हाल ही में सर्वाेच्च न्यायालय की एक टिप्पणी ने देश के वैचारिक गलियारों में एक नई बहस को जन्म दिया है, जिसमें इंटरनेट के उपयोग को बच्चों का भी मौलिक अधिकार माना गया है। मुख्यधारा के समाचार पत्रों में यह खबर भले ही एक छोटे से कॉलम में सिमटकर रह गई हो, लेकिन इसके दूरगामी और गहरे सामाजिक निहितार्थ हैं। आज एक अजीब विडंबना हमारे सामने है। एक तरफ दुनिया भर के समाज, शासक और अभिभावक बच्चों को स्क्रीन और इस आभासी मायाजाल से दूर रखने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं, तो दूसरी तरफ इस तरह की न्यायिक टिप्पणियां उस संघर्ष को और पेचीदा बना देती हैं। सच तो यह है कि बिना विवेक के दिया गया कोई भी अधिकार वरदान के बजाय अभिशाप बन जाता है। इस संवेदनशील मसले पर केवल कानूनी चश्मे से देखने के बजाय इसके व्यावहारिक, सामाजिक और मानवीय पक्षों पर गहराई से विचार करना आज की सबसे बड़ी जरूरत है।
अधिकार और दायित्व एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यदि दायित्वों का बोध न हो, तो अधिकार विनाश की राह पकड़ लेते हैं। बच्चों का मन कोमल, संवेदनशील और अपरिपक्व होता है। उनके पास जीवन के सही और गलत को तौलने की वह वैचारिक तराजू नहीं होती जो एक वयस्क के पास होती है। इंटरनेट सूचनाओं का एक ऐसा असीम और अनियंत्रित महासागर है, जहाँ ज्ञान के कुछेक नगीनों के मुकाबले विकृतियों और भ्रामक विषयों का अंबार लगा है। एक अबोध बालक सत्य और असत्य के उस बारीक फर्क को भांप नहीं पाता। आभासी संसार बहुत चमकदार और मोहक होता है, जो असल जिंदगी की वास्तविकताओं से कोसों दूर एक काल्पनिक लोक रचता है। हमारे बच्चे अनजाने ही इस भ्रमजाल की दलदल में धंसते जा रहे हैं, और यह स्थिति किसी भी समाज के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं है।
इस पूरी बहस में तकनीक के व्यावसायिक और आर्थिक पक्ष को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। आज इंटरनेट केवल पढ़ाई या सूचना का माध्यम भर नहीं रह गया है, बल्कि यह दुनिया का सबसे बड़ा और आक्रामक बाजार बन चुका है। बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय डिजिटल कंपनियों की नजर में हमारे बच्चे उनके सबसे बड़े उपभोक्ता हैं। इन कंपनियों का एकमात्र उद्देश्य अपने मुनाफे को बढ़ाना है। इसके लिए वे ऐसे मनोवैज्ञानिक पैंतरे अपनाती हैं कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और ऐप्स की संरचना ही इस तरह की जाती है कि इंसान को उनकी लत लग जाए। अबोध बच्चे इस सोचे-समझे व्यापारिक षड्यंत्र के सबसे आसान शिकार बन रहे हैं। वे घंटों स्क्रीन के सामने चिपके रहते हैं। बच्चों को कोई भी अधिकार देने से पहले उनकी सुरक्षा की गारंटी देना हमारा प्राथमिक सामाजिक और नैतिक दायित्व होना चाहिए।
आधुनिक दौर में बच्चों की इस बढ़ती डिजिटल निर्भरता के पीछे केवल मनोरंजन की चाह नहीं, बल्कि सामाजिक अलगाव भी एक बड़ा कारण बनता जा रहा है। जब आस-पड़ोस के बच्चों के साथ खेलने का माहौल सिकुड़ जाता है, तो अभिभावक भी अपनी व्यस्तता के चलते बच्चों को बहलाने के लिए खुद डिजिटल उपकरण थमा देते हैं। यह सुविधा कुछ पलों के लिए भले ही बड़ों को राहत देती हो, लेकिन लंबे समय में यह बच्चों के मानसिक और सामाजिक ताने-बाने को भीतर से खोखला कर रही है। माता-पिता और बच्चों के बीच का वह जीवंत संवाद, जो कभी पारिवारिक मूल्यों की रीढ़ हुआ करता था, आज विज्ञापनों और सूचनाओं के शोर में कहीं खो गया है।
बचपन की सबसे खूबसूरत खूबी उसका प्रकृति के सानिध्य में बढ़ना होता है। लेकिन आज खेल के मैदानों की जगह मोबाइल की स्क्रीन ने ले ली है। मोहल्लों के मैदान वीरान हो रहे हैं और बच्चों का स्वाभाविक शारीरिक विकास लगभग थम सा गया है। अल्प आयु में ही चश्मे चढ़ जाना, कम उम्र में मोटापे का शिकार होना, रीढ़ की हड्डी में अकड़न और पाचन तंत्र का कमजोर होना अब आम बात बन गई है। यह सिर्फ स्वास्थ्य समस्याएं नहीं हैं, बल्कि एक गंभीर संकट का स्पष्ट संकेत है कि हमारी आने वाली पीढ़ी शारीरिक रूप से कमजोर और अक्षम होती जा रही है।
