Monday, January 16, 2017

विरोधियों की राजनीति पर भारी केंद्र की राजनीतिक शुचिता

पनी अनेक अवैध गतिविधियों के माध्‍यम से अर्थव्‍यवस्‍था को अवैध मुद्रा संभावित क्षेत्र यानी भ्रष्‍टाचार में तब्‍दील कर कांग्रेस ने देश को आर्थिक ही नहीं सामाजिक-राजनीतिक-सामरिक रूप से भी खोखला कर दिया था। लगातार दस वर्षों तक गठबंधन सरकार की सर्वेसर्वा होने के नाते उसने केंद्र में खुद के और राज्‍यों में क्षेत्रीय दलों के घपलों-घोटालों-अवैध कारोबार को एक तरह से वैध स्‍वरूप प्रदान करना शुरू कर दिया था।
आज पश्चिम बंगाल में रोजवैली और शारदा चिटफंड घोटाले में यदि त्रृणमूल कांग्रेस के संसदीय दल के नेता पकड़े जा रहे हैं, तथाकथित सबसे ईमानदार राजनीतिक पार्टी का तबका धारण करने को अतिआतुर आप के स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री के हवाला कारोबार के गणित साक्ष्‍य सहित उद्घाटित हो रहे हैं तथा कांग्रेस सहित अनेक क्षेत्रीय दलों के राजनेताओं द्वारा की गई अवैध लेन-देन की गतिविधियों के बारे में जांच एजेंसियां आए दिन कोई न कोई खुलासा कर रही हों, ऐसे में केंद्र सरकार के मुद्राबंदी कार्यक्रम के प्रति सजग भारतीय नागरिक अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकता।
मुद्राबंदी से क्‍या लाभ होंगे या हो सकते हैं इसके लिए क्षेत्रीय दलों की घटिया राजनीतिक सोच-समझ से मुद्राबंदी को नहीं देखा जा सकता है। किसी भी देश में अर्थव्‍यवस्‍था एक ऐसा विषय है, जो अर्थव्‍यवस्‍था के प्रकट व गुप्‍त घटकों का संपूर्ण फ्लोचार्ट बनाए बिना कदापि नहीं समझा जा सकता। और भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था में इसके सामान्‍य व्‍यवहार के समानांतर जो अवैध आर्थिक व्‍यवहार वर्षों से देश में हो रहा था उसको समझने के लिए तो फ्लोचार्ट को और भी व्‍यापक बनाने की जरूरत है।
ऐसी परिस्थितियों में बड़े मूल्‍य की मुद्रा को बंद करके ही देशभर में फैले अवैध कारोबार को नियंत्रित किया जा सकता था। यदि इस प्रक्रिया में बैंक अधिकारियों ने अवैध धन को वैध बनाने का दुष्‍प्रयास किया तो इस बारे में मुद्राबंदी कार्यक्रम को विफल बताना अनुचित है। वास्‍तव में बैंक अधिकारियों के सहयोग से कालाधन का वैधीकरण भी उन राजनीतिक विरोधियों के कारण ही हो सका है, जो मुद्राबंदी नहीं होने देना चाहते थे। दिल्‍ली में आप, पश्चिम बंगाल में त्रृणमूल, यूपी में सपा जैसे राजनीतिक दलों का अस्तित्‍व जिस कांग्रेस की बदौलत है, उसने इनको केंद्र सरकार के मुद्राबंदी कार्यक्रम के प्रति इस शर्त पर एक करने की कोशिश करी कि शायद भविष्‍य में सत्‍तारूढ़ होने में अगर कभी गठबंधन के सहारे की जरूरत हो तो क्‍यों न अभी से मामला फि‍ट कर लिया जाए। इसके अलावा मुद्राबंदी का विरोध करनेवाले राजनीतिक दलों का मकसद और कुछ भी नहीं था।
