महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

सोमवार, 27 मई 2019

विकासपरक राजनीति के पर्याय नरेंद्र मोदी

भारत देश की वर्तमान राजनीति स्‍पष्‍ट रूप में दो भागों में विभाजित है। यह प्रवृत्ति किसी भी देश की राजनीति में शुरू से ही रही है। देश ही क्‍यों, एक परिवार के सदस्‍यों के बीच भी जब-तब मतभेद उभरते हैं तो उस आधार पर अपने-अपने सिद्धांतों का संरक्षण शुरू हो जाता है। यहीं से 'राज' विचार उभरता है। राज करना केवल देश पर राज करना नहीं होता। वैचारिक रूप में दूसरों पर राज करने की स्थिति तो व्‍यक्ति, परिवार, समुदाय, गांव और शहर के स्‍तर पर भी उठनी शुरू हो जाती है। 'राज' भावना का व्‍यक्तिगत और सामाजिक स्‍तर पर इतना व्‍यापक प्रभाव होने के बावजूद यदि 'राज' के आधार पर बननेवाली नीतियों से देश में हलचल मची हुई है, तो इसमें इतनी चिंता की क्‍या बात है। कम से कम जिस केंद्रीय सत्‍ता (2014 से भाजपा के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन अर्थात् राजग जिसके प्रधानमंत्री हैं नरेन्द्र मोदी) को लेकर भारतीय राजनीति संक्रमणकाल से गुजर रही है, वह शासन के लिए अपेक्षित सत्‍यनिष्ठा का पालन तो कर रही है। बहुत सी राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक और अन्‍य समस्‍याओं के रहते-रहते भी क्या यह कम बड़ी बात है कि पिछले पांच वर्षों से केंद्रीय सत्‍ताधारकों ने अपने सारे शासकीय सौदे सत्‍यनिष्‍ठा व पारदर्शिता से किए हैं ? विपक्ष, सत्‍ता पक्ष का विरोध करने के लिए कुछ भी आरोप लगाता रहे, पर संवेदनशील नागरिक वर्तमान केन्‍द्रीय शासन के प्रति लोकतांत्रिक रूप में जुड़ता जा रहा है। भारत देश में विगत सरकारें तो अवैध शासकीय सौदों के आधार पर घोटालों और घपलों का एक रिकार्ड ही बना चुकी थी। तब की तुलना में अब का शासन कुछ तो सुधार की स्थिति में है ही। हां, देश में छोर से छोर तक व्‍याप्‍त और एक-एक आदमी को घेरे हुई समस्‍याएं तो जड़ से तभी मिटेंगी, जब वर्तमान केंद्र सरकार के ईमानदार प्रयासों के साथ देश के लोग भी जुड़ें तथा आगामी एक दशक तक सरकार से कोई भी विलासी अपेक्षा न करें।  
कोई स्‍वीकार करे अथवा नहीं परंतु सच यही है कि किसी भी राष्‍ट्र में विकास, कल्‍याण  आदि बातें राजनीतिक अस्तित्‍व को बनाने या बचाए रखने वाली स्थितियों के सामने हमेशा गौण ही होती हैं। ऐसा इसलिए भी होता है क्‍योंकि देश में दैनिक विकास या कल्‍याण संबंधी काम सीधे-सीधे केंद्रीय सत्‍ता के अधीनस्‍थ नहीं रहते। शासकीय कर्मचारियों की काम करने की आदतें या कार्य निष्‍ठा सत्‍ता के चरित्र के अनुसार निर्धारित होती है। और जो देश दशकों से कांग्रेसी सरकार की नीतिगत पंगुता को झेल रहा था, भला उसके अंतर्गत काम करनेवाला कर्मचारी वर्ग कहां से, कैसे सत्‍याचारी हो जाता। अतकहने का तात्‍पर्य यही है कि वर्तमान मोदी सरकार को सत्‍ता तो भाजपा राजनीतिक दल के रूप में मिली, परन्‍तु उसके लिए काम करनेवाला राष्‍ट्रव्‍यापी कार्यकारी तंत्र तो वही है, जो कांग्रेस उसके लिए छोड़ गई। निष्‍कर्ष यही है कि यदि हम निचले स्‍तर पर क्रांतिकारी तरीके से सामाजिक, सरकारी और बुनियादी अंतर देखना चाहते हैं तो उसके लिए केवल मोदी को ही नहीं बल्कि पूरे राजनीतिक समाज और कार्यपालिका के प्रत्‍येक घटक (कर्मचारी) को सत्‍यनिष्‍ठ बनना पड़़ेगा। अपेक्षित परिणाम तभी मिल सकेंगे।
