Friday, September 16, 2016

उस दिवस का गर्वबोध

कुछ माह पहले किसी काम से दिल्‍ली स्थित कनॉट प्‍लेस में था। दोस्‍तों ने भी वहां आना था। मैं जल्‍दी पहुंच गया तो प्रतीक्षा में समय व्‍यर्थ करने के बजाए इधर-उधर घूमने चल पड़ा। जेठ की गर्मी में दिल्‍ली झुलस रही थी। पसीने की चिपचिपाहट से सड़क पर पैदल आता-जाता व्‍यक्ति दिल के भीतर तक परेशान था। घूमते-घूमते जब थकानगर्मी और पसीने से लथपथ हो गया तो सिंधिया हाउस बस स्‍टैंड पर बैठ गया। लोग दोपहर भोजनावकाश के समय दफ्तरों से बाहर निकलकर खा-पी और घूम रहे थे। वे वातानुकूलित कक्षों में चार-पांच घंटे गुजार कर आए थे इसलिए उन्‍हें वातावरण की ज्‍यादा गरमाहट में बेचैन हुआ नहीं देखा।
उस समय सिंधिया हाउस बस स्‍टैंड के पास दो तरह के लोग विचरण कर रहे थे। एक वे थेजो मशीनी और मानवीय भागमभाग में सनी दिल्‍ली की गर्मी से मुक्ति के लिए आकाशपेड़-पौधों और हवा की ओर टकटकी लगाए हुए थे कि वर्षा हो और उनके जीवन में शीतल पवन रस बरसे। लोग गरमाहट से छूटने के लिए प्रकृति से वर्षा के वरदान की आस लगाए बैठे थे। इसके अलावा उन गरीबसंघर्षशील लोगों के पास कोई उपाय भी न था। दूसरे वे थेजो वातानुकूलित सुविधाओं से तृप्‍त थे। मोटे होने के डर और अपने महंगे चिकित्‍सक की सलाह पर थोड़ी देर के लिए खाए-पिए को पचाने निकले थे।
मेरी दृष्टि अचानक सरकारी विज्ञापनों पर लिखी नीतियों तथा नियमों पर पड़ी। सोचा, बस स्‍टैंड के पास लगे सुंदर-सजीले विज्ञापनों में केंद्र और दिल्‍ली सरकार के जनकल्‍याणकारी कार्यों की सूचनाएं गरीबों को सुखद अनुभव तो करा रही होंगी, लेकिन वास्‍तव में उनकी जिंदगी तो सरकारी-सामाजिक विसंगतियों तले ही दबी हुई है। देर तक बस स्‍टैंड पर बैठा रहा। आने-जाने वाली बसों से लोग उतरते, उनमें चढ़ते। राहगीरों की कदम चालों से ही उनके व्‍यक्तित्‍व और उस आधार पर देशकाल का आकलन करने में डूबा हुआ मैं भूल ही गया कि दिल्‍ली में साथियों के साथ किसी काम के सिलसिले में आया हुआ हूँ। तभी कमजोर पैरों से लचकता हुआ एक व्‍यक्ति मेरे पास आकर रुका। मैं फौरन खड़ा हुआ और उसे अपनी जगह पर बिठाकर इधर-उधर टहलने लगा।                
मैंने उस दिन एक बात पर गहराई से विचार किया, जिसने मेरे भीतर खलबली मचा दी। मैं सोच रहा था, ‘‘क्‍या मेरी जिंदगी ऐसे ही अपने लिए व्‍यस्‍त रहने, भागने-दौड़ने में ही बीत जाएगीभारतीय संस्‍कृति के परम धर्म नि:स्‍वार्थ सेवाकर्म का क्‍या कभी मैं अपने जीवन में अनुसरण कर सकूंगा?’’
