Friday, March 10, 2017

नीली-रंगीली-चमकीली होली

फाल्‍गुन माह होली की धुरड्डी में कितना मनोहर लगता है। यह दो वर्ष पूर्व की धुरड्डी थी। सुबह जब तक आकाश बादलों से भरा था भारतीय जनमानस उदास रहा। लोग संशकित थे कि कहीं वर्षा न आ जाए, कहीं होली के त्‍योहार में वर्षाजनित ठंड न बढ़ जाए। मैं भी उदास हो उठा था। जब पत्‍नी ने बताया कि बाहर तो बादलों का झुरमुट लगा हुआ है और बारिश आने को है तो मैं बिस्‍तर पर पसरे-पसरे ही उस होली-दिवस के प्रति सहानुभूति से भर उठा।
          कक्ष से बाहर आकर देखा तो मेघभरे नभ की प्रतिछाया धरती पर बिखरी हुई थी। सूर्य का अस्तित्‍व कहीं नहीं था। सूर्यप्रकाश की लालसा में जनभावनाएं अत्‍यंत बेचैन थीं। बच्‍चे अपने-अपने घर के बाहर उदास-हताश मुख लिए हुए मौसम से खिन्‍न थे। मैं भी सोच रहा था कि धुरड्डी के दिन वर्षा की ऐसी संभावना मैंने, जितना याद कर पा रहा हूँ, पहले कभी नहीं महसूस की थी।
          लेकिन घर के भीतर कुछ क्षण व्‍यतीत करने के बाद जैसे ही मैं बाहर आया तो देखा सूर्यप्रकाश का अमृत धरती पर चमकने लगा था। यह सूर्योपस्थिति अद्भुत थी। इससे सभी को आत्‍मसंतोष हुआ। वासंती होली में यदि नभ काले मेघों से भरा हो और वर्षा की आशंकाएं उभर आएं तो मन केवल इसलिए उदासीन नहीं होता कि वसंत माह की शोभा नहीं रही, बल्कि इसलिए भी होता है कि जीवन में सबसे विशेष मौसम ही सबसे अनाकर्षक बन गया। भावनात्‍मक रूप से यह स्थिति मानव को छिन्‍न-भिन्‍न कर देती है। लगने लगता है कि जीवन शून्‍य है और इससे कुछ भी प्रोत्‍साहन नहीं मिलने वाला। लेकिन उस दिन मौसम शून्‍य-स्थिति से उबर चुका था। इसलिए होली का आनंद प्राप्‍त करने का विशेष अवसर भारतीय जनमानस को मिल ही गया।
          सवेरे दस-ग्‍यारह बजे तक सूर्य प्रताप धरती के कण-कण तक फैल चुका था। सूर्य किरणों से निकलने वाली ऊर्जा, ताप ने लोगों को एक-दूसरे पर रंग लगाने के लिए प्रेरित किया। ध्‍यानपूर्वक महसूस करने पर वह होली-दिवस अति मनभावन था। घर की खिड़की से दूर दिखता सेमल का पेड़ अपने ललंगे पुष्‍पों सहित कितना सुंदर लगता था। उसके गाढ़े लाल रंगी पुष्‍प जैसे नील नभ, पृथ्‍वी की हरियाली पर अपना रंग उड़ेल रहे थे। आकाश नीला अमृत बन व्‍याप्‍त था। दूर-सुदूर तक धरती के कोने गगन के सुनील क्षितिज की चमक से सुहावने बन लहरा रहे थे। नभ तले धरती से कुछ ऊपर वायुमंडल पर काले पक्षियों का प्राकृतिक विचरण कितना प्रभावी था। मंद रिमकती हवा का संस्‍पर्श माधुर्य से परिपूर्ण था।
