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Tuesday, April 17, 2018

कठुआ-उन्नाव के सहारे भाजपा-हिन्दू-मोदी विरोधी व्यर्थ राजनीति

भारत में खतरनाक राजनीति अपनी जड़ें बहुत गहरे जमा चुकी है। कांग्रेस ने विगत चार-पांच दशकों में देश के हर कोने, समुदाय, गांव-घर तक ऐसी राजनीतिक गंदगी फैलाई कि यह आज विषबेल बन चुकी है। नई पैदा होनेवाली पीढ़ी पन्‍द्रह-बीस साल की होते ही इस राजनीतिक जहर के चेपेटे में आ ही जाती है। पिछले साढ़े चार वर्षों से देश की केंद्रीय सत्‍ता से बाहर रहने की कुंठा व हताशा में कांग्रेस विपक्ष के रूप में जो नहीं कर सकती थी, वह सब कर रही है। भाजपा को बदनाम करने के लिए कांग्रेसी नेतृत्‍व में विपक्षी षड्यंत्र कितना गहन है, इसकी कल्‍पना करते हुए भाजपा बेचारी और राजनीतिक रूप से निष्क्रिय नजर आने लगी है।
विकेश कुमार बडोला 
भाजपा की बदनामी के लिए नया खेल कठुआ और उन्‍नाव की घटनाओं के बल पर खेला जा रहा है। आठ साल की बच्‍ची से बलात्‍कार और बाद में उसकी हत्‍या अक्षम्‍य अपराध है। इसके लिए अपराधी को जो दंड मिले वो कम है। महिलाओं से बलात्‍कार करना और बाद में उसके परिवार वालों पर अत्‍याचार करना भी गंभीर अपराध हैं। इनके लिए दोषी कोई भी हो, चाहे साधारण आदमी या विधायक, उसको भी उसके किए की सख्‍त से सख्‍त सजा मिलनी ही चाहिए।
          लेकिन प्रश्‍न यह है कि क्‍या विगत वर्षों में बलात्‍कार और हत्‍या के यही दो मामले रहे हैं, जिन पर विपक्षी राजनीतिक दलों तथा मीडिया को इतनी सनसनी मचाने का मौका मिला। क्‍या कश्‍मीरी पंडितों की बहू-बेटियों, छोटी-छोटी बच्चियों के साथ बलात्‍कार होने के बाद उनकी नृशंस तरीके से हत्‍या नहीं हुई थी? क्‍या हाल ही में दिल्‍ली के गोविंदपुरी में हुई सुमन दूबे नामक महिला से छेड़छाड़ और भरे बाजार में उसकी हत्‍या होना अपराध नहीं था? ऐसे रोजाना पता नहीं कितने बलात्‍कार और बलात्‍कार के बाद हत्‍याओं के मामले भारत में दिखाई-सुनाई देते हैं? क्‍या उन सब के संबंध में वैसा ही मीडिया ट्रीटमेंट और न्‍यायालयी हस्‍तक्षेप हो पाता है, जैसा कि कठुआ और उन्‍नाव के मामले में हो रहा है? अगर बाकी मामलों में कठुआ और उन्‍नाव जैसा न्‍यायालयी हस्‍तक्षेप नहीं होता या इन्‍हें पर्याप्‍त मीडिया कवरेज नहीं मिलता, तो साफ दिखता है कि यह सब राजनीति के लिए हो रहा है। दिल्‍ली में भीड़ भरे बाजार में हुई चार बच्‍चों की मां की हत्‍या मीडिया के लिए इसलिए व्‍यापक कवरेज नहीं बन पाई क्‍योंकि राजधानी में भाजपा सरकार नहीं है। कुछ दिन पूर्व कर्नाटक में एक हिन्‍दू विधवा महिला को उसके घर में ही बंद कर सात-आठ मुसलिम लोगों ने कई दिनों तक उसके साथ बलात्‍कार किया। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है तो यह खबर अखबारों में मात्र एक दिन के लिए एक कॉलम तक सिमट कर रह गई। अभी भी यहां-वहां लगभग हर प्रदेश में महिलाओं, बेटियों और बच्चियों के साथ रेप, रेप के बाद हत्‍या किए जाने के मामले लगभग रोज ही पढ़ने-दिखने-सुनने को मिलते हैं। लेकिन जिन मामलों में राजनीति नहीं हो सकती, वे मामले पीड़ितों तक ही सिमट कर रह जाते हैं। यह इस देश का दुर्भाग्‍य है कि महिलाओं के साथ बलात्‍कार और कई मामलों में बलात्‍कार के बाद हत्‍या या तेजाब फेंकने जैसी घटनाओं में से कुछ ही घटनाएं खबरों में इसलिए बनी रह पाती हैं, ताकि उन पर राजनीति की जा सके। पीड़िताओं के वास्‍तविक दुख को समझ कर न्‍याय होना अभी इस देश की न्‍यायिक व्‍यवस्‍था का स्‍वाभाविक हिस्‍सा नहीं हो पाया है। मीडिया हो चाहे न्‍यायालय सभी का राजनीतिक रुख समझना अब आम जनता के लिए आसान है, क्‍योंकि यही वह जनता है, जिसे कांग्रेस ने इतने वर्षों से गंदी राजनीति करने, उसे सीखने-समझने के अवसर के अलावा कुछ नहीं दिया।  
मीडिया के अतिरंजित रुख के कारण कठुआ का मामला संयुक्‍त राष्‍ट्र तक जा पहुंचा है। क्‍या यह उचित है? देश में या विदेश में या संयुक्‍त राष्‍ट्र में सभी जगह भाजपा को सत्‍ता से बाहर होते देखने के लिए प्रभावशाली बेचैन लोगों की कमी नहीं है। लेकिन इसमें दोष भाजपा का भी है, जो दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे ज्‍यादा सदस्‍यों-कार्यकर्ताओं का राजनीतिक दल होते हुए भी अपने लिए एक ऐसा मीडिया घराना नहीं बना पा रहा, जो कांग्रेस की तुलना में उसके अधिक बड़े व व्‍यापक राजनी‍तिक निर्णयों, कार्यों और सुशासन का व्‍यापक विश्‍लेषण कर सके। जबकि विपक्ष इतना शातिर है कि भाजपा के सड़क से लेकर संसद और मीडिया से लेकर न्‍यायालयों में विराजमान समर्थक भी उसको बदनाम करने की विपक्षी मुहिम का हिस्‍सा बन जाते हैं। हमारे सामने अनेक ऐसे उदाहरण हैं, जिनमें कांग्रेस के कुशासन, गलत नीतियों और भ्रष्‍टाचार के खिलाफ देशव्‍यापी आक्रोश, आंदोलन तथा धरना-प्रदर्शनों के दौरान भी उसके समर्थक उसके विरोध में नहीं गए। यह सब इसलिए होता है क्‍योंकि सामान्‍य जनता की नजर में प्रबुद्ध माने जानेवाले मीडिया और न्‍यायालय के लोग कांग्रेस के प्रत्‍येक काले कारनामे, भ्रष्‍टाचार और देशविरोधी गतिविधि पर भी तटस्‍थ विश्‍लेषण करते आए हैं। इन्‍होंने कांग्रेसी शासन के दौरान किसी भी देशव्‍यापी समस्‍या के लिए सीधे-सीधे कभी भी कांग्रेस को जिम्‍मेदार नहीं माना। कांग्रेस शासन के दौरान हुआ दामिनी बलात्‍कार और हत्‍या का मामला हो या महिलाओं पर हुए अनगिनत तेजाब हमलों के मामले या फि‍र राष्‍ट्रीय घोटाले हों या मुद्रा मूल्‍य गणना से बाहर पहुंचे भ्रष्‍टाचार, अवैध लेन-देन के शासकीय मामले, सभी में मीडिया और न्‍यायालय ने कभी ऐसी टिप्‍पणी प्रमुखता से नहीं की कि जिससे लगे देश खतरे में है या देश में कानून का शासन नहीं है। यहां तक कि कांग्रेसी शासन में देश में हुई तमाम असामाजिक हलचलों और अवैध कार्यों पर संयुक्‍त राष्‍ट्र का भी ध्‍यान नहीं गया। तो क्‍या यह मान लिया जाए कि संयुक्‍त राष्‍ट्र को हैंडल करनेवालों के साथ भी कांग्रेस राजनीतिक संबंध बना के चलती थी। मान क्‍या लिया जाए, ऐसा ही है। ऐसा न होता तो संयुक्‍त राष्‍ट्र महासचिव ब्रिटेन के जासूस को जहर देने तथा सीरिया के संबंध में रूस व अमेरिका के बीच छिड़े शीतयुद्ध के कारण साफ दिखते तृतीय विश्‍व युद्ध के खतरों के बारे में चिंतित होते, न कि भारत में सनसनी बने मामले को लेकर।   
कठुआ की आठ वर्षीय बच्‍ची जिन हालात में मरी, उसमें उसके परिवारीजनों का संत्रास और उन्‍नाव की बलात्‍कार पीड़िता का दुख समझना हर किसी के बूते की बात नहीं। इसी तरह रेप की दूसरी घटनाओं की शिकार और रेप के बाद जान से मार दी गई नारियों और उनके परिवार वालों के दुख की कोई सीमा नहीं। उसे सामान्‍य आदमी महसूस नहीं कर सकता। ऐसे मामलों में पीड़ित महिलाओं या उनके संबंधियों के लिए सबसे जरूरी होता है समयबद्ध न्‍याय। लोगों, मीडिया और न्‍यायालय को इस दिशा में ठोस कार्य करने के लिए कदम उठाने होंगे न कि ऐसी घटनाओं पर गंदी राजनीति का मोहरा बनना चाहिए।