Thursday, December 1, 2016

ट्रंप विरोध का निरर्थक प्रलाप

मेरिकी राष्‍ट्रपति चुनाव में रिपब्लिकन उम्‍मीदवार डोनाल्‍ड ट्रंप के‍ विजयी होने का झटका यूरोपीय तथा शेष दुनिया के वामपं‍थियों को निरंतर बेचैन किए हुए है। विगत दिनों 45वें अमेरिकी राष्‍ट्रपति के रूप में ट्रंप की विजय-घोषणा से पूर्व तक येन-केन-प्रकारेण विश्‍व-बिरादरी की मीडिया उन्‍हें पराजित व चुका हुआ व्‍यक्ति मान चुका थी। इस बारे में अमेरिकी मीडिया सहित वामपंथियों का प्रतिनिधित्‍व करनेवाले संसारव्‍यापी मीडिया ने ट्रंप के विरोध में अथक प्रचार-प्रसार किया, उन्‍हें राष्‍ट्रपति के रूप में न चुने जाने के लिए भरसक कोशिश करी।

बड़े-बड़े समाचारपत्रों के लिए वर्षों से अंग्रेजी व हिंदी सहित अन्‍य भाषाओं में स्‍तंभ लिखनेवाले तथाकथित विद्वानों ने अनेक निरर्थक कारणों से डेमोक्रेटिक राष्‍ट्रपति उम्‍मीदवार हिलेरी क्लिंटन के बारे में पहले से ही धारणाएं बना ली थीं जिनका गुप्‍त मंतव्‍य किसी प्रकार हिलेरी को चुनाव में जिताना था। यदि मीडिया के बार में यह बात सत्‍य है तो फि‍र संसार का मीडिया अपने आप में एक घृणास्‍पद सूचना तंत्र बनकर ही रह गया है। इस परिस्थिति में तो लगता है कि दीर्घकालीन जनसरोकारों के बारे में सोच-समझ कर उन्‍हें प्रकाशित-प्रसारित करने की मीडिया की त‍टस्‍थ तथा निष्‍पक्ष दृष्टि बाधित हो चुकी है। वास्‍तव में अमेरिकी राष्‍ट्रपति चुनाव को लेकर इससे पूर्व इतना षड्यंत्रकारी पूर्वानुमान मीडिया ने कभी नहीं बनाया जितना कि इस बार। चुनावों के लिए उम्‍मीदवारी तय होने के उपरांत ही यह षड्यंत्र अमेरिका सहित पूरी दुनिया में वामपंथी विचारकों का संक्रमण रहा। इसकी मंशा डोनाल्‍ड ट्रंप को किसी तरह राष्‍ट्रपति के रूप में अयोग्‍य घोषित कर उनके विरुद्ध अमेरिकी मतदाताओं को हतोत्‍साहित करना था।

अमेरिका दुनिया में आधुनिकता के सर्वश्रेष्‍ठ मानदंडों पर चलनेवाले राष्‍ट्रों में सर्वोपरि है। वर्तमान जन-जीवन अनेक जैविक सुविधाओं तथा संसाधनों के रूप में जो कुछ प्राप्‍त कर रहा है उसका आभार अमेरिका को अधिक जाता है। आधुनिक जीवन को संभालने के लिए जो राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक-सामरिक तथा अन्‍य सार्वजनिक राष्‍ट्रीय मानदंड किसी राष्‍ट्र को अपने लिए चाहिए होते हैं उन्‍हें अपनाने, पालने-पोषने में भी अमेरिका विगत शताब्दियों से दुनिया के देशों के लिए अनुकरणीय रहा है। स्‍वाभाविक है इन परिस्थितियों में दुनिया के देशों के लिए अमेरिकी राष्‍ट्रपति चुनाव सदैव ही प्रमुख समाचार रहा। क्‍योंकि इस आधार पर ही उनके विश्‍व के सबसे शक्तिशाली देश व सबसे सामर्थ्‍यवान इसके राष्‍ट्रपति के साथ विभिन्‍न व्‍यापारिक लाभों, सामाजिक संबंधों तथा सामरिक आवश्‍यकताओं के लिए संबंध स्‍थापित हो सकते हैं।

