महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

मंगलवार, 17 अप्रैल 2018

कठुआ-उन्नाव के सहारे भाजपा-हिन्दू-मोदी विरोधी व्यर्थ राजनीति

भारत में खतरनाक राजनीति अपनी जड़ें बहुत गहरे जमा चुकी है। कांग्रेस ने विगत चार-पांच दशकों में देश के हर कोने, समुदाय, गांव-घर तक ऐसी राजनीतिक गंदगी फैलाई कि यह आज विषबेल बन चुकी है। नई पैदा होनेवाली पीढ़ी पन्‍द्रह-बीस साल की होते ही इस राजनीतिक जहर के चेपेटे में आ ही जाती है। पिछले साढ़े चार वर्षों से देश की केंद्रीय सत्‍ता से बाहर रहने की कुंठा व हताशा में कांग्रेस विपक्ष के रूप में जो नहीं कर सकती थी, वह सब कर रही है। भाजपा को बदनाम करने के लिए कांग्रेसी नेतृत्‍व में विपक्षी षड्यंत्र कितना गहन है, इसकी कल्‍पना करते हुए भाजपा बेचारी और राजनीतिक रूप से निष्क्रिय नजर आने लगी है।
विकेश कुमार बडोला 
भाजपा की बदनामी के लिए नया खेल कठुआ और उन्‍नाव की घटनाओं के बल पर खेला जा रहा है। आठ साल की बच्‍ची से बलात्‍कार और बाद में उसकी हत्‍या अक्षम्‍य अपराध है। इसके लिए अपराधी को जो दंड मिले वो कम है। महिलाओं से बलात्‍कार करना और बाद में उसके परिवार वालों पर अत्‍याचार करना भी गंभीर अपराध हैं। इनके लिए दोषी कोई भी हो, चाहे साधारण आदमी या विधायक, उसको भी उसके किए की सख्‍त से सख्‍त सजा मिलनी ही चाहिए।
          लेकिन प्रश्‍न यह है कि क्‍या विगत वर्षों में बलात्‍कार और हत्‍या के यही दो मामले रहे हैं, जिन पर विपक्षी राजनीतिक दलों तथा मीडिया को इतनी सनसनी मचाने का मौका मिला। क्‍या कश्‍मीरी पंडितों की बहू-बेटियों, छोटी-छोटी बच्चियों के साथ बलात्‍कार होने के बाद उनकी नृशंस तरीके से हत्‍या नहीं हुई थी? क्‍या हाल ही में दिल्‍ली के गोविंदपुरी में हुई सुमन दूबे नामक महिला से छेड़छाड़ और भरे बाजार में उसकी हत्‍या होना अपराध नहीं था? ऐसे रोजाना पता नहीं कितने बलात्‍कार और बलात्‍कार के बाद हत्‍याओं के मामले भारत में दिखाई-सुनाई देते हैं? क्‍या उन सब के संबंध में वैसा ही मीडिया ट्रीटमेंट और न्‍यायालयी हस्‍तक्षेप हो पाता है, जैसा कि कठुआ और उन्‍नाव के मामले में हो रहा है? अगर बाकी मामलों में कठुआ और उन्‍नाव जैसा न्‍यायालयी हस्‍तक्षेप नहीं होता या इन्‍हें पर्याप्‍त मीडिया कवरेज नहीं मिलता, तो साफ दिखता है कि यह सब राजनीति के लिए हो रहा है। दिल्‍ली में भीड़ भरे बाजार में हुई चार बच्‍चों की मां की हत्‍या मीडिया के लिए इसलिए व्‍यापक कवरेज नहीं बन पाई क्‍योंकि राजधानी में भाजपा सरकार नहीं है। कुछ दिन पूर्व कर्नाटक में एक हिन्‍दू विधवा महिला को उसके घर में ही बंद कर सात-आठ मुसलिम लोगों ने कई दिनों तक उसके साथ बलात्‍कार किया। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है तो यह खबर अखबारों में मात्र एक दिन के लिए एक कॉलम तक सिमट कर रह गई। अभी भी यहां-वहां लगभग हर प्रदेश में महिलाओं, बेटियों और बच्चियों के साथ रेप, रेप के बाद हत्‍या किए जाने के मामले लगभग रोज ही पढ़ने-दिखने-सुनने को मिलते हैं। लेकिन जिन मामलों में राजनीति नहीं हो सकती, वे मामले पीड़ितों तक ही सिमट कर रह जाते हैं। यह इस देश का दुर्भाग्‍य है कि महिलाओं के साथ बलात्‍कार और कई मामलों में बलात्‍कार के बाद हत्‍या या तेजाब फेंकने जैसी घटनाओं में से कुछ ही घटनाएं खबरों में इसलिए बनी रह पाती हैं, ताकि उन पर राजनीति की जा सके। पीड़िताओं के वास्‍तविक दुख को समझ कर न्‍याय होना अभी इस देश की न्‍यायिक व्‍यवस्‍था का स्‍वाभाविक हिस्‍सा नहीं हो पाया है। मीडिया हो चाहे न्‍यायालय सभी का राजनीतिक रुख समझना अब आम जनता के लिए आसान है, क्‍योंकि यही वह जनता है, जिसे कांग्रेस ने इतने वर्षों से गंदी राजनीति करने, उसे सीखने-समझने के अवसर के अलावा कुछ नहीं दिया।  
