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Wednesday, August 24, 2016

बुलंदशहर में हुई दुष्कर्म की घटना पर

ह दुर्भाग्‍यशाली ही कहा जाएगा कि देश में होनेवाली हर किस्‍म की दुर्घटनाएं राजनीतिक दलों को अपनी राजनीतिक मंशा पूरी करने का माध्‍यम ही नजर आती हैं। उन्‍हें पीड़ितों से सीधे-सीधे कोई सरोकार नहीं होता। जब सिर पर बन आती है या अपनी राजनीतिक जमीन खिसकने का भय उन्‍हें सताने लगता है तो उनका पुलिस-प्रशासन सचेत होता है। उत्‍तर प्रदेश के बुलंदशहर में हुई बलात्‍कार की घटना को इस संदर्भ में व्‍यापकता से देखा व समझा जा सकता है। नोएडा का एक परिवार अपनी कार में सवार होकर राष्‍ट्रीय राजमार्ग 91 से होते हुए पारिवारिक कार्यक्रम में शामिल होने शाहजहांपुर जा रहा था। रात डेढ़ बजे अपराधियों ने पहले उनकी चलती कार के आगे कुछ फेंका ताकि वे रुक जाएं। पहली बार में तो चालक ने गाड़ी नहीं रोकी। लेकिन दूसरी बार भी जब कार के आगे कोई चीज गिरने की आवाज सुनाई दी तो परिवार आशंकित हो गया और चालक ने कार रोक दी। इतने में पीछे से आई कार से छह-सात आदमी उतरे। परिवार की कार में तीन पुरुष और तीन महिलाएं बैठी थीं। अपराधी उन्‍हें बंदूक की नोक पर राजमार्ग पर‍ स्थित फ्लाईओवर के नीचे संपर्क मार्ग की तरफ ले गए। यहां उन्‍होंने तीनों पुरुषों को कार में बंधक बना लिया और तीन महिलाओं में से दो के साथ सामूहिक बलात्‍कार किया।
                हालांकि बलात्‍कार की यह अकेली घटना नहीं जो राजनीति से लेकर पुलिस-प्रशासन की अकर्मण्‍यता और कारगर व्‍यवस्‍था के अभाव की पोल खोलती हो। इससे पहले भी देशभर में इस तरह की अनेक घटनाएं हुईं और राष्‍ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्‍यूरो के अनुसार तो 2010 से 2014 तक देश में दुष्‍कर्म के मामलों में निरंतर वृद्धि हुई है। यहां सवाल मात्र दुष्‍कर्म का नहीं। दुष्‍कर्म जैसे अपराध तो घर की चाहरदीवार में भी होते हैं। विशेषकर दुष्‍कर्म पीड़ितों के नाते-रिश्तेदार या दोस्‍त ही इसमें लिप्‍त रहते हैं। इस पर पुलिस या प्रशासन प्रत्‍यक्ष रूप से कोई नियंत्रण नहीं कर सकता। ऐसे मामलों को सामाजिक माहौल में सांस्‍कृतिक विचारधाराओं का विकास कर नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन राष्‍ट्रीय, अंतर्राष्‍ट्रीय राजनीतिक और सामाजिक व्‍यवस्‍थाएं आज इस स्थिति में हैं कि विकास के अभिशाप के रूप में उभरी सामाजिक बुराइयां मिटाना उनकी कार्यसूची में है ही नहीं। परंतु इस स्थिति में जब आधुनिकता के बिगड़ते मिजाज से व्‍यक्ति-व्‍यक्ति में मानसिक विकार तेजी से बढ़ रहे हैं, सरकारों को अपनी पुलिसिंग व्‍यवस्‍था में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्‍यकता है। विधान-संविधान और नियम-कानूनों को देश के भीतर सुदूर सुनसान स्‍थानों में घटित होते अपराधों के अनुसार इतना लचीला होना चाहिए कि अपराधियों को तुरंत पकड़कर ऐसे दंड का प्रावधान हो कि अपराध करने से पहले कोई भी व्‍यक्ति दंड के भय के बाबत अवश्‍य विचार करे। यह विडंबना ही है कि जब अपराध की घटनाओं का मीडिया द्वारा व्‍याख्‍यान होना शुरू होता है और जब देश के एक बड़े जनसमूह तक ऐसी घटनाओं की सूचना प्रसारित हो जाती है, तब उस स्‍थान की राज्‍य-व्‍यवस्‍था अपराधियों की धरपकड़ के लिए सक्रिय होती है, जहां अपराध हुआ होता है।
