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गुरुवार, 11 अप्रैल 2019

राफेल विवाद पर व्यर्थ प्रलाप

राफेल विवाद पर जिस तरह लोकसभा चुनाव के प्रथम चरण के मतदान से ठीक एक दिन पहले शीर्ष अदालत ने यह कहा कि रिव्यू पेटीशन के बिंदु विचारणीय हैं तो इससे यह समझना कठिन नहीं कि कांग्रेस, रिव्यू पैटीशन डालनेवाले वकील और शीर्ष अदालत में बैठे जज किसी तरह (अनावश्यक राफेल विवाद क्रियेट कर) मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा करना चाहते हैं और कांग्रेस के पक्ष में लोकसभा चुनाव की हवा बनाना चाहते हैं। लेकिन लोग अब चेत गए हैं। अब कांग्रेस सत्ता के सपने देखना बंद कर दे। जब लोग तन-मन-धन से ही नहीं आत्मा से भी कांग्रेस के विरोध में हो चुके हैं तब कांग्रेस को इस तरह की कवायद बिलकुल नहीं करनी चाहिए। अगर कांग्रेस अदालतों के माध्यम से ऐसी कवायद करती रही तो मोदी के कारण तो नहीं लेकिन हां कांग्रेस के कारण लोकतंत्र हास्यास्पद बनकर जरूर खत्म हो जाएगा।
सत्रहवें लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान से ठीक एक दिन पहले राफेल विवाद (जो मोदी सरकार के आने के बाद वास्तव में विवाद है ही नहीं) फिर उछाल दिया गया है। क्या यह विडंबना नहीं कि कांग्रेस अपने सेट किए हुए वकीलों, जजों के माध्यम से राफेल के अनावश्यक विवाद को इस लोकसभा चुनाव का अंतिम चरण का मतदान पूर्ण होने तक भुनाने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती। लेकिन कांग्रेस को यह भी जान लेना चाहिए कि उसके लिए यह कड़वा ही नहीं परम सत्य है कि राफेल में यदि केन्द्र सरकार की कोई अनचाही आधिकारिक गलती या चूक न्यायालयी विचार के बाद पकड़ में आती भी है तो इससे जनता के मानस पर कोई फर्क नहीं पड़नेवाला। आखिर कांग्रेस, कांग्रेस जनित वकील और न्यायाधीश यह क्यों नहीं समझते कि उनके माइंड सेट के हिसाब से भारत की विवेकवान जनता चले ही क्यों!
भारतीयों को कांग्रेस का राष्ट्रविरोधी चरित्र जानने और भाजपा की मोदी सरकार की सत्यनिष्ठा समझने के लिए किसी न्यायालयी निर्णय की आवश्यकता नहीं। गजब स्थिति यह है कि जो कांग्रेस अपने कार्यकाल में कई घोटालों-घपलों अवैध लेन-देन में प्रमाणों और तथ्यों के साथ फंसी नजर आई उन पर न्यायालय में यह सिद्ध हो गया कि जांच एजेंसियों ने मामले में ढंग से जांच नहीं की। कांग्रेसी छत्रछाया में हुए एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ के सबसे बड़े टू जी स्पेक्ट्रम घोटाले में कोर्ट ने घोटाले के आरोपियों को यह कहकर छोड़ दिया कि जांच एजेंसी सीबीआई के पास मामले में आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं है। केवल टू जी ही नहीं कांग्रेस जनित हरेक घोटाले में देश की अदालतें कांग्रेसी घोटालेबाज नेताओं के पक्ष में कार्य कर रही हैं। जनता यह सब खूब समझ रही है।
राफेल में रिव्यू पेटीशन डालनेवाले अरुण शौरी, प्रशांत भूषण जैसे लोगों का दिमाग खराब हो गया है। कानूनी नियमावलियों का हवाला देकर झूठे ही राफेल में मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा किया जा रहा है। कांग्रेस, इसके नेता, इनके पक्ष में खड़े होनेवाले वकील और कांग्रेस की मेहरबानी से शीर्ष न्यायालय में विराजमान न्यायाधीश चाहे जितना जोर लगा लें राफेल सौदे के मनगढ़ंत घोटाले पर मोदी सरकार को घेरने का, लेकिन लोगों को पता है कि यह सब कुछ कांग्रेस के एक आदमी को सत्ता तक पहुंचाने के लिए ही किया जा रहा है।
लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। अदालतें उन मामलों पर तो कोई सुनवाई या निर्णय देती नहीं जो देश की जनता को प्रतिदिन परेशान किए हुए हैं। जैसे कि निजी स्कूलों और हास्पिटलों में आम आदमी को लूटने के तंत्र को सुधारने और इसमें आम आदमी के हिसाब से बदलाव के लिए अदालतें सरकारों पर कोई दबाव नहीं बनाती। अदालतें परिवहन, खाद्यान, किसान, बेरोजगारी जैसे विषयों पर अलग-अलग राज्यों को राज्य की सामाजिक-आर्थिक परिस्थिति के अनुसार निर्देश देकर बहुत बड़ी भूमिका का निर्वहन कर सकती हैं। इसी प्रकार समाज और संस्कृति के उत्थान के कार्यों को प्रोत्साहित करने के लिए भी अदालतें सरकारों पर दबाव बना उन्हें निर्देशित कर सकती हैं। लेकिन इस दिशा में सोचने के लिए अदालतें तैयार नहीं। कोई भी मामला हो चाहे राम मंदिर, तीन तलाक, जम्मू कश्मीर, अफस्पा, नक्सल या माओवाद, देश विरोध, पाकिस्तान आदि मामलों पर अदालतों के फैसले गोपनीय तरीके से कांग्रेस को सत्तासीन करने के मकसद से होते रहे हैं।
यह कितनी दुखद और क्रुद्ध करने की बात है कि सुप्रीम कोर्ट राफेल विवाद के बारे में मोदी विरोधियों की पेटीशन को आम चुनाव के बीच में सुनवाई के लिए ले रहा है। कांग्रेस नहीं हुई पता नहीं क्या हो गई और गांधी नहीं हो गए पता नहीं क्या हो गए जो इनका होना भारतीय सत्ता तंत्र में जरूरी है, जो इन्हें सत्ता में लाने के लिए राफेल के अनावश्यक विवाद को पहले तो कांग्रेसी अध्यक्ष ने हवा देने में कोई कसर नहीं उठाए रखी और अब कांग्रेस के अनुसार चलनेवाले वकील और न्यायाधीश इस संबंध में लोगों को बरगलाने की कोशिश में हैं। लेकिन ये सभी जान लें कि अब देशवासी इस संबंध में ही नहीं कांग्रेस की बलात सत्ता में स्थापना के लिए किए जानेवाले अन्य गुप्त षड्यंत्रों में नहीं फंसनेवाले। बहुत हो गया। सुप्रीम कोर्ट नहीं हो गया जैसे आसमान से टपका कोई न्यायिक यंत्र हो गया जो इसके कहे अनुसार ही सब होगा। जब तक यह तथाकथित सुप्रीम कोर्ट भारतीय गरीब, पीड़ित और देशभक्त लोगों के पक्ष में न्याय की कार्रवाइयां नहीं करता, तब तक होता रहे यह लोकतंत्र के चार स्तंभों में से एक महत्वपूर्ण स्तंभ, इसकी परवाह किसी को नहीं।
कोर्ट-कचहरियां विवादों को सुधारने, लोगों देश के भले के लिए स्थापित हुई थीं या कुतर्की वकीलों और कांग्रेसी चमचों के कहे अनुसार कांग्रेस की भलाई के लिए, यह बात अभी तक लोग समझ नहीं पाए। कोई एक मुद्दा बता दीजिए देश की भलाई का जिसमें तथाकथित सुप्रीम कोर्ट की एकाधिक जजों से युक्त पीठ ने एकमत से देश के पक्ष में फैसला दिया हो। यदि कोई जज अधिसंख्य देशभक्त जनता और ईमानदार मोदी सरकार के पक्ष में खुलकर सामने आया तो कांग्रेसी कृपाप्राप्त जज प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर जनता से ही न्याय की गुहार करने लगे। ये कुंठित दिमाग रखनेवाले जज इन्हें क्या पता कि आम आदमी कैसे-कैसे दिन गुजारता रहा है इस देश में!
इन जजों का न्याय अंग्रेजी भाषा में कानून की धाराएं लिखने-पढ़ने तक ही सीमित हो चुका है। अनावश्यक नियम-अधिनियम की धाराएं उपधाराएं बना कर कानून का अच्छा बिजनेस चल रहा है। कानून की मोटी-मोटी व्यर्थ किताबों को छापने और बेचने का धंधा चल रहा है। आम आदमी इन चीजों से पक चुका है। यदि जनता कांग्रेस पार्टी से ऊब चुकी है तो उसे जबरन न्यायालयी हस्तक्षेप से कांग्रेस के पक्ष में खड़ा करने का दुस्साहस क्यों किया जा रहा है! क्या इसके लिए स्वयं शीर्ष न्यायालय और वे वकील जो कांग्रेस की जड़ों को हरा करने के लिए राफेल जैसे विवाद को अनावश्यक रूप में बढ़ा रहे हैं, लोकतंत्र में न्याय के प्राकृतिक सिद्धांत की धज्जियां नहीं उड़ा रहे? इसके लिए उन्हें कठघरे में कौन खड़ा करेगा?