परंतु विगत दिनों यह देखकर घोर आश्‍चर्य हुआ कि बहुमत से चुने गए सबसे शक्तिशाली व्‍यक्ति डोनाल्‍ड ट्रंप के विरुद्ध डेमोक्रेटिक राजनीतिक दल के समर्थक अमेरिकी लोग सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। उनकी घोषणा थी कि वे ट्रंप को अमेरिका का राष्‍ट्रपति मानने के लिए तैयार नहीं होंगे। एक सफ्ताह तक हजारों प्रदर्शनकारी न्‍यूयार्क, लॉस एंजिलिस और शिकागो में लोकतांत्रिक तरीके से बहुमत के आधार पर नवनिर्वाचित राष्‍ट्रपति ट्रंप के विरुद्ध नारे लगाते रहे। उनका कहना था कि वे ट्रंप की आश्‍चर्यजनक विजय के विरुद्ध हैं। न्‍यूयार्क में लोगों ने ट्रंप के आवास के निकट भी अपना विरोध प्रदर्शित किया।

ट्रंप का राष्‍ट्रपति के रूप में चुनाव बहुमत के आधार पर हुआ है। यह अमेरिका की लोकतांत्रिक प्रणाली के अंतर्गत ही संपन्‍न हुआ। तब भी आज अमेरिका के अनेक प्रांतों में यदि ट्रंप का विरोध हो रहा है तो उसका एकमात्र कारण यही है कि ऐसे लोगों को भड़कानेवाली वामपंथी विचारधारा बुरी तरह से खतरे में पड़ चुकी है, जो विश्‍व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के बहुमत को धता बताकर अपना बेकार शून्‍य प्रतिरोध प्रकट करने पर तुली हुई है।

जिन बहुसंख्‍यक लोगों ने रिपब्लिकन राजनीतिक दल के उम्‍मीदवार ट्रंप को अपना राष्‍ट्रपति चुना है क्‍या वे अमेरिकी सड़कों पर ट्रंप का विरोध कर रहे लोगों से कम लोकतांत्रिक अधिकार वाले नागरिक हैं? क्‍या ट्रंप समर्थक अधिसंख्‍य मूल अमेरिकी लोग, प्रवासियों के रूप में अमेरिका में बसे व कालांतर में वहां की नागरिकता ग्रहण करनेवालों से कम अधिकार संपन्‍न हैं जो वे अपने ही देश में अप्रवासी मुसलिमों, अश्‍वेतों, अफ्रीकियों, नाइजीरियायियों तथा विशेषकर अप्रवासी एशियाई मुसलिमों का विरोध झेलें? क्‍या इन परिस्थितियों में अमेरिका के अपने क्षेत्रीय और सीमांकन अधिकार आप्रवासन सिद्धांतों तथा अप्रवासियों की अति अधिकारपूर्ण मंशा के कारण खतरे में नहीं हैं? यह बात केवल अमेरिका ही नहीं बल्कि अन्‍य अनेक देशों पर भी लागू होती है। आखिर में इन आत्‍मघाती आप्रवासन अधिकारों पर चलने की परिस्थितियां किसी देश को अपने मूल स्‍वरूप में रहने भी दे सकती हैं या नहीं?

यह अति महत्‍वपूर्ण प्रश्‍न है जो अप्रवासियों के अधिकारों तथा इस संदर्भ में मानवाधिकार का व्‍यापार करनेवालों से अवश्‍य पूछा जाना चाहिए। यदि भारत में भी अप्रवासी भारतीय मोदी का इसलिए विरोध करने लगें कि वे मुसलिम आतंकवादियों पर प्रतिबंध लगाने को संकल्‍पबद्ध हैं तो यह विरोध अमेरिका सहित किसी भी दूसरे देश में मूल्‍यांकन योग्‍य नहीं हो सकता। विचार यह भी होना चाहिए कि आखिर उन परिस्थितियों में किसी राष्‍ट्र की अपनी राष्‍ट्रीय स्‍वायतत्‍ता क्‍या रह जाती है जब अप्रवासी नागरिक अपनी घातक मंशाओं को उस राष्‍ट्र के लोकतांत्रिक अस्तित्‍व पर थोपने पर उतारू हो जाएं।