                संविधान के अंतर्गत केंद्र व राज्‍य सरकारों के अधीन जैसी पुलिसिंग प्रणाली की कल्‍पना साठ-सत्‍तर साल पहले की गई थी, उसमें अब बहुत व्‍यापक सुधार की आवश्‍यकता आन पड़ी है। एक आम आदमी की नजर में आज पुलिसिंग कार्यप्रणाली हंसी-ठट्ठे का खेल बन कर रह गई है। खासकर उत्‍तर प्रदेश व बिहार जैसे राज्‍यों के पुलिस बल के सामाजिक और सरकारी कार्यों, दायित्‍वों और नागरिक सुरक्षा के उनके कर्त्‍तव्‍यों की अवधारणा इतनी खोखली हो चुकी है कि वे दिन के कुछ घंटों में बंधुआ श्रमिकों की तरह अपना ड्यूटी रोस्‍टर पूरा कर रहे होते हैं। आज देश में छोटे-बड़े कई तरह के अपराध तेजी से घट रहे हैं। इसके अलावा इंटरनेट और साइबर अपराधों में भी दिनोंदिन वृद्धि हो रही है। परंपरागत अपराधों में तो पुलिस सरकार के दबाव में अपराधियों को देर-सवेर पकड़ ही लेती है लेकिन साइबर अपराधों की जड़ तक पहुंचने और अपराधियों को दबोचने के लिए अभी तक देश का पु‍लिस बल इतना काबिल नहीं हो सका है।
सड़क से लेकर घरों में होनेवाले अपराधों के पीछे न जाने कितने किस्‍म के व्‍यक्तिगत मानसिक विकार होते हैं। इन परिस्थितियों में पुलिस बल को अपराधों की श्रेणियों के अनुसार प्रशिक्षण देकर उन्‍हें और उनके अधिकारों को विकसित करने की जरूरत  है। इतना ही नहीं उनके लिए पुलिसिंग से संबंधित समन्‍नुत साधन-संसाधन भी उपलब्‍ध होने चाहिए। यहां तक कि एक पुलिसवाले की ड्यूटी आठ-दस-बारह घंटे के बजाए चार-पांच घंटे की होनी चाहिए। कहने का तात्‍पर्य यह है कि हरेक पुलिसकर्मी चार घंटे ड्यूटी पर तैनात रहे और बाकी के चार घंटों में उसे शारीरिक व मानिसक रूप से स्‍वस्‍थ, सक्रिय, ऊर्जावान रखने तथा पुलिस कर्त्‍तवयों से संबंधित साहित्‍य पढ़ने को बाध्‍य किया जाए और श्रेष्‍ठ पुलिसिंग का प्रशिक्षण दिया जाए। इस तरह की पुलिसिंग कार्यशालाएं देशभर में अवश्‍य शुरू होनी चाहिए। इस उपक्रम से देश का पुलिस बल तो समन्‍नुत होगा ही होगा साथ में  बेरोजगारी भी दूर होगी, क्‍योंकि चार घंटे का ड्यूटी रोस्‍टर और चार घंटे पुलिसिंग प्रशिक्षण नियत होगा तो एक स्‍थान पर दो व्‍यक्तियों की तैनाती सुनिश्चित हो सकेगी।
अपराधों से बचने के लिए जनता को भी सरकार और पुलिस के साथ जागरूक बनना पड़ेगा। प्राय: देखा जाता है कि लोग स्‍वार्थवश और नागरिक दायित्वों के प्रति उदासीन होने के कारण अपराधों के घटने की पूर्व जानकारी या सूचना को पुलिस के साथ नहीं बांटते। पूर्व में इसके लिए पुलिस और प्रशासन के गलत बर्ताव को दोषी ठहराया जाता था, लेकिन अब जब पुलिस खुद विज्ञापन और सूचनाएं देकर नागरिकों से उनके नाक-कान बनने का आग्रह कर रही हो, तब तो जनता को उन्‍हें सहयोग देना ही चाहिए। इन्‍हीं उपायों को अपनाकर और नियम-अनुशासन बनाकर बढ़ते अपराधों पर नियंत्रण पाने की दिशा में कुछ कदम आगे बढ़ा जा सकता है। हालांकि देश, राज्‍य या समाज को पूर्णत: अपराधमुक्‍त करने के लिए सरकारों को आधुनिकता की विसंगतियों की ओर भी ध्‍यान लगाना होगा। भारत जैसे देश में तो आधुनिकता की विसंगतियां ही नहीं पारंपरिक राजनीति करने के मोहरे जैसे आरक्षण, जाति-धर्म आदि भी अपराधों के अहम कारक हैं। अपराधों पर नियंत्रण पाने में अगर अभी तक कामयाबी नहीं मिली तो इसके लिए भी पारंपरिक राजनीति करने के मोहरे ही जिम्‍मेदार हैं।
