महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

सोमवार, 23 जुलाई 2018

कुसुम दीदी

मेरी दृष्टि में जीवन विडंबनाओं के अतिरिक्‍त कुछ नहीं। पहले जीवन और फि‍र मौत। इससे बड़ी विडंबना किसी के भी जीवन में और क्‍या हो सकती है! मरनेवाले के लिए तो मरने से पहले तक यह विडंबना होती है। लेकिन मरनेवाले को 'एक-पूरे-जीवन-की-तरह' याद करनेवाले उसके जीवित संबंधी के लिए यह विडंबना असीमित होती है। मैं जीवनभर अपने किसी संबंधी, प्रिय व्‍यक्ति की खोज-खबर करूं या न करूं, मेरे लिए यह चिंता की बात नहीं, लेकिन किसी अपने के मरने के बाद मैं विचित्र मन:स्थिति में अवश्‍य पहुंच जाता हूं। और इस मन:स्थिति में मरनेवाले अपने प्रिय मानव के साथ व्‍यतीत जीवन के क्षण, दिन और अनुभव स्‍मृति-पटल पर चलचित्रित होने लगते हैं।  
          मेरे पिता के एक भाई और तीन बहिनें हैं। पांच भाई-बहनों के कुल बीस बच्‍चे हैं। बीस बच्‍चों में से अट्ठारह के विवाह हो चुके हैं। सबसे बड़ी बुआ की बेटी कुसुम दीदी इन बीस बच्‍चों में से एक थी। वह अनिल भाई से छोटी थीं। अनिल भाई बीस बच्‍चों में से सबसे बड़े हैं। कुसुम दीदी उनसे छोटी लेकिन सबसे बड़ी दीदी थीं। उन्‍नीस बच्‍चे और उनके माता-पिता सकुशल जीवनयापन कर रहे हैं। अधिसंख्‍य माताओं-पिताओं के नाती-पोते और नातिन-पोतियां भी हो चुके हैं। कुसुम दीदी के भी दो बालक हैं। दोनों युवा, योग्‍य और संवेदनशील हैं। ऐसे में कुसुम दीदी का सभी को छोड़ जाना परिवार को हतप्रभ कर गया।
          मुझे भी दीदी की मृत्‍यु के दो दिन बाद पता चला कि वह नहीं रहीं। 18 जुलाई को उन्‍होंने अपनी अंतिम श्‍वास ली और शरीर को निष्‍प्राण छोड़ शिवलीन हो गईं। 12 जुलाई 2013 को मेरी दादी और कुसुम दीदी की नानी की मृत्‍यु हुई थी। तब के बाद हमारे परिवार में यह दूसरी दुखद घटना हुई है। कुसुम दीदी के जीवन का कुछ समय ननिहाल में भी व्‍यतीत हुआ था। तब ही उनके सार्थक, सकारात्‍मक और परिश्रमी व्‍यक्तित्‍व को निकटता से देखने का अनुभव हुआ। जीवन का अधिक समय संघर्ष में गुजारनेवाली दीदी ने कभी भी अपने जीवन से जुड़ी समस्‍याओं की आड़ लेकर किसी को दुखानेवाली कोई बात नहीं की। और अगर किसी को कभी लगा भी होगा कि वे अपने जीवन की परिस्थितियों की आड़ लेकर दूसरे को परेशान करनेवाली बात कर रही हैं, तो दीदी ने खुद ही इस स्थिति की अनदेखी करने या ऐसी स्थिति से दूर रहने की सोची। मैंने कभी भी उन्‍हें तनाव, कुंठा और क्रोध में नहीं देखा। जीवन में गृहस्‍थ का तन-मन तोड़नेवाला संघर्ष करते हुए भी वे विचलित नहीं हुईं। वे हमेशा भविष्‍य के प्रति आशान्वित रहती थीं। वर्तमान की समस्‍याओं में उलझे रहनेवाला व्‍यक्तित्‍व उनका नहीं था। उनका व्‍यक्तित्‍व अधिकार का भूखा नहीं था, अपितु वह दायित्‍व निर्वहन में ही संतुष्‍ट रहता।