अरविंद केजरीवाल और ममता बनर्जी को बड़े मूल्‍य की मुद्रा बंद होने पर इसलिए तकलीफ हो रही है क्‍योंकि इनका वोटबैंक का सारा तंत्र अवैध नकदीकरण के आधार पर ही तय होता रहा है। रोकड़रहित लेन-देन के बारे में भले ही साइबर सुर‍क्षा की कमी का हवाला मुद्राबंदी के समर्थकों को भी सोचने पर विवश करता हो परंतु इतना तो है कि देश में जो राजनीतिक दल चुनावों में अवैध मतों से लेकर अवैध मुद्रा और अन्‍य अवैधानिक कामों में बुरी तरह लिप्‍त थे, अब उनका काल उनके सिर पर नाच रहा है। उनके अवैध कारनामों के दिन लदने वाले हैं।
अनेक राज्‍यों में स्‍थानीय निकाय चुनावों में भाजपा को मिला बहुमत पूरे राजनीतिक परिवेश को समझने के लिए पर्याप्‍त है। और आनेवाले दिनों में इस संभावना को नकारा नहीं जा सकता कि पांच राज्‍यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी पंजाब व मणिपुर में गठबंधन के रूप में तथा यूपी, उत्‍तराखंड और गोवा में पूर्ण ही नहीं अपितु प्रचंड बहुमत से सरकार बनाने जा रही है। गठबंधन की स्थिति में भी भाजपा का मत प्रतिशत पंजाब व मणिपुर में बढ़ेगा ही बढ़ेगा।
कुछ मीडिया संस्‍थान अपने पत्रों और दूरदर्शनीय प्रसारण माध्‍यमों में पांच राज्‍यों के चुनाव परिणामों का सर्वेक्षण दिखा रहे हैं। उनका सर्वेक्षण कुछ उसी तरह का है जैसे कोई थलचर जीव चारों ओर से दूसरे हिंसक जीवों से घिर जाने के बाद जमीन में अपना सिर यह सोच कर गाड़ लेता है कि किसी ने उसको नहीं देखा इसलिए उसकी जान बच जाएगी। मीडिया संस्‍थानों के तथाकथित सर्वेक्षण भी भाजपा के बढ़ते जनाधार की अनदेखी कर रहे हैं। सर्वेक्षणों के अनुसार भाजपा पूर्ण बहुमत नहीं प्राप्‍त करेगी। जबकि वस्‍तुस्थिति इससे बिलकुल विपरीत है। जैसे कि वे कह रहे हैं कि उत्‍तर प्रदेश में किसी भी राजनीतिक दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने जा रहा। जबकि यह लेखक ठोक-बजा कर यह बात रेखांकित करता है कि यदि उप्र में चुनाव साफ-सुथरे संपन्‍न हुए तो बहुमत पाने के लिए भाजपा की आंधी लोकसभा 2014 से भी अधिक तीव्र होगी। पांच राज्‍यों का यह चुनाव इस कोण से भी बड़ा उदाहरण बनने जा रहा है कि कांग्रेस सहित क्षेत्रीय दल केवल इसी बार नहीं बल्कि सदैव के लिए राजनीति की पृ‍ष्‍ठभूमि में पहुंचने वाले हैं। विशेषकर उत्‍तर प्रदेश, गोवा और उत्‍तराखंड में।  
आज देश का केंद्रीय शासन देश पर शासन करने के लिए यदि कुछ पीड़ादायक निर्णय ले भी रहा है तो वह शासन-व्‍यवस्‍था की विवशता है, जिसकी जड़ बहुत गहरे पिछली सरकारों के कार्यकलापों के कारण जमी हुई है। भाजपा नेतृत्‍व वाली ढाई वर्षीय केंद्र सरकार के बारे में छोटे-मोटे कितने भी लांछन भले ही लग रहे हों किंतु दो बातें इस सरकार के बारे में विरोधियों और उनके अंध-समर्थकों को अवश्‍य याद होनी चाहिए। एक, घोटालों की सरकार का रिकार्ड बना चुकी संप्रग सरकार की तुलना में राजग में अब तक एक भी घोटाला नहीं हुआ। और दो, देश के भीतर पिछले ढाई वर्ष में एक भी आतंकी दुर्घटना नहीं हुई। और यह सब उपलब्धि उस दौर में और उन परिस्थितियों में मिली जब यूरोप के विकसित देश तक आतंक के दंश से मुक्‍त नहीं रहे। इसके अलावा जन-गण-मन के लिए वर्तमान सरकार द्वारा एक अल्‍पाव‍धि में ही कम से कम उतनी योजनाएं तो लागू कर ही दी गई हैं, जितने कि कांग्रेसी राज में घोटाले भी नहीं हुए। और सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसी योजनाओं का सुचारू क्रियान्‍वयन भी सुनिश्चित हो रहा है।