मीडिया के अतिरंजित रुख के कारण कठुआ का मामला संयुक्‍त राष्‍ट्र तक जा पहुंचा है। क्‍या यह उचित है? देश में या विदेश में या संयुक्‍त राष्‍ट्र में सभी जगह भाजपा को सत्‍ता से बाहर होते देखने के लिए प्रभावशाली बेचैन लोगों की कमी नहीं है। लेकिन इसमें दोष भाजपा का भी है, जो दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे ज्‍यादा सदस्‍यों-कार्यकर्ताओं का राजनीतिक दल होते हुए भी अपने लिए एक ऐसा मीडिया घराना नहीं बना पा रहा, जो कांग्रेस की तुलना में उसके अधिक बड़े व व्‍यापक राजनी‍तिक निर्णयों, कार्यों और सुशासन का व्‍यापक विश्‍लेषण कर सके। जबकि विपक्ष इतना शातिर है कि भाजपा के सड़क से लेकर संसद और मीडिया से लेकर न्‍यायालयों में विराजमान समर्थक भी उसको बदनाम करने की विपक्षी मुहिम का हिस्‍सा बन जाते हैं। हमारे सामने अनेक ऐसे उदाहरण हैं, जिनमें कांग्रेस के कुशासन, गलत नीतियों और भ्रष्‍टाचार के खिलाफ देशव्‍यापी आक्रोश, आंदोलन तथा धरना-प्रदर्शनों के दौरान भी उसके समर्थक उसके विरोध में नहीं गए। यह सब इसलिए होता है क्‍योंकि सामान्‍य जनता की नजर में प्रबुद्ध माने जानेवाले मीडिया और न्‍यायालय के लोग कांग्रेस के प्रत्‍येक काले कारनामे, भ्रष्‍टाचार और देशविरोधी गतिविधि पर भी तटस्‍थ विश्‍लेषण करते आए हैं। इन्‍होंने कांग्रेसी शासन के दौरान किसी भी देशव्‍यापी समस्‍या के लिए सीधे-सीधे कभी भी कांग्रेस को जिम्‍मेदार नहीं माना। कांग्रेस शासन के दौरान हुआ दामिनी बलात्‍कार और हत्‍या का मामला हो या महिलाओं पर हुए अनगिनत तेजाब हमलों के मामले या फि‍र राष्‍ट्रीय घोटाले हों या मुद्रा मूल्‍य गणना से बाहर पहुंचे भ्रष्‍टाचार, अवैध लेन-देन के शासकीय मामले, सभी में मीडिया और न्‍यायालय ने कभी ऐसी टिप्‍पणी प्रमुखता से नहीं की कि जिससे लगे देश खतरे में है या देश में कानून का शासन नहीं है। यहां तक कि कांग्रेसी शासन में देश में हुई तमाम असामाजिक हलचलों और अवैध कार्यों पर संयुक्‍त राष्‍ट्र का भी ध्‍यान नहीं गया। तो क्‍या यह मान लिया जाए कि संयुक्‍त राष्‍ट्र को हैंडल करनेवालों के साथ भी कांग्रेस राजनीतिक संबंध बना के चलती थी। मान क्‍या लिया जाए, ऐसा ही है। ऐसा न होता तो संयुक्‍त राष्‍ट्र महासचिव ब्रिटेन के जासूस को जहर देने तथा सीरिया के संबंध में रूस व अमेरिका के बीच छिड़े शीतयुद्ध के कारण साफ दिखते तृतीय विश्‍व युद्ध के खतरों के बारे में चिंतित होते, न कि भारत में सनसनी बने मामले को लेकर।   
कठुआ की आठ वर्षीय बच्‍ची जिन हालात में मरी, उसमें उसके परिवारीजनों का संत्रास और उन्‍नाव की बलात्‍कार पीड़िता का दुख समझना हर किसी के बूते की बात नहीं। इसी तरह रेप की दूसरी घटनाओं की शिकार और रेप के बाद जान से मार दी गई नारियों और उनके परिवार वालों के दुख की कोई सीमा नहीं। उसे सामान्‍य आदमी महसूस नहीं कर सकता। ऐसे मामलों में पीड़ित महिलाओं या उनके संबंधियों के लिए सबसे जरूरी होता है समयबद्ध न्‍याय। लोगों, मीडिया और न्‍यायालय को इस दिशा में ठोस कार्य करने के लिए कदम उठाने होंगे न कि ऐसी घटनाओं पर गंदी राजनीति का मोहरा बनना चाहिए।