          हमारे परिवार को छोड़ शेष दुनिया और इसके लोगों के लिए कुसुम दीदी की मृत्‍यु बड़ी बात या घटना नहीं है और हो भी नहीं सकती, क्‍योंकि संसार के अनुसार वे अत्‍यंत सामान्‍य मनुष्‍य थीं। लेकिन इसी संसार के भूत, वर्तमान और भविष्‍य काल का दार्शनिक विश्‍लेषण करते रहनेवाले मेरे जैसे व्‍यक्ति के लिए कुसुम दीदी का अवसान 'एक-पूरी-दुनिया-के-जीवन-ढहने' के बराबर है। न सही दुनिया के लिए हरेक मरनेवाला विशेष हो, परंतु मरनेवाले को ह्रदय से याद करनेवाले उसके संबंधियों के लिए वह अत्‍यंत विशिष्‍ट होता है।
          कुसुम दीदी और उन जैसे लोगों ने मरने से पूर्व जिस सूर्य किरण को अंतिम बार देखा होगा, जिस रात को कीट-पतंगों की सन्‍यासी आवाज के साथ आखिरी बार महसूस किया होगा, वर्षा की जिन बूंदों को गिरते देखा होगा, जिन पेड़-पौधों को उनकी हरियाली और पक्षियों की चहचहाहट के साथ इच्‍छाभर निहारा होगा, जिस चन्‍द्रमा के उजाले से अपने कक्ष को उज्‍ज्‍वल पाया होगा, जिस संबंधी की आंखों व हाव-भाव में अपने लिए अथाह प्रेम पाया होगा, उन सभी से मिलने और उनको देखने की बहुत इच्‍छा हो रही है। 
        दुनिया विचित्र है। मरनेवालों के बारे में यहां एक महान अनुभव है। कहा गया है कि मरनेवाला तब तक नहीं मरता, जब तक उसको प्रेमपूर्वक याद करनेवाले जीवित हैं। मरनेवाले के जीवनकाल के विभिन्‍न अनुभव जब तक उसे प्रेम करनेवालों, उसके संबंधियों में रहते हैं, वह तब तक मरता नहीं। जीने वालों की संस्‍मृतियों में डोलते रहने तक मरनेवाला कहां मरता है! इसी आशा और विश्‍वास के साथ गहराई तक अनुभव होता है कि कुसुम दीदी कहीं नहीं गईं, बल्कि यहीं हमारे बीच हैं।

शनिवार, 21 जुलाई 2018

भीड़तंत्र की विरोधाभासी व्याख्या


लोग सुप्रीम कोर्ट को भगवान समझते हैं। तभी तो वे कहते हैं कि कोर्ट ने ऐसा कहा, वैसा कहा। लोग ये क्‍यों नहीं सोचते कि सुप्रीम कोर्ट में बैठे न्‍यायाधीश भी उसी भारतीय व्‍यवस्‍था में रह रहे हैं, जहां तमाम समस्‍याएं मौजूद थीं और हैं। तब वे कैसे भगवान जैसे हो सकते हैं।
जब भारत के कोर्ट बंद रहते हैं तो अखबारों के प्रमुख पन्‍नों पर ज्‍यादा बवाल वाली खबरें नहीं होतीं, लेकिन जैसे ही कोर्ट खुलता है, तो बवाल वाली खबरों का अंबार लग जाता है। अखबार वाले बड़े उत्‍साह से कोर्ट के हवाले से छापते हैं कि कोर्ट ने सरकार से यह कहा, वह पूछा, सरकार को हड़काया, सरकार से सवाल पूछा। यह लेखक कोर्ट और अखबार वालों दोनों से पूछता है कि क्‍या इनका अपना शासन-प्रशासन और बाकी व्‍यवस्‍थाएं उस स्‍तर की हैं, जैसा ये देश में सभी व्‍यवस्‍थाएं चाहते हैं।
