मित्र

मंगलवार, 3 नवंबर 2026

प्रौढ़ावस्था का द्वंद्व: भौतिकता, जर्जर काया और ज्ञानार्जन की अधूरी प्यास

 


आज मनुष्य को भौतिकता को संपूर्णता के साथ जीने के लिए शारीरिक एवं मानसिक शक्तियों के साथ-साथ आत्मिक शक्ति भी चाहिए। एक परिपक्व व्यक्ति जब अपनी प्रौढ़ावस्था में जर्जरता एवं रोगों की ओर बढ़ते अपने शरीर के साथ दुनिया के हर विषय से संबंधित ज्ञान को बढ़ाना चाहता है, तो उसका जर्जर होता शरीर और उसके रोग उसके मार्ग में बाधाएं बनकर खड़े हो जाते हैं। और जो व्यक्ति भौतिकता के साथ अधिक लगाव न रखकर आध्यात्मिकता के साथ लगन लगाकर अधिकाधिक ज्ञानार्जन करना चाहता है, शारीरिक निःशक्ता की परिस्थितियां उसके साथ भी हैं तथा वह भी रोगग्रस्त होकर बहुत कुछ करने की इच्छा रखते हुए भी कुछ नहीं कर पाने के पश्चातापों से घिरा हुआ है।

मानव जीवन की यह यात्रा केवल जन्म और मृत्यु के बीच का एक साधारण अंतराल नहीं है, बल्कि यह चेतना के विकास, अनुभव के विस्तार और बोध की पराकाष्ठा तक पहुँचने का एक ऐसा महाअभियान है, जिसके प्रत्येक चरण में संघर्ष और संकल्प की अनिवार्यता जुड़ी हुई है। जब हम सृष्टि के इस असीम पट पर मनुष्य के अस्तित्व का विश्लेषण करते हैं, तो यह सत्य अत्यंत स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आता है कि स्थूल संसार में केवल जीवित रहना ही पर्याप्त नहीं है। इस जीवन को अपनी संपूर्ण गरिमा, सार्थकता और पूर्णता के साथ जीने के लिए त्रिविध शक्तियों—शारीरिक, मानसिक और आत्मिक—का अनूठा और समवेत संगम आवश्यक होता है। यदि इनमें से एक भी शक्ति का अभाव हो जाए, तो मानव व्यक्तित्व का भव्य भवन ढहने लगता है। शारीरिक शक्ति हमें कर्मठता और गतिशीलता प्रदान करती है, मानसिक शक्ति हमें विचार, तर्क और विश्लेषण का संबल देती है, किंतु आत्मिक शक्ति वह परम आलोक है जो हमारे संपूर्ण अस्तित्व को अर्थ और दिशा प्रदान करती है। इन तीनों के समन्वय के बिना भौतिकता का भोग भी अधूरा और कुंद हो जाता है।

परंतु काल का चक्र अपनी गति से निरंतर आगे बढ़ता रहता है और मनुष्य के जीवन में एक ऐसा मोड़ आता है जहाँ उसकी युवावस्था के सारे वेग, उमंग और महत्वाकांक्षाएं शांत पड़ने लगती हैं। यह प्रौढ़ावस्था का वह संध्याकाल है, जब जीवन का पूर्वार्द्ध पीछे छूट चुका होता है और उत्तरार्द्ध की गंभीर और शांत छाया चारों ओर फैलने लगती है। इस परिपक्व अवस्था में पहुँचकर मनुष्य की दृष्टि में एक मौलिक परिवर्तन आता है। अब उसे सांसारिक प्रपंचों की तुच्छता और व्यर्थता का बोध होने लगता है। उसके भीतर यह तीव्र उत्कंठा जागृत होती है कि वह इस संसार के हर विषय से संबंधित ज्ञान को अपने भीतर समाहित कर ले। इतिहास, दर्शन, विज्ञान, कला, साहित्य और लोक-व्यवहार के जितने भी रहस्य इस धरा पर विद्यमान हैं, उन सबको जानने और समझने की एक अद्भुत पिपासा उसके अंतर्मन में कुलाचें भरने लगती है। वह सोचता है कि जीवन के इस अंतिम पड़ाव पर वह ज्ञान के अनंत महासागर में गोता लगाकर अपनी इस बौद्धिक क्षुधा को शांत करे।

