1. प्रस्तावना: लोक आस्था, प्रकृति और सूर्य उपासना का सनातन महापर्व WithMyThought
भारतवर्ष को उत्सवों और पर्वों की भूमि कहा जाता है, जहाँ प्रत्येक ऋतु, प्रत्येक कृषि चक्र और प्रत्येक खगोलीय परिवर्तन के साथ किसी न किसी अनुष्ठान का विधान है। किंतु इन समस्त पर्वों में 'छठ महापर्व' अपनी विशिष्टता, कठोर अनुशासन, प्रकृति के प्रति अगाध कृतज्ञता और लोक-संस्कृति के सजीव चित्रण के कारण अद्वितीय स्थान रखता है। यह इकलौता ऐसा पर्व है जिसमें उगते हुए सूर्य के साथ-साथ अस्ताचलगामी (डूबते हुए) सूर्य को भी अर्घ्य दिया जाता है, जो जीवन के सत्य—उत्थान और पतन, दोनों के प्रति भारतीय दर्शन के समभाव का परिचायक है।
बिना किसी पुरोहित, बिना किसी मूर्ति-पूजन के सीधे प्रकृति की शक्तियों—सूर्य, जल, वायु और पृथ्वी—को समर्पित यह पर्व आज केवल बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश की भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दिल्ली से लेकर मुंबई, और सिलिकॉन वैली से लेकर मॉरीशस, लंदन और अमेरिका तक वैश्विक लोक-संस्कृति का एक जीवंत प्रतीक बन चुका है।
2. ऐतिहासिक एवं पौराणिक उत्पत्ति: वैदिक काल से पौराणिक कथाओं तक
छठ पर्व की जड़ें भारत के प्राचीनतम इतिहास, वैदिक ऋचाओं और सनातन पुराणों में बहुत गहराई तक समाहित हैं। इसकी उत्पत्ति और विकास को समझने के लिए हमें इसके विभिन्न ऐतिहासिक और पौराणिक संदर्भों का सूक्ष्म विश्लेषण करना होगा।
(क) वैदिक काल और महर्षि विश्वामित्र का संदर्भ
वैदिक ग्रंथों में सूर्य उपासना का उल्लेख प्रचुरता से मिलता है। ऋग्वेद में सूर्य को जगत की आत्मा (सूर्य आत्मार जगतस्तस्थुषश्च) कहा गया है। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, त्रेता युग में जब भगवान श्रीराम और माता सीता ने अयोध्या का राज्याभिषेक संपन्न किया, तब राजसूय यज्ञ के अनुष्ठान के अवसर पर महर्षि विश्वामित्र के मार्गदर्शन में कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्योपासना का विधिवत विधान हुआ था।
(ख) रामायण काल: सीता-रामायण और मुंगेर का कश्यप ऋषि आश्रम
पौराणिक कथाओं के अनुसार, रावण वध के पश्चात भगवान राम और माता सीता पर ब्रह्महत्या का पाप लगा था। इस पाप से मुक्ति पाने के लिए मुनि विश्वामित्र के आदेश पर राम-सीता ने मुंगेर (बिहार) के वर्तमान ‘ऋषि कुंड’ के निकट गंगा तट पर छह दिनों तक कठोर उपवास रखकर सूर्य देव की पूजा की थी। कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन उन्होंने भगवान सूर्य की आराधना कर क्षमा और शुद्धि प्राप्त की थी। आज भी मुंगेर में माता सीता के चरणों के निशान उस पौराणिक घटना की गवाही देते हैं।
(ग) महाभारत काल: द्रौपदी और पांडवों की कथा