अखबार, मोदी सरकार से पहले, ज्‍यादातर पैसे वाले कांग्रेसियों या कांग्रेसियों के संबंधियों और उनके हितैषी लोगों के थे। मोदी सरकार आने से पहले देश में कितनी समस्‍याएं थीं, यह सोचकर सामान्‍य आदमी कुंठित और बीमार हो जाता था। सोशल मीडिया एक बिजनेस प्‍लान और आर्थिक फायदे के लिए देश में आ तो गया था, पर कांग्रेस और राजनीति से लेकर दूसरे अनेक क्षेत्रों में फैले उसके लुटेरों को आभास न था कि यही सोशल मीडिया एक दिन उनकी जड़ खोदेगा। जब तक कांग्रेस सोशल मीडिया से खुद को हुए नुकसान का आकलन करती या सोशल मीडिया पर पाबंदी लगाती, तब तक लोग उसके विरुद्ध सचेत और जागरूक हो गए और परिणामस्‍वरूप 2014 में उसे सत्‍ता से हटा दिया।
          लेकिन अब जब सोशल मीडिया कांग्रेस को जड़मूल खत्‍म करने के लिए लोगों के बीच एक सशक्‍त सूचना माध्‍यम बना हुआ है, तो विपक्ष के रूप में कांग्रेस और उसके सहयोगी राजनीतिक दल और लोग सोशल मीडिया पर नियंत्रण करने की बात करने लगे हैं, उसकी सूचनाओं को भ्रामक और समाज विरोधी बताने लगें हैं। अखबार वाले और सुप्रीम कोर्ट में बैठे जज और याचिका दायर करनेवाले कांग्रेस समर्थक आजकल देश को भीड़तंत्र से होनेवाले खतरे गिना रहे हैं।
लेकिन अचरज ये सोचकर होता है कि सुप्रीम कोर्ट के ये जज जम्‍मू-कश्‍मीर के पत्‍थरबाजों, स्‍थानीय नागरिकों और इनके साथ मिल आतंकी गतिविधियां करनेवाले उग्रवादियों पर विचार करते समय यह वक्‍तव्‍य क्‍यों नहीं देते कि देश में भीड़तंत्र नहीं चल सकता। पश्चिम बंगाल में मुसलमानों के वोट हथियाने के लिए लोकतंत्र को खूंटी पर टांगनेवाली ममता बनर्जी सरकार और उसके गुंडातत्‍वों द्वारा फैलाई गई और फैलाई जा रही हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट के जज ऐसी ही‍ टिप्‍पणियां क्‍यों नहीं करते। केरल के बारे में भी सुप्रीम कोर्ट को भीड़तंत्र और उसकी अराजकता दिखाई नहीं देती। 
कुल मिलाकर एक सामान्‍य व्‍यक्ति सीधे-सीधे समझ सकता है कि जो लोग मोदी समर्थक हैं और मोदी या देश का विरोध करनेवालों की पिटाई कर उन्‍हें सबक सिखाते हैं, तो कोर्ट को ये लोग अराजक भीड़तंत्र दिखने लगते हैं, और जो लोग कांग्रेस के पाले में हैं और यदि वे वास्‍तव में अराजकता फैलाते हैं या भीड़तंत्र का नंगा नाच करते हैं तो कोर्ट उनकी तरफ आंखें मूंद लेता है।
          कोर्ट और प्रेस के हवाले से दिए जानेवाले विरोधाभासी दृष्टिकोणवाले लोकतंत्र के उक्‍त भाषण और कायदे संवेदनशील लोगों को कभी रास नहीं आनेवाले। आज जब एक विवेकशील व्‍यक्ति भलीभांति जानता है कि कांग्रेस ने इस देश को लूटने के सिवा कुछ नहीं किया, तो वह क्‍यों कांग्रेस के हित में गाए जानेवाले न्‍यायालय और प्रेस के राग में लिप्‍त हो।
जब एक सामान्‍य व्‍यक्ति लोकतांत्रिक तरीके से मोदी के समर्थन में खड़ा है, तो उसे विचलित करने के लिए लोकतांत्रिक मूल्‍यों से खिलवाड़ क्‍यों किया जा रहा है। भीड़तंत्र से खतरे की जो नई भ्रामक प्रचार नीति कांग्रेस और उसके समर्थकों द्वारा मोदी सरकार के विरुद्ध 2019 के आम चुनाव से पूर्व बनाई जा रही है, उस पर न्‍यायालय भी संतुलित विवेक से सोच नहीं पा रहा।
