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बुधवार, 15 अगस्त 2018

हम सब में हो स्वतंत्रता की सच्ची भावना

हत्‍तरवां स्‍वतंत्रता दिवस मनाते हुए हमारे सामने भारत देश के बारे में गर्वित होने के साथ-साथ लज्जित होने की विवशताएं भी हैं। ऐसा इसलिए क्‍योंकि हमारे जिन स्‍वतंत्रता सेनानियों ने अपने सर्वस्‍व का बलिदान कर भारत को अंग्रेजों के राज से मुक्‍त कराया था, उन पर तो हमें जीवनभर गर्व रहेगा परंतु स्‍वतंत्रता के एक दशक बाद भारत में जैसी लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था पनपी और जिनके राजनेतृत्‍व में पनपी उस स्थिति में पूरे भारत का सार्वजनिक जीवन आधारभूत जीवन-सुविधाओं को प्राप्‍त करने के आधार पर अमीरी-गरीबी के रूप में गहराई तक बंट गया। इस स्थिति में स्‍वतंत्रता का अनुभव हमें लज्जित भी करता है।   
जब हम 71 वर्ष पहले के भारत यानी ब्रिटिश सत्‍ता के एशियाई उपनिवेशों में से एक उपनिवेश भारतभूमि की कल्‍पना करते हैं, तो स्‍वतंत्रता आंदोलन के अनेक विहंगम दृश्‍य हमारी आंखों में पुनर्जीवित हो उठते हैं। लाखों स्‍वतंत्रता सेनानियों ने अपने निजी जीवन को स्‍वतंत्रता का लक्ष्‍य प्राप्‍त करने की सीढ़ियों के रूप में समर्पित कर दिया। ऐसे अधिनायकों का निजी, पारिवारिक और सामाजिक जीवन भारत की स्‍वतंत्रता के लिए होम हो गया। स्‍वतंत्रता और स्‍वतंत्रता आंदोलन के संदर्भ में संवेदनशील होकर विचार करते समय हमें यह तथ्‍य भी अपने मन-मस्तिष्‍क में रखना होगा कि जो लोग सच में एक आजाद, अंग्रेज राज से मुक्‍त और सुखी-शांत-समृद्ध भारत के लिए अंग्रेजों से लड़े-भिड़े, क्‍या आजादी के बाद उनकी भावनाओं का सम्‍मान किया गया? क्‍या उनके बलिदान और स्‍वतंत्रता मिलने के बाद उनके विचारों, कल्‍पनाओं और स्‍वप्‍नों का भारत निर्मित हो सका? और यदि ऐसा नहीं हो सका, तो इसके लिए दोषी कौन है? वास्‍तव में देश आज दो ध्रुवों में बंटा हुआ है। यह स्थिति सन् 2014 से पहले ज्‍यादा भयग्रस्‍त करती थी। स्‍वतंत्रता के उद्देश्‍य के अनुरूप यदि भारत पूरी तरह विकसित नहीं हो सका है तो इसमें हमारे राजनेताओं की अकर्मण्‍यता, अदूरदर्शिता और असंवेदनशीलता की भूमिका ही अधिक रही। इसके विपरीत अधिसंख्‍य भारतीय नागरिक राजनेताओं के देशविरोधी कर्मों से दुखी रहते आए हैं। यह उनका ही संकल्‍प था कि उन्‍होंने ऐसे नेताओं को सत्‍ता से अलग कर राष्‍ट्रभक्ति का परिचय दिया।