महाभारत काल में छठ पर्व का संदर्भ और अधिक स्पष्ट रूप से उभरता है। जब पांडव जुए में अपना सारा राजपाट हारकर वनवास और अज्ञातवास के कष्ट झेल रहे थे, तब द्रौपदी अत्यंत मानसिक और शारीरिक पीड़ा से गुजर रही थीं। तब महर्षि धौम्य ने द्रौपदी को सूर्य देव की उपासना का यह कठिन व्रत करने का परामर्श दिया था। द्रौपदी ने काम्यक वन में विधि-विधान से यह व्रत किया, जिसके प्रभाव से पांडवों को उनका खोया हुआ राज्य, वैभव और बल पुनः प्राप्त हुआ।
दूसरा प्रसंग महाभारत के महान योद्धा सूर्यपुत्र कर्ण से जुड़ा है। कर्ण प्रतिदिन घंटों कमर भर जल में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देते थे। उनके इसी अनुष्ठान के कारण उन्हें अपराजित योद्धा और दानी माना जाता था। आज भी छठ व्रतियों द्वारा जल में खड़े होकर अर्घ्य देने की परंपरा सीधे तौर पर कर्ण की उपासना पद्धति से जुड़ी हुई है।
(घ) प्रथम सूर्य मंदिर और राजा प्रियव्रत की कथा
श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार, स्वायंभुव मनु के पुत्र राजा प्रियव्रत को कोई संतान नहीं थी। महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराया, जिसके फलस्वरूप रानी मालिनी ने एक पुत्र को जन्म दिया, किंतु वह मृत पैदा हुआ। राजा प्रियव्रत शोक में मृत बालक को लेकर श्मशान पहुंचे और प्राण त्यागने लगे।
तभी ब्रह्मपुत्र देवर्षि नारद प्रकट हुए और उन्होंने राजा को सृष्टि की देवी ‘प्रकृति’ (देवसेना) के बारे में बताया। नारद जी ने कहा कि प्रकृति देवी सृष्टि की मूल प्रवृत्ति का छठा अंश हैं, इसलिए उन्हें ‘षष्ठी देवी’ कहा जाता है जो बच्चों की रक्षा करती हैं और आयु प्रदान करती हैं। राजा प्रियव्रत ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को उपवास रखकर विधि-विधान से षष्ठी देवी की पूजा की। देवी ने प्रसन्न होकर मृत बालक को जीवित कर दिया। तभी से संतान की रक्षा, आरोग्यता और दीर्घायु के लिए यह व्रत लोक-प्रचलित हो गया।
3. छठ महापर्व का चार दिवसीय कठोर और वैज्ञानिक अनुष्ठानिक स्वरूप
छठ पूजा कोई साधारण एक-दिवसीय त्यौहार नहीं है, बल्कि यह 36 घंटे का निर्जला उपवास और चार दिनों की एक आध्यात्मिक साधना है, जो शुद्धता, अनुशासन और समर्पण की पराकाष्ठा है।
[नहाय-खाय] ---> [लोहंडा एवं खरना] ---> [संध्या अर्घ्य (अस्ताचलगामी सूर्य)] ---> [उषा अर्घ्य (उदयगामी सूर्य)]
(क) प्रथम दिन: नहाय-खाय (कार्तिक शुक्ल चतुर्थी)
शुद्धता का आरंभ: इस दिन व्रती प्रातःकाल उठकर गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान करते हैं। यदि नदी उपलब्ध न हो तो घर के जल में गंगा जल मिलाकर स्नान किया जाता है।
सात्विक भोजन: इस दिन घर की पूरी सफाई की जाती है। व्रती और पूरा परिवार केवल एक बार शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण करता है। पारंपरिक रूप से इस दिन कद्दू (लौकी) की सब्जी, चने की दाल और अरवा चावल बनाए जाते हैं, जिसे सेंधा नमक और घी में पकाया जाता है। इस भोजन को ग्रहण करने के बाद अगले 36 घंटों तक अन्न-जल का त्याग शुरू हो जाता है।
(ख) द्वितीय दिन: खरना या लोहंडा (कार्तिक शुक्ल पंचमी)