          वास्‍तव में उस दिन गगन पथ विशेष रूप से सुसज्जित था। इसीलिए पक्षियों का आवागमन अधिक हो रहा था। रंगों का वह आयोजन प्रकृति के स्‍तर पर कितना रंगपूर्ण, भावनाप्रण था। एक प्रकार से तो फाल्गुन का संपूर्ण समय प्राकृतिक रूप से अतिप्रिय, सर्वसुंदर होता ही है परंतु होली की धुरड्डी में दिवस का कांति प्रभाव जीवन की अन्‍य किसी सुखापेक्षा पर प्रतिबंध लगा देता है। इस संप्रभाव में जीवन का पूर्वावलोकन, संभावी विश्‍लेषण सब समाविष्‍ट हो जाते हैं। प्रकृति प्रदत्‍त यह अवस्‍था एक प्रकार से जीव-जीवन का श्रेष्‍ठ संसाधन बन जाती है।
          सूर्य प्रकाश में शरीर को जीवन-ऊर्जा मिलती रही। सीमेंट निर्मित भवनों से भरा मेरा जीवन परिवेश हरियाली के बिना भी वसंत में आशा-जिज्ञासा से परिपूर्ण करता रहा। यदि हरी-भरी वनस्‍पति से भरे भूभाग में मेरा यह फाल्‍गुन समय व्‍यतीत हो तो मैं यथार्थ संसार से सदैव के लिए संबंधविच्‍छेद कर लूं। मैं आधुनिक विवशता का बोझ ढोते हुए भी प्रकृति के रहस्‍यों में रुचि लेता हूँ। इतना तन्‍मय होकर प्राकृतिक रहस्‍यों के प्रति एकस्‍थ होता हूँ कि आधुनिकता का अनुभव प्रकृति और अपने बीच बाधा लगने लगता।
          संध्‍या समय, जब होली का हुड़दंग थम गया, मैं एक मित्र से मिलने चल पड़ा। मदिरापान कर होली में अपने मन की अश्‍लील कुंठा प्रदर्शित कर चुके नर-नारी, बाल-बच्‍चे, बड़े-बूढ़े और छोटे-बड़े उस समय नहीं दिखे। सभी धुरड्डी की थकावट मिटाने घरों में बंद थे। रास्‍ते में दो-एक व्‍यक्ति दिखे, जो होली के रंगों से रंगे वस्‍त्र पहने खड़े, झूम-झूम कर बातें करते थे। उनका मदिरा प्रभाव अभी तक बना हुआ था। एकाध स्‍त्री भी दिखी। एक कुत्‍ता भी दिखा। उस पर भी हरा रंग लगा हुआ था। सोचा, मदिरा के मद में किसी ने अपशब्‍द कहते हुए उसे भी रंग दिया होगा। इतना संवेदनशील कोई मानव कम से कम इस शहर में तो नहीं रहा होगा, जो कुत्‍ते को भी होली की रंगकामनाएं प्रेषित कर उस पर रंग लगाता।
संध्‍या होने को थी। चारों दिशाओं के क्षितिज अनेक रंगों को छींटते हुए सूर्यास्‍त की तैयारी करने लगे थे। ढलते सूर्य किरणों की झिलमिल-झिलमिल मुख पर पड़ी। संध्‍या समय के हलके शीत प्रभाव में यह ग्रीष्‍म ताप अच्‍छा लगा। रात्रि में मित्र से विदा लेकर मैं घर आ गया। सुबह जिस तरह की रंगों की फुलवारी प्रकृति में व्‍याप्‍त थी, रात भी उसी के अनुप्रभाव में खिलती-बढ़ती जा रही थी। भोजन करने के बाद छत पर टहलते हुए अपनी मन-भावनाओं में मैं सभी को होली की रंगकामनाएं प्रेषित कर रहा था।