इन परिस्थितियों में ऐसा नहीं लगता कि सच्‍चे स्‍वतंत्रता सेनानियों का बलिदान व्‍यर्थ चला गया। स्‍वतंत्रता आंदोलन के आरंभिक काल से लेकर स्‍वतंत्रता मिलने के कालखंड तक जिन लोगों ने भारतभूमि के लिए अपना जीवन झोंक दिया, उनकी मातृभक्ति की भावनाएं आज भी देशवासियों के हृदय में हिलोरें ले रही हैं। ऐसे बलिदानी वीरों के मुखचित्र देखकर, उनकी वीरगाथाएं पढ़कर तथा राष्‍ट्रोत्‍थान के बारे में उनके संकल्‍पों व विचारों से परिचित होकर आज भी सच्‍चे देशभक्‍तों के शरीर के रोएं खड़े हो जाते हैं। यह अनुभव इस आदि प्रवचन को सत्‍य सिद्ध करता है कि मातृभूमि के लिए सत्‍यनिष्‍ठा से अपना सब कुछ समर्पित करनेवाले वीरों की संस्‍मृतियों को असत्‍य के बूते मिटाया नहीं जा सकता। ऐसे ही वीरों से प्रेरणा लेकर आज कई लोग भारत के विकास के लिए व्‍यक्तिगत और संस्‍थागत रूप में अपनी-अपनी भूमिकाओं का निर्वहन कर रहे हैं। आज हमारा देश विकास के जिन विभिन्‍न आयामों को स्‍पर्श कर रहा है वह हमारे उन वैज्ञानिकों, अभियंताओं, अध्‍यापकों, श्रमिकों, सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों, चिकित्‍सकों, विचारकों और दूसरे लोगों के परिश्रम से ही संभव है, जिन्‍हें क्षण-क्षणांश सच्‍चे स्‍वतंत्रता सेनानियों का त्याग याद रहता है।
आज देश के संवेदनशील और विवेकवान नागरिकों को यह विचार अवश्‍य मथता रहता है कि स्‍वतंत्रता के वास्‍तविक मायने क्‍या थे? हमारे स्‍वतंत्रता सेनानी अंग्रेजों की राज-व्‍यवस्‍था को समाप्‍त कर भारत देश को स्‍वतंत्र क्‍यों कराना चाहते थे? वास्‍तव में अंग्रेजों की राज-व्‍यवस्‍था व्‍यापारिक क्रियाओं और राजकीय नियम-कानूनों को समुचित तरीके से चलाने के हिसाब से खराब नहीं थी। व्‍यापार, समाज और संपूर्ण राजकाज के अनुसार जो नियम-कानून अंग्रेजों ने बनाए, उस कालखंड में उनका कठोर अनुपालन होता था। और नियम-कानूनों का अनुपालन न करनेवालों के विरुद्ध समयोचित अनुशासनात्‍मक और दंडात्‍मक कार्रवाइयां भी होती थीं। अंग्रेज ही थे जिनके शासन करने के तरीके का अनुसरण स्‍वतंत्रता मिलने के बाद भारत के लोकतांत्रिक देश बनने पर हमारे नेताओं ने भी किया। स्‍वतंत्रता के बाद दशकों तक भारत अंग्रेजों के शासनाधीन निर्मित नियम-कानूनों के अनुसार ही चला। अब भी भारत देश की जो लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था है उसकी कार्यप्रणाली अंग्रेजों के बनाए नियमों, क्रियाविधियों और प्रक्रियाओं पर ही चल रही है।
निस्‍संदेह ब्रिटेन लोकतांत्रिक देश नहीं था और न अब है, परंतु शासन करने के उसके अनेक नियमों का अनुसरण लोकतांत्रिक देश आज भी करते हैं। संसद के दोनों सदन--लोकसभा और राज्‍यसभा, राज्‍यों की राज्‍यविधानसभाएं, न्‍यायपालिका, पुलिस, केंद्र सरकार के विभिन्‍न मंत्रालयों का कार्यकारी तंत्र और कर्मचारीगण सभी लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍थाएं अंग्रेजों द्वारा आरंभ किए गए राज-नियमों से ही परिचालित होती आई हैं। हालांकि विगत चार वर्षों में भाजपा की मोदी सरकार ने भारतीय लोकतांत्रिक कार्य-व्‍यवस्‍था को अंग्रेजों की उक्‍त पुरातन कार्यप्रणाली और नियमबद्धता से थोड़ा बहुत मुक्‍त अवश्‍य किया है, लेकिन इस कार्यप्रणाली और नियमबद्धता से पूरी तरह मुक्‍त होना अभी संभव नहीं। ऐसा इसलिए क्‍योंकि अंग्रेजों के शासन करने के नियम, कानून और अन्‍य संपूर्ण व्‍यवस्‍थाएं शासन करने हेतु खोजी गईं अभी तक की सर्वोत्‍तम विधियां हैं।