यदि लोकतंत्र में जनभावनाओं के सम्मान के लिए कार्य किए जाने की सार्वभौमिक अपेक्षा उभरती है तो कहां संदेह है कि मोदी इसमें खरे नहीं उतर रहे। अधिसंख्य भारतीय नागरिक यदि उन्हें अपना राजनीतिकसामाजिक और राष्ट्रीय मार्गदर्शक मान रहे हैं तो क्या हमें नागरिकों की भावनाओं का विरोध करना चाहिएयदि इस परिस्थिति में भी मोदी विरोध की व्यर्थ कोशिश विभिन्न स्तरों पर होती है तो यह मोदी का नहीं अपितु जनसामान्य की भावनाओं का विरोध ही होगा। इसलिए हमें सचेत होकर अपनी राजनीतिक अंतर्दृष्टि को परिवर्तित करने की आवश्यकता है। राष्ट्र में हर क्षेत्र में अपेक्षित संतुलित विकास की इच्छाएं पालने या इस संदर्भ में बातें करने से ही काम नहीं चलेगा बल्कि इस दिशा में जो राजनीतिक नेतृत्व काम कर रहा है और पहले के राजनीतिक नेतृत्वों से कई गुणा बेहतर ढंग से काम कर रहा हैउसे हर रूप में सहयोग करना देश के सभी लोगों का प्रथम कर्तव्य होना चाहिए। हमारे प्रतिकूल बनते आए जीवन के वातावरण में सुधार के लिए किसी न किसी रूप में शुरुआत तो करनी ही पड़ेगी और यह शुरुआत मोदी के नेतृत्व में हो रही है तो इससे भेद रखना न्यायसंगत कैसे कहलाएगा।
यदि मोदी जैसे समर्पित और सत्‍यनिष्‍ठ नेता देश के प्रधानमंत्री हैं तो नौकरशाही भी ईमानदारी से निरंतर देश के सभी कार्यों को करती रहेगी। इसके इतर यदि मोदी अपनी पार्टी, अपने या यह कहना श्रेष्‍ठ होगा कि लोगों के भविष्‍य के लिए राजनीतिक रूप में मजबूत होने की इच्‍छा से चुनावों में लोगों को मतदान के लिए उत्प्रेरित करते हैं, तो इसमें इतना परेशान या चिंतित होने का कोई मतलब नहीं, जितना कि विपक्ष के रूप में कांग्रेस, उसका समर्थक मीडिया तंत्र या उसके विश्‍लेषक होते हैं। मानिए कि यदि मोदी की जगह कांग्रेस का कोई नेता होता और वह बहुमत के साथ केंद्र की सत्‍ता में सत्‍तारूढ़ होने के अलावा चुनावों के लिए आयोजित होनेवाली जनसभाओं में लोगों के आकर्षण का केंद्र बनता या लोग उसके भाषणों को सुनने के लिए जन समुद्र के रूप में एकत्र होते, तो यही स्थिति कांग्रेसी पत्रकारों के लिए देशहित में परिवर्तित होती। तब वे इस स्थिति को लोगों से कांग्रेस या उसके नेता के जुड़ाव के रूप में सकारात्‍मक तरीके से प्रचारित करते। लेकिन चूंकि अभी उनके विरोधी मोदी के साथ यह स्थिति है, तो उन्‍हें चुनावों के बहाने अपने विरोधी को यह कहने से संकोच भी नहीं हो रहा कि देश में असली मुद्दों पर तो प्रधानमंत्री और उसकी पार्टी का ध्‍यान है ही