होली की रात के चन्‍द्रप्रकाश में घर-आंगन, द्वार-रोशनदान सभी अतिविचित्र रंगानुभव में चमक रहे थे। स्‍वयं से पूछा कि चांद के बड़े गोले व बीस-पच्‍चीस सितारों के साथ नभ का वास्‍तविक रंग क्‍या है। उत्‍तर मिला, नीला-रंगीला। मंथर, शीतल पवन सरसराहट में शीत पीड़ा का अंदेशा हुआ तो स्‍वयं को होली के अनुभव से अलग कर घर के अंदर भेजने को तैयार करने लगा। मन तो होली की रात वाली चन्‍द्रमयी निशा को देखते रहने का था पर तन विवश था घर में दुबक निद्रालीन होने को।
विकेश कुमार बडोला

Tuesday, February 7, 2017

मोदी के नेतृत्व में निरंतर बढ़ती भाजपा की प्रासंगिकता

जैसे-जैसे भारतीय जनता पार्टी नरेंद्र मोदी के नेतृत्‍व में भारतवर्ष में अपना लोकतांत्रिक विस्‍तार कर रही है, उतनी तीव्रता से कांग्रेसजनित मीडिया का मोदी विरोधी दुष्‍प्रचार पांव पसार रहा है। इस हड़बड़ाहट में तथाकथित पत्रकार, बुद्धिजीवी और विभिन्‍न क्षेत्रों की जानकारी रखनेवाले विशेषज्ञ यह भी भूल चुके हैं कि कृत्रिम विद्वता ओढ़कर लोगों को अपनी मनपसंद सरकार या राजनीतिक दल के अनुसार बातों, चर्चाओं व भाषणों से मूर्ख बनाए रखने का जमाना गया।
पिछले बीस वर्षों में मध्‍यम वर्गीय भारतीय लोगों की जो पीढ़ी तैयार हुई वह केवल कहे-सुने पर विश्‍वास करने की स्थिति में बिलकुल नहीं है। उसकी आदत है कि वह हर बात व चीज को अपने स्‍तर पर नाप-तौल और ठोक-बजा कर स्‍वीकार करती है। इसलिए कांग्रेस रूपी राजनीतिक दल के उकसावे में क्षेत्रीय राजनीतिक दल और इन सभी के अवैध धंधों की कमाई से उपजे पत्रकारिता संस्‍थानों को अब इस भ्रांति में बिलकुल नहीं रहना चाहिए कि लोगों को मोदी के विरोध में असत्‍य भाषण करके दुष्‍प्रेरित किया जा सकता है। लोग कम से कम इस देश के दो प्रमुख राजनीतिक दलों तथा उनकी कार्यप्रणालियों को तो ढंग से पहचान ही गए हैं। इतना ही नहीं उन्‍हें क्षेत्रीय दलों के राजनीतिक स्‍तर का भी भलीभांति ज्ञान हो चुका है। इसलिए उनके लिए संवैधानिक रूप से भाजपा के अतिरिक्‍त कोई दूसरा बेहतर राजनीतिक विकल्‍प अभी इस देश में है भी नहीं तथा मोदी की अपूर्व राजनीतिक दूरदर्शिता, ईमानदारी व सबका साथ सबका विकास अवधारणा के पीछे छुपी सत्‍यनिष्‍ठा के होते हुए भविष्‍य में भी देश की राजनीति में किसी अन्‍य राजनीतिक दल के टिकने की कोई संभावना नहीं बची।
प्राय: इस देश के लोगों को वर्षों से राजनीतिक भ्रष्‍टाचार, दुराचार तथा अत्‍याचार झेलते रहने के कारण सब कुछ भूलने की आदत रही है। इस दुखांत त्रासदी में लोगों ने इतने वर्षों से भ्रष्‍टाचार के दलदल में फंसी राष्‍ट्रीय राजनीति के कर्ताधर्ताओं से उनकी राजनीतिक गंदगी का हिसाब पूछना ही बंद कर दिया था। वह हिसाब भी क्‍या पूछती! वर्षों की राजनीतिक अवैध गतिविधियां यदि उंगलियों में गिने जाने योग्‍य होतीं या घपलों-घोटालों का हिसाब आम आदमी को याद रहने लायक गिनती के इर्द-गिर्द ठहरता तो लोग नेताओं से कुछ पूछते न। लेकिन लोगों की नजर में सन 2014 से पहले तक का राष्‍ट्रीय शासन-तंत्र लोगों पर लोकतंत्र की धारणा के नाम पर एकाधिकार के घिनौने स्‍तर तक जा पहुंचा था।