भीड़तंत्र के असली खतरे तो वे राज्‍य, लोग और धार्मिक समूह हैं, जो आज तक कांग्रेस के लिए सत्‍ता पाने का माध्‍यम बने हुए हैं। कश्‍मीर के हालात क्‍या भीड़तंत्र का आभास नहीं देते? लेकिन कोर्ट और प्रेस ने वहां के बारे में कभी भीड़तंत्र शब्‍द का इस्‍तेमाल नहीं किया। कश्‍मीर ही नहीं केरल, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और कम-ज्‍यादा मात्रा में कांग्रेसी प्रभाव में रहे राज्‍यों में भीड़तंत्र दशकों से अराजकता का नंगा नाच करता रहा है। वहां के बारे में कोर्ट ने कोई टिप्‍पणी क्‍यों नहीं की? उलटे कोर्ट के न्‍यायाधीश ऐसे राज्‍यों में हुए या हो रहे अराजकता के नंगे नाच की अनदेखी कर सुरक्षा बलों के विरोध में निर्णय सुनाते रहे हैं कि वे स्‍थानीय लोगों पर अत्‍याचार कर रहे हैं, कि सरकार को सशस्‍त्र सेनाओं को उन स्‍थानों से हटा देना चाहिए, कि ऐसे राज्‍यों को संभालने का सारा दायित्‍व स्‍थानीय प्रशासन का है न कि केंद्र सरकार का। भीड़तंत्र के बारे में विरोधाभासी न‍जरिया वाले कोर्ट को आज अचानक भीड़तंत्र का खतरा इतना क्‍यों डराने लगा है? इस बात के गूढ़ राजनीतिक निहितार्थ हैं। गुजरात, कर्नाटक, उत्‍तर प्रदेश आदि राज्‍यों में विधानसभा चुनाव से पूर्व जिस तरह केंद्र की मोदी सरकार के विरोध में झूठे किसान आंदोलन, बंद और जाम जैसी गतिविधियां की गईं, क्‍या वह भीड़तंत्र की अराजकता नहीं थी? उस पर कोर्ट और मीडिया ने भीड़ को क्‍यों नहीं कोसा? क्‍या इसलिए कि वह भीड़ उस मोदी सरकार के विरोध में थी, जो कोर्ट के कई न्‍यायाधीशों और मीडिया के कई लोगों की नजर में इसलिए खटक रही है क्‍योंकि वह मोदी सरकार इन्‍हें इनकी कांग्रेसी दुर्नीति के हिसाब से नहीं चलने दे रही। ऐसा नहीं चलेगा। अधिसंख्‍य मोदी समर्थकों को कोर्ट के ऐसे प्रतिबंध और सलाह मानने में कोई रुचि नहीं है। कांग्रेस द्वारा अनेक क्षेत्रों में किए गए अत्‍याचार और अन्‍याय से पीड़ित लोगों के पक्ष में न्‍याय करने के स्‍थान पर कोर्ट अनावश्‍यक विषयों पर अपनी टीका-टिप्‍पणी करना बंद करे। वह आम लोगों के हित में न्‍याय को व्‍यावहारिक बनाएगा तब ही उसका सच्‍चा सम्‍मान देश में हो सकेगा।
अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता के नाते कांग्रेस के नेता, कार्यकर्ता, समर्थक जब देश के प्रधानमंत्री को अपशब्‍द बोलने लगें, कांग्रेस के लिए हिन्‍दू बाबा और संत के रूप में परिवर्तित अनेक मुसलिम षड्यंत्रकारी (प्रमोद, अग्निवेश) जब प्रधानमंत्री की हिन्‍दू गतिविधियों को पाखंड कहने लगें और साथ ही कहने लगें कि संविधान इसकी अनुमति नहीं देता, तो क्‍या यह देश के प्रधानमंत्री और उनको चुननेवाले बहुसंख्‍यक लोगों का अपमान नहीं? इस पर सोचने और प्रधानमंत्री तथा बहुसंख्‍यक भारतीय लोगों का अपमान करनेवालों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करने के स्‍थान पर कोर्ट ऐसे लोगों की पिटाई पर देश को भीड़तंत्र के खतरों से पीड़ित बताने लगे, तो यह स्थिति लोकतांत्रिक आधार पर अत्‍यंत अस्‍वीकार्य है।