ट्रंप यदि राष्‍ट्रपति के उम्‍मीदवार के रूप में चुनाव अभियानों में अमेरिका को आतंकवाद, भ्रष्‍टाचार सहित दूसरी बुराइयों से बचाने का संकल्‍प लेते हुए दिखे तथा इस उपक्रम में उन्‍होंने आतंक के केंद्र में विचाराधीन आत्‍मघाती मुसलिम विचारधारा को लक्ष्‍य कर उस पर नियंत्रण की बात करी तो इसमें गलत क्‍या हुआ। इसका मंतव्‍य यह तो नहीं कि वह सज्‍जन मुसलिमों को भी आतंकवादी समझेंगे। यदि उनके इस संकल्‍प से दुनिया में आतंकवाद समाप्‍त होता है या आतंकी समूहों में बौखलाहट होती है तो समझा जाना चाहिए कि वे आतंक को वास्‍तव में समाप्‍त करने के लिए कटिबद्ध होंगे। यह तो दुनिया के लिए अच्‍छा ही सिद्ध होगा। तब क्‍यों उनके विरोध को सड़क से लेकर विचारों तक में स्‍थान दिया जा रहा है। य‍ह बात समझकर ऐसी विरोधी विचारधारा को सड़क से लेकर मीडिया घरानों तक प्रतिबंध करने की आवश्‍यकता अब आन पड़ी है। ट्रंप का इस तरह का विरोध आइएस जैसे आतंकी समूहों का गुप्‍त समर्थन ही है, जो आदर्श विश्‍व के समर्थकों को कभी भी किसी स्थिति में सहन नहीं हो सकता।
विकेश कुमार बडोला

Friday, November 11, 2016

सोशल मीडिया की गति-दुर्गति

ब से सोशल मीडिया अस्तित्‍व में आया, पारंपरिक पत्रकारिता की सच्‍चाई सामने आ गई। सोशल मीडिया के जितने भी उपक्रम हैं, उनके निर्माण के पीछे की भावना पहलेपहले यह बिलकुल नहीं थी कि ये आम आदमी की अभिव्‍यक्ति के लिए हैं और इनसे दुनिया के सभी लोगों को स्‍वयं को अभिव्‍यक्‍त करने का एक अवसर मिलेगा। सोशल मीडिया के माध्‍यमों का एकमात्र और सोचा-विचारा गया उद्देश्‍य सूचना प्रौद्योगिकी व्‍यापार के आधार पर धनार्जन करना था। इसलिए जिस देश में सूचना प्रौद्योगिकी उपक्रमों और संसाधनों का जितना अधिक विकास हुआ, उस देश के श्रेष्‍ठ सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों ने इनफॉर्मेशन मोबिलाइजेशन यानि चल-सूचना तंत्र विकसित किए और आज इससे खूब धनार्जन कर रहे हैं।

          आज फेसबुक, ट्विटर, इंस्‍टाग्राम, लिंक्‍ड इन, व्‍हाट्स ऐप जैसे वर्तमान लोकप्रिय सोशल मीडिया माध्‍यमों से जुड़कर लोग स्‍वयं की बातों, अनुभवों और जिज्ञासाओं को प्रकट कर रहे हैं। विशेषकर सहस्राब्दियों की अस्‍वस्‍थ मानवीय सोच-समझ के परिणामस्‍वरूप पनपी मनुष्‍यों की कुंठाएं आज के युग के मनुष्‍यों द्वारा सोशल मीडिया के माध्‍यमों पर स्‍पष्‍ट रूप से इस तरह प्रकट हो रही हैं कि सोशल मीडिया खुद के सदुपयोगी स्‍वरूप से विमुख होकर विभिन्‍न लोगों के मध्‍य अनेक अनावश्‍यक विषयों पर वाद-विवाद करने का खतरनाक अड्डा बन चुका है।

          सोशल मीडिया के दुष्‍परिणाम इसके प्रयोगकर्ता दो विपरीत विचारों के व्‍यक्तियों को केवल अपने मंच पर ही वैरी नहीं बना रहे बल्कि इसका प्रभाव व्‍यक्तियों के सामान्‍य जीवन में भी देखा जा सकता है। व्‍यक्ति सोशल मीडिया की लत में इतना डूब चुका है कि वह इससे, जितना संभव हो, हर समय जुड़ा रहना चाहता है और अपने द्वारा लिखी गई किसी बात या प्रस्‍तुत किए गए किसी चित्र पर अपने सोशल मीडिया मित्रों की पंसद और टिप्‍पणियों की प्रतीक्षा में कई सूचना प्रौद्योगिकी जनित भ्रमों, रोगों और लिप्‍साओं से घिरता जा रहा है।

सोशल मीडिया के साथ बने रहने की लत के कारण अधिकांश लोगों का सामान्‍य जीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। लोग खाना-पीना और अन्‍य दैनिक गतिविधियां भूलकर इससे चिपके हुए हैं। सोशल मीडिया के कतिपय मंचों जैसे फेसबुक, ट्विटर और व्‍हाट्स ऐप पर बड़ी जनसंख्‍या की आसन्‍न व्‍यस्‍तता की स्थिति यह है कि उसे प्रतिपल-प्रतिदिन मानव जीवन की अनुभूति से विरक्ति हो रही है। ऑनलाइन बहु स्‍तरीय भ्रमावरण रोग से ग्रस्‍त होकर न चाहते हुए भी अधिकांश लोग धीमे-धीमे मशीन में परिवर्तित हो रहे हैं।

