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Saturday, December 2, 2017

भारतीय कमजोरियों के कारण हुई हाफि‍ज की रिहाई

जिस वक्‍त आतंक पूरी दुनिया में अत्‍यंत संक्रमणकारी बना हुआ है और आतंकियों द्वारा विभिन्‍न देशों पर बीस-पच्‍चीस दिनों में एक न एक बड़ा आतंकी हमला कर दिया जा रहा है, उसी समय संयुक्‍त राष्‍ट्र द्वारा प्रतिबंधित लश्‍कर-ए-तैयबा सरगना हाफि‍ज सईद को पाकिस्‍तानी अदालत की नजरबंदी से मुक्‍त कर सामान्‍य नागरिक की भांति छोड़ देना यही दर्शाता है कि आतंक के संबंध में पाकिस्‍तान, वैश्विक महाशक्तियों व पाक की गलत नीतियों का संरक्षण करनेवाले शक्तिशाली देशों की कूट व कार्यनीति कितनी द्विअर्थी है। 26 11 2009 को मुंबई के ताज होटल सहित अन्‍य स्‍थानों पर आतंकी हमले के प्रमुख षड्यंत्रकारी आतंकी हाफि‍ज को मुंबई हमले की आठवीं बरसी से ऐन पहले साक्ष्‍यों के अभाव में रिहा कर देने से पाक तो विश्‍व स्‍तर पर बदनाम हुआ ही। इसके साथ ही अमेरिका तथा संयुक्‍त राष्‍ट्र भी संदेह के दायरे में आ गए, क्‍योंकि आतंक को बढ़ावा व संरक्षण देने के लिए पाक पर लागू अंतर्राष्‍ट्रीय नियंत्रण, प्रतिबंध और निगरानी के इनके संकल्‍प इन परिस्थितियों में निष्‍प्रभावी ही सिद्ध हो रहे हैं।
विकेश कुमार बडोला 
विगत पांच-छह महीनों में तो अंतर्राष्‍ट्रीय राजनीति में दबदबा रखने वाले शक्तिशाली राष्‍ट्रों यानि कि अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस जैसे देश भी एकाधिक आतंकी हमलों से बच नहीं पाए। अनेकों आतंकी हमलों में अभी तक विश्‍वभर में हजारों-लाखों निर्दोष लोगों की जानें जा चुकी हैं। कायदे से इस एकमात्र कटु सत्‍य से आत्‍मप्रेरित होकर आतंक के प्रति शून्‍य सहनशीलता की धारणा तो अब तक वैश्विक स्‍तर पर बन ही जानी चाहिए थी और आतंक के मूल उद्देश्‍यों, कारणों, प्रतीकों व अन्‍यान्‍य धार्मिक-सामाजिक कारणों को समूल नष्‍ट कर दिया जाना चाहिए था। लेकिन यह दुर्भाग्‍यपूर्ण व दुखद है कि इस दिशा में वैश्विक महाशक्तियां एकमत से कार्रवाई नहीं कर पा रहीं। हाफि‍ज के रिहा होने के दौरान भी मिश्र में आतंकी हमले होना व खुद पाक में धार्मिक कट्टरप‍ंथियों के कारण उपद्रव में लोगों की जानें जाना, विश्‍व के लोगों के मन में यही स्‍वीकारोक्ति जगाता है कि आतंक का मकसद बहुत खतरनाक है और इसे जल्‍द से जल्‍द पूरी तरह कुचलने की जरूरत है।
नवंबर माह की शुरुआत में अमेरिका ने पाकिस्‍तान को 20 आतंकी समूहों की सूची सौंपी थी, जिसमें कश्‍मीर को लक्ष्‍य कर आतंकी गतिविधियां चलानेवाले लश्‍कर, जैश व हरकत जैसे आतंकी गिरोहों का नाम भी शामिल था। भारत द्वारा मुंबई हमलों के लिए दोषी आंतकी गिरोह के खिलाफ जो सुबूत पहले पाक, उसकी अदालत तथा बाद में अमेरिका और संयुक्‍त राष्‍ट्र को सौंपे गए थे, उनके आधार पर स्‍पष्‍ट था कि मुंबई पर हमला हाफि‍ज के गिरोह लश्‍कर-ए-तैयबा ने ही किया था। हालांकि अमेरिका द्वारा लगाए गए कुछ आर्थिक प्रतिबंधों तथा अमेरिका में दक्षिणपंथी सरकार के सत्‍तारूढ़ होने के बाद पाक को लगा था कि यदि वह कुछ दिनों के लिए हाफि‍ज को नजरबंद कर देगा, तो इससे भारत भी संतुष्‍ट हो जाएगा और उस पर लगे अंतर्राष्‍ट्रीय प्रतिबंध भी हट जाएंगे। लेकिन अंतर्राष्‍ट्रीय राजनीति के केंद्र में हथियार निर्माताओं