किंतु नियति का विधान और शरीर की अपनी सीमाएं मनुष्य के इस सुंदर स्वप्न के मार्ग में दीवार बनकर खड़ी हो जाती हैं। जिस समय मनुष्य का मन ज्ञानार्जन के लिए सबसे अधिक आकुल और परिपक्व होता है, ठीक उसी समय उसका शरीर जर्जरता और शिथिलता के गर्त में उतर रहा होता है। वार्द्धक्य के चरणचिह्न उसकी हड्डियों, मांसपेशियों और स्नायुओं पर स्पष्ट अंकित होने लगते हैं। जो शरीर कभी उसकी एक आवाज़ पर अजेय गति से दौड़ने के लिए तत्पर रहता था, आज वही शरीर विभिन्न प्रकार के रोगों और व्याधियों का क्रीड़ास्थल बन चुका होता है। नेत्रों की ज्योति मंद पड़ने लगती है, कर्ण-इंद्रियों की क्षमता क्षीण होने लगती है, और मस्तिष्क में निरंतर चलने वाले विचारों का क्रम शारीरिक पीड़ाओं के कारण बार-बार खंडित होने लगता है। ऐसे में, जब वह दुनिया के हर विषय से संबंधित ज्ञान को बढ़ाना चाहता है, तो उसका जर्जर होता शरीर और उसके रोग उसके मार्ग में बाधाएं बनकर खड़े हो जाते हैं। यह शारीरिक असमर्थता केवल एक भौतिक विवशता नहीं है, बल्कि यह उस आत्मा के लिए एक भारी कारागार बन जाती है जो ज्ञान के खुले आसमान में उड़ान भरना चाहती है।

इस विडंबना का एक दूसरा और अधिक गंभीर पक्ष भी है। संसार के तमाम आकर्षणों से ऊबकर कई बार मनुष्य भौतिकता के साथ अपना सारा लगाव त्याग देता है। वह धन, वैभव, यश और ऐश्वर्य की अंधी दौड़ से पूरी तरह विरत हो जाता है। वह समझ जाता है कि भौतिकता की यह चकाचौंध केवल एक भ्रमजाल है, जो अंततः आंतरिक शांति को सोख लेती है। इस बोध के बाद वह आध्यात्मिकता के साथ अपनी गाढ़ी लगन लगाता है। वह वेदों, उपनिषदों, संतों की वाणी और परम सत्य के अन्वेषण में अपने शेष जीवन को होम देना चाहता है। उसकी चाहत होती है कि वह अधिकाधिक ज्ञानार्जन करके अपने भव-बंधन को काटे और अंतश्चेतना को उस परमात्मा से जोड़े जो इस सृष्टि का आधार है। वह सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर एकाग्रता के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचना चाहता है।

किंतु विडंबना यह है कि भौतिकता से विरक्त होकर आध्यात्मिकता की शरण में जाने वाले उस साधक के मार्ग में भी राह की मुश्किलें कम नहीं होतीं। शारीरिक निःशक्ता की परिस्थितियां उसके साथ भी उतनी ही क्रूरता से पेश आती हैं जितनी कि एक सामान्य ज्ञानार्थी के साथ। आध्यात्मिकता का मार्ग भी सहज नहीं है; उसके लिए भी आसन, ध्यान, प्राणायाम, निरंतर स्वाध्याय और गाढ़ एकाग्रता की आवश्यकता होती है। जब वह साधक घंटों पद्मासन में बैठकर ब्रह्म-चिंतन करना चाहता है, तो उसकी रीढ़ की हड्डी का दर्द, जोड़ों का वात रोग और शरीर की अन्य अस्वस्थताएं उसकी चेतना को पुनः स्थूल धरातल पर घसीट लाती हैं। वह ध्यान में उतरना चाहता है, किंतु शरीर की कोई न कोई व्याधि उसे छटपटाने पर विवश कर देती है।