राष्‍ट्र विरोधी लोगों का मंतव्‍य जानने के लिए विवेकवान भारतीय नागरिकों को किसी न्‍यायालयी या मीडिया प्रमाण की आवश्‍यकता नहीं। अग्निवेश जैसे लोगों का मंतव्‍य उनके धूर्त, कपटी और कलुषित चेहरों से आसानी से समझा जा सकता है। न्‍यायालय की ओर से ऐसे लोगों का बचाव नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि इन्‍हें प्रधानमंत्री और उनके बहुसंख्‍यक समर्थकों का अपमान करने के लिए कठोर दंड दिया जाना चाहिए। यदि न्‍यायालय इस दिशा में कुछ नहीं सोचता तो ऐसे लोगों को जनता ही दंडित करेगी। और इसमें कुछ बुरा भी नहीं।

शुक्रवार, 6 जुलाई 2018

मंदसौर की घटना, दोषी को हो तुरंत फांसी


वर्ष की बच्ची या बच्चा। यह आयु मनुष्य की अबोध आयु है। इसमें बच्चे मानसिक और भावनात्मक रूप में खाने-पीने और खिलौनों तक सीमित होते हैं। निश्चिंतता, खेल-कूद, दौड़-भाग, पढ़ने-सीखने और बड़ों के प्रेम में बीतता बच्चों का जीवन इसीलिए निश्छल, निष्कपट और मासूम होता है। लेकिन जीवन के इस काल में यदि किसी बच्चे को यौन शोषण का विकृत रूप झेलना पड़े तो बचे रहने पर यह उसके पूरे जीवन को दुष्प्रभावित करता है। जिस पशुवत तरीके से मंदसौर में बच्ची के साथ बलात्कार हुआ, पता नहीं वह बची कैसे रह गई।
          मध्य प्रदेश के मंदसौर में छह वर्ष की दिव्या के साथ मोहम्मद इरफान नामक वयस्क शख्स ने जिस तरह यौन शोषण किया, वह आदमी की मानसिक विकृति की पराकाष्ठा है। इस तरह की विकृति दिव्या पर बलात्कार करनेवाले शख्स में अपने आप नहीं आई। यह उसके मतावंलबी समाज और समुदाय द्वारा कालांतर से पोषित विकृति है, जिसका परीक्षण वे अपने परिवार-समाज में तो सहजतापूर्वक कर लेते हैं, लेकिन अन्य मतावलंबी स्त्रीवर्ग पर ऐसा कुत्सित परीक्षण करने के लिए उन्हें अपने परिवार-समाज से प्रोत्साहन मिलता है। बेशक इस बात पर विचार करने के लिए हमारे बुद्धिजीवी और राजनीतिज्ञ सहमत हों, पर इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति और आंकड़़े स्पष्ट बताते हैं कि यह एक समुदाय द्वारा दूसरे समुदाय की महिलाओं, चाहे वह किसी भी आयु वर्ग की हों, को लक्षित कर होनेवाली घटनाएं हैं।