नहीं। जबकि देश के सभी मुद्दों पर यह सरकार पिछली सरकारों से बहुत अच्‍छा काम कर रही है। इस बात का अनुभव देश की अधिसंख्य जनता ही नहीं कर रही, बल्कि आर्थिक-समाजिक-राजनीतिक गतिविधियों का मंथन कर वार्षिक रिपोर्टें छापनेवाली अंतर्राष्‍ट्रीय संस्‍थाएं भी ऐसा महसूस कर रही हैं। आज दुनिया के शक्तिशाली देशों के राष्‍ट्राध्‍यक्ष, विचारक और लोग भी मोदी के राजनीतिक दृष्टिकोण पर मोहित हैं। मोदी भारत देश की विभिन्न नागरिक आवश्यकताओं के लिए ही नहींबल्कि वैश्विक शांति व कल्याण के विचार से संचित हो आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्‍याओं के लिए नए-नए काम कर रहे हैं। इन कामों को दुनिया की सराहना भी मिल रही है।
य‍ह एक तथ्‍यपूर्ण और अनुभवी बात है कि जो पक्ष या दल केंद्र की राजनीति में कर्ताधर्ता यानि सत्‍तारूढ़ नहीं होता उसके विचारक, राजनीतिक समर्थक, राजनेता, इतिहासकार और सामान्‍य समर्थक राजनीति को लोगों की दृष्टि में निकृष्‍ट बनाने का हरसंभव प्रयास करते हैं। कांग्रेस भी पिछले पांच वर्षों से यही कर रही है। मोदी विरोध में कांग्रेस अपनी हर राजनीतिक चाल चल चुकी है, लेकिन तब भी उसे सफलता नहीं मिल पा रही। यह लेखक यहां कांग्रेसियों के विरोधी के रूप में भाजपा को इसलिए नामांकित नहीं करना चाहता, क्‍योंकि दल आधारित वैचारिक विभाजन वास्‍तव में कुछ नहीं होता। जिस तरह चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस के महत्‍वाकांक्षी नेता कांग्रेस छोड़ भाजपा में आते रहे हैं और भाजपा भी उनको राजनीतिक लाभ के लिए अपने पाले में लेने से नहीं हिचकी या हिचकती, उस स्थिति में संवेदनशील और समझदार लोगों के लिए भाजपा नहीं बल्कि प्रधानमंत्री मोदी ही अधिक प्रासंगिक हैं। मोदी की ख्‍याति या स्‍वीकार्यता इसलिए नहीं बढ़ रही कि वे आरएसएस या भाजपा से सम्‍बद्ध हैं। आरएसएस तो एक आदर्श संस्‍था है, पर दल के रूप में भाजपा का ऐसा विश्‍वसनीय जनाधार नहीं कि वह लोगों के बीच वैसा आकर्षण बन पाए, जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी बन गए हैं। ऐसा इसलिए है क्‍योंकि जो राजनीतिक दिग्‍दर्शन मोदी के पास है, भाजपा में अटल बिहारी वाजपेयी के बाद वैसा और किसी में देखने को नहीं मिला।
हालांकि गहन सामाजिक और विशेषकर धार्मिक मतभेदों का पूर्ण समाधान करने के लिए स्‍पष्‍ट राजनीतिक निर्णय लेने के मामले में तो मोदी भी संशयग्रस्‍त हैं, पर लोगों को आशा है कि यदि भाजपा में मोदी जैसे एक दर्जन नेता और हो जाएं तो यह समस्‍या भी समाप्‍त हो जाएगी। लेकिन तब तक मोदी को राजनीतिक समर्थन देना, सामाजिक सहारा देना लोगों के लिए बहुत जरूरी है। ऐसा नहीं होगा तो कांग्रेस लोकतंत्र को कृत्रिम लोकतंत्र बनाकर इस देश से सनातन धर्म को उखाड़ फेंकने के लिए हर संभव राजनीतिक दुस्‍साहस करेगी। यह बात आम और खास सबको स्‍वीकार करनी चाहिए। आज केवल मोदी के कारण ही भाजपा लोगों के लिए सर्वमान्‍य