मंगलवार, 31 दिसंबर 2024
मंगलवार, 24 दिसंबर 2024
शनिवार, 21 दिसंबर 2024
सोमवार, 9 दिसंबर 2024
शनिवार, 7 दिसंबर 2024
मंगलवार, 3 दिसंबर 2024
रविवार, 1 दिसंबर 2024
शुक्रवार, 29 नवंबर 2024
सोमवार, 25 नवंबर 2024
गुरुवार, 21 नवंबर 2024
शनिवार, 9 नवंबर 2024
गुरुवार, 7 नवंबर 2024
बुधवार, 6 नवंबर 2024
मंगलवार, 5 नवंबर 2024
सोमवार, 4 नवंबर 2024
शनिवार, 2 नवंबर 2024
शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2024
गुरुवार, 24 अक्टूबर 2024
बुधवार, 23 अक्टूबर 2024
सोमवार, 21 अक्टूबर 2024
शनिवार, 28 सितंबर 2024
फेसबुक पहले और अब
फेसबुक इस देश में 26 सितंबर 2006 में आरंभ हुआ था। इससे पहले आर्कुट पर व्यस्त थी युवा पीढ़ी। शुक्र था कि आर्कुट पर बच्चे, बूढ़े और कामकाजी लोग व्यस्त नहीं थे। यह लेखक उन पहले सौ ग्राहकों में अवश्य रहा होगा, जो फेसबुक के यूजर के रूप में प्रकट हुए। तब इस लेखक के द्वारा अनेक लेख, विचार, इत्यादि फेसबुक की वॉल पर पोस्ट किये जाते थे। कई बार फेसबुक वालों को ईमेल भेजी कि जिसके अधिक फॉलोवर हैं और जो अधिक विचार फेसबुक वॉल पर पोस्ट कर रहा है, उसके लिए कोई मौद्रिक प्रोत्साहन योजना चलाई जाय यानी कि ऐसे व्यक्ति को फेसबुक की तरफ से कुछ धन मिले। पर ना जी।
©विकुब
फेसबुक वालों ने लेखक के इस सुझाव पर ध्यान ही नहीं दिया। तब फेसबुक एप्लिकेशन के एक-एक टैब और सब-सेक्शन को देख व समझ कर याद रखना आसान था। तब फेसबुक यूजर को पता था कि कौन-सा सेक्शन क्या जानकारी या सूचना लिये हुये है। इसलिये यह लेखक और इस जैसे दूसरे यूजर फेसबुक की तरफ से धन न मिलने पर भी इस प्लेटफॉर्म पर जुड़े रहे और इस पर प्रतिदिन एकाध घंटा गुजार ही रहे थे।
©विकुब
लेकिन 2006 के बाद 2012 या 2013 में यह फेसबुक वॉल यूजलेस लगने लगी। इसी लेखक को नहीं, अनेक यूजर्स को ये यूजलेस लगने लगी। इसे हिकारत भरी नजर से देखा जाने लगा। जो कोई फेसबुक की चर्चा करता तो उसे अपमानजन्य लताड़-झाड़ पड़ती। ऐसे माहौल में इस लेखक ने तो खुद को इस वॉल से परमानेंटली डिएक्टिवेट कर दिया था। तब परमानेंटली डिएक्टिवेट होने का टैब या कहें सेक्शन भी सरल, सुलभ व आसानी से सभी यूजर्स की पहुँच में था। इसलिये समझदार यूजर्स इस फेसबुक मंच से धड़ाधड़ तेजी से परमानेंटली डिएक्टिव होने लगे।
©विकुब
लेकिन कोरोना महामारी के वक्त फेसबुक ही नहीं, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, स्टारमेकर, इत्यादि सॉफ्टवेयर एप्लिकेशन्स के आईटी इंजीनियर्स ने अपनी-अपनी एप्लिकेशन्स को अनेक सुविधाओं, वीडियोज प्रसारित करने की सुगमताओं और दूसरी फैसिलिटीज से फुलफिल कर दिया। इसका परिणाम यह रहा कि लोग वीडियोज बना-बना कर इन प्लेटफार्म्स पर प्रसारित करने लगे। आज की डेट में ये वीडियोज रील्स कहलाने लगे हैं। अब फेसबुक ही नहीं, हर इंटरनेट चालित वीडियो प्लेटफार्म पर वीडियोज यानी रील्स की बाढ़ आ गई है। जिसके पास मास्टर फोन है, जिसके पास इंटरनेट कनेक्शन है, जिसके पास दुनिया के मेलों में घूमने-फिरने की अनंत कामना पसरी हुई है, वो वीडियोज व रील्स में घुसा हुआ है। और फेसबुक, इंस्टाग्राम व यूट्यूब अधिक फॉलोवर्स, व्यूज, लाइक्स, कमेंट्स, शेयर्स प्राप्त करनेवाले यूजर्स को कुछ धन भी दे रहे हैं।