बुधवार, 11 अप्रैल 2018

महिला असुरक्षा की व्यापकता

हाल ही में दिल्‍ली के गोविंद पुरी में भीड़भरे साप्‍ताहिक बाजार में एक महिला को चाकुओं से गोद कर मार दिया गया। दस वर्ष से कम आयु के चार बच्‍चों की मां सुमन दूबे से पहले तो बदमाशों ने अश्‍लील व्‍यवहार किया और फि‍र उसके पति सहित भीड़ द्वारा बदमाशों का विरोध किए जाने, उन्‍हें पीटने पर उन्‍होंने चाकू से सुमन पर कई वार कर दिए। बेचारी सुमन ने चिकित्‍सालय पहुंचने से पहले ही प्राण त्‍याग दिए। इस तरह अप्रत्‍याशित रूप में एक हंसता-खेलता गरीब परिवार दो गुंडों के अश्‍लील, अभद्र व्‍यवहार तथा हिंसक हमले के कारण बुरी तरह बिखर गया। इन गुंडों के बारे में ज्ञात हुआ कि ये कुछ दिन पूर्व ही जेल से सजा पूरी कर छूटे थे। हालांकि इसके बाद लोगों ने बदमाशों को बुरी तरह पीटकर पुलिस के हवाले कर दिया।
विकेश कुमार बडोला 
लेकिन पुलिस या कानून की अभिरक्षा में रहते हुए बदमाशों को उनके दुस्‍साहस, अपराध के लिए त्‍वरित और समयबद्ध दंड मिल पाएगा, इसमें संदेह ही संदेह है। क्‍योंकि हमारे सामने साढ़े चार वर्ष पूर्व दिल्‍ली के ही वसंत विहार में हुए दुष्‍कर्म व लोमहर्षक हत्‍या कांड के बाद अपराधियों को सजा नहीं होने का कड़वा अनुभव अभी भी पसरा हुआ है। उस घटना की पीड़िता दामिनी का बलात्‍कार कर जितने नृशंस तरीके से उसे मारा-पीटा गया था और उसके बाद इस घटना के विरोध में देश-विदेश में पन्‍द्रह-बीस दिनों तक सरकार विरोधी जैसा जनांदोलन हुआ था, उसकी परिणति आखिर में क्‍या हुई। आज तक दामिनी के बलात्‍कारियों व हत्‍यारों को सजा नहीं हो पाई है। यहां तक कि उस घटना का जो सबसे क्रूर व हिंसक अपराधी था, उस पर किशोर न्‍याय बोर्ड में मुकदमा चलाकर उसका पुनर्वास भी कर दिया गया है। यदि देश की राजधानी दिल्‍ली महिलाओं की सुरक्षा इस तरह करेगी और पीड़ित-असुरक्षित होने पर उन्‍हें ऐसा न्‍याय दिलवाएगी, तो बेटी पढ़ाओ-बेटी बढ़ाओ जैसे सरकारी अभियान की सात्विकता समाज में कैसे सिद्ध होगी। लोग अमेरिकी बंदूक संस्‍कृति के विरोध में देश-विदेश में मार्च निकालते हैं लेकिन अपराध रोकने के लिए मात्र बंदूक के लाइसेंस बंद करने से काम नहीं चलनेवाला। अपराध नियंत्रण व उन्‍मूलन के लिए इसका वास्‍तविक चरित्र पहचान कर उसे खत्‍म करना होगा।
सुमन दूबे और दामिनी जैसी महिलाएं अकेली नहीं है, जो लैंगिक अश्‍लीलता तथा अभद्रता और इसके परिणामस्‍वरूप हत्‍या, तेजाब हमला आदि हिंसक व्‍यवहार का कोप झेल रही हैं। लगभग प्रतिदिन ही महानगरों से लेकर सुदूर गांवों में अनेक महिलाओं के साथ ऐसा दुर्व्‍यवहार हो रहा है। महिलाओं के विरुद्ध घटनेवाली जिन घटनाओं के अपराधी पकड़े नहीं जाते हैं या भाग जाते हैं, उनके लिए तो कह सकते हैं कि न्‍यायिक धारणाएं या दंड निर्धारित नहीं हो सकते। लेकिन कितने आश्‍चर्य की बात है कि दामिनी और सुमन दूबे के हत्‍यारे पकड़े जाने के बाद भी निचली अदालतों से लेकर उच्‍च व सर्वोच्‍च अदालतों में मात्र विधि विवेचना का माध्‍यम बने रहते हैं। वर्षों बीत जाने तथा आरोप सिद्ध व पुष्‍ट हो जाने के बाद भी इन्‍हें इनके किए का उचित दंड नहीं मिल पाता।