पूरे दिन का उपवास: पंचमी तिथि को व्रती पूरे दिन अन्न और जल ग्रहण किए बिना उपवास रखते हैं।
शाम का प्रसाद: सूर्यास्त के बाद संध्या के समय मिट्टी के नए चूल्हे पर आम की लकड़ी की आंच से गुड़ की खीर (रसियाव) और गेहूं के आटे की रोटियां बनाई जाती हैं।
व्रती का भोजन: व्रती पहले भोग लगाती हैं और फिर इस प्रसाद को ग्रहण करती हैं। इसके बाद परिवार के अन्य सदस्यों और सगे-सम्बन्धियों को प्रसाद बांटा जाता है। इस प्रसाद को ग्रहण करने के बाद व्रतियों का कठिन 36 घंटे का निर्जला व्रत प्रारंभ हो जाता है, जिसमें पानी की एक बूंद भी गले के नीचे नहीं उतारी जाती।
(ग) तृतीय दिन: संध्या अर्घ्य - डूबते सूर्य को प्रणाम (कार्तिक शुक्ल षष्ठी)
ठेकुवा और पकवानों का निर्माण: इस दिन सुबह से ही बांस की टोकरियों (सूप और दौरा) में मौसमी फल, कंदमूल (सुथनी, शकरकंद, गाजर, अदरक का पौधा), डाभ (नारियल), नींबू, केला और पवित्र प्रसाद 'ठेकुवा' (गेहूं का आटा, गुड़ और घी से बना विशिष्ट पकवान) सजाए जाते हैं।
घाट की यात्रा: शाम को पूरा परिवार सिर पर दउरा (सूप की टोकरी) उठाए पारंपरिक लोकगीतों गाते हुए नदी, तालाब या निर्मित कृत्रिम जलाशयों के घाट की ओर प्रस्थान करता है।
अर्घ्यदान: व्रती पानी के अंदर खड़े होकर डूबते हुए सूर्य (अस्ताचलगामी सूर्य) को दूध और जल से अर्घ्य देते हैं। यह दृश्य अत्यंत भावुक और अलौकिक होता है, जहाँ डूबते सूरज को भी प्रणाम करने की सनातन संस्कृति की महानता दिखाई देती है।
(घ) चतुर्थ दिन: उषा अर्घ्य - उगते सूर्य को प्रणाम (कार्तिक शुक्ल सप्तमी)
रात भर का जागरण: घाट पर या घर के आंगन में रात भर लोकगीत (कोसी भरना, छठी मैया के गीत) गाए जाते हैं। भक्तजन रात भर जागकर जागरण करते हैं।
सुबह का अर्घ्य: सप्तमी तिथि की भोर में, सूरज निकलने से काफी पहले व्रती और उनके परिजन पुनः जल में खड़े हो जाते हैं।
पारण: जैसे ही क्षितिज पर सूर्य की पहली किरण दिखाई देती है, उगते हुए सूर्य (उदयगामी सूर्य) को अंतिम अर्घ्य दिया जाता है। इसके पश्चात व्रती कच्चे दूध का शरबत और थोड़ा सा प्रसाद खाकर अपना 36 घंटे का कठिन उपवास तोड़ते हैं, जिसे 'पारण' कहा जाता है। इसके बाद सभी में प्रसाद का वितरण होता है।
4. भौगोलिक विस्तार और आधुनिक महानगरीय क्रेज: दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य स्थान
पिछले कुछ दशकों में वैश्वीकरण, शहरीकरण और प्रवासन (Migration) के कारण छठ पर्व का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। जो पर्व कभी बिहार के गांवों के चूल्हों और खेतों तक सीमित था, वह आज वैश्विक महानगरों की चमचमाती सड़कों और वीआईपी घाटों का सबसे बड़ा सांस्कृतिक महाकुंभ बन चुका है।
(क) बिहार: लोक-संस्कृति की मूल आत्मा और जनसैलाब
बिहार में छठ पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का सबसे बड़ा पर्व है।