©विकुब
इसलिये इस मोड़ से अर्थव्यवस्था ने अपने को हाँकने के लिये इंटरनेट चालित सोशल मीडिया के प्लेटफार्म्स के साथ गंभीरता से जोड़ दिया है। और इसीलिये अब फॉलोवर्स, व्यूज, लाइक्स, कमेंट्स व शेयर्स आसानी से नहीं मिलते। ये सभी अब पैसे, रुपये, धन, मुद्रा, मनी और स्टेटस के पर्याय बन चुके हैं। इसी कारण अब किसी भी यूजर को किसी भी प्लेटफॉर्म पर फॉलोवर, व्यू, लाइक, कमेंट या शेयर यूँ ही बिना स्वार्थ के नहीं मिलते जी। अब ये सभी कुछ चंदा, दान, भेंट, शगुन, सेलेरी, लाभ, मुनाफा, इनकम, बेनिफिट और उधार की कैटेगरी में आ चुके हैं। मतलब कि फॉलोवर, व्यू, लाइक, कमेंट या शेयर यूँ ही नहीं मिलेंगे। चंदा, दान, भेंट, शगुन, सेलेरी, लाभ, मुनाफा, इनकम, बेनिफिट और उधार के बदले में जो आशा की जाती है, जो अपेक्षा की जाती है, जो फेवर चाहिये होता है वही सब कुछ अब फॉलोवर, व्यू, लाइक, कमेंट या शेयर के बदले में भी चाहिये ज्यादातर यूजर्स को।
©विकुब
लोग होशियार हैं। नेगेटिव रूप में तो ज्यादा होशियार हैं। वे इस जिद पर अड़े हुये हैं कि वे फलाणे की शक्ल पंसद नहीं करते, तो किसी भी सोशल मीडिया पेज पर उसकी फोटो सरकते हुये देखकर उसे क्यों भाव दें। उसे क्यों फॉलो करें। उसकी पोस्ट या पोस्ट्स पर क्यों अपनी फॉलोवरशिप, व्यूज, लाइक्स, कमेंट्स या शेयर्स बर्बाद करें। लोग सोचते हैं कि जब उन्हें बदले में फॉलोवरशिप, व्यूज, लाइक्स, कमेंट्स या शेयर्स मिलेंगे या इन वर्चुअल एक्टिविटीज के अलावा जब उन्हें बदले में रियल लाइफ में कुछ फायदा होगा, तब ही वे फायदा करानेवाले को फॉलो करके उसकी पोस्ट्स को व्यूज, लाइक्स, कमेंट्स या शेयर्स प्रदान करेंगे।
©विकुब
अर्थात् जो फॉलोवरशिप, व्यूज, लाइक्स, कमेंट्स या शेयर्स शुरू-शुरू में कूड़ा करकट समझकर, बिना सोचे-समझे या यूँ ही दे दिये जाते थे अब वे चंदा, दान, भेंट, शगुन, सेलेरी, लाभ, मुनाफा, इनकम, बेनिफिट और उधार की कैटेगरी में आ चुके हैं। अब ये आसानी से नहीं मिलेंगे। फ्री में ये उसी को मिलेंगे जिनके बीच आपस में खूब पटती है, जो एक-दूसरे की शक्लें पसंद करते हैं, जो वर्चुअल के अलावा रियल लाइफ में एक-दूसरे के किसी न किसी काम आते हैं.........
©विकुब
और हाँ प्रतिभा, टैलेंट, कुशाग्रता, अद्वितीयता, नवीनता, अभिनवता, कल्याणकारिता, मानवता, मनुष्यता, बुद्धिमत्ता और विलक्षणता के लिये सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर लोगबाग किसी को बगैर स्वार्थ, निःशुल्क रूप में आगे बढ़ाते भी हैं या यूँ कहें उसे फॉलो, व्यू, लाइक, कमेंट या शेयर करते भी हैं तो जान लीजिये सच.... कड़वा है पर सच है..... कि अपने लोग ऐसा नहीं करते......एक व्यक्ति जिनके लिये अनजान रहता है वे अनजान ही ऐसा करते हैं...... एक-दूसरे को बचपन से जानने वाले अधिकतर लोग तो अमेरिका से लेकर उत्तर कोरिया और आस्ट्रलिया से लेकर मंगोलिया तक (यह देश तो इस किचकिच में शामिल है ही) यूँ ही फ्री में मुफ्त में अपनेपन से फॉलो, व्यू, लाइक, कमेंट या शेयर करते ही कहाँ हैं जी!!!!!