समाज में हो रहेे दुष्‍कर्मों, लूटपाट, हिंसा और यहां तक कि आत्‍महत्‍याओं की घटनाओं में भी अपराध घटित होने के प्रथम सूचना विवरण दर्ज करानेे से लेकर अपराधी को पकड़ने तक का समस्‍त कार्य तो पुलिस का है, लेकिन क्‍या अपराध घटित होने की प्रक्रिया में नागरिक, पुलिस, समाज और सरकार सभी की बेईमानी और अकर्मण्‍यता जिम्‍मेदार नहीं? इस बात पर अवश्‍य विचार हो और जितनी जल्‍दी हो सके देश के पुलिस बल को नई शक्तियों, अधिकारों और सुविधाओं से लैस करने की दिशा में काम किया जाए। ऐसा होगा तो हम उम्‍मीद कर सकते हैं कि देश में किसी के साथ कोई भी यूं ही राह चलते दुष्‍कर्म, लूटपाट और दुर्व्‍यवहार करने की जुर्रत नहीं कर सकता।
पूरे देश में लड़कियों और महिलाओं के विरुद्ध लैंगिक भेदभाव और अत्‍याचार भावना दिनोंदिन बढ़ रही है। आशंका है कि कहीं इसकी परिणति आनेवाले वर्षों में समाज के लिए आत्‍मघाती न हो जाए। इस बात का ध्‍यान देशभर के पुलिस-प्रशासन को अवश्‍य रखना होगा। दुष्‍कर्म की घटनाएं देश में एक सतत् अभ्‍यास बन चुकी हैं लेकिन इस पर पूर्ण प्रतिबंध के लिए सरकार, न्‍यायपालिका और पुलिस-प्रशासन की कार्यप्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव बिलकुल नहीं आया। जब तक न्‍याय की सर्वोच्‍च संस्‍था इस संबंध में दुष्‍कर्म पीड़ितों की पीड़ा को अपने विवेक के केंद्र में रख निर्णय नहीं करेगी तब तक इस समस्‍या से छुटकारा मिलना असंभव ही प्रतीत होता है। न्‍यायिक व्‍यवस्‍था भी कहीं न कहीं अपनी धारा की राजनीति के हित के अनुसार चल रही है। या तो न्‍याय व्‍यवस्‍था स्‍वावलंबी बने और पीड़ितों के पक्ष में त्‍वरित और क्रांतिकारी निर्णय ले या उस राजनीति को समाज और खासकर महिलाओं के प्रति सम्‍माननीय दृष्टिकोण अपनाने को विवश करे, जिस राजनीतिक विचारधारा के समर्थन में उसके निर्णय पीड़ितों के प्रतिकूल हो रहे हैं। अन्‍यथा जनजीवन में बलात्‍कार पीड़ित महिलाओं का दर्द अन्‍य सामाजिक अव्‍यवस्‍थाओं और उनसे निकली पीड़ाओं की तरह एक रूटीन बन जाएगा। और यदि किसी लोकतांत्रिक देश में ऐसा होता है तो लोकतंत्र अपने आप में विडंबनात्‍मक और अप्रासंगिक हो जाएगा। हमारे जनप्रतिनिधियों को इस विषय पर अपना न्‍यूनतम विचार तो करना ही चाहिए। माना कि वे बड़ी जिम्‍मेदारी के निर्वहन के लिए अयोग्‍य हैं, पर अपनी विचारशक्ति बढ़ाकर राजनीतिक रूप से योग्‍य हो सकते हैं। फलतउन्‍हें समस्‍याओं को सामान्‍य तरीके से सुलझाने का ही काम नहीं करना बल्कि समस्‍याओं के पैदा होने के कारणों की पड़ताल कर उन्‍हें समूल मिटाने के लिए भी कमर कस लेनी चाहिए।