कैसी विडंबना है कि एक ओर तो सूचना प्रौद्योगिकी के समस्‍त उपक्रम व्‍यापार करने और पैसा कमाने का शक्तिशाली तंत्र बने हुए हैं, तो दूसरी ओर सार्वजनिक जनसंचार के रूप में यह अरबों लोगों की चेतन-अवचेतन भावनाओं-दुर्भावनाओं के ज्‍वार से निकली अभिव्‍यक्तियों के माध्‍यम भी बने हुए हैं। जैसे कि मानव जीवन में किसी भी बात, घटना, सेवा, संसाधन और विचार के अच्‍छे-बुरे दोनों पहलू होते हैं, वैसे ही सूचना प्रौद्योगिकी के अंतर्गत सोशल मीडिया माध्‍यमों के भी हैं। लेकिन चिंताजनक प्रश्‍न है कि बाकी क्षेत्रों की तरह इस क्षेत्र के अच्‍छे-बुरे पहलुओं का मूल्‍यांकन कौन करेगा। कौन यह निर्णय करेगा और कैसे यह सहज ही सर्वमान्‍य होगा कि सोशल मीडिया का यह पहलू अच्‍छा या वह पहलू बुरा है। इसी तरह अनेक लोगों के विचारों का अध्‍ययन कर कौन यह निर्धारित करेगा कि यह विचार मूल्‍यवान है या वह विचार मूल्‍यहीन तथा कैसे मूल्‍यवान व मूल्‍यहीन विचार निर्धारित करनेवाले व्‍यक्ति का इस कार्यक्रम के लिए जीवनोचित योग्‍यता के बहुमत के आधार पर चयन हो सकेगा। ये कुछ प्रश्‍न हैं, जो अभिव्‍यक्ति के नाम पर व्‍याप्‍त जन भावनाओं और दुर्भावनाओं से पटे पड़े सोशल मीडिया माध्‍यमों को देखने के बाद स्‍वत: ही मन-मस्तिष्‍क में आ रहे हैं।

          केवल सोशल मीडिया ही नहीं अपितु मुख्‍यधारा के मीडिया में भी कई समूह हैं, जो जीवन की अच्‍छी-बुरी विचारधाराओं में बंटे हुए हैं। कुछ समूह मानव जीवन की आस्तिक धारणाओं का समर्थन करते हुए जनसंचार का दायित्‍व संभाल रहे हैं, तो कुछ समूह नास्तिक विचारों से सहमति प्रदर्शित करते हुए उस प्रकार का जनसंचार बना रहे हैं।

मनुष्‍य जब तक अपरिपक्‍व होता है, वह इनमें से किसी भी समूह की ओर आकर्षित हो सकता है। बल्कि अपरिपक्‍व मानव तो उत्‍तरदायित्‍वों से हीन नास्तिक विचारों के पोषक जनसंचार समूहों के प्रति शीघ्र लगनशील हो जाता है। निस्‍संदेह परिपक्‍व होने और अपने विवेक से सोचने-विचारने की अवस्‍था में उसे नास्तिक विचारों का जनसंचार समूह अरुचिकर लगने लग जाए या उसे उस पर अनास्‍था होने लगे, लेकिन उस पर नास्तिक विचारों का प्रारंभिक दुष्‍प्रभाव जीवनभर रहता है। एक प्रकार से वह आस्तिक होने की इच्‍छा रखते हुए भी और नास्तिकता के दुष्‍चक्र से बाहर न निकल सकने की विवशता के कारण वैचारिक रूप से किंकर्त्‍तव्‍यविमूढ़ हो रहता है। वह अंतत: दो विपरीत विचारधाराओं के कारण दोनों के प्रति मध्‍यमार्गी बन जाता है तथा यही स्थिति मनुष्‍य के लिए सबसे अधिक हानिकारक है। इस तरह वह अपना जीवन बर्बाद ही कर देता है।