©विकुब
निष्कर्ष यानी कन्क्लूजन : वैसे गलती किसी की नहीं है, चौबीसों घंटे फोन पर सरकते सोशल मीडिया पर कोई कितना, किस-किस को और कब तक फॉलो, व्यू, लाइक, कमेंट या शेयर करता रहेगा। जिंदगी आधुनिकता, प्रगति, शहरीकरण, डिजिटलीकरण, विधर्मीकरण और दूसरे कारणों से पहले से ही उधड़ी हुई है ज्यादातर लोगों की। वे क्या-क्या जी करेंगें? इसलिये जैसा चल रहा है, चलने देते हैं। बस प्रार्थना ये करते हैं कि सोशल मीडिया रोजगार का परमानेंट अड्डा न बन पाये, प्रार्थना करते हैं कि सरकारें रोजगार के लिये कोई व्यावहारिक मॉडल स्थापित करे, सोशल मीडिया जैसा वर्चुअल मॉडल कुछ हद तक रोजगार का मॉडल प्रतीत हो सकता है, पर अधिक समय तक यह कारगर नहीं है। यदि सरकारें ऐसा नहीं करेंगी, तो मनुष्य व मनुष्यता को चबाने को आतुर सोशल मीडिया के विनाश की प्रार्थना कैसे कर पायेंगे प्राकृतिक जीवन चाहनेवाले!
@विकुब
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फेसबुक पहले और अब
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सोमवार, 23 सितंबर 2024
रविवार, 8 सितंबर 2024
जनसत्ता में "मीडिया चक्रव्यूह" की समीक्षा
जनसत्ता
दैनिक हिंदी समाचारपत्र में
पुस्तक- मीडिया चक्रव्यूह - की समीक्षा
रविवार दिनाँक 8 सितंबर 2024 को
प्रकाशित हुयी है।
बुधवार, 7 अगस्त 2024
मीडिया चक्रव्यूह (उपन्यास) मीडिया पर पहला हिन्दी उपन्यास
ऐसा पहला उपन्यास जो :--
· मीडिया की आंतरिक समस्याओं को गहनतापूर्वक प्रस्तुत करता है
· सामान्य मीडियाकर्मियों के संघर्ष, पीड़ा, शोषण और विवशताओं को रेखांकित करता है
· अपूर्व कथा के माध्यम से मीडिया की विसंगतियाँ उजागर करता है
· अवैध कारोबार का सुरक्षा-मुखौटा बने मीडिया के दुरुपयोग के अज्ञात बिंदुओं पर प्रकाश डालता है
· देश की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक और यहाँ तक कि धार्मिक-आध्यात्मिक समस्याओं की परत-प्रति-परत खोलता है
· अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्रों के आंतरिक उपक्रमों की पड़ताल करता है
· भारतीय शासन-प्रशासन की अकर्मण्यता, विकलांगता और जीवनघाती विसंगतियाँ प्रकट करता है
· इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से प्रचलित पारंपरिक मीडिया को भी अलोकप्रिय बनाया है, इसका औपन्यासिक विवरण देता है
शुक्रवार, 5 जुलाई 2024
लोकतंत्र... नहीं-नहीं.... लोपतंत्र... हाँ...हाँ... लीपापोत तंत्र... की कुछ झलकियाँ....
लोकतंत्र... नहीं-नहीं.... लोपतंत्र... हाँ...हाँ... लीपापोत तंत्र... की कुछ झलकियाँ....