इस दोहरी मार के बीच मनुष्य के अंतर्मन में जो आत्म-संघर्ष आरंभ होता है, वह शब्दों में वर्णनातीत है। वह रोगग्रस्त होकर, अपने भीतर अपार बौद्धिक क्षमता और असीम इच्छाशक्ति रखते हुए भी, वास्तविक धरातल पर कुछ भी कर पाने में असमर्थ हो जाता है। वह दुनिया को बदलना चाहता है, ज्ञान के नए क्षितिज छूना चाहता है, आध्यात्मिकता के गूढ़ रहस्यों को जीना चाहता है, किंतु उसकी अपनी काया ही उसकी शत्रु बन जाती है। कुछ नहीं कर पाने के इन असीम पश्चातापों से वह निरंतर घिरा रहता है। उसके भीतर यह पश्चाताप दीमक की तरह सुलगता रहता है कि जब शरीर स्वस्थ था, इंद्रियां सबल थीं, और समय उसके पास प्रचुर मात्रा में था, तब उसने उस सुवर्ण काल को व्यर्थ की सांसारिक उलझनों और भौतिक लिप्साओं में क्यों गंवा दिया? क्यों उसने उस समय ज्ञान और अध्यात्म की ओर ध्यान नहीं दिया, जब शरीर उसका सबसे बड़ा सहयोगी बन सकता था?

यह पश्चाताप केवल एक व्यक्ति विशेष की व्यथा नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण मानव जाति की उस सार्वभौमिक त्रासदी का प्रतीक है, जहाँ मनुष्य की इच्छाएं और उसकी क्षमताएं कभी एक ही समय पर एक साथ नहीं चलतीं। जब मनुष्य युवा होता है, तब उसके पास असीम शारीरिक शक्ति और ऊर्जा होती है, किंतु न तो उसके पास जीवन का वह परिपक्व अनुभव होता है और न ही ज्ञानार्जन के प्रति वह गंभीर पिपासा होती है। उस उम्र में वह संसार को भोगने और जीतने की जिद्द में पागल रहता है। और जब प्रौढ़ावस्था में आकर उसे ज्ञान, विवेक और अध्यात्म का वास्तविक मूल्य समझ में आता है, तब तक ऊर्जा का वह स्रोत सूख चुका होता है और शरीर रूपी यंत्र पूरी तरह जीर्ण-शीर्ण हो चुका होता है। समय का यह फेर और प्रकृति का यह अटल नियम मनुष्य को भीतर से तोड़कर रख देता है।

रोगों की शैया पर लेटा हुआ वह परिपक्व व्यक्ति जब अपनी पिछली यात्रा को देखता है, तो उसे अपनी अधिकांश उपलब्धियां निरर्थक प्रतीत होती हैं। उसने जीवन भर जिन मकानों, गाड़ियों, संपत्तियों और संबंधों को सहेजने में अपनी पूरी आयु खपा दी, वे सब आज उसकी इस एकाकी पीड़ा में उसके किसी काम नहीं आ रहे हैं। काम आने वाली एकमात्र चीज़ यदि हो सकती थी, तो वह था वह आंतरिक ज्ञान और आध्यात्मिक संपदा, जिसे संचित करने के लिए अब उसके पास न तो शारीरिक सामर्थ्य बचा है और न ही अनुकूल परिस्थितियां हैं। यह अहसास उसके मन में एक अगाध शून्य पैदा कर देता है। वह देखता है कि उसके चारों ओर ज्ञान के ग्रंथ रखे हैं, उसके मन में उन्हें पढ़ने की अदम्य इच्छा है, किंतु उसकी धुंधली होती आंखें उन अक्षरों को पढ़ने से इनकार कर रही हैं। वह अपने गुरुओं और संतों के वचनों को सुनना चाहता है, किंतु उसकी बहरी होती इंद्रियां केवल मौन और सन्नाटा परोसती हैं।