2014 में इस तरह के राजनीतिक शासन को उखाड़ लोगों ने अभूतपूर्व कार्य किया। परंतु दुखद है कि देश में मीडिया ने इस अभूतपूर्व घटनाक्रम की प्रशंसा नहीं करी। प्रशंसा इसलिए नहीं हुई क्‍योंकि विजयी राजनीतिक दल दक्षिणपंथ का पैरोकार था तथा वैचारिक कुंठाओं से आक्रांत वामपंथ मीडिया को यह कैसे रास आ सकता था।   यदि मीडिया को भ्रष्‍ट बनाने वाले कांग्रेस जैसे राजनीतिक दल ऐसे ऐतिहासिक बहुमत से विजयी होते तो निस्‍संदेह यही मीडिया उनके पांच वर्षीय कार्यकाल तक उनकी इस उपलब्धि को विशेष रूप से प्रसारित करता रहता। परंतु दशकों के सत्‍ता तंत्र के तले जो मीडिया इस देश में पनपा वास्‍तव में उसका अधिकांश वामपंथ का विद्रूप था। इस पत्रकारीय विद्रूप ने केवल पत्रकारिता को ही नहीं अपितु अखिल भारतीय शिक्षण-व्यवस्‍था, कला-साहित्‍य-संगीत की पुरातन भारतीय स्‍थापनाओं, सांस्‍कृतिक-सामाजिक विरासतों तथा राजनीति की मौलिक लोकतांत्रिक दृष्टि को भी कलंकित किया। इसका भ्रष्‍ट हस्‍तक्षेप जीवन के प्रत्‍येक क्षेत्र में इस सीमा तक बढ़ा कि जन-जन के विचारों में लोकतंत्र की धारणा कलुषित हो गई। लोग मात्र भय और जीविका के लिए लोकतंत्र को बाहरी मन से स्‍वीकार करने लगे।
आज नरेंद्र मोदी के नेतृत्‍व में भाजपा सरकार विगत साढ़े छह दशकों की राजनीतिक पंगुता, लोकतांत्रिक असभ्‍यता को मिटाने का प्रशंसनीय कार्य कर रही है। परंतु खेद कि इस बारे में मीडिया निष्‍पक्ष रूप से विस्‍तार से कुछ नहीं कहता। विकास के रूप में यदि वर्तमान शासन-तंत्र ने कुछ अतिशयोक्तिपूर्ण कार्य नहीं भी किए लेकिन पिछली सरकारों की तुलना में ये कार्य अत्‍यंत सराहनीय हैं। फि‍र वर्तमान सरकार के दो वर्षों के विकास कार्यों को देखकर विरोधियों द्वारा यह अपेक्षा कर लेना कि यह जनता की हर समस्‍या का समाधान हो, तो ऐसा तो कम से कम इस भौतिक युग में बिना किसी चमत्‍कार के हो नहीं सकता।
यदि पहले की सरकारों ने वर्ष दर वर्ष सत्‍तारूढ़ होने के दौरान विकास की योजनाओं का समुचित क्रमिक क्रियान्‍वयन किया होता तो निश्चित रूप से उनके पास वर्तमान सरकार से अपनी विकास छवि के बाबत तुलना करने का कोई नैतिक आधार होता। परंतु वास्‍तविकता यही है कि केंद्रीय स्‍तर पर विगत सरकारों ने राष्‍ट्रीय महत्‍व का कोई विशेष कार्य नहीं किया। जो कुछ भी इन्‍होंने किया वह पूर्णरूपेण अनियोजित, अवैध लाभार्जन के लालच से परिचालित तथा सर्वथा अयोग्‍य राजनेताओं की दिमागी उपज था।