एक ओर विराष्ट्र मंत्री श्रीमान जयशंकर कहते हैं कि, "आतंकवाद को पनाह देनेवाले देशों को अलग-थलग करें।"
सौजन्य: जनसत्ता समाचारपत्र के पृष्ठ 20 पर शुक्रवार 5 जुलाई 2024 को प्रकाशित।
तो दूसरी ओर आतंक का येन-केन-प्रकारेण पोषण-रक्षण कर चुकने के उपराँत दंडभोक्ता व कारागार में काराकृत दो संदिग्ध, नवनिर्वाचित लोकसभा सदस्यों के रूप में, शपथ लेने को तैयार-
सौजन्य: जनसत्ता समाचारपत्र के पृष्ठ 8 पर शुक्रवार 5 जुलाई 2024 को प्रकाशित।
ये कैसा लीपापोत तंत्र है? ये कैसा विरोधाभास है? जागरूक तथा विद्वान व्यक्ति के गले नहीं उतरता यह तंत्र।
गुरुवार, 9 मई 2024
जिंदगी में जज्बे की झांकी का दर्शन है मीडिया चक्रव्यूह
जिंदगी में जज्बे की झांकी का दर्शन है मीडिया चक्रव्यूह
आंदोलन जैसा विषय आज की दुनिया में सामान्य जन के लिए चिंतन का मुद्दा भले ही न प्रतीत हो पर जब कोई संवेदनशील व्यक्ति इसकी गहराइयों में झांककर इसके पीछे छुपे कारणों, इससे जुड़े लोगों के अंतरद्वंद्वों, संघर्षों और उनके मर्मांतक दुःख-तकलीफों से परिचित कराने की कोशिश में सफल होता है तो महसूस होता है कि ये सामान्य कहानी नहीं बल्कि व्यवस्था की नग्न सच्चाइयां हैं... और कोई है ऐसा, जो इनको उजागर करने का माद्दा रखता है। अपने एक संपादक मित्र के जरिये यह जानकर कि उनके एक लेखक-अनुवादक दोस्त ने इस विषय पर उपन्यास लिखा है, तो लेखक की इस रचना के प्रति मेरी जिज्ञासा जागी।
उपन्यास के लेखक खुद एक पत्रकार और अनुवादक होने के साथ ही विभिन्न सामाजिक विषयों की पृथक समझ भी रखते हैं। खुद एक मीडिया संस्थान में कई साल सेवा देने के बाद अब स्वतंत्र लेखन और अनुवाद कार्य के साथ ही अपने गांव-समाज की सेवा में रत् हैं। एक प्रमुख हिंदी दैनिक में बतौर संपादक मैंने भी मीडिया हाउस की तमाम तिकड़में देखीं हैं, उनकी विवशता देखी है तो भ्रष्ट अफसरशाही के दांव-पेच भी देखने का अवसर मिला है, लेकिन सौभाग्य से वैसी परिस्थितियों से दो-चार नहीं होना पड़ा जैसे इस उपन्यास के नायक और दूसरे पात्रों को होना पड़ा।
उपन्यास की शुरुआत मीडिया हाउस के कर्मचारियों के आंदोलन से होती है। कर्मचारियों को चार महीने से वेतन नहीं मिला है। आंदोलन के बीच उनका मुंह बंद करने के लिए एक-दो महीने का वेतन देने की बात उड़ाई जाती है लेकिन अभावों में जी रहे और फिर भी काम कर रहे कर्मचारी इससे संतुष्ट नहीं होते। कर्मचारियों के नेतृत्वकर्ता छगन चौहान को कंपनी का सीईओ सुरेश, मालिक के गुस्से का डर दिखाकर चुप करा देता है। कर्मचारियों का आक्रोश शांत नहीं होता बल्कि वे और भड़क जाते हैं। इसके बाद जयानंद गुप्ता, सुषमा खन्ना समेत नौ-दस लोग आंदोलन की कमान हाथ में ले लेते हैं और कहानी के नायक चंद्रप्रकाश को भी अनिच्छा से ही सही, इस टोली में शामिल होना पड़ता है। चूंकि चंद्रप्रकाश सतत् चिंतनशील और संवेदनशील है, इसलिये वह आंदोलन की निरर्थकता और इसके दुष्प्रभावों के बारे में नेताओं की टोली को आगाह करता रहता है लेकिन कोई सुनता नहीं। आंदोलन की आड़ में अफसरों के बीच अपने हित साधने के षड्यंत्र भी चल रहे होते हैं। साथियों को शुरुआत में पता नहीं चलता कि जयानंद, सीईओ सुरेश को पद से हटाकर खुद सीईओ बनने की साजिश में लगे मुकेश गुप्ता के इशारे पर आंदोलन का रुख मोड़ रहा