बुलंदशहर में दुष्‍कर्म की घटना एक मामूली घटना नहीं रही। पूरे दो हफ्ते तक जनसंचार के केंद्र में ठहरी इस घटना के कई अन्‍य वीभत्‍स राजनीतिक और सामाजिक पहलू भी सामने आए। घटना के कुछ दिनों बाद ज्ञात हुआ कि अपराधियों ने दुष्‍कर्म का वीडियो भी बनाया तथा उसके आधार पर पीड़ित परिवार को धमकाने और चुप कराने की पूरी तैयारी उन्‍होंने कर रखी थी। पिछले दिनों केंद्र सरकार ने जब पोर्नोग्राफी पर प्रतिबंध के लिए कड़ा कानून बनाने की पहल की थी तो प्रगतिवाद के कई तथाकथित झंडाबरदारों ने इस पर आपत्ति प्रकट करी और इसे सभ्‍य और आधुनिक समाज के लिए बड़ा रोड़ा बता कर खूब विवाद उत्‍पन्‍न किया था। लेकिन बच्‍चों, युवतियों और यहां तक कि प्रौढ़-वृद्ध स्त्रियों के साथ आए दिन होनेवाली दुष्‍कर्मों की घटनाओं को ध्‍यान में रखते हुए उनकी दलील सरकार के विरोध में थोथी ही प्रतीत होती है। देखा जाए तो समाज के इस तरह के विघटन के लिए वास्‍तविक दुष्‍कर्मी यही लोग हैं। 

विकेश कुमार बडोला

Saturday, August 20, 2016

सोशल मीडिया की शक्ति से परिचित राजग

यह आलेख मूल रूप से दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में
रविवार 21 अगस्‍त 2016  को प्रकाशित हो चुका है।
रविवार 21 अगस्‍त 2016 को दैनिक जागरण के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में
विगत दिनों वित्‍त मंत्री अरुण जेटली ने एक महत्‍त्‍वपूर्ण वक्‍तव्‍य दिया। इसमें उन्‍होंने मंत्रियों और प्रशासकों को सोशल मीडिया पर अपनी बात रखने की खुली छूट दिए जाने के पक्ष में अपने तर्क रखे। उन्‍होंने कहा अगर यह व्‍यवस्‍था शुरू होती है तो इससे शासन के कार्यों में पारदर्शिता आएगी, शासन-प्रशासन की समस्‍त कार्यप्रणाली सुचारू होगी और सर्वोपरि शासन-प्रशासन में कार्यरत् एक व्‍यक्ति को एक सामान्‍य नागरिक के रूप में अभिव्‍यक्ति की वास्‍तविक स्‍वतंत्रता प्राप्‍त हो सकेगी। माइगॉव.इन कम्‍प्‍यूटर एप्लिकेशन की दूसरी वर्षगांठ के अवसर पर वित्‍त मंत्री का ऐसा वक्‍तव्‍य राजग सरकार की स्वच्‍छ और साफ कार्यप्रणाली की ओर संकेत करता है। हाल ही में कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग ने अपनी सेवा शर्तों का नया मसौदा तैयार किया है। इसमें स्‍पष्‍टत: एक प्रस्‍ताव है, जिसमें उल्लिखित है कि शीर्ष सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को खुले तौर पर फेसबुक, ट्विटर और लिंक्‍डइन जैसी सोशल नेटवर्किंग साइटों पर खुद को अभिव्‍यक्‍त करने की छूट हो लेकिन इस मसौदे में सरकार की आलोचना पर प्रतिबंध अभी भी बना हुआ है। मसौदे के नियमानुसार अधिकारियों को टेलीविजन, सोशल मीडिया और किसी अन्‍य संचार माध्‍यम से यहां त‍क कि कार्टून के माध्‍यम से भी सरकार की आलोचना करने का अधिकार नहीं है। कुल मिलाकर इस मसौदे की शर्तों को देखकर सरकार का उद्देश्‍य इस रूप में दृष्टिगोचर होता है कि सरकारी कर्मचारी विभिन्‍न सोशल साइटों पर किसी खास सरकारी निर्णय के लागू होने या कानून बनने से पहले तो उस पर अपने विभिन्‍न मतों को प्रकट कर सकते हैं, सरकार भी जरूरी मतों पर ध्‍यान देते हुए उन्‍हें अपनी सरकारी नीति के नियमों का हिस्‍सा बना सकती है, लेकिन निर्णय हो जाने के उपरांत या कानून बन जाने के बाद सरकारी कर्मचारियों को उसमें मीन-मेख निकालने की अनुमति नहीं दी जाएगी। सरकार के अनुसार सोशल मीडिया‍ विभिन्‍न