मोदी सरकार के बेहतर होने के पक्ष में इतने तार्किक आधार हैं कि वर्तमान सरकार चाहे तो विशाल जन भावनाओं का प्रतिनिधित्‍व करते हुए उन्‍हें चुनावी लाभ के लिए सीधे-सीधे अपने पक्ष में मोड़ सकती है। परंतु इन लाभकारी राजनीतिक परिस्थितियों में भी मोदी सरकार ने राजनीतिक मर्यादा और शासकीय शुचिता के आदर्श स्‍थापित किए हैं। यदि ऐसा न होता तो सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह की श्रृंखला में अनेक कांग्रसियों सहित क्षेत्रीय दलों के न जाने कितने नेता राजनीनिक प्रतिद्वंदिता का शिकार हो कारागार में पड़े रहते। घपलों-घोटालों के आरोप में फंसे नेता और अफसर यदि अभी तक कठोर दंड नहीं पा सके हैं और इसके लिए वर्तमान सरकार को कोसा जा रहा है तो कोसने वालों को इतना तो याद रखना ही पड़ेगा कि दंड का निर्धारण न्‍यायपालिका करेगी न कि कार्यपालिका। और कार्यपालिका व विधायिका को लोकसभा व राज्‍यसभा के माध्‍यम से बीते संसद सत्र में निरंतर कुंद ही किया जाता रहा।
विकेश कुमार बडोला

Thursday, December 8, 2016

शहीदों के मेले और दुश्मन देश का वार्ता राग

विगत दिनों जम्‍मू कश्‍मीर स्थित नगरोटा और सांबा में आतंकियों से हुई मुठभेढ़ में हमारे 7 सैनिक शहीद हो गए। सैनिकों के शहीद होने के बारे में जानना शायद इस देश के लोगों के लिए एक सामान्‍य खबर है। तभी तो पाकिस्‍तान की ओर से जारी आतंकी घुसपैठ के एक अघोषित युद्ध में हमारे सीमा प्रहरी सैनिकों को निरंतर जूझना पड़ रहा है तथा दुख इस बात का है कि पड़ोसी होने के तमाम सामान्‍य संस्‍कार तोड़ कर खुद पर हिंसक व बदमिजाज राष्‍ट्र होने का ठप्‍पा लगा चुके पाकिस्‍तान के साथ भारत की वार्ता की गुंजाइश अभी भी ढूंढी जा रही है। जिस दिन नगरोटा-सांबा में हुए आतंकी हमले में हमने अपने सैनिक गंवाए उससे पहले दिन भारत में तैनात पाकिस्‍तानी उच्‍चायुक्‍त अपने यहां के विदेश मंत्री के साथ भारत सरकार सेे वार्ता करने की जुगत में जुटे हुए थे। और साथ ही एहसान की भाषा में कह रहे थे कि वे हमारे साथ बिना शर्त वार्ता करने को तैयार हैं।
आखिर इस देश की राजनीति को यह हो क्‍या गया है, जो पाकिस्‍तान के लिए इस तरह की कोई गुंजाइश छोड़ती है, जिसमें उसे लगता रहे कि वह तमाम गलतियां करके भी भारत की नजर में वार्ता करने लायक बना हुआ है। भारत स्थित उसके उच्‍चायुक्‍त का यह दुस्‍साहस हुआ ही क्‍यों कि वह कोई प्रेस विज्ञप्ति दे दे कि पाक वार्ता के लिए तैयार है। क्‍या वे दो-ढाई माह पहले उड़ी में शहीद भारतीय सैनिकों का बलिदान तथा उसके बाद भारतभर में आग की तरह व्‍याप्‍त पाकिस्‍तान पर आक्रमण करने तथा भारत की तरफ से उसकी जलापूर्ति रोकने की जनभावना को भूल गए?