चाहे प्रजातंत्र हो या राजतंत्र एक विशाल जनसंख्‍या को व्‍यक्तिगत, सामाजिक, सामुदायिक और संस्‍थागत रूप में समुचित तरीके से व्‍यवस्थित करने के लिए कुछ नियम बनाने पड़ते हैं। लेकिन यदि प्रजातंत्र में नियमों का उल्‍लंघन शीर्ष स्‍तर से ही होने लगे तो ऐसे प्रजातंत्र में सुख-शांति-समृद्धि कैसे आ सकती है। भारत में आजादी के दो दशक बाद यही परिस्थिति निर्मित हुई, जिससे लोकतंत्र आहत हुआ और परिणामस्‍वरूप सच्‍चे नागरिक, देशभक्‍त लोग दुखी हो गए। प्रजातंत्र की ऐसी दुर्गति के विपरीत यदि राजतंत्र में नियमों का समुचित पालन हो रहा है, तो ऐसा तंत्र प्रजातंत्र से भी अधिक उन्‍नत, प्रोन्‍नत और समृद्ध होता है। अत: इस संबंध में यही निष्‍कर्ष स्‍वीकार्य है कि किसी राष्‍ट्र में तंत्र कोई भी हो जब तक उसके शीर्ष नेतृत्‍वकर्ता सत्‍यनिष्‍ठ होकर उस तंत्र को चलाते हैं, तब तक ऐसे राष्‍ट्र के गौरव के लिए अपना सर्वस्‍व झोंक चुके और झोंकनेवाले लोगों को राष्‍ट्रीय मान-सम्‍मान देना मात्र आम देशवासियों की नहीं, अपितु देश को चलानेवाले नेताओं की भी अहम जैविक आवश्‍यकता होती है।
यदि भारत के सामान्‍य नागरिक ही नहीं बल्कि सत्‍ता संभाल रहे नेता भी मातृभूमि के लिए स्‍वयं को बलि देवी पर अर्पित कर चुके वीरों के लिए तन-मन-धन से मान-सम्‍मान रखेंगे, तो ही हम उनके स्‍वप्‍नों के भारत का निर्माण करने की दिशा में आगे बढ़ सकेंगे। स्‍वतंत्रता की सच्‍ची भावना हम सब में होनी चाहिए। ऐसा होने पर ही भारतीय नागरिकों में राष्‍ट्रीय कर्तव्‍यों के नि:स्‍वार्थ निर्वहन के प्रति दृढ़ता साकार हो सकेगी।

शनिवार, 11 अगस्त 2018

सूचनाओं पर नियंत्रण और निगरानी की अनुचित नीति

वैसे तो काल्‍पनिक और आध्‍यात्मिक रूप में हम सभी इस दुनिया से बहुत दूर रहते हैं। इस दुनिया से मतलब देशी-विदेशी शासन-तंत्र के अधीन चलने वाली दुनिया से है। इसमें वह दुनिया सम्मिलित नहीं, जो हमारे चारों ओर प्राकृतिक रूप में विद्यमान है। जब हम कल्‍पना, स्‍वप्‍न और अध्‍यात्‍म के वशीभूत होकर शासन तंत्र की गंदगी से सनी इस दुनिया से ईर्ष्‍या करते हैं और इसके शासकों और शासकों को चुननेवाले मूर्ख लोगों से अलगाव रखते हैं, तो हमें किसी बात का डर क्‍यों होना चाहिए।