दृष्टिकोणों, आलोचनाओं, टिप्‍पणियों और सुझावों को सामने रखता है। इसलिए पारदर्शी सरकारी प्रणाली में सोशल मीडियाा पर मंत्रियों और अधिकारियों को अपनी राय रखने देने में कोई समस्‍या नहीं  होनी चाहिए। सरकार का मत है कि इससे परामर्श की प्रक्रिया को बढ़ावा मिलता है। वित्‍त मंत्री ने सोशल मीडिया के लाभ गिनाते हुए बताया कि पहले जनमत या सुझावों के लिए केवल बड़े महानगरों की ओर ही देखा जाता था, लेकिन अब सोशल मीडिया की सहायता से विद्यालयों, महाविद्यालयों, द्वितीय-तृतीय और यहां त‍क कि उससे भी छोटे स्‍तर के शहरों और गांवों से भी किसी सरकारी मत पर लोगों की स्‍वतंत्र राय मिल जाती है। उनका कहना है कि अब युवाओं के पास किसी भी विषय के संबंध में अधिकाधिक सूचनाएं हैं और सरकार का उद्देश्‍य इन के साथ अपनी मानव मशीनरी यानि अधिकारियों और कर्मचारियों का संवाद सुनिश्चित करना है, ताकि उसे जनता के लिए आवश्‍यक नीतियां बनाने में सहायता मिले।
          एक तरफ राजग सरकार सोशल मीडिया के लाभों से उल्‍लसित होकर इससे अपने अधिकारियों और कर्मचारियों को जोड़कर अपनी राजनीतिक दशा-दिशा को मांझना चाहती है और जितना अधिक हो सके जनहितैषी होने में उसे कोई समस्‍या नहीं है तथा दूसरी ओर संप्रग सरकार थी, जिसने अपने घपलों-घोटालों को मुख्‍यधारा के मीडिया में अपनी सांठगांठ के चलते बहुत दबाने की कोशिश की और जब सोशल मीडिया में उसके प्रति देश की जनता आग उगलने लगी, उसके घोटालों को उजागर करते हुए उसे सत्‍ताच्‍युत करने के संकल्‍प करने लगी तो उसने इस पर प्रतिबंध की तैयारी भी शुरू कर दी थी। उस काल में मुख्‍यधारा के मीडिया में जो संप्रग के घोटाले बाद में उजागर होने शुरू हुए, वे भी इस डर से हुए कि कहीं मुख्‍यधारा का मीडिया जनमानस की दृष्टि में हास्‍यास्‍पद और पूरी तरह अनदेखा न हो जाए। इसलिए मुख्‍यधारा के मीडिया ने भी सोशल मीडिया की ताकत को भांपकर अपनी विचारधारा तत्‍कालीन संप्रग सरकार के घोटालों और अवैध गतिविधियों को उजागर करने के रूप में बदलनी शुरू कर दी। इसमें भी वे मीडिया संस्‍थान सुस्‍त रहे जो पूरी तरह या किसी न किसी रूप में कांग्रेसियों, वामदलों और संप्रग के गठजोड़ से चल रहे थे। आज भी यही स्थि‍ति है। कुछ मीडिया संस्‍थान अब सोशल मीडिया के रुख से खुद को संचालित कर रहे हैं। इसी में उनकी भलाई भी है। लेकिन अभी भी कुछ संस्‍थान ऐसे हैं, जो जनता को बेवकूफ समझ कर भ्रम का आवरण फैलाने में लगे हुए हैं। उनकी यही चाल-ढाल रही तो आनेवाले एक या दो सालों में वे पूरी तरह खत्‍म हो जाएंगे।
इस संदर्भ में राजग ने सोशल मीडिया से जुड़ने के संबंध में जो विचार प्रकट किए हैं, वे उसकी स्‍वच्‍छ राजनीतिक छवि और उसके पारदर्शी सुशासन का स्‍पष्‍ट संकेत हैंं। जनमानस को इसे समझना चाहिए।
विकेश कुमार बडोला

Tuesday, August 16, 2016

राजनीति विकासपरक हो विवादास्पाद नहीं