राजनीतिक दल बना हुआ है। कल यदि भाजपा में मोदी जैसा कोई नहीं होगा, तो अचरज नहीं कि भाजपा भी राजनीतिक रूप में अल्‍पमत में आ जाए। मोदी का व्‍यक्तिगत दिग्‍दर्शन उन्‍हें राजनेता के अलावा बहुत कुछ बनाता है। उनके संभाषण हों या संबोधन उनमें जो जनसंवेदना और जनकल्‍याणकारी बातें या चिंताएं होती हैं, वे इसी बात का द्योतक हैं कि वे जनसरोकारों से राजनीतिक ही नहीं आत्मिक रूप से भी जुड़े हुए हैं। मोदी केवल जनकल्‍याण की दिखावटी चिंता नहीं करते। उनके पास लोगों के जीवन के उत्‍थान के लिए सर्वथा नए-नए उपाय हैं, जिनका प्रयोग वे अपनी राजनीतिक शक्ति से कर भी रहे हैं। चूंकि उनकी नीतियां पूर्व की सरकारों द्वारा अपनाई गईं नीतियों से एकदम अलग व नवप्रवर्तनकारी हैं, इसलिए शुरू में उनसे सामंजस्‍य बिठाना नागरिकों के लिए मुश्किल हो रहा है। लेकिन धीरे-धीरे ऐसी मुश्किल भी खत्‍म हो जाएगी। जरूरत इतनी है कि लोग यह सोचकर धैर्य बनाए रखें कि उन्‍होंने देश की केंद्रीय सत्‍ता एक अत्‍यंत सत्‍यनिष्‍ठ नेता को सौंपी है। 

गुरुवार, 11 अप्रैल 2019

राफेल विवाद पर व्यर्थ प्रलाप

राफेल विवाद पर जिस तरह लोकसभा चुनाव के प्रथम चरण के मतदान से ठीक एक दिन पहले शीर्ष अदालत ने यह कहा कि रिव्यू पेटीशन के बिंदु विचारणीय हैं तो इससे यह समझना कठिन नहीं कि कांग्रेस, रिव्यू पैटीशन डालनेवाले वकील और शीर्ष अदालत में बैठे जज किसी तरह (अनावश्यक राफेल विवाद क्रियेट कर) मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा करना चाहते हैं और कांग्रेस के पक्ष में लोकसभा चुनाव की हवा बनाना चाहते हैं। लेकिन लोग अब चेत गए हैं। अब कांग्रेस सत्ता के सपने देखना बंद कर दे। जब लोग तन-मन-धन से ही नहीं आत्मा से भी कांग्रेस के विरोध में हो चुके हैं तब कांग्रेस को इस तरह की कवायद बिलकुल नहीं करनी चाहिए। अगर कांग्रेस अदालतों के माध्यम से ऐसी कवायद करती रही तो मोदी के कारण तो नहीं लेकिन हां कांग्रेस के कारण लोकतंत्र हास्यास्पद बनकर जरूर खत्म हो जाएगा।
सत्रहवें लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान से ठीक एक दिन पहले राफेल विवाद (जो मोदी सरकार के आने के बाद वास्तव में विवाद है ही नहीं) फिर उछाल दिया गया है। क्या यह विडंबना नहीं कि कांग्रेस अपने सेट किए हुए वकीलों, जजों के माध्यम से राफेल के अनावश्यक विवाद को इस लोकसभा चुनाव का अंतिम चरण का मतदान पूर्ण होने तक भुनाने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती। लेकिन कांग्रेस को यह भी जान लेना चाहिए कि उसके लिए यह कड़वा ही नहीं परम सत्य है कि राफेल में यदि केन्द्र सरकार की कोई अनचाही आधिकारिक गलती या चूक न्यायालयी विचार के बाद पकड़ में आती भी है तो इससे जनता के मानस पर कोई फर्क नहीं पड़नेवाला। आखिर कांग्रेस, कांग्रेस जनित वकील और न्यायाधीश यह क्यों नहीं समझते कि उनके माइंड सेट के हिसाब से भारत की विवेकवान जनता चले ही क्यों!