          अगर सुमन की हत्‍या के प्रकरण में कानूनी कार्रवाई के लिए आवश्‍यक उपलब्‍ध साक्ष्‍य का प्रश्‍न उठता है तो क्‍या सुमन का पति, उसके चार बच्‍चे तथा सैंकड़ों की संख्‍या में एकत्र लोगों की भीड़ पर्याप्‍त प्रत्‍यक्ष साक्षीगण नहीं हैं? क्‍या इनके द्वारा घटना का आंखों देखा वर्णन किए जाने के आधार पर न्‍यायाधीश सीधे अपराधियों को मृत्‍यु दंड नहीं सुना सकते। जब हमने निर्दोष दामिनी व सुमन को अपराधियों के हिंसक हमले के बाद तड़पते हुए मरते देख लिया है, तब अपराधियों को मौत का दंड देने के लिए कानून व इसके संरक्षकों, न्‍यायाधीशों के सम्‍मुख मानवीयता का संदर्भ क्‍योंकर प्रकट होता है? यह न्‍याय के प्राकृतिक सिद्धांत के अनुसार नहीं चलने का अभ्‍यास है, जो उस जनता के मन में कानून व विधि तंत्र के प्रति अविश्‍वास जगाता है, जिसके प्रतिनिधित्‍व वाले लोकतंत्र में ऐसे विधिक तंत्र की स्‍थापना होती है।
          देर से न्‍याय मिलने तथा जटिल कानूनी प्रक्रियाओं के चलते बड़ी संख्‍या में अपराधी देश की जेलों में भरे पड़े हैं। और जिस प्रकार जेलों में बंद न्‍यायाधीन, विचाराधीन अपराधियों की संख्‍या बढ़ती जा रही है, उस अनुपात में हमारे जेल तंत्र तथा उसके शासन-प्रशासन की कार्यपालक शक्तियां, सुविधाएं और अपराधियों का दंड सुनिश्चित करने का त्‍वरित प्रशासनिक ढांचा तैयार नहीं हो पा रहा। चलो यह मान भी लिया जाए कि कुछ अपराधों में गलत साक्ष्‍यों तथा अनुचित पुलिस निरीक्षण के कारण निर्दोष लोगों को सजा के तौर पर जेलों में रखा गया है और उन पर कानूनी कार्रवाई शीघ्रता में होनी भी नहीं चाहिए क्‍योंकि ऐसे में निर्दोष लोगों को दंड मिलने पर कानून खुद ही सवालों के घेरे में आ जाएगा। लेकिन जिन आपराधिक घटनाओं के प्रत्‍यक्ष साक्षीगण घटनाओं का स्‍पष्‍ट विवरण दे चुके होते हैं और साथ ही साक्षीगणों के विवरणों से मिलते-जुलते वैज्ञानिक-प्रामाणिक साक्ष्‍य भी एकत्र किए जा चुके होते हैं, उन पर न्‍याय में देरी होने से लोगों में न्‍याय-व्‍यवस्‍था के प्रति अविश्‍वास ही उत्‍पन्‍न होता है। 
      लोकतांत्रिक विधि व्‍यवस्‍था के साथ-साथ सामान्‍य प्राकृतिक मानवीय जीवन को हानि पहुंचानेवाले जो भी अपराध, अवैध कार्य और लोक विरोधी कर्म होंगे उनके लिए त्‍वरित दंड की व्‍यवस्‍था तो होनी ही चाहिए। लेकिन हम देखते आए हैं कि न केवल आम जनता में से दामिनी और सुमन के हत्‍यारों को कोई समयोचित कानूनी दंड मिल पाता है और न ही देश के बड़े राजनीतिक अपराधियों को उनके शासन-कर्म संबंधी अपराधों के लिए कड़ा दंड मिलता है। राजनीतिक अपराधियों को दंड मिलता भी है तो कारागार भी उनके लिए राजनीतिक कार्यालय बना रहता है और विभिन्‍न अपराधों में दंड मिलने के बाद भी स्‍वास्‍थ्‍य-जांच के लिए उन्‍हें देश के सबसे बड़े आयुर्विज्ञान संस्‍थान में भर्ती होने में भी कोई समस्‍या नहीं होती। यह कैसी विडंबनाजनित सच्‍चाई है कि अपराधी को कठोर कारावास या मृत्‍युदंड देने के बदले उन्‍हें जेल में सामान्‍य जीवन जीने की सुख-सुविधाएं मिलती हैं और स्‍वास्‍थ्‍य लाभ के लिए एम्‍स जैसे संस्‍थानों में भी भर्ती करवाया जाता है। और ऐसे अपराधियों द्वारा अनेक तरह से पीड़ित हुए लोग और उनकी भावी पीढ़ी अपराध किए बिना ही जेल जैसे कठोर करावास पाते हैं और जीवनभर घुट-घुट कर जीते रहते हैं।