विश्‍व गुरु बनने के लिए किसी भी देश के वासियों की जीवन के प्रति एक स्‍पष्‍ट और सुखद सोच होनी चाहिए। भारत में राजनीतिक मंशाएं नेताओं को यह भाषण देने के लिए तो जरूर प्रेरित करती हैं कि हम तरक्‍की और उन्‍नति करेंगे तथा विश्‍व गुरु बनेंगे परंतु तरक्‍की और उन्‍नति कैसे करेंगे या विश्‍व गुरु कैसे बनेंगे, इस बारे में हमारा सार्वजनिक रूप से कोई ठोस कार्यक्रम नहीं होता। यह आशा की गई थी कि संसद के दोनों सदनों में सांसद मानसून सत्र में देश और जनता के कल्‍याणार्थ आवश्‍यक विधेयकों पर विचार-विमर्श कर इन्‍हें पारित करेंगे। उनसे जनप्रतिनिधि के रूप में यह अपेक्षा है कि वैश्विक रूप से कृत्रिम व प्राकृतिक समस्‍याओं से घिरी दुनिया में वे अपने देश को हर तरह से सुरक्षित रखने की दिशा में काम करेंगे। लेकिन ओछी राजनीति के दम पर सत्‍ता हथियाने वाली क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों के लिए विषय राजकाज नहीं अपितु उन अनावश्‍यक और नगण्‍य मुद्दों पर संसद का ध्‍यानाकर्षण कराना है, जो कहीं भी विचारयोग्‍य नहीं होने चाहिए। विश्‍व में इस समय बड़ा मुद्दा आतंकवाद है। यूरोपीय संघ के कई देश प्रत्‍यक्ष आतंक की चपेट में हैं। अमेरिका, इंग्‍लैंड, फ्रांस, बेल्जियम, तुर्की जैसे विकसित देश और बांग्‍लादेश, पाकिस्‍तान के कारण भारत जैसे देशों में भी आतंकवाद तेजी से पैर पसार रहा है। इसके साथ ही वर्ष के बारह महीनों में विश्‍व के तमाम देशों के साथ भारत भी जलवायु विघटन का शिकार बन रहा है। भूकंप, अतिवृष्टि, तापमान वृद्धि और अप्रत्‍याशित प्राकृतिक असंतुलन से जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। इन परिस्थितियों में देश के जनप्रतिनिधियों को देश-दुनिया और इसके लोगों के प्रति एक समग्र कल्‍याण भावना और मानवीय दृष्टिकोण रखकर काम करने की अत्‍यंत जरूरत है। लेकिन नहीं उनका ध्‍यान अभी भी जातिवाद, नटखटपन से ग्रसित और एकदम नौसिखिया राजनीति करने पर लगा हुआ है।
पड़ोसी देश पाकिस्‍तान के कारण कश्‍मीर में भारत के सामने आतंकवाद से निपटने की बड़ी चुनौती है। इस बाबत भारत ने संयुक्‍त राष्‍ट्र जैसे मंच के माध्‍यम से पाकिस्‍तान को कठोर शब्‍दों में चेतावनी भी दे दी है कि वह भारत के अंदरूनी मामलों में हस्‍तक्षेप न करे और न इसके लिए अपनी आतंकवादी नीति का इस्‍तेमाल करे। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्‍वरूप ने स्‍पष्‍ट रूप से कह दिया कि पाकिस्‍तान गुलाम कश्‍मीर खाली करे। इस चेतावनी से पहले भारत ने भारत-चीन सीमा पर अपने 120 युद्धक टैंक तैनात कर दिए थे। इस क्रिया की प्रतिक्रिया में चीनी सैन्‍य गतिविधि भी सीमा पर बढ़ गई। चीन गुलाम कश्‍मीर के एक भाग और दक्षिण चीन सागर में प्राकृतिक रत्‍नों से पूर्ण समुद्री क्षेत्र को हथियाने के चक्‍कर में है। इसके लिए उसने अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर कई बार प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष रूप से पाकिस्‍तान की आतंकी नीति पर कभी कुछ नहीं बोला, बल्कि चुप्‍पी साध कर ही रखी। वह पाकिस्‍तान के माध्‍यम से भारत पर प्रत्‍यक्ष व परोक्ष युद्ध थोपना चाहता है। चूंकि पाकिस्‍तान और भारत की दुश्‍मनी कई दशक पुरानी है इसलिए चीन दोनों देशों के इस वैमनस्‍य का फायदा उठाकर गुलाम कश्‍मीर के एक  भाग पर अपना दबदबा बनाए रखना चाहता है। मुसलिम मत को सारी दुनिया पर थोपने की भ्रांति से ग्रस्‍त आइएस आतंकवाद का केंद्र बनकर यूरोप से  लेकर एशिया-अफ्रीका तक किसी न किसी रूप में आतंकवाद फैला रहा है। दुश्‍मन देशों के बीच युद्ध की आशंका के मद्देनजर आइएस अपनी आतंकवादी गतिविधियों का इस्‍तेमाल वैश्विक युद्ध भड़काने के रूप में भी कर सकता है।