भारतीयों को कांग्रेस का राष्ट्रविरोधी चरित्र जानने और भाजपा की मोदी सरकार की सत्यनिष्ठा समझने के लिए किसी न्यायालयी निर्णय की आवश्यकता नहीं। गजब स्थिति यह है कि जो कांग्रेस अपने कार्यकाल में कई घोटालों-घपलों अवैध लेन-देन में प्रमाणों और तथ्यों के साथ फंसी नजर आई उन पर न्यायालय में यह सिद्ध हो गया कि जांच एजेंसियों ने मामले में ढंग से जांच नहीं की। कांग्रेसी छत्रछाया में हुए एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ के सबसे बड़े टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले में कोर्ट ने घोटाले के आरोपियों को यह कहकर छोड़ दिया कि जांच एजेंसी सीबीआई के पास मामले में आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं है। केवल टू जी ही नहीं कांग्रेस जनित हरेक घोटाले में देश की अदालतें कांग्रेसी घोटालेबाज नेताओं के पक्ष में कार्य कर रही हैं। जनता यह सब खूब समझ रही है।
राफेल में रिव्यू पेटीशन डालनेवाले अरुण शौरी, प्रशांत भूषण जैसे लोगों का दिमाग खराब हो गया है। कानूनी नियमावलियों का हवाला देकर झूठे ही राफेल में मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है। कांग्रेस, इसके नेता, इनके पक्ष में खड़े होनेवाले वकील और कांग्रेस की मेहरबानी से शीर्ष न्यायालय में विराजमान न्यायाधीश चाहे जितना जोर लगा लें राफेल सौदे के मनगढ़ंत घोटाले पर मोदी सरकार को घेरने का, लेकिन लोगों को पता है कि यह सब कुछ कांग्रेस के एक आदमी को सत्ता तक पहुंचाने के लिए ही किया जा रहा है।
लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। अदालतें उन मामलों पर तो कोई सुनवाई या निर्णय देती नहीं जो देश की जनता को प्रतिदिन परेशान किए हुए हैं। जैसे कि निजी स्कूलों और हास्पिटलों में आम आदमी को लूटने के तंत्र को सुधारने और इसमें आम आदमी के हिसाब से बदलाव के लिए अदालतें सरकारों पर कोई दबाव नहीं बनाती। अदालतें परिवहन, खाद्यान, किसान, बेरोजगारी जैसे विषयों पर अलग-अलग राज्यों को राज्य की सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति के अनुसार निर्देश देकर बहुत बड़ी भूमिका का निर्वहन कर सकती हैं। इसी प्रकार समाज और संस्कृति के उत्थान के कार्यों को प्रोत्साहित करने के लिए भी अदालतें सरकारों पर दबाव बना उन्हें निर्देशित कर सकती हैं। लेकिन इस दिशा में सोचने के लिए अदालतें तैयार नहीं। कोई भी मामला हो चाहे राम मंदिर, तीन तलाक, जम्मू कश्मीर, अफस्पा, नक्सल या माओवाद, देश विरोध, पाकिस्तान आदि मामलों पर अदालतों के फैसले गोपनीय तरीके से कांग्रेस को सत्तासीन करने के मकसद से होते रहे हैं।