इस प्रकार का मानसिक आघात व्यक्ति को विक्षिप्तता की सीमा तक ले जा सकता है। वह सोचता है कि यदि प्रकृति को यही करना था कि मनुष्य को अंत में रोग और लाचारी ही देनी थी, तो उसने इतनी तीव्र जिज्ञासा और ज्ञान की पिपासा क्यों दी? क्यों उसने मनुष्य के भीतर उस अनंत को जानने की इच्छा पैदा की, जिसे वह अपने इस जर्जर शरीर के साथ कभी छू ही नहीं सकता? क्या यह मनुष्य के साथ एक बहुत बड़ा क्रूर मज़ाक नहीं है? इनप्रश्नों के उत्तर में केवल मौन और उस जर्जर शरीर की मद्धिम सांसें ही सुनाई देती हैं।

किंतु यदि हम इस गाथा की गहराई में उतरकर विचार करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह संकट केवल बाहरी शरीर का नहीं, बल्कि हमारी जीवन-दृष्टि का है। मनुष्य ने हमेशा शरीर को ही अपना सर्वस्व मान लिया। उसने यह कभी स्वीकार ही नहीं किया कि शरीर तो केवल एक वस्त्र है, एक साधन है, जो एक दिन पुराना होना ही है। जब तक मनुष्य शरीर की युवावस्था के नशे में चूर रहता है, तब तक वह इस शाश्वत सत्य को स्वीकार करने से बचता रहता है। और जब वार्द्धक्य अनिवार्य रूप से आ धमकता है, तब वह बौखला जाता है। यदि जीवन के पूर्वार्द्ध में ही इस नश्वरता का बोध हो जाए, यदि भौतिकता और आध्यात्मिकता के बीच एक संतुलित तालमेल शुरू से ही बिठा लिया जाए, तो प्रौढ़ावस्था की यह जर्जरता इतनी भयानक और असहनीय प्रतीत नहीं होगी।

ज्ञानार्जन की यह जो लालसा प्रौढ़ावस्था में जागती है, वह वास्तव में आत्मा की वह पुकार है जो यह याद दिलाती है कि भौतिक शरीर की नश्वरता के परे भी एक ऐसा सत्य है जो कभी नष्ट नहीं होता। जो व्यक्ति जीवन भर केवल बाहरी दुनिया को संवारने में लगा रहता है, वह भीतर से पूरी तरह कंगाल हो जाता है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति अपने भीतर झांकने का अभ्यास थोड़ा-बहुत भी कर लेता है, उसके लिए वृद्धावस्था की शारीरिक निःशक्ता उतनी कष्टप्रद नहीं होती, क्योंकि उसने शरीर से परे अपनी पहचान बना ली होती है। लेकिन जो लोग जीवन भर केवल भोग और भौतिकता के समंदर में गोता लगाते रहते हैं, उनके लिए यह जर्जरता और रोग एक ऐसा वज्राघात सिद्ध होते हैं जिससे वे कभी उबर नहीं पाते।

तथापि, इस संपूर्ण परिदृश्य में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दार्शनिक पहलू यह भी है कि पश्चाताप की यह अग्नि मनुष्य के अंतःकरण को शुद्ध भी करती है। जो व्यक्ति अपने अतीत की भूलों पर पश्चाताप करता है, उसकी चेतना में एक प्रकार का वैराग्य और विनम्रता जन्म लेती है। अहंकार का वह दुर्ग, जो युवावस्था में सबसे ऊँचा होता है, बुढ़ापे की इन बीमारियों और विवशताओं के आगे ढह जाता है। जब मनुष्य बिस्तर पर पड़ा-पड़ा अपनी लाचारी देखता है, तो उसका सारा दंभ चूर-चूर हो जाता है। और जब दंभ समाप्त होता है, तभी वास्तविक ज्ञान और आध्यात्मिकता के प्रवेश के लिए द्वार खुलते हैं। इसलिए, यद्यपि रोग और जर्जरता कष्टदायक हैं, किंतु वे मनुष्य को उसके अंहकार से मुक्त करने का एक कठोर माध्यम भी हैं।