          बलत्कृत होने के बाद दिव्या की मरणासन्न स्थिति पर पहले-पहल औपचारिक-आधिकारिक रूप में कोई प्रतिक्रिया कहीं से नहीं उभरी। सोशल मीडिया में बात फैलने और बड़ी संख्या में लोगों के विरोध, प्रदर्शन और बलात्कारी को फांसी देने की मांग के बाद मुख्य मीडिया में इस घटना की चर्चा हुई। अप्रैल में जम्मू-कश्मीर के कठुआ में आसिफा नामक जिस लड़की से बलात्कार होने की खबरें प्रसारित हुईं और जिस तरह मीडिया, फिल्मी जगत और बाकी लोगों ने इस घटना पर प्रतिक्रिया दी, उसकी तुलना में मंदसौर में बलत्कृत बच्ची के लिए इनमें से किसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
कठुआ में जिस बच्ची को बलात्कार के बाद वीभत्स तरीके से मारा गया था, वह अप्रैल से कई माह पूर्व की घटना थी। और जिन लोगों को बच्ची से बलात्कार करने के लिए पकड़ा गया, वे खुद के निर्दोष होने के लिए राज्य सरकार से सीबीआई जांच की मांग भी खुद कर रहे थे। तीन माह बीत जाने पर भी आसिफा के बलात्कार के दोषियों पर बलात्कार का दोष सिद्ध नहीं हुआ। स्पष्ट है कि कठुआ की बच्ची से बलात्कार उसी के समुदाय के लोगों द्वारा किया गया और केंद्र की मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए हिंदू पुजारी और अन्य हिंदू लोगों को दोषी बताकर मामले को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचा गया। दुर्भाग्य से संयुक्त राष्ट्र में बैठे लोगों ने भी उस घटना पर संज्ञान लेकर भारत के संबंध में महिलाओं को असुरक्षित बताने और भारत को हिंदू मान्यताओं के आधार पर महिलाओं के लिए असुरक्षित बताने का दुष्चक्र रचा।
          यदि समाज और सामान्य लोग बलात्कार पर धर्म, समुदाय आदि के आधार पर भेद करते हैं तो क्या कथित लोकतंत्र के जिम्मेदार स्तंभ सरकार, प्रेस और अदालतों को भी ऐसे ही चलना चाहिए। अगर ऐसा नहीं था तो मंदसौर की घटना पर जिम्मेदार लोकतांत्रिक स्तंभों में से एक मीडिया और उसमें भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एक हिस्से में इस घटना के प्रति संवेदनहीनता क्यों है? क्यों यह हिस्सा मंदसौर की घटना को अपने मीडिया चैनलों पर दिखाना तक नहीं चाहता?
क्या इसलिए कि मंदसौर में जिस बच्ची के साथ बलात्कार हुआ वह हिन्दू थी और जिसने बलात्कार किया वह मुसलमान था। और मीडिया का यह हिस्सा अपनी संरक्षक कांग्रेस पार्टी के आदेश पर मुसलमानों द्वारा किए जा रहे किसी भी अपराध, अत्याचार और सामाजिक-राजनीतिक विध्वंस पर कुछ कहना ही नहीं चाहता। ऐसे में यदि ये लोग कठुआ बलात्कार की घटना पर हिन्दुओं का अपमान करने के लिए षडयंत्र के तहत दोषी बनाए गए हिन्दुओं को केंद्र में रख एक निश्चित एजेंडा पर खबरें चलाएंगे और देश-विदेश में हिन्दू मत से खार खानेवाले इस एजेंडे से प्रभावित होकर पूरी दुनिया में हिन्दू विरोधी दुष्प्रचार में लिप्त होंगे, तो क्या यह स्थिति किसी भी लोकतंत्र के लिए सुखद होगी? क्या ऐसे राजनीतिक षड्यंत्र स्पष्ट रूप में मुसलिम वोटों के लालच में नहीं किए जा रहे? क्या इससे भारत या किसी भी देश में लोकतांत्रिक संतुलन स्थापित किया जा सकता है?
          ये ऐसे प्रश्न हैं जो इस देश के अधिसंख्य भारतीयों को यानि कि बहुसंख्यक भारतीयों को विचलित करते हैं। ऐसे में लोकतंत्र के प्रति आस्थावान रहना लोगों के लिए संभव नहीं। मोदी सरकार को इस दिशा में सोचकर कुछ कड़े निर्णय लेने ही होंगे। और सबसे पहले लिए जानेवाले निर्णय के अंतर्गत जनसंख्या नीति केंद्र सरकार के मुख्य कार्यों में सर्वोपरि कार्य होना चाहिए।
यदि हम जन-जीवन की सभी समस्याओं के केंद्रक कारण की पड़ताल करते हैं, तो सबसे बड़ी समस्या जनसंख्या वृद्धि की है। यह समस्या केवल जन-जीवन को खतरे में डाल रही है अपितु प्रकृति-पर्यावरण के असंतुलन का भी कारण बन रही है। राष्ट्रीय नियम-कानूनों के प्रति उदासीन होकर मुसलमान जिस तेजी से अपनी जनसंख्या बढ़ा रहे हैं, उससे शिक्षा लेकर कई देशों में लोकतांत्रिक प्रणाली को संशोधित किए जाने पर मंथन चल रहा है। रूस, चीन, इजरायल जैसे देश इस दिशा में संवेदनशील तरीके से कदम बढ़ा रहे हैं।
भारत को भी देश के शहरों में बढ़ती और जनतांत्रिक व्यवस्था तथा प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ने का कारण बनी जनसंख्या पर नियंत्रण करना होगा। मंदसौर जैसी घटनाएं हमारे लिए जनसंख्या वृद्धि को रोकने की बड़ी प्रेरणा बन सकती हैं। लोगों को इस काम को पूरा करने की आशा वर्तमान मोदी सरकार से ही है, अन्यथा कांग्रेस तो देश-समाज का बेड़ा गर्क पहले ही कर चुकी है। जिस बच्ची का बलात्कार हुआ हो और बलात्कार करनेवाले समुदाय के लोग इस पाप के लिए दोषी की धार्मिक अंधविश्वास के आधार पर प्रशंसा कर रहे हों, देश का तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग मौन धारण किए बैठा हो, मीडिया का एक वर्ग इस खबर पर ध्यान नहीं दे रहा हो और कांग्रेस पार्टी के मध्यप्रदेश स्थित नेता बलात्कारी के पक्ष में राजनीतिक संरक्षक बनकर खड़े हों, इन परिस्थितियों में बच्ची के अभिभावकों तथा दूसरे संबंधियों पर क्या बीतती होगी, इसकी कल्पना करने से ही शरीर में रक्त जम जाता है।
वैसे तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सार्वजनिक सभा में दिव्या के बलात्कारी को जल्द से जल्दी फांसी पर चढ़ाने का वचन दिया है, लेकिन अपराधियों के साथ अदालतों के माध्यम से जैसा व्यवहार होता हुआ आया है, उस स्थिति में लगता नहीं कि चौहान अपना वचन पूरा कर पाएंगे। दिल्ली में दामिनी के बलात्कारियों पर अभी तक अदालत द्वारा अंतिम निर्णय नहीं हो सका है। राजकाज और न्यायालयों की ऐसी कार्यप्रणाली लोगों में लोकतंत्र के प्रति अविश्वास उत्पन्न करती है। कालांतर में लोकतंत्र का विघटन इन्हीं कारणों से होता है। मध्य प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार को इस दिशा में ठोस और त्वरित निर्णय लेने चाहिए और बलात्कारियों को एक महीने नहीं बल्कि पन्द्रह दिन में ही फांसी पर चढ़ा देना चाहिए। तब जाकर दिव्या जैसी बच्चियों के साथ थोड़ा सा न्याय हो पाएगा।