कालांतर से शासन-तंत्र का यह डर जनता में अलग-अलग तरह से भरा गया। कभी धर्मांतरण (हिन्‍दू से मुसलमान बनने) के रूप में, कभी प्रतिकूल शासकीय नियम-कानूनों के रूप में, कभी आपातकाल के रूप में, कभी नसबंदी के रूप में, कभी मौलिक अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता नहीं मिलने के रूप में, कभी कृत्रिम बौद्धिकता को विद्यालयी और विश्‍वविद्यालयी पाठ्यक्रम के रूप में पढ़ने के रूप में, कभी सोशल मीडिया पर प्रतिबंध या नियंत्रण के रूप में और अब वर्तमान में हमारे इंटरनेट मंचों के संपूर्ण आंकड़ों-प्रविष्टियों-लिखे-पढ़े हुए की निगरानी के रूप में। इस संदर्भ में गहन विचारणीय बात यह है कि क्‍या इससे जनता के मनोभावों को पूरी तरह परि‍वर्तित करने में सफलता मिल जाएगी? मनोभावों पर स्‍वयं व्‍यक्ति के अतिरिक्‍त किस का वश हो सकता है। मूल रूप में कोई भी व्‍यक्ति या राष्‍ट्र का नागरिक उन भावनाओं से परिचालित नहीं होता, जैसी भावनाएं आजकल सोशल मीडिया पर प्रदर्शित हो रही हैं। ऐसी भावनाएं उस सरकार, समाज और परिवेश की क्रियाओं का ही परिणाम है जो व्‍यक्ति का अपने-अपने हित के लिए इस्‍तेमाल कर रहे हैं। तो क्‍या इस स्थिति में व्‍यक्ति को छोड़कर सरकार, समाज और परिवेश की गतिविधियों पर नियंत्रण की बात नहीं होनी चाहिए? और सर्वाधिक नियंत्रण तो उस सरकार और अग्रगामी राष्‍ट्रीय नीतियों का नेतृत्‍व करनेवाले उसके नेताओं पर होना चाहिए जो सरकार, समाज और व्‍यक्ति के पालक बनकर बैठे हैं। क्‍या उन पर किसी का या स्‍वयं उनका नियंत्रण है?
शासन-तंत्र में सम्मिलित और शासन-तंत्र में आने के लिए बेचैन राजनीतिक रूप से गंदे और भ्रष्‍ट लोगों की मांग पर यदि हिन्‍दुस्‍थान की मूल जनता के सोशल मीडिया मंचों पर निगरानी रखी जा रही है तो इसमें जनता को घबराने और डरने की क्‍या आवश्‍यकता। रखे कोई भी निगरानी। सोशल मीडिया मंचों पर जो कुछ लिखा, बोला या प्रकट किया जा रहा है, क्‍या वह निगरानी के बाद लोगों के भीतर से मर जाएगा? जब ऐसा नहीं होगा, तो ऐसी निगरानी का क्‍या लाभ? एक मानव के रूप में सर्वाधिक (सभी नहीं) भ्रष्‍ट यदि देश और समाज में कोई रहा है या है तो वह नेता, बड़े अधिकारी और अमीर लोग ही रहे। ऐसे लोगों की हर प्रकार की गंदगी को सोशल मीडिया के माध्‍यम से अभिव्‍यक्‍त कर रहे लोगों को गंदा कैसे माना जाएगा? और अगर माना भी जाता है, तो माना जाता रहे। लोगों को इसकी चिंता कदापि नहीं होनी चाहिए। नेता, अधिकारी हो या कोई कितना ही धनी क्‍यों न हो, सभी नश्‍वर हैं। ऐसे नश्‍वर लोगों द्वारा अपने हित साधने के लिए बनाए जा रहे कानून के अनुसार यदि जनता गलत है, तो जनता को हंसते-हंसते यह गलती स्‍वीकार करनी चाहिए। इसके लिए उसे चिंता या आत्‍मग्‍लानि नहीं होनी चाहिए। वास्‍तव में मूर्ख शासकों के बनाए व्‍यर्थ-निरर्थ नियम-कानूनों को मानने से बड़ा अपराध कुछ नहीं।