आज वर्तमान सरकार के पास जनता के विकास के लिए अनेक योजनाएं हैं। योजनाओं के क्रियान्‍वयन के प्रामाणिक अभिलेख हैं। विकास कार्यों को संचालित करने में किसी तरह के भ्रष्‍टाचार, घपले-घोटाले या अवैध मुद्रा लेन-देन की कोई आशंका नहीं। प्रत्‍येक कार्य निष्‍पादन प्रणाली पूर्णत: पारदर्शी है। कृषकों, सैन्‍यकर्मियों, श्रमिकों, निर्धनों, स्त्रियों, विकलांगों, भूतपूर्व सैन्‍यकर्मियों, युवाओं तथा आम जनता के लिए वर्तमान सरकार ने अनेक ऐसी कल्‍याणकारी योजनाएं बनाई व संचालित की हैं, जिनसे लोग बिना किसी जटिलता के सहज लाभान्वित हो रहे हैं। मोदी के रूप में इस देश को ऐसा जननायक उपलब्‍ध हुआ जो अपनी शासकीय नीतियों को मानवीय संवेदना के आधार पर निर्धारित करता है। यदि वर्तमान केंद्र सरकार राजनीतिक शुचिता के साथ ऐसे ही कार्य करती रही तो भारत में विकास जनभागीदारी के साथ शीघ्र ही व्‍यावहारिक स्‍वरूप ग्रहण करने लगेगा। बहुत संभव है कि इसके बाद मोदी के विरोधियों के पास उनके राजनीतिक विरोध का कोई तरीका नहीं बचे।
इतना कुछ होने के बाद भी अपनी सरकार की विभिन्‍न योजनाओं, योजनाओं के लाभों के संवितरण तथा इनके पारदर्शी क्रियान्‍वयन के बारे में प्रधानमंत्री को अपने भाषणों में स्‍वयं बताना पड़ता है, बारंबार जनता को याद दिलाना पड़ता है। इससे ज्ञात होता है कि देश का मीडिया कितना पक्षपाती हो गया। सरकारी कामकाज के पारदर्शी संचालन तथा ठोस क्रियान्‍वयन से देश की गरीब जनता को होनेवाले फायदे मीडिया को नहीं दिखाई देते। चूंकि देश में मीडिया को वामपंथी विचार की स्‍थापना करनी है और इस हेतु उसे स्‍वयं का ढंग से इस्‍तेमाल करने के लिए शासकीय छत्रछाया की भी जरूरत है, जो उसे दक्षिणपंथी कही जानेवाली मोदी सरकार से मिल नहीं रही। इसलिए मीडिया लाइन सरकार की अनेक लोक-कल्‍याणकारी, मानवीय संवेदनाओं पर आधारित योजनाओं के बारे में तटस्‍थ होकर बताने को राजी नहीं। केंद्र की अनेक विकास योजनाओं का लाभ गैर-भाजपाई राज्‍यों की जनता तक इसलिए भी नहीं पहुंच पाता, क्‍योंकि गैर-भाजपाई सरकारें केवल भाजपा विरोध की राजनीति करने पर ही उतारू हैं। ऐसी सरकारें परंपरागत राजनीतिक द्वेष व प्रतिस्‍पर्धा की गंदी आदत के कारण भाजपा से केवल वोट हथियाने की प्रतिस्‍पर्द्धा तक ही सीमित रहना चाहती हैं। इन परिस्थितियों में जैसे-जैसे लोग देश-समाज के बाबत स्‍वाध्‍ययन कर अपने स्‍वतंत्र विचार बनाएंगे वैसे-वैसे भाजपा अपने सुशासन व विकास मंत्र के बूते उनके लिए प्रासंगिक होती जाएगी और कांग्रेस सहित अन्‍य राजनीतिक दल संभवत: अस्तित्‍व के संघर्ष के लिए भी न बचें।
विकेश कुमार बडोला