इन्‍हीं आत्‍मविश्‍लेषणों में डूबा था कि एक नयनहीन व्‍यक्ति पर दृष्टि पड़ी और स्थिर हो गई। वह अपने प्रतिदिन के कटु जीवन अनुभवों के आधार पर अपनी छड़ी बस की सीढ़ियों पर टिकाता हुआ नीचे उतरा। दो-एक पल रुका और अपने गंतव्‍य तक जाने का पता पूछने की जिज्ञासावश अपने पास से गुजरते कुछ लोगों की ओर सहायता पाने की भाव-भंगिमा बनाते हुए जल्‍दी-जल्‍दी मुड़ा। आधुनिक भ्रांति में डूबे समूचे विश्‍व का असर भला भारतीय राजधानी और इसके भागते-दौड़ते लोगों पर कैसे न होता! वे सभी अपनी-अपनी अति व्‍यस्‍त, मस्‍त और त्रस्‍त भावनाओं के साथ अपने कदमों को आगे बढ़ा रहे थे। उन्‍हें उस दृष्टिहीन से कोई सरोकार न था। इसमें उनकी गलती नहीं थी! क्‍योंकि जब उन्‍हें अपना ही होश न था तो भला नयनहीन व्‍यक्ति की समस्‍या से क्‍या मतलब होता!
मैंने अपनी घिसी-पिटी दिनचर्या के सहारे खड़े अपने स्‍वार्थआलस्‍य को तिलां‍जलि दी और झट से उस व्‍‍यक्ति के निकट पहुंच गया। वह तब तक अपने पास आकर खड़े हुए एक दूसरे व्‍‍यक्ति से अपने गंतव्‍य-स्‍थल का पता पूछने लगा था। उस व्‍यक्ति ने मेरे वहां खड़े होते-होते तक नयनहीन को उसके गंतव्‍य का पता बता दिया। लेकिन गंतव्‍य-स्‍थल सड़क के उस तरफ था। वास्‍तव में दृष्टिबाधित व्‍यक्ति को सिंधिया हाउस स्थित डीटीसी कार्यालय में बस-पासबनाने जाना था। अब समस्‍या यह थी कि वह ऊंचे लौह डिवाइडर वाली और वाहनों की रेलमपेल से भरी सड़क पर पैदल चलते हुए कैसे उस पार जाए।
मैंने उससे पूछा, ‘‘अगर आपको बुरा या डर न लगे तो मैं आपको सिंधिया हाउस तक छोड़ आऊं?’’ वह सोचता-सकुचाता हुआ हामी तो भर गया, लेकिन मुझे लगा वह मुझसे असुरक्षा भी महसूस कर रहा था। सामाजिक माहौल में व्‍याप्‍त विश्‍वासघात, चोरी-चकारी और दूसरी मानवजनित बुराइयों के कारण उसका संकोच करना व डरना स्‍वाभाविक भी था। किंतु मैंने पसीने से भीगी उसकी बांह जिस आत्‍मीयता और अपनत्‍व की वेदना से पकड़ी तथा उसे चलने को कहा, शायद उससे उसका विश्‍वास मुझ पर बन गया। उसकी बांह थामकर सड़क के इस तरफ से भीड़भरे पैदल पथ पर चलते हुए मैं उसे भूमिगत मार्ग से निकालकर सड़क के उस पार ले गया।
धीरे-धीरे वह मुझसे मेरे बारे में पूछने लगा। उसके सभी प्रश्‍नों का उत्‍तर मैं धैर्यपूर्वक देता रहा। लेकिन अविश्‍वास भरे सामाजिक माहौल में मुझे उस से कुछ पूछना अमर्यादित लगा। इसलिए मैंने उस से कुछ नहीं पूछा। सोचाकहीं वह मेरे पूछने को गलत न समझे या उसे कोई असुरक्षा भाव न घेर ले। नयनहीन को सिं‍धिया हाउस डीटीसी डिपो में सकुशल पहुंचाकरवहां कार्यरत कर्मचारी से उसकी मदद करने को कहकर मैंने उसे प्रणाम कहा और वापस लौट आया।
यह सब करते हुए भी मेरे भीतर डर बैठा हुआ था। सोच रहा था कि कहीं लोग यह न समझें कि मैं दृष्टिहीन व्‍यक्ति की सहायता किसी स्‍वार्थवश कर रहा हूँ। लेकिन बाद में साथियों के साथ चाय पीते हुए मुझे बहुत अच्‍छा लगा। मेरा वह दिवस गर्वबोध से संचित हो उठा। उस रात भी देर तक मन में रह-रह कर यही बात उठती रही कि किसी प्राणी की नि:स्‍वार्थ सेवा से बड़ा पुण्‍य कुछ भी नहीं।  