है। कंपनी का मालिक सुरास गैर वित्तीय संस्थाओं के जरिये किये गये घालमेल के जुर्म में जेल में बंद है। वह कर्मचारी नेताओं को मुलाकात के लिये जेल में बुलाता है लेकिन वेतन देने में असमर्थता जताने के साथ ही वह एक तरह से कर्मचारी नेताओं को धमकाता भी है। जेल में भी सुरास के राजसी ठाठ देखकर कर्मचारी दंग रह जाते हैं। एक तरफ जेल में भी मालिक के ये ठाठ और दूसरी तरफ कर्मचारियों के घरों में रोटी के लाले, इस सच्चाई को पचा पाना कर्मचारियों के लिये आसान नहीं। मालिक के रवैये से भड़के कर्मचारी आंदोलन तेज करते हैं। मुकेश गुप्ता जो चाहता था वही हुआ, आंदोलन को शांत न कर सकने के कारण सुरास, सुरेश को सीईओ पद से हटा मुकेश गुप्ता को सीईओ बना देता है। मुकेश गुप्ता पहले 2 नेतृत्वकर्ता कर्मचारियों को बर्खास्त करता है और फिर कहानी के नायक चंद्रप्रकाश समेत 21 कर्मचारियों को। इसी के साथ आंदोलन ठंडा पड़ जाता है। योग्य कर्मचारी एक-एक कर संस्थान छोड़ जाते हैं।
कथानक तो बस इतना भर है लेकिन लेखक ने इसके बीच में अ-बैंकिंग वित्तीय संस्थानों द्वारा भ्रष्ट तरीकों से अकूत संपत्ति बनाने, सरकारी विभागों-संस्थानों में व्याप्त भ्रष्टाचार, अंतर्राष्ट्रीय जगत में आर्थिक और राजनीतिक दबदबे के उद्देश्य से हथियारों की होड़ जैसे गंभीर मुद्दों पर भी रोशनी डाली है, तो कहीं-कहीं प्रकृति के चित्रण से विषयांतर भी किया है। उपन्यास के पात्र विपिन और वैभवलक्ष्मी की प्रेम-लीलाओं के उद्धरण तमाम दुश्चिंताओं के बीच जिंदादिली का एहसास करा जाते हैं। उपन्यास के कई प्रसंग अपने तंत्र की विसंगतियों और उनके बीच पिसते सीधे-सादे लोगों के अपने प्रसंग हैं।
इस उपन्यास की कथावस्तु साधारण इंसान को सामान्य सी लग सकती है लेकिन जड़ता से मुक्त चेतनशील व्यक्ति के लिये यह वह चश्मा है, जिससे वह भ्रष्ट तंत्र की कारगुजारियों, आम जन की पीड़ा, उसकी विवशता, जीवन के लिये उसकी जद्दोजहद, हार और फिर से जीवन शुरू करने के उनके जज्बे की झांकी का दर्शन कर सकता है।
-प्रकाश
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ऐसा पहला उपन्यास जो :--
· मीडिया की आंतरिक समस्याओं को गहनतापूर्वक प्रस्तुत करता है
·
सामान्य मीडियाकर्मियों के संघर्ष, पीड़ा, शोषण और विवशताओं को रेखांकित करता है
·
अपूर्व कथा के
माध्यम
से
मीडिया
की
विसंगतियाँ
उजागर
करता
है
·
अवैध कारोबार का
सुरक्षा-मुखौटा बने मीडिया के दुरुपयोग के अज्ञात बिंदुओं पर प्रकाश डालता है
·
देश की
राजनीतिक,
सामाजिक,
आर्थिक,
वैज्ञानिक
और
यहाँ
तक
कि
धार्मिक-आध्यात्मिक समस्याओं की परत-प्रति-परत खोलता है
·
अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्रों के आंतरिक उपक्रमों की पड़ताल करता है
·
भारतीय शासन-प्रशासन की
अकर्मण्यता,
विकलांगता
और
जीवनघाती
विसंगतियाँ
प्रकट
करता
है
·
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से प्रचलित पारंपरिक मीडिया को भी अलोकप्रिय बनाया है, इसका औपन्यासिक विवरण देता है
शुक्रवार, 3 मई 2024
क्या सोशल मीडिया से लोगों को मुक्ति मिलेगी?
क्या सोशल मीडिया से लोगों को मुक्ति मिलेगी?
नहीं मिली तो लोग जंतुओं की तरह सोच-समझ से रहित होकर विलुप्त हो जायेंगे।
अवश्य विचार करें-
विशेषकर सोशल मीडिया का कारोबार करनेवाले अवश्य विचार करें-