भ्रष्‍ट शासन-तंत्र के लिए काम कर रहे मीडियावाले देश में हो रही गतिविधियों पर जैसे समाचार, बातें और विश्‍लेषण प्रसारित करते हैं, क्‍या जनता को उसे सच मानने के लिए विवश किया जा सकता है? यदि नहीं किया जा सकता, तो सोशल मीडिया पर प्रतिबंध की बातें क्‍यों हो रही हैं? जो हिन्‍दुस्‍थानी जनता विवेकवान है, वह वास्‍तव में कालांतर से वैसी ही है, जैसे सोशल मीडिया के विभिन्‍न मंचों के माध्‍यम से वह स्‍वयं को अभिव्‍यक्‍त कर रही है। भला विसंगतियों से पूर्ण संविधान के अंतर्गत शासन करने की चाह रखनेवाले मूर्ख, असंवेदनशील और अमानवीय नेताओं का विवशतापूर्ण गुणगान कब तक किया जा सकता है। समय ने इसकी सीमा बांधी थी, जो 2014 में समाप्‍त हो चुकी है।
एक बात तो है कि समय सच्‍चा न्‍याय करता है और क्‍या सच था, क्‍या झूठ था या क्‍या सच है, क्‍या झूठ है, इसे प्रस्‍तुत कर ही देता है। 2014 के बाद भारतीय राजनीति बहुत गंभीर संक्रमण से गुजर रही है। इस संक्रमण की चपेट में आए कुछ राजनीतिक दल शासन करने के लिए छटपटा रहे हैं। सोशल मीडिया पर प्रतिबंध या नियंत्रण का कुविचार इसी छटपटाहट के कारण उपजा है।
जो कुछ इस राष्‍ट्र में राजनीतिक रूप में घट रहा है, वह पहली बार नहीं हो रहा। वह सब कुछ पहले भी हो चुका है। आज उसकी पुनरावृत्ति हो रही है। जिन्‍होंने सत्‍ता और शासन के लिए पिछले डेढ़-सौ वर्ष से इस देश को इसके मूल जीवन, संस्‍कृति, धर्म, भाषा, जीवनचर्या और दिनचर्या से बलात अलग कर दिया वे आज अपनी सत्‍ता को पूरी तरह खोने के भय से जनता पर नियंत्रण की नई-नई बातें सोच रहे हैं। सोशल मीडिया पर प्रतिबंध और नियंत्रण की नीति इसी का दुष्‍परिणाम है।
जो कुछ राष्‍ट्र के नेताओं को अनुकूल विकास के लिए करना चाहिए, उस दिशा में तो कोई अभी तक ध्‍यानपूर्वक सोच भी नहीं रहा। जनसंख्‍या वृद्धि के संबंध में कोई बात ही नहीं कर रहा। चाहे किसी भी तरह का संकट हो, भीड़ के रूप में सोशल मीडिया में फैली अराजकता ही क्‍यों न हो, उसके समुचित समाधान का उपाय है जनसंख्‍या नियंत्रण नीति। अभी से यह नी‍ति बनेगी, तो आनेवाले दस वर्षों बाद भीड़जनित समस्‍याओं से मुक्ति मिल सकेगी। आखिर इतनी बड़ी जनसंख्‍या, जिसमें अवैध मुसलिमों की जनसंख्‍या भी करोड़ों में है, को किसी भी रूप में (शुद्ध लोकतांत्रिक रूप में भी) नियंत्रित कैसे किया जा सकता है! नेतागण सोशल मीडिया पर नियंत्रण की बात छोड़ें और एक सुनियोजित जनसंख्‍या नीति बनाएं। चाहे देश को सत्‍यनिष्‍ठा से संचालित करने का विचार है या अभी तक वास्‍तविकता में देश भ्रष्‍टाचार से चलता आया है, दोनों ही स्थितियों में जनसंख्‍या पर विशेषकर अवैध मुसलिम जनसंख्‍या पर नियंत्रण अत्‍यंत आवश्‍यक है। अन्‍यथा भ्रष्‍टाचार को गुप्‍त रूप में शासन-तंत्र से जोड़े रखकर चलनेवाली सरकारें भी भीड़ की अधिकता से ध्‍वस्‍त हो जाया करती हैं। और फि‍र भीड़तंत्र ही चला करता है तथा लोकतंत्र पुस्‍तकों की परिभाषाओं में ही सिमट कर रह जाता है।