कहने का तात्‍पर्य यही है कि जब किसी न किसी बहाने पूरी दुनिया तीसरे विश्‍व युद्ध के मुहाने पर खड़ी है और इस कारण विकसित और विकासशील देशों के अलग-अलग विकास संबंधी मानक भी आधुनिकता की उपयोगिता के नहीं बल्कि विसंगति के सूत्रधार बन गए हों, तो ऐसे में किसी देश के भीतर जाति, धर्म, आरक्षण और अनेक दूसरे अनुपयोगी वाद-विवाद में संसद से लेकर सड़क तक शोर होना क्‍या सिद्ध करता है। यह यही बताता है कि अभी हम ठीक से किसी लोकतांत्रिक देश के एक सामान्‍य नागरिक होने की योग्‍यता भी अर्जित नहीं कर पाए हैं।
अपने लिए वर्णसूचक शब्‍दों का इस्‍तेमाल किए जाने पर बौखलाई बसपा नेता मायावती और उनके दल के एक अन्‍य नेता का संसद में किया गया कथन बड़ा विचित्र था। उनके अनुसार अगर उन पर या उनकी राजनीतिक पार्टी पर की गई टिप्‍पणी से दलित लोग आंदोलन करते हैं और देश में बवाल होता है तो इसके जिम्‍मेदार वे नहीं होंगे, इसकी जिम्‍मेदारी केंद्र सरकार की होगी। एक तरह से उनके इस कथन ने उन लोगों को बवाल करने और विधि व्‍यवस्‍था को बिगाड़ने के लिए उकसाया ही है, जिनके वर्णगत प्रतिनिधित्‍व से ऐसे लोग संसद में विराजमान हैं। मायावती और उनकी राजनीति से जुड़े लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि विघटन की बातें करके उनका लोकतांत्रिक जनाधार बढ़ेगा नहीं अपितु घटेगा ही। वे अपनी जाति, विचारधारा और राजनीति से अगर निम्‍नस्‍तरीय सामाजिक वातावरण उत्‍पन्‍न करेंगी, तो दूसरी तरफ जिनसे उनका द्वेष है, वे क्‍या शांत बैठे रहेंगे। वे भी अपने स्‍तर पर अपने राजनीतिक अधिकारों के लिए इनसे उलझेंगे। तो ऐसे में भला लोकतंत्र का अर्थ क्‍या रह जाता है। मायावती जैसे नेताओं को सोचना होगा कि देश में राजनीतिक पद या कद उन्‍हें अधिकार नहीं देता कि वे इसके दायित्‍व, मर्यादा को भूलकर अपना राजनीतिक एकाधिकार स्‍थापित करने में ही लगे रहें। उन्‍हें राजनेता के पद की राजसेवा की अवधारणा को समझना होगा। इसी में उनकी और उनके राजनीतिक अस्तित्‍व की भलाई है।
राजनीति के कई ऐसे रूप देखने को मिल रहे हैं, जिससे लोकतंत्र और संविधान के प्रति अनास्‍था का भाव व्‍यापक होता है। आप पार्टी के सांसद भगवंत मान को ही लें। इन्‍होंने संसद भवन के भीतर का वीडिया बनाकर सोशल मीडिया साइट पर डाल दिया। यह सांसद यह तो जानता ही रहा होगा कि 2001 में भारतीय संसद पर आतंकी हमला हो चुका है। तब एक सांसद के रूप में मान की जिम्‍मेदारी क्‍या बनती थी और उन्‍होंने क्‍या किया, इस पर उन्‍हें अवश्‍य विचार करना चाहिए। इस घटना के बाद उन्‍हीं की ही पार्टी से निलंबित सांसद हरिंंदर सिंह खालसा ने तो मान के बारे में कह दिया कि वे संसद में मदिरापान करके आते हैं और उनसे मदिरा की दुर्गंध आती है। खालसा ने बताया कि उन्‍होंने लोकसभा अध्‍यक्ष को संसद में अपनी सीट मान से अलग करने के लिए आवेदन पत्र भी दिया हुआ  है। जनतंत्र