दूसरी ओर आस्तिक भाव-विचारों के साथ प्रारंभ से जुड़े मानवों का जनसंचार भी श्रेष्‍ठ होता है। उनमें परस्‍पर सेवा, कल्‍याण, प्रेम, उदारता, परोपकार की सद्भावनाएं विकसित होती हैं जिनके बल पर वे अपने जीवन को प्रतिपल सार्थक करते चलते हैं। ऐसे लोग नास्तिक लोगों के लिए भी मित्र होते हैं, उनके लिए भी उदारता रखते हैं। लेकिन चूंकि नास्तिक लोग असुर होते हैं, उनकी नियति में सदाचरण और सन्‍मार्ग अपनाना नहीं होता, इसलिए वे सदैव आस्तिकता के सिद्धांतों और आस्तिक लोगों से वैर-भाव बनाए रखते हैं। उनका ज्ञान उन्‍हें इतना भी उदार नहीं बना सकता कि वे आस्तिक-नास्तिक के द्ंवद से निकलकर जीवन में सामान्‍य मानवीय संबंध स्‍थापित कर पाएं या प्रमुदित होकर एक-दूसरे का अभिनंदन कर पाएं।

आज सोशल मीडिया पर ऐसे ही आस्तिक और नास्तिक लोगों का विचार-युद्ध चल रहा है। नास्तिक लोगों के विवादों और कुतर्कों की स्थिति यह है कि यदि आस्तिक-समूह के व्‍यक्ति कहते हैं कि शुद्ध जल के सेवन से स्‍वस्‍थ हो सकते हैं तो नास्तिक शक्ति के मोहपाश में बंधे लोग शुद्ध जल को भी ईर्ष्‍या भाव से देखने लगते हैं। यदि नास्तिक-समूह के लोगों के साथ अनेक विषयों से संबंधित वाद-विवाद की प्रतिपल की तनातनी से मुक्ति के लिए आस्तिक-समूह के लोगों द्वारा उन्‍हें विचार-युद्ध से अलग मल-युद्ध के लिए चुनौती दी जाती है तो वे कायरों की तरह अपने कुतर्की विचारों को ओढ़ चुप्‍पी साध लाते हैं।

          शास्‍त्रों में उद्धृत है कि विसंगत विचारों का समर्थन करनेवालों को पहले प्रेम व शांति से समझाया जाता है किंतु धर्म की मर्यादा के अंतर्गत इसकी भी एक सीमा होती है और यदि यह सीमा समाप्‍त हो जाती है, तो विसंगत विचारों के समर्थकों का संहार करना ही पड़ता है ताकि संसार में मानवीयता का धर्म बचा रहे।

          भारत में नास्तिक व आसुरी लोगों, कई वर्षों तक जीवन को कुतर्कों से परिचालित करते हुए आए विचारकों और इनके वर्षों के वैचारिक राज को अंत करने का शंखनाद हो चुका है। सोशल मीडिया इसमें देश का साथ दे रहा है, तो यह प्रसन्‍नता की बात है। यदि सोशल मीडिया के इस अभियान में कुछ अनर्गल भी होता है, तो उसकी यह समझकर अनदेखी की जानी चाहिए कि यह अभियान सहस्राब्दियों की अनर्गल सामाजिक-राजनीतिक सत्‍ता के नास्तिक-कुतर्की-विवादित संचार व्‍यवस्‍था को ध्वस्‍त करने के लिए ही प्रारंभ हुआ है। निस्‍संदेह लोगों द्वारा सोशल मीडिया इंटरनेट साइट से जुड़ने और उसमें अधिकाधिक समय व्‍यतीत करने का लाभ अमेरिकी व चीनी सोशल मीडिया साइट नियंत्रक कारोबारियों को ही क्‍यों न हो, परंतु यह उपक्रम दीर्घकालीन भारतीय-विचार स्‍थापना के लिए अब उस मीडिया से तो लोगों को छुटकारा दिलाने लगा है जो अंग्रेजों से भी अधिक अमानवीय शासकों-प्रशासकों की छत्रछाया में पिछले 70 वर्षों से जनमानस को हांक रहा था, राजनीतिक दलों व इनके नेताओं के संकेतों पर परिचालित होता आ रहा था।

लेकिन सोशल मीडिया वेबसाइटों में भी ऐसा सद्प्रयास कुछेक लोगों द्वारा ही किया जा रहा है। शेष लोगों की भीड़ तो इस पर अनावश्‍यक और व्‍यर्थ कथोपकथन को प्रसारित करने तथा उस पर क्रिया-प्रतिक्रिया देने पर ही लगी हुई है, जिसका कदाचित सदियों के वैचारिक पृष्‍ठांकन में कुछ भी मूल्‍यांकन न हो सकेगा। 

विकेश कुमार बडोला