प्रमुख केंद्र: पटना में गंगा के तट (दीघा घाट, गायघाट, महेंद्रू घाट से लेकर बेउर और दानापुर तक), मुंगेर में गंगा तट, हाजीपुर, बेगूसराय, और भागलपुर में ऐसा जनसैलाब उमड़ता है कि पूरा प्रदेश मानों थम जाता है।
जाति और वर्ग की दीवारें टूटना: छठ एक ऐसा पर्व है जहाँ किसी प्रकार का जातिगत, ऊंच-नीच या अमीर-गरीब का भेद नहीं रहता। एक ही घाट पर झोपड़ी में रहने वाला श्रमिक और बहुराष्ट्रीय कंपनी का सीईओ कंधे से कंधा मिलाकर अपनी टोकरी उठाए खड़े होते हैं।
(ख) उत्तर प्रदेश: पूर्वांचल से लेकर राजधानी लखनऊ तक महाकुंभ
उत्तर प्रदेश में खासकर पूर्वांचल (गोरखपुर, वाराणसी, गाजीपुर, बलिया, आजमगढ़, जौनपुर) और अब पश्चिमी व मध्य उत्तर प्रदेश (नोएडा, गाजियाबाद, कानपुर, लखनऊ) में छठ का क्रेज अभूतपूर्व रूप से बढ़ा है।
वाराणसी (काशी): गंगा के घाटों पर लाखों दीपों की रोशनी और हजारों व्रतियों का विहंगम दृश्य देखने लायक होता है। दशाश्वमेध घाट और अस्सी घाट पर विदेशी पर्यटक भी इस संस्कृति को देखने खिंचे चले आते हैं।
नोएडा और गाजियाबाद: दिल्ली से सटे इन एनसीआर शहरों में लाखों पूर्वांचली प्रवासी निवास करते हैं। यहाँ पार्कों, कृत्रिम तालाबों और हाउसिंग सोसाइटियों के अंदर आरडब्ल्यूए (RWA) द्वारा भव्य छठ घाट बनाए जाते हैं, जहाँ डीजे पर बजते पारंपरिक गीत और ढोल-नगाड़ों की गूंज देखते ही बनती है।
(ग) दिल्ली: राजनीतिक और सांस्कृतिक राजधानी में छठ का विराट स्वरूप
दिल्ली में छठ पूजा अब केवल प्रवासियों का पर्व नहीं रहा, बल्कि यह राष्ट्रीय राजधानी की मुख्यधारा की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है।
यमुना घाट और कृत्रिम झीलें: आईटीओ, बदरपुर, सोनिया विहार, कालिंदी कुंज और वज़ीराबाद के यमुना घाटों पर प्रशासन द्वारा विशाल इंतजाम किए जाते हैं।
राजनीतिक महत्व: दिल्ली में लगभग 35-40% आबादी पूर्वांचली मतदाताओं की है, जिसके कारण राजनीतिक दलों (आप, भाजपा, कांग्रेस) द्वारा छठ समितियों को भारी आर्थिक सहायता, वीआईपी टेंट, घाटों पर सुरक्षा, बिजली, पानी और सांस्कृतिक कार्यक्रमों की व्यवस्था प्रदान की जाती है। दिल्ली सरकार द्वारा इस दिन सार्वजनिक अवकाश (Public Holiday) घोषित किया जाना इस पर्व के बढ़ते राजनीतिक और सामाजिक महत्व को प्रमाणित करता है।
(घ) भारत के अन्य महानगर और वैश्विक पटल
मुंबई: जुहू चौपाटी और मड आइलैंड पर उत्तर भारतीय संघों द्वारा भव्य छठ पूजा का आयोजन किया जाता है, जिसमें बॉलीवुड की कई हस्तियां और मराठी मानुष भी बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं।
बेंगलुरु, हैदराबाद और चेन्नई: आईटी हब के रूप में विकसित इन दक्षिण भारतीय शहरों में झीलों और पार्कों के किनारे टेक प्रोफेशनल्स और इंजीनियरों द्वारा सामुदायिक छठ पूजा मनाई जाती है।
वैश्विक स्तर (Global Scale): अमेरिका (न्यू जर्सी, कैलिफोर्निया), ब्रिटेन (लंदन के टेम्स नदी किनारे), मॉरीशस, फिजी, ट्रिनिडाड और टोबैगो, तथा नेपाल के तराई क्षेत्रों में रहने वाले प्रवासी भारतीय आज भी अपनी मिट्टी की खुशबू को जीवित रखते हुए अत्यंत भव्यता के साथ छठ महापर्व का आयोजन करते हैं।
