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बुधवार, 5 सितंबर 2018

डॉक्टर प्रकृति

एक व्यक्ति घर के भीतर से बाहर निकलता है और प्रकृति के शरण में अकेला ध्यानमग्न होता है, तो व्यक्ति साधारण नहीं होता। वह प्रकृति का ही एक चेतन अंश बन जाया करता है। लेकिन ऐसा आजकल होता नहीं। व्यक्ति अधिकांश समय घर और कार्यालय की दीवारों के भीतर बंद रहता है। वह बाहर निकलता भी है तो भीड़ के साथ, भीड़ में मिल जाने और भीड़ के दुर्गुणों में लिप्त हो जाने के लिए। भीड़ का लाभ देश, समाज या स्वयं भीड़ को तब मिलता, जब भीड़ में एकत्र सभी लोग अपने विचारों से अपने को देखते और अपनी अनंत वैचारिक प्रक्रिया में वे आत्मप्रेरणा से समझबूझ रखनेवाले संवेदनशील बनते हैं दुर्भाग्य बलशाली है कि ऐसा हो नहीं रहा।
          वह इसी भीड़ से बचने के लिए महानगर छोड़ एक छोटे पहाड़ी कस्बे में गया। लोगों, उनके विवादों-कुतर्कों-मतभेदों-हिंसाजनित झगड़ों की भीड़ से सांसारिक दुर्गति उसे स्पष्ट दिखाई दे रही है। आश्चर्य कि भीड़ में लिप्त लोगों को अपना पतन महसूस नहीं होता। लोगों ने जैसे भीड़भाड़ के बीच अपने दुर्दांत पतन को अपनी दिनचर्या, जीवनचर्या और इन सबसे बढ़कर अपनी नियति मान लिया है। उन्हें इसी तरह की दुनिया में विकास करने, आगे बढ़ने तथा तरह-तरह के कंपीटीशन में फर्स्ट आने पर गर्व बोध हो रहा है। परंतु वह...., वह इन सबसे मर्माहत है। उसे इस सांसारिक भ्रम से चिढ़ है। 
          भीड़ से दूर रहने पर उसे जीवन से गहन प्रेम होने लगा। इस प्रेमानुभूति में उसे भीड़ द्वारा बसाई गई दुनिया अत्यंत कुरूप लगने लगी। इसीलिए वह अब एकान्त-शान्त हो स्वयं से प्रेम कर रहा है। स्वयं से प्रेम की अनुभूति एकान्त में ही हो सकती है। 
          .....वह संवेदना के इतने गहन तल पर पहुंच चुका था कि उसे अनिद्रा रोग ने घेर लिया। हालांकि एकान्त, शान्त रहने से तथा स्वयं से लगाव बढ़ते जाने से उसे सामान्यतः अनिद्रा से कोई शारीरिक समस्या नहीं थी। लेकिन एक दिन.....उस दिन के ढलने के बाद देर रात तक उसे नींद नहीं आई। वह तरह-तरह के विचारों के आंदोलन से अपने मस्तिष्क को पिसता हुआ महसूस करने लगा। विचारों पर नियंत्रण कर उन्हें थामने का आत्मोपाय सफल तो हुआ, पर उसका सिर दर्द से तपने लगा। किसी तरह रात्रि व्यतीत हुई...सुबह हुई, पर सुबह से लेकर शाम तक भी सिर दर्द ठीक हुआ।
उस दिन सन्ध्या से पहले उसके शहर के ऊपर काले बादल घिर आए थे। भादों की ऋतु थी। वर्षा किसी पूर्वानुमान के बिना ही जाती थी। उस सन्ध्या में भी रिमझिम करती वर्षा बूंदों ने धरती, वृक्ष लताओं, पौधों सहित सब कुछ भिगो दिया। वह घर पर अकेला ही था। घरवाले कहीं गए हुए थे। सिर दर्द विचित्र बेचैनी उत्पन्न करने लगा। वह उठा और सीधे छत पर चला गया। बूंद-बूंद गिरती वर्षा में भीगते हुए वायु का स्पंदन उसे अपनी श्वासों, त्वचा, मुख और शरीर के खुले अंगों के लिए अत्यंत अमृतमयी लगा।
          वह सन्ध्याकाल उसके जीवन में अपरिमित प्राकृतिक आनन्द लेकर आया। बारिश की बूंदें भी धीरे-धीरे वायु के मद्दिम स्पर्श से भाप बन उड़ गईं। गगन में काले मेघों के आवरण जितनी तेजी से बने थे, उससे अधिक तीव्रता से बिगड़ने-बिखरने लगे। आंखों के देखते-देखते ही गगन ने रंगों का उत्सव मनाना शुरू कर दिया।