शारीरिक नुकसान के साथ-साथ बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य भी बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। लगातार स्क्रीन पर टकटकी बांधे रहने से ध्यान केंद्रित करने की क्षमता यानी फोकस लगातार घट रहा है। बच्चों में चिड़चिड़ापन, व्यग्रता, अवसाद और अनिद्रा जैसी समस्याएं घर करती जा रही हैं। जब दिमाग को हर सेकंड एक नई आभासी उत्तेजना मिलती है, तो उसकी अपनी मौलिक चिंतन क्षमता और विचारशीलता कुंठित होने लगती है। बच्चे अब खुद सोचने के बजाय रेडीमेड और बनावटी जवाबों पर निर्भर हो गए हैं। इसके अलावा, पारिवारिक संवाद लगभग खत्म सा हो गया है। एक ही छत के नीचे रहने के बावजूद सब अपने-अपने डिजिटल संसार में कैद हैं। इससे बच्चों के भीतर की करुणा, सहानुभूति और संवेदनाएं सूख रही हैं और वे मानवीय दुखों के प्रति उदासीन होते जा रहे हैं।
यह आभासी दुनिया जितनी आकर्षक दिखती है, उतनी ही खतरनाक भी है। साइबर अपराध और ऑनलाइन शोषण का जाल बच्चों को तेजी से अपनी चपेट में ले रहा है। कई बार शातिर अपराधी बच्चों को आसानी से बरगला लेते हैं, जिससे वे न केवल मानसिक प्रताड़ना झेलते हैं, बल्कि कई बार भय और अवसाद में आकर आत्महत्या जैसा खौफनाक कदम तक उठा लेते हैं। साथ ही, इंटरनेट पर जिस तरह की अश्लील और हिंसक सामग्री आसानी से उपलब्ध है, उसने हमारी सांस्कृतिक और नैतिक नींव को हिलाकर रख दिया है। हिंसा और अभद्रता बच्चों के लिए सामान्य बात बनती जा रही है, जिससे समाज में अनुशासनहीनता और संस्कारों का पतन तेजी से हो रहा है।
इस डिजिटल प्रलय के बीच यह समझना भी आवश्यक है कि विद्यालयों और शिक्षण संस्थानों की भूमिका इस दिशा में कितनी महत्वपूर्ण हो चली है। आज शिक्षा केवल परीक्षा पास करने का साधन बनकर रह गई है, जहाँ विद्यार्थियों को नैतिक मूल्यों और आंतरिक अनुशासन की शिक्षा देने के बजाय तकनीक आधारित रेस में दौड़ाया जा रहा है। यदि शिक्षा प्रणाली ही बच्चों को आत्ममंथन और संयम का पाठ पढ़ाने में असफल हो जाए, तो न्यायालयीन अधिकारों के दायरे समाज को और अधिक असमंजस में डाल देंगे। विद्यालयी स्तर पर विद्यार्थियों के लिए डिजिटल डिटॉक्स और मानवीय संवेदनाओं को जागृत करने वाले शिविरों का आयोजन अनिवार्य किया जाना चाहिए, ताकि वे किताबी ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक जीवन की वास्तविक सच्चाइयों से भी रूबरू हो सकें।
इस विकट परिस्थिति से उबरने के लिए हमें किसी एक पक्ष पर निर्भर रहने के बजाय एक संतुलित और व्यावहारिक मार्ग अपनाना होगा। तकनीक को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता, लेकिन उसे सिर पर बिठाना भी खतरनाक है। हमें अपने घरों में उस पुराने पारिवारिक माहौल को लौटाना होगा जहाँ शाम को सब मिलकर बैठते थे, दिनभर की बातें साझा करते थे। माता-पिता को बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताना होगा। बच्चों को फिर से मैदानों की तरफ मोड़ना होगा। शारीरिक श्रम, मैदानी खेल और पसीना बहाना बच्चों के चरित्र और शरीर दोनों को गढ़ता है। मुद्रित पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं और कहानियों की संस्कृति को फिर से जिंदा करना होगा, जो आँखों को बिना नुकसान पहुँचाए मानसिक एकाग्रता बढ़ाती हैं। घर के भीतर श्नो-फोन जोनश् बनाए जाने चाहिएकृखासकर भोजन कक्ष और शयन कक्ष में मोबाइल का प्रवेश वर्जित होना चाहिए तथा पैरेंटल कंट्रोल का सख्ती से उपयोग हो।
अंत में यही कहा जा सकता है कि तकनीक मनुष्य की सुविधा के लिए है, न कि उसे अपना गुलाम बनाने के लिए। बच्चों का सर्वांगीण विकासकृजिसमें उनका शारीरिक, मानसिक और नैतिक स्वास्थ्य शामिल हैकृहमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। न्यायपालिका और समाज दोनों को मिलकर इस बात पर नए सिरे से विचार करना होगा कि क्या बालपन की मासूमियत को ताक पर रखकर दी जाने वाली डिजिटल आज़ादी वास्तव में कोई अधिकार है, या फिर एक बड़ा छलावा? संतुलन और संयम ही इस समूची समस्या का एकमात्र और अचूक समाधान है।
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