5. छठ पूजा का वैज्ञानिक, दार्शनिक और पर्यावरणीय महत्व
छठ पूजा केवल लोक-आस्था का विषय नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहन वैज्ञानिक, स्वास्थ्यवर्धक और पर्यावरण-संरक्षण से जुड़े अनमोल पहलू छिपे हैं।
(क) वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संबंधी दृष्टिकोण
विटामिन डी और सोलर थेरेपी (Solar Therapy): उगते और डूबते सूर्य की किरणों (इन्फ्रारेड और अल्ट्रावायलेट किरणों का संतुलित अंश) में शरीर को पर्याप्त मात्रा में विटामिन डी मिलता है। जल में खड़े होकर सूर्य की ओर देखने से आंखों की रोशनी तेज होती है और पीनियल ग्रंथि (Pineal Gland) सक्रिय होती है, जिससे मानसिक तनाव कम होता है।
शारीरिक और मानसिक डिटॉक्सिफिकेशन (Detoxification): लगातार 36 घंटे तक बिना जल के रहना शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को बढ़ाता है, आंतों की सफाई करता है और मेटाबोलिज्म को दुरुस्त करता है।
पारंपरिक खानपान की पौष्टिकता: कद्दू, गुड़, शुद्ध घी, गेहूं और मौसमी फल पूरी तरह से ऑर्गेनिक और मौसमी होते हैं, जो सर्दियों के आगमन से पहले शरीर को ऊर्जा और प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करते हैं।
(ख) पर्यावरण संरक्षण (Eco-Friendly Festival)
शून्य कार्बन और पर्यावरण अनुकूल: छठ पर्व में उपयोग होने वाली अधिकांश सामग्री पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल होती है—बांस के सूप, मिट्टी के चूल्हे, गन्ने के डंठल, ताजे फल और पत्ते। इसमें प्लास्टिक के न्यूनतम उपयोग का संदेश दिया जाता है (हालांकि आधुनिक समय में पॉलीथीन के प्रयोग पर रोक लगाने के लिए विशेष अभियान चलाए जाते हैं)।
जल स्रोतों की सफाई: इस पर्व के बहाने ही सही, वर्ष में कम से कम एक बार नदियाँ, तालाब और पोखर बड़े पैमाने पर साफ किए जाते हैं, जो जल संरक्षण का एक बड़ा संदेश देता है।
6. निष्कर्ष: आधुनिकता के दौर में भी अपनी जड़ों से जुड़ा सनातन लोक-पर्व
आज के इस अति-आधुनिक, डिजिटल और भागदौड़ भरे युग में, जहाँ मनुष्य अपनी जड़ों, परंपराओं और प्रकृति से कटता जा रहा है, 'छठ महापर्व' हमें पुनः अपनी मिट्टी, अपने परिवार और अपनी प्रकृति की ओर लौटने का मार्ग दिखाता है। यह इस बात का प्रमाण है कि संस्कृति कोई पुरानी वस्तु नहीं है, बल्कि यह वह जीवंत ऊर्जा है जो पीढ़ियों को बांधकर रखती है।
बिहार के सुदूर गाँवों के कच्चे चूल्हों से शुरू होकर दिल्ली की वीआईपी सड़कों, मुंबई के समंदर तटों और सात समंदर पार अमेरिका के महाद्वीपों तक पहुँचने वाला यह महापर्व इस बात की गवाही देता है कि जब आस्था सच्ची हो, प्रकृति के प्रति प्रेम अटूट हो और अनुशासन निष्कलंक हो, तो कोई भी स्थानीय परंपरा पूरी दुनिया की साझी विरासत बन सकती है। छठ मईया की यह महिमा युगों-युगों तक मानव चेतना को आलोकित करती रहेगी।