क्या कल्पनातीत रंग थे! जैसे रंग अग्नि में जलकर रंगीले धुंए से नभ की रूप सज्जा कर रहे थे। कुछ पल के लिए धुंधली छवि में इन्द्रधनुष भी पूर्व दिशा के दाईं ओर दिखाई पड़ा था। उत्तर दिशा से आरंभ हुई नभ की रंगोली पश्चिम और दक्षिण दिशा तक फैल गई। क्षण-क्षण बदलते रंगों के अतुल सौन्दर्य से छनकर जो सूर्य प्रकाश धरती पर बिखरता, उसमें धानी-हरियाली धरती आंखों को चुंधियाने वाली चमक से भर उठी। वर्षा ऋतु से सीले-गीले मानवजनित भवन, संरचनाएं सभी पावन उजाले में आंखों के लिए सुंदर हो उठे।
          रात घिरने लगी। सन्ध्या के रात्रि में बदलते रहने से विभिन्न रंगी मेघ, नभ को जैसे अपने अद्वितीय रंगाकर्षण से विस्मयभूत कर देना चाहते थे। नीले, पीले, संतरी, लाल, गुलाबी, श्वेत-श्याम रंगों के परस्पर मिश्रण से जो श्रेष्ठ रंग-रूप मेघों का बन सकता था, उसी से दक्षिण-पश्चिम दिशा का आकाश संवरता रहा। दक्षिण-पश्चिम दिशा की सीमा पर, व्योम की ओर ऊपर अपने नुकीले कोनों को फैलाए अर्द्धचन्द्र प्रकट हो गया। रुई के स्वर्णरंगी फाहों जैसे पारदर्शी मेघों से ढका हुआ चन्द्रमा सन्ध्या और रात्रि के मिलन का सबसे अद्भुत संकेत था। ध्रुव तारा भी उससे कुछ नीचे टिमटिम करता दिखने लगा था। वर्षाजनित कीट-पतंगों, झींगुरों की कुर..कुर..कुर.. किर...किर...किर... करती ध्वनियां परिवेश को प्रकृति के विचित्र-विचित्र अनुभवों से भर रही थीं।
          सन्ध्या के अन्तिम क्षणों में दक्षिण-पश्चिम का आकाश जैसे संपूर्ण प्रकृति और इसके जीव-जंतुओं के लिए परम धाम बन गया। चाहे नभ के रंग हों, चन्द्रमा-ध्रुव सितारा हो, पवन के स्पंदन हों या फिर गगन विहार करते पक्षी हों.....सभी दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर जाने के लिए व्यग्र हो उठे। जैसे वहां नभ का विवाह हो रहा हो। जैसे सभी उधर जाने के लिए व्याकुल हों। जैसे वहां जाकर सभी की श्वासें अटकने वाली हों।
उसने जीवन में पहली बार उस ढलती सन्ध्या बेला में नभ की दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर हजारों पक्षियों को एक साथ उड़ते हुए देखा। कितना अद्भुत दृश्य था वह! प्रकृति के हर संभव रंग से सजता-संवरता नभ का वह भाग, जिस पर अनगिन पखेरू उड़ान भर रहे थे, उसके जैसे मानवों के लिए साक्षात 'स्वर्ग उद्यान' के रूप में प्रस्तुत था। उस दिशा में कुछ दूर तक तो पखेरू उड़ते हुए दिखते रहे। फिर आंखों से ओझल होते रहे। वह आश्चर्यचकित हो सोचता रहा कि इतने पखेरू उसी रात्रि-सन्ध्या बेला में उस दिशा की ओर उड़ रहे हैं या वह पहली बार यह सब देख अनुभव कर रहा है!
वह उत्तर-पूर्व दिशा से उड़कर दक्षिण-पश्चिम दिशा की ओर उड़ कर जानेवाले अन्तिम पक्षी को देखता रहा। संपूर्ण नभ ने रात्रि की घनी नीलिमा ओढ़ ली थी। अर्द्धचन्द्रमा और ध्रुव तारा उसे अपने रजत प्रकाश से आत्मविभोर करने लगे। पूरा नभ ही सितारों की रजत टिमटिम से भर गया। रात्रि का प्रथम प्रहर समाप्त होनेवाला था।
तभी उसे उसकी पत्नी ने कंधे से खींचकर हिलाया तो उसे आभास हुआ कि वह सिर दर्द से मुक्ति के लिए प्रकृति की शरणागत था। उसने गणना की कि प्रकृति के उपक्रम पर ध्यानस्थ हुए उसे साढ़े चार घण्टे व्यतीत हो चुके थे। 
उसका सिर दर्द से पूरी तरह मुक्त था। नभ की रंगोली, पखेरुओं की उड़ान, चन्द्रमा-सितारों की रजत किरणों और धानी-हरीतिमा वसुन्धरा को स्पर्श कर बहनेवाली पवन के स्पंदनों ने उसके मस्तिष्क की अद्भुत चिकित्सा कर दी थी। उसे लगा जैसे प्रकृति ने ही डॉक्टर बन कर उसकी चिकित्सा की है