यह कितनी दुखद और क्रुद्ध करने की बात है कि सुप्रीम कोर्ट राफेल विवाद के बारे में मोदी विरोधियों की पेटीशन को आम चुनाव के बीच में सुनवाई के लिए ले रहा है। कांग्रेस नहीं हुई पता नहीं क्या हो गई और गांधी नहीं हो गए पता नहीं क्या हो गए जो इनका होना भारतीय सत्ता तंत्र में जरूरी है, जो इन्हें सत्ता में लाने के लिए राफेल के अनावश्यक विवाद को पहले तो कांग्रेसी अध्यक्ष ने हवा देने में कोई कसर नहीं उठाए रखी और अब कांग्रेस के अनुसार चलनेवाले वकील और न्यायाधीश इस संबंध में लोगों को बरगलाने की कोशिश में हैं। लेकिन ये सभी जान लें कि अब देशवासी इस संबंध में ही नहीं कांग्रेस की बलात सत्ता में स्थापना के लिए किए जानेवाले अन्य गुप्त षड्यंत्रों में नहीं फंसनेवाले। बहुत हो गया। सुप्रीम कोर्ट नहीं हो गया जैसे आसमान से टपका कोई न्यायिक यंत्र हो गया जो इसके कहे अनुसार ही सब होगा। जब तक यह तथाकथित सुप्रीम कोर्ट भारतीय गरीब, पीड़ित और देशभक्त लोगों के पक्ष में न्याय की कार्रवाइयां नहीं करता, तब तक होता रहे यह लोकतंत्र के चार स्तंभों में से एक महत्वपूर्ण स्तंभ, इसकी परवाह किसी को नहीं।
कोर्ट-कचहरियां विवादों को सुधारने, लोगों देश के भले के लिए स्थापित हुई थीं या कुतर्की वकीलों और कांग्रेसी चमचों के कहे अनुसार कांग्रेस की भलाई के लिए, यह बात अभी तक लोग समझ नहीं पाए। कोई एक मुद्दा बता दीजिए देश की भलाई का जिसमें तथाकथित सुप्रीम कोर्ट की एकाधिक जजों से युक्त पीठ ने एकमत से देश के पक्ष में फैसला दिया हो। यदि कोई जज अधिसंख्य देशभक्त जनता और ईमानदार मोदी सरकार के पक्ष में खुलकर सामने आया तो कांग्रेसी कृपाप्राप्त जज प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर जनता से ही न्याय की गुहार करने लगे। ये कुंठित दिमाग रखनेवाले जज इन्हें क्या पता कि आम आदमी कैसे-कैसे दिन गुजारता रहा है इस देश में!
इन जजों का न्याय अंग्रेजी भाषा में कानून की धाराएं लिखने-पढ़ने तक ही सीमित हो चुका है। अनावश्यक नियम-अधिनियम की धाराएं उपधाराएं बना कर कानून का अच्छा बिजनेस चल रहा है। कानून की मोटी-मोटी व्यर्थ किताबों को छापने और बेचने का धंधा चल रहा है। आम आदमी इन चीजों से पक चुका है। यदि जनता कांग्रेस पार्टी से ऊब चुकी है तो उसे जबरन न्यायालयी हस्तक्षेप से कांग्रेस के पक्ष में खड़ा करने का दुस्साहस क्यों किया जा रहा है! क्या इसके लिए स्वयं शीर्ष न्यायालय और वे वकील जो कांग्रेस की जड़ों को हरा करने के लिए राफेल जैसे विवाद को अनावश्यक रूप में बढ़ा रहे हैं, लोकतंत्र में न्याय के प्राकृतिक सिद्धांत की धज्जियां नहीं उड़ा रहे? इसके लिए उन्हें कठघरे में कौन खड़ा करेगा?