कोई देश तब बनता है जब उसका एक-एक नागरिक वहां अपने कर्तव्‍यों के निर्वहन में लगकर देश चलानेवालों से अपनी सुरक्षा की भावना रखता है। कर्तव्‍य निर्वाह करने में तो नागरिक लगे हुए हैं परंतु राष्‍ट्रीय-अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर की राजनयिक व्‍यवस्‍था के दोषों और सड़ी हुई कार्यप्रणाली के कारण नागरिकों का जीवन सुरक्षित नहीं है। विशेषकर सैनिकों और किसानों का जीवन तो विगत 70 वर्षों से इस देश में सरकारी सुरक्षा की कागजी छतरी के बावजूद असुरक्षित ही बना रहा।
राष्‍ट्र के लिए कर्तव्‍य निर्वाहक के रूप में सैनिक और किसान से बढ़कर कौन हो सकता है। और जब हमारे एक नहीं कई सैनिक निरंतर उस देश की तरफ से उत्‍पन्‍न आतंकी हमलों और सैन्‍य उकसावे की गतिविधियों में अपनी कीमती जानें गंवा रहे हों, जो बिना मतलब खून-खराबे को पसंद करता हो तो ऐसे में कम से कम शहीद सैनिकों के अंतर्मन में राष्‍ट्र का अस्तित्‍व धुंधला ही जाएगा। इस प्रकार देश के लिए जान देना उनके लिए फि‍र एक बड़ी देशभक्ति की भावना नहीं रह जाती। यह उनके मन की बात होती है। इसे वे कभी बाहर नहीं निकालते। लेकिन हमें समझना होगा कि बिना किसी घोषित युद्ध के एक देश के सैनिकों का ऐसे ही किसी देश की धार्मिक कार‍गुजारियों के कारण मर जाना कहां और कब तक सहन हो सकता है। 
यदि कर्तव्‍यपरायणता की बात होती है तो हमारे सैनिक अपने देश के लिए ही नहीं बल्कि शांति सैनिक बनकर मित्र देशों के लिए भी सैन्‍यकर्मी के रूप में अपना सर्वस्‍व झोंक देते हैं, अपनी जान की परवाह नहीं करते। लेकिन पाकिस्‍तान की ओर से जारी उकसावे वाले आतंकी युद्ध में षडयंत्र के तहत अपनी जान गंवाना हमारे सैनिकों को भी गवारा नहीं होगा। जो लोग कहते हैं कि युद्ध किसी समस्‍या का हल नहीं उनसे केवल एक प्रश्‍न है। क्‍या वे शहीद सैनिकों के स्‍थान पर खुद को रखकर या उनकी भावना से मौत का साक्षात्‍कार करते हुए कभी कह सकते हैं कि युद्ध समस्‍या का हल नहीं। और फि‍र युद्ध लड़े जाने की शुरुआत इसी युग में तो नहीं होगी। धर्मग्रंथों में समाहित, हजारों वर्षों का प्रामाणिक इतिहास हमें बताता है कि एक-दूसरे के परिक्षेत्रों पर अधिकार जमाने की मंशा से दुनिया में युद्ध हमेशा से होते रहे हैं। युद्ध नहीं करने की भावना अगर इतनी बलवती होती तो आज दुनिया में विभिन्‍न देशों का अस्तित्‍व नहीं होता तथा विश्‍वभर में हथियारों का कारोबार लाइसेंसशुदा नहीं होता। उस पर पूर्ण प्रतिबंध लग गया होता। इन परिस्थितियों में एक अद्वितीय संवेदना जटिल प्रश्‍न बनकर खड़ी होती है कि आखिर युद्ध न होने पर भी संसार में सुखी है कौन।