इस स्थिति में यह आवश्यक हो जाता है कि मनुष्य अपनी वर्तमान सीमाओं को पूरी तरह से स्वीकार करे। यदि वह जर्जर शरीर के साथ दुनिया के हर विषय का विस्तृत ज्ञान प्राप्त नहीं भी कर पा रहा है, तो भी जितना संभव है, उतने में ही संतोष करना सीखे। ज्ञान केवल बड़ी-बड़ी पुस्तकों के अध्ययन या भारी-भरकम ग्रंथों के संकलन का नाम नहीं है; ज्ञान वह आत्मानुभूति है जो न्यूनतम साधनों और शांत मन के साथ भी प्राप्त की जा सकती है। यदि शारीरिक पीड़ाओं के कारण बड़े-बड़े अनुसंधान या ग्रंथ-लेखन संभव नहीं हैं, तो कम से कम एक शांत चित्त के साथ अपने भीतर झांकना तो संभव है ही। आध्यात्मिकता का मूल संदेश ही यही है कि ईश्वर या परम सत्य तक पहुँचने के लिए किसी बाहरी तामझाम या युवा शरीर की आवश्यकता नहीं होती, उसके लिए तो केवल एक टूटे हुए और विनम्र मन की आवश्यकता होती है।

जब प्रौढ़ व्यक्ति इस रहस्य को समझ लेता है कि ज्ञान केवल बाहर से इकट्ठा करने की वस्तु नहीं है, बल्कि वह भीतर से प्रगट होने वाला आलोक है, तब उसके सारे पश्चाताप धीरे-धीरे गलने लगते हैं। वह समझ जाता है कि जो समय बीत गया, उसे वापस नहीं लाया जा सकता, किंतु जो वर्तमान क्षण उसके पास शेष है, उसे वह अपनी इस असीम लाचारी के बावजूद एक नई दृष्टि से जी सकता है। रोग और जर्जरता भले ही उसकी बाहरी गतिविधियों को सीमित कर दें, किंतु उसकी आंतरिक चेतना की उड़ान को कोई भी रोग या कोई भी शारीरिक निःशक्ता कभी नहीं बांध सकती। आत्मा अजर और अमर है, और जब शरीर शिथिल होता है, तो कई बार चेतना और अधिक सूक्ष्म और प्रखर हो जाती है।

अतः मनुष्य का यह जीवन चाहे भौतिकता की चकाचौंध से शुरू हुआ हो और चाहे प्रौढ़ावस्था की इन विकट जर्जरताओं और पश्चातापों के बीच से गुजर रहा हो, इसका अंतिम गंतव्य आत्मिक शांति और बोध ही है। शारीरिक शक्तियों का क्षय होना प्रकृति का नियम है, मानसिक शक्तियों का बदलना समय की चाल है, किंतु आत्मिक शक्ति का निरंतर जागृत रहना मनुष्य के अपने पुरुषार्थ पर निर्भर करता है। यदि मनुष्य जीवन के किसी भी मोड़ पर—चाहे वह युवावस्था हो या वार्द्धक्य का अंतिम छोर—अपनी अंतश्चेतना को जगाने में सफल हो जाता है, तो उसके सारे रोग, सारे संताप और सारे पश्चाताप एक ऐसे दिव्य प्रकाश में विलीन हो जाते हैं जो जीवन के हर अंधकार को हमेशा के लिए समाप्त कर देता है।

यही इस संपूर्ण अस्तित्व का सार है और यही मनुष्य की सबसे बड़ी विजय है कि वह शरीर के जर्जर होने के बावजूद अपनी आत्मा के अमरत्व को पहचान ले। जब तक मनुष्य इस सत्य को नहीं समझता, तब तक वह भौतिकता के मरुस्थल में भटकता रहेगा और अंत में अपनी ही इच्छाओं के बोझ तले दबा हुआ पश्चाताप की अग्नि में जलता रहेगा। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम जीवन के हर पड़ाव पर अपनी शक्तियों का सही आकलन करें, भौतिकता की सीमाओं को पहचानें, और अपनी आत्मिक ऊर्जा को संचित करते हुए इस नश्वर संसार की यात्रा को एक पूर्णता, संतुलन और परम शांति के साथ पूरा करें।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें