मैंने साक्षात देखा व अनुभव किया है कि पिछले दो वर्ष में 35 से लेकर 60 वर्ष तक के आयु वर्ग के अधिसंख्य व्यक्तियों को राजनीतिक गतिविधियों, विचारों एवं धारणाओं से गहन अलगाव हो गया है। इन लोगों में बहुत-से ऐसे थे जो अभी केंद्रीय सत्ता में विराजित शासन करने वाले दल के पक्ष में खड़े दिखाई देते थे, किंतु सहसा उनकी चेतना जाग्रत हुई है और वे राजनीतिक पक्ष-विपक्ष से खिन्न होकर केवल और केवल अपने-अपने काम धंधों में व्यस्त दिखाई देते हैं। उन्हें लगता है कि यदि विपक्ष मूर्खतापूर्ण हरकतें करके अराजकता फैला रहा है, तो पक्ष वाले ऐसी हरकतों एवं अराजकताओं पर कठोरतापूर्वक पूर्ण प्रतिबंध क्यों नहीं लगा रहा है? पक्ष अर्थात् सत्तारूढ़ दल के ऐसे राजनीति-राजनीति खेलते हुए निरंतर तू-तू मैं-मैं के वाद-विवाद ने दोनों के समर्थकों के दृष्टिकोण को राजनीति के प्रति तटस्थ एवं गहराई तक उदासीन बना दिया है।
पिछले
कुछ वर्षों से हमारे सामाजिक
और राजनीतिक परिदृश्य में एक अत्यंत सूक्ष्म
किंतु दूरगामी प्रभाव डालने वाला परिवर्तन आकार ले रहा है,
जिसे साक्षात देखा और अनुभव किया
जा सकता है। यह परिवर्तन पैंतीस
से साठ वर्ष की उस आयु
वर्ग से जुड़ा है
जो किसी भी देश की
रीढ़, उसकी कार्यशील चेतना और उसकी वास्तविक
आर्थिक-सामाजिक ऊर्जा का केंद्र होता
है। इस आयु वर्ग
के अधिसंख्य व्यक्तियों में राजनीतिक गतिविधियों, वैचारिक बहसों और दलीय धारणाओं
से एक गहन एवं
स्पष्ट अलगाव पैदा हो गया है।
स्थिति यह है कि
इनमें से बहुत-से
ऐसे लोग थे जो कल
तक केंद्रीय सत्ता में विराजित शासन करने वाले दल के सबसे
मुखर समर्थकों या संरक्षकों के
रूप में खड़े दिखाई देते थे। किंतु सहसा उनकी चेतना जाग्रत हुई है और उस
जाग्रति ने उन्हें राजनीतिक
पक्ष-विपक्ष के इस अंतहीन
और व्यर्थ संघर्ष से खिन्न कर
दिया है। आज वे राजनीति
के कोलाहल से पूरी तरह
कटकर केवल और केवल अपने-अपने काम-धंधों, आजीविका और पारिवारिक उत्तरदायित्वों
में व्यस्त दिखाई देते हैं। उनके इस मौन और
अलगाव के पीछे एक
गहरा वैचारिक क्षोभ है, जो सत्ता और
विपक्ष दोनों की भूमिकाओं पर
गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
इस
वर्ग के भीतर पनप
रही यह उदासीनता अचानक
उपजी कोई सनक नहीं है, बल्कि यह उस अनुभवजन्य
वास्तविकता का परिणाम है
जो उन्होंने बीते कुछ समय में नजदीक से देखी है।
इन नागरिकों के मन में
एक तीखा विरोधाभास घर कर गया
है। वे देखते हैं
कि यदि एक ओर विपक्ष
की ओर से लगातार
ऐसी हरकतें की जाती हैं
जो राजनीतिक अपरिपक्वता, अराजকতা और व्यवस्था को
बाधित करने वाली प्रतीत होती हैं, तो दूसरी ओर
उनके मन में यह
स्वाभाविक एवं तार्किक प्रश्न उठता है कि आखिर
पक्ष यानी सत्तारूढ़ दल ऐसी हरकतों
और अराजकताओं पर पूरी कठोरता
से अंकुश क्यों नहीं लगा रहा है? शासन चलाने की मुख्य जिम्मेदारी
सत्ता पक्ष की होती है।
जनता जब किसी दल
को बहुमत देकर केंद्रीय सत्ता सौंपती है, तो उसकी अपेक्षा
केवल यह नहीं होती
कि वह विपक्ष की
हर आलोचना का जवाब भाषणों
या बयानों से दे, बल्कि
उसकी सबसे बड़ी मांग यह होती है
कि देश में कानून का शासन स्थापित
हो, अनुशासन बना रहे और सार्वजनिक जीवन
में न्यूनतम मर्यादाओं का पालन हो।
लेकिन जब सत्तारूढ़ दल
भी विपक्ष के स्तर पर
उतरकर केवल राजनीतिक बयानबाजी, तू-तू मैं-मैं और चुनावी नूराकुश्ती
में उलझा रहता है, तब आम नागरिक
का शासन की गंभीरता से
मोहभंग होने लगता है।
यह
निरंतर चलने वाला राजनीतिक कोलाहल और पक्ष-विपक्ष
का यह द्वंद्व अब
देश की सामान्य जनता
के लिए एक थकाऊ तमाशा
बन चुका है। साठ
के
दशक
की
ओर
बढ़ते
या
पैंतीस
को
पार
कर
चुके
गृहस्थ,
व्यवसायी,
पेशेवर
और
मेहनतकश
लोग
अब
इस
बात
को
भली-भांति
समझने
लगे
हैं
कि
राजनीति
अब
देश
के
वास्तविक
विकास,
नीतिगत
सुधारों
या
जनहित
के
दीर्घकालिक
मुद्दों
से
भटककर
मात्र
एक
सतही
अखाड़ा
बन
कर
रह
गई
है।
इस राजनीतिक
अलगाव का एक और
बड़ा मनोवैज्ञानिक पहलू यह है कि
जब नागरिक खुद को व्यवस्था के
केंद्र में पूरी तरह असहाय महसूस करते हैं, तो वे अपनी
ऊर्जा को पूरी तरह
से संकुचित कर लेते हैं।
पैंतीस से साठ वर्ष
की आयु वह पड़ाव होती
है जहाँ व्यक्ति अपने जीवन के सबसे बड़े
उत्तरदायित्वों का निर्वहन कर
रहा होता है—बच्चों की
शिक्षा, बुजुर्ग माता-पिता का स्वास्थ्य, भविष्य
की आर्थिक सुरक्षा और अपने व्यवसाय
या नौकरी की स्थिरता। इस
उम्र का व्यक्ति कोरे
नारों और भावनात्मक बहसों
से ऊपर उठकर स्थायित्व और शांति चाहता
है। जब वह देखता
है कि देश के
कर्णधार और बड़े राजनेता
गंभीर राष्ट्रीय विषयों पर भी बचकानी
बयानबाजी और श्रेय लेने
की होड़ में व्यस्त हैं, तो उसका भरोसा
टूटने लगता है। उसे यह अहसास होता
है कि राजनीति अब
राष्ट्र-निर्माण का माध्यम न
रहकर कुछ लोगों का पेशा और
मनोरंजन बन चुकी है।
इस प्रकार की व्यवस्था से
वैचारिक अलगाव स्वाभाविक भी है और
एक प्रकार का मौन प्रतिरोध
भी, जिसके माध्यम से जनता राजनेताओं
को यह संदेश देना
चाहती है कि वे
अपने आचरण में सुधार करें।
यह तटस्थता इस बात का भी प्रमाण है कि भारतीय लोकतंत्र का मतदाता अब परिपक्व हो रहा है, किंतु उसकी यह परिपक्वता उसे सक्रिय सहभागिता की ओर ले जाने के बजाय गहरी खिन्नता की ओर धकेल रही है, जो किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए एक चिंता का विषय होना चाहिए। जब समाज का एक बहुत बड़ा और प्रबुद्ध वर्ग राजनीति से पूरी तरह विमुख होकर अपनी खोल में सिमट जाता है, तब लोकतंत्र में एक ऐसा वैचारिक शून्य पैदा होता है जिसे अक्सर संकीर्ण और कट्टर तत्व भरने का प्रयास करते हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि पक्ष और विपक्ष दोनों यह समझें कि जनता अब उनकी इन बचकानी और अनर्गल बहसों से ऊब चुकी है। देश की जनता को केवल वादों या एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने की कला में कोई रुचि नहीं बची है। उन्हें सुशासन, पारदर्शिता, आर्थिक सुरक्षा और एक शांत व सुव्यवस्थित वातावरण चाहिए जहाँ वे बिना किसी राजनीतिक डर या अराजकता के अपने सपनों को जी सकें। जब तक राजनीतिक दल इस मूलभूत सत्य को नहीं पहचानेंगे और अपनी कार्यशैली में परिपक्वता नहीं लाएंगे, तब तक यह राजनीतिक अलगाव और अधिक गहराता जाएगा, जो अंततः लोकतांत्रिक संस्थाओं की जड़ों को अंदर से खोखला कर सकता है।