हम ज्‍यादा पीछे न जाकर एक वर्ष पूर्व पठानकोट के वायु सैनिक केंद्र पर हुए आतंकी हमलों से लेकर उड़ी में शहीद सैनिकों तथा सीमा पार सर्जिकल स्‍ट्राइक होने के बाद लगभग प्रतिदिन शहीद, घायल होनेवाले हमारे सैनिकों के बारे में सोचें तो एक विषाद मन में घर कर जाता है कि अंतत: हमारी रक्षा नीति को कब तक धैर्य के उपबंधों से लिपटे रहना होगा। हमारे सैन्‍यकर्मी एक-एक दो-दो करके शहीद होने पर लगे हुए हैं। शहीदों का वास्‍तविक सांख्यिकीय ब्‍यौरा रखकर भारत-पाकिस्‍तान के रिश्‍तों पर बात करना बिलकुल वैसा ही होगा जैसे कोई किसी को बार-बार विष दे और विष पीनेवाला हर बार बच जाने पर फि‍र विष पिलानेवाले से दोस्‍ती की आशा रखे। पाकिस्‍तान के राष्‍ट्रीय चरित्र में वह राजनीतिक मंशा कभी नहीं होगी कि वह अपने यहां आतंक पर पूरी तरह नियंत्रण पा लेगा। और यदि ऐसा नहीं होगा तो सीमा पर तैनात हमारे निर्दोष सिपाहियों के निरंतर बलिदान पर रोक लगाना बहुत मुश्किल होगा।
हमारी रक्षा नीति में पाकिस्‍तान को लेकर वहां सेना प्रमुख बदले जाने के बाद या उसके द्वारा बिना शर्त वार्ता के लिए तैयार होने की दोनों स्थितियों में कोई समझौतापरक परिवर्तन बिलकुल नहीं होना चाहिए। चाहे भारत-पाकिस्‍तान के तनावपूर्ण रिश्‍ते हों या इस आधार पर दुनिया की राजनीतिक अथवा सामरिक महत्‍वाकांक्षाएं, तय है कि परमाणु और नाभिकीय विस्‍फोट में दुनिया के खत्‍म होने तक पाकिस्‍तान का भारत के साथ दुर्व्‍यवहार जारी रहेगा।
इन परिस्थितियों में हमारी कोशिश यही हो कि पाक के साथ वार्ता के सभी रास्‍ते बंद करके पहले खुद के स्‍तर पर अन्‍यथा विश्‍व बिरादरी को साथ लेकर उसके भीतर के आतंक को उसके चीं-चुपड़ के बिना हमेशा के लिए खामोश कर दिया जाए। इसके बाद यदि वह सुधरने का प्रयास करेगा तो उसके साथ वार्ता की जा सकती है। फि‍लहाल तो सीमा पर अपने सैनिकों के शहीद होने के समाचारों से संवेदनशील भारतवासी संत्रासित हैं। सरकार को पाकिस्‍तान के साथ कोई भी वार्ता करने से पूर्व शहीद और घायल हुए सैनिकों तथा उनकी जैविक भावनाओं के साथ जुड़ी देशवासियों की भावनाओं को अवश्‍य समझना चाहिए।
विकेश कुमार बडोला