की गुप्‍त भूमिका कहीं न कहीं पाक को आतंकियों का संरक्षण करने का गाहे-बगाहे मौका देती ही रही है। संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद के देशों के बीच विभिन्‍न वैश्विक मुद्दों को लेकर उपजे मतभेदों के कारण भी ऐसा हो रहा है। अमेरिका यदि आतंक के संबंध में भारत की बात मान पाक पर प्रतिबंध और नियंत्रण का प्रस्‍ताव रखता है, तो चीन प्रत्‍यक्ष रूप में व रूस, ब्रिटेन व फ्रांस अप्रत्‍यक्ष रूप में केवल भारत के ही हितों की अमेरिकी पैरवी पर उंगली उठा देते हैं।
पाक प्रायोजित आतंक से पीड़ित भारत की चिंताओं को लेकर कोई भी देश एकल रूप में यदि भारत के समर्थन में आता भी है तो उसे अन्‍य देशों का किसी न किसी तरह का विरोध झेलना पड़ता है। और यह सब हो रहा है अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर अपने-अपने देशों की व्‍यापारिक, सामरिक व सामाजिक मान्‍यताओं का अधिरोपण करने की मंशा के कारण। कोई भी शक्तिशाली देश यही चाहेगा कि पूरे विश्‍व में उसी की जीवन संबंधी मान्‍यताओं व उस आधार पर उसके व्‍यापार का प्रसार हो। प्राय: चीन के संबंध में तो यही सच्‍चाई हम सभी के सम्‍मुख है।
मुसलिम आतंक के खतरनाक इरादों से हालांकि चीन भी भलीभांति परिचित है। लेकिन उसके यहां लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत आतंकियों या उनके समुदाय का सत्‍ता के लालच में कोई संरक्षण नहीं होता। आतंक पर पूर्ण नियंत्रण के लिए ऐसे अलोकतांत्रिक देश की धारणा ही आज के समय की आवश्‍यकता जान पड़ती है। लेकिन दूसरी ओर चीन को यह भी लगता है कि यदि उसने आतंक की मुसलिम धार्मिक प्रेरणाओं को अपने देश के बाहर पाक या वैश्विक स्‍तर पर नियंत्रित करने की कोशिश की तो इससे उसका व्‍यापार प्रभावित होगा। इसीलिए वह आतंकवाद के संबंध में भारत सहित यूरोपीय व अन्‍य देशों की चिंताओं की अनदेखी करता रहा है।
निकट भविष्‍य में आतंकवाद को लेकर उसके इस दृष्टिकोण में फर्क भी नहीं पड़ेगा। वह भारत की इच्‍छा के अनुरूप हाफि‍ज जैसे आतंकी को अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर तब ही पूर्ण दंड दिलाने के लिए आगे कदम बढ़ाएगा, जब भारत उसके साथ उसकी शर्तों पर निकटता बढ़ाएगा। और भारत ऐसे अवसरों को गंवाता ही रहा है। ओबीओआर ऐसी ही चीनी परियोजना थी, जिसमें विश्‍व के आधे से अधिक प्रमुख देशों के शामिल होने के बाद भी भारत चीन में हुए इस सम्‍मेलन में नहीं पहुंचा। साथ ही तिब्‍बत के संरक्षण के नाम पर जिस दलाई लामा की यात्राओं, सभाओं को लेकर भारत चीन के विरोध के बाद भी, उसका हिमायती बना रहा, आज वही दलाई लामा तिब्‍बती लोगों की इस मंशा से हमें परिचित करा रहा है कि वहां के लोग चीन के साथ जाना चाहते हैं। अब दलाई लामा को अपने देश के राजनीतिक, धार्मिक, राष्‍ट्रीय हित चीन के साथ जाने में सुरक्षित नजर आ रहे हैं। यदि ऐसा है तो फि‍र भारत क्‍यों अब तक चीन की नाराजगी मोल लेकर तिब्‍बती बाबा का राजनीतिक संरक्षण करता रहा। ऐसी कमजोरियों से भारत को उबरना होगा। आज के हिसाब से अनुपयोगी तिब्‍बत जैसे देश के लिए चीन से बिगाड़ का ही परिणाम है, जो भारत आज अजहर मसूद और हाफि‍ज जैसे आतंकियों को भारत में उनके द्वारा किए गए आतंकी हमलों के लिए अंतर्राष्‍ट्रीय न्‍यायालय में कठोर दंड नहीं दिला पा रहा।