विकेश कुमार बडोला

Saturday, September 3, 2016

विकास के विरोधाभासी सिद्धांत

मूल रूप से यह आलेख 4 सितंबर 2016 को दैनिक जागरण
के राष्‍ट्रीय संस्‍करण में प्रकाशित हो चुका है
गुलाम कश्‍मीर के संदर्भ में भारतीय नीति निर्धारकों का य‍ह निर्णय विरोधाभासी ही कहा जाएगा कि उसने पाकिस्‍तान अधिकृत कश्‍मीर से विस्‍‍थापित 36,348 परिवारों का चयन कर उन्‍हें प्रति परिवार 5.5 लाख रुपए की अनुदान राशि देने पर विचार आरंभ कर दिया है। सरकार इस विशेष राहत अनुदान की घोषणा प्रवासी भारतीय दिवस के अवसर पर करेगी। यह अच्‍छी बात है कि कोई राष्‍ट्र अपने यहां दूसरे देश से आए शरणार्थियों को सुख-सुविधाएं प्रदान करेलेकिन ऐसे में कुछ प्रश्‍न स्‍वाभाविक रूप से उठते हैं कि क्‍या ऐसा कोई भी राष्‍ट्र जो प्रवासियों को अनुदान देने की बात कर रहा हैपहले उसे अपने मूल नागरिकों का जीवन-स्‍तर ऊंचा नहीं उठाना चाहिए? क्‍या उसे सर्वप्रथम अपने राष्‍ट्र के लोगों की निर्धनता,असहायता और आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक सुरक्षा के बारे में विचार नहीं करना चाहिए?
एक ओर दाना मांझी जैसे भारतीय नागरिक हैंजिन्‍हें अपनी मृत पत्‍नी का शव घर ले जाने के लिए सरकारी वाहन उपलब्‍ध नहीं हुआ तथा अंततवह अपनी पत्‍नी का शव अपने कंधे पर लादकर ले जाने को विवश हुआ और दूसरी ओर गुलाम कश्‍मीर से आए हजारों लोगों के लिए हजार करोड़ अनुदान देने की योजना। क्‍या इन दो बातों से हमें अपने राष्‍ट्रीय नेताओं की देश-समाज-नागरिकों के प्रति एक ऐसी विरोधाभासी दृष्टि परि‍लक्षित नहीं होतीजिसमें हम गहराई तक यह सोचने को विवश होते हैं कि अभी भारत के वैकासिक मानदंडों में दूरदर्शितापरिपक्‍वता और न्‍यायिक चेतना की बहुत अधिक कमी है।
वैज्ञानिक तथा आर्थिक सिद्धांतोंधारणाओं के आधार पर विकास के स्‍वप्‍न देखनेवाले विकसित देशों ने अपने यहां विकास की पहली शर्त के रूप में जनसंख्‍या नियंत्रण का उपाय अपनाया। कालांतर में अत्‍यधिक विकसित होने या सर्वाधिक विकसित राष्‍ट्र बन जाने की महत्‍त्‍वाकांक्षाओं के कारण भले ही उन्‍हें अपने वैज्ञानिक और भौतिक उत्‍पादन के उपभोग के लिए विशाल जनसंख्‍या वाले देशों की ओर ताकना पड़ापरंतु उन्‍होंने इन महत्‍त्‍वाकांक्षाओं के दुष्‍परिणामों पर विचार नहीं  कियाजिसकी परिणति आज कई स्‍तरों पर आतंक-अव्‍यवस्‍था से घिरे विश्‍व के रूप में सामने है। कहने का आशय यह है कि सबसे पहले भारत को अपने देश के नागरिकों का जीवन-स्‍तर ऊंचा उठाना चाहिए। इसके बाद ही शरणार्थियों को बड़ी आर्थिक देनी चाहिए। 
दाना मांझी तो एक उदाहरण है। इस देश में उस जैसे न जाने कितने स्‍वाभिमानी लोग हैं, जो कठोर परिश्रम के बावजूद अपना इतना आर्थिक मूल्‍यांकन होने का अधिकार भी नहीं रखते कि उनकी रोटी-कपड़ा-मकान की आधारभूत आवश्‍यकताएं पूरी हो सकें।
इसमें संदेह नहीं कि मोदी सरकार अपनी पूर्ववर्त्‍ती सरकारों के वनिस्‍पत बहुत अच्‍छा काम कर रही है। अपने समस्‍त कार्यों के लिए वर्तमान सरकार सज्‍जनता और पारदर्शिता का आधार बनाए हुए हैजिसने जनमानस के हृदय पर छाप छोड़ी हैपरंतु वह पाकिस्‍तान और कश्‍मीर के संबंध में अंतर्राष्‍ट्रीय कूटनीतिक गोलबंदी को इतना आत्‍मघाती भी न बनाए कि यह सब कुछ हमारे अपने देश के लिए ही कई स्‍तरों पर हानिकारक सिद्ध हो।
आज तक सभी विकसित देशों ने विकास के लिए अपने देश की जनसंख्‍या को नियंत्रित रखकर ही विकासशास्‍त्र को फलीभूत किया है। इसलिए मोदी सरकार भी विकास के इस पहलू पर अवश्‍य विचार करे। कहीं ऐसा न हो कि डेमोग्राफी पर आधारित उनके वैकासिक सिद्धांत इतने उलझ जाएं कि देश में जनसमस्‍याएं एक नया आकार ले लें। वैसे भी वे अपने समस्‍त सिद्धांतों को तब ही लागू कर पाएंगे जब उन्‍हें भविष्‍य में लोकतंत्र का बहुमत मिल पाएगा। क्‍योंकि गुलाम कश्‍मीर के लोगों को अनुदान की भारी राशि वितरण जैसी उनकी कार्य योजनाएं बड़े स्‍तर पर उनके लोकतांत्रिक आधार को दरकाने का काम भी कर सकती है।
  विकेश कुमार बडोला