, जंगलों के भीतर चौड़ी पत्ती वाले वृक्षों का पौधारोपण किया जाना चाहिए और पानी के प्राकृतिक स्रोतों (पोखर, ताल) का निर्माण किया जाना चाहिए ताकि वन्यजीवों को भोजन और पानी के लिए इंसानी बस्तियों का रुख न करना पड़े।

पांचवें और सबसे महत्वपूर्ण चरण में, राज्य सरकार को अपनी मुआवजा नीति और सामाजिक सुरक्षा तंत्र पर पुनर्विचार करना होगा। मुआवजा कोई समाधान नहीं है, लेकिन यदि कोई अप्रिय घटना घटती है, तो पीड़ित परिवार को त्वरित, सम्मानजनक और पर्याप्त वित्तीय सहायता के साथ-साथ परिवार के किसी एक सदस्य को सरकारी या अर्ध-सरकारी सेवा में रोजगार की गारंटी दी जानी चाहिए। इसके अलावा, पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले प्रत्येक नागरिक का राज्य सरकार द्वारा निःशुल्क दुर्घटना एवं वन्यजीव क्षति बीमा कराया जाना चाहिए।

निष्कर्षतः, चार नवंबर 2026 को देहरादून से प्रसारित समाचार-पत्रों में छपी वह खबर केवल पौड़ी के दो परिवारों का शोक गीत नहीं है, बल्कि वह संपूर्ण उत्तराखंड राज्य के शासन और प्रशासनिक ढांचे के चेहरे पर एक गहरा तमाचा है। 57 से अधिक मौतों का यह वीभत्स आंकड़ा किसी भी सभ्य समाज के लिए एक महा-कलंक है। पौड़ी का जनजीवन आज जिस उपेक्षा, भय और असहायता के दौर से गुजर रहा है, यदि उसे तुरंत दूर न किया गया, तो यह संकट केवल पलायन को ही बढ़ावा नहीं देगा, बल्कि राज्य व्यवस्था के खिलाफ एक व्यापक जनाक्रोश और सामाजिक विस्फोट को जन्म देगा। पहाड़ के लोगों ने हमेशा धैर्य, सहनशीलता और राष्ट्रसेवा का परिचय दिया है, लेकिन उनकी इस सहनशीलता को उनकी कमजोरी मान लेना शासन-प्रशासन की सबसे बड़ी भूल होगी। समय आ गया है कि राज्य सरकार अपनी नींद से जागे, कागजी बहसों और खोखले आश्वासनों से बाहर निकले और पौड़ी के नागरिकों को भयमुक्त जीवन जीने का उनका मौलिक अधिकार वापस लौटाए। जब तक पौड़ी के आँगन सुरक्षित नहीं होंगे, जब तक बच्चों की खिलखिलाहट से भय की छाया नहीं हटेगी, तब तक उत्तराखंड के विकास और सुशासन के तमाम दावे पूरी तरह से झूठे, खोखले और संवेदनहीन ही बने रहेंगे।