में जहां हमसे संसद और संविधान के प्रति सम्‍मान और आदर करने को कहा जाता है, वहां यदि मान जैसे व्‍यक्ति जनप्रतिनिधि होंगे तो देश की दशा-दिशा कितनी खतरनाक होगी, यह कल्‍पना ही अपने आप में घिनौनी है। कहां तो मानसून सत्र में वस्‍तु एवं सेवा कर विधेयक सहित कई अन्‍य महत्‍वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा होनी थी और इसके बाद इनके पारित होने की कामना की जा रही थी और कहां मानसून सत्र के पहले कुछ दिन ही निरर्थक मुद्दों में घिसट गए।   
देश के नेताओं को समझना और सोचना होगा कि सांसद-विधायक बन जाना हर्षातिरेक, प्रफुल्‍लता और मनमानी का ही विषय नहीं है। जनप्रतिनिधित्‍व ग्रहण करने का अर्थ है जनता के दैनिक जीवन के लिए समय-काल-परिस्थिति के अनुसार काम करना। अगर सही जनप्रतिनिधि होगा तो भारत जैसी जीवन-परिस्थितियों में तो उसे राजनीति में विभिन्‍न प्रकार के जनकल्‍याणकारी कामों से मरने की फुर्सत नहीं होनी चाहिए। जनता के लिए काम करने के हिसाब से भारतीय भूभाग में सांसद-विधायक बनना अभी आराम का मामला तो किसी भी कोण से नहीं है। अगर कभी ऐसे जनप्रतिनिधियों को विवश होकर या कानून की बाध्‍यता से निर्धारित जनकल्‍याणकारी काम समय पर पूरा करने को कहा भी आएगा, तो वे इतने चिंताग्रस्‍त हो जाएंगे कि फौरन पदमुक्‍त होने का अनुरोध करने लगेंगे। क्‍योंकि कामकाजी और खासकर ईमानदारी से काम करनेवाले राजनेता के सामने इतने सार्वजनिक विकास कार्यक्रम हैं कि वह अपने एक कार्यकाल में तो इन्‍हें, कितना ही परिश्रम कर ले, पूरा नहीं कर सकता। अब जाति, धर्म, समुदाय आदि निरर्थक मानसिक विकारों में बंटी राजनीतिक धारा को तिलांजलि देने का समय आ गया है। हम सब सोचें तो सही कि विकास का वास्‍तविक तात्‍पर्य है क्‍या। विकास भवनों, सड़कों और भौतिक सुविधाओं तक ही सीमित न हो। उसे व्‍यक्तिगत भावनाओं तक ले जाना होगा और उस से बढ़कर राजनीतिक नीतियों में अंतर्निहित करना होगा। यह सब करने के लिए हमें और हमारे राजनेताओं को चमत्‍कार करने की आवश्‍यकता नहीं, बल्कि अपनी-अपनी मानवीय अंतदृष्टि में राजनीति को एक नवीन और सर्वथा इसके मौलिक स्‍वरूप में देखने की जरूरत है।  
इसलिए हमारे राजनेताओं को अब अपने वैचारिक और राजनीतिक दृष्टिकोण में तत्‍काल परिवर्तन करना चाहिए। यदि वे प्रतिपल जनता के प्रति दायित्‍व-भाव से बंधे रहेंगे तो निश्चित रूप से फि‍र कभी ऊल-जुलूल मुद्दों में नहीं उलझेंगे और ना ही इन पर वाद-विवाद करेंगे। उन्‍हें वैश्विक परिप्रेक्ष्‍य में अपने देश को आगे बढ़ाने और संतुलित विकास पथ पर अग्रसर करने के लिए ही प्रयासरत रहना चाहिए। तभी जनता में उनकी भावनात्‍मक स्‍वीकार्यता हो सकेगी। देश की मुख्‍यधारा की राजनीति में शामिल ऐसे तथाकथित नेताओं को यह विचार भी अवश्‍य करना चाहिए कि विश्‍व में व्‍याप्‍त प्राकृतिक और मानवजनित कृत्रिम समस्‍याएं इस सीमा तक बढ़ रही हैं कि उनके निराकरण पर ही ध्‍यान लगाकर लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था और इसके अंतर्गत निर्धारित सांसद-विधायक पदों को बचाए रखा जा सकता है। इसके अलावा उनके पास कोई चारा नहीं है। 
विकेश कुमार बडोला