रविवार, 8 अप्रैल 2018

प्रकृति को बचाने के लिए


वैसे तो मनुष्‍य जीवन अलग-अलग समय में अनेक परिवर्तनों से गुजरा, लेकिन दुनिया का पिछले पन्‍द्रह वर्ष का परिवर्तन अत्‍यंत विचित्र है। ''दुनिया का परिवर्तन'' से तात्‍पर्य व्‍यक्ति, परिवार, गांव, शहर, रिश्‍ते-नाते, दोस्‍ती-यारी, पर्व-त्‍योहार मनाने के उत्‍साह-उमंग में परिवर्तन से है।
विकेश कुमार बडोला

पिछले 15 सालों में आदमी का जीवन, आदमी के मूल जीवन जैसा नहीं रहा। जो कुछ है, जैसा है, सब रफ्तार के हवाले है। लोगों को वाकई सांस लेने की फुर्सत भी नहीं। किसी से अपनापन, प्‍यार-प्रेम और संवेदना मिलने की उम्‍मीद तो अब बेमानी लगती है। धरती के एक छोर पर रह रहा आज का मनुष्‍य धरती के दूसरे कोने पर अपने दोस्‍त और रिश्‍तेदारों से आसानी से संपर्क कर सकता है। हर समय संपर्क कर सकता है। इसके लिए उसके पास बहुत से संचार साधन मौजूद हैं। मोबाइल फोन, मोबाइल फोन पर वीडियो कॉल, सोशल मीडिया के कई प्‍लेटफॉर्म्‍स के माध्‍यम से सीधे संपर्क में रहने की सुविधाएं मौजूद हैं। पैसा है, सुविधाएं हैं, ऐश और आराम है। सब कुछ है। लेकिन फि‍र भी एक बेचैनी है। एक विचित्र अस्थिरता है। स्‍वयं की भावनाओं को संभालने का कड़वे अनुभवों का संघर्ष है।
यह सब कुछ व्‍यक्ति को दूसरे व्‍यक्ति के साथ आत्‍मीयता से संवाद नहीं करने दे रहा। न चाहते हुए भी लोग ऐसे अंधेरी-संकरी गुफा में घुसते जा रहे हैं, जहां से एक आदर्श मानव के रूप में वापस आना उनके लिए असंभव हो चुका है। चारों ओर हम वही होता देख रहे हैं, जो मनुष्‍य को नहीं करना चाहिए।
मनुष्‍य का दंभ इतना अधिक है कि वह अमर प्राकृतिक प्रतीकों-सूरज, चांद, सितारों, पृथ्‍वी और इसके वन-वनस्‍पतियों के प्रति भी नतमस्‍तक नहीं है। अपने होने, सांस लेने, जीवन में मौजूद होने और जिंदा रहने के इन प्राकृतिक कारकों के लिए मनुष्‍य के मन में मान-सम्‍मान नहीं। जहां उसका आधा जीवन इन प्राकृतिक घटकों की सुंदरता, विचित्रता, विडंबना पर विचार करते हुए व्‍यतीत होना चाहिए था, वहां उसका जीवन कीड़ों से भी बदतर स्थिति में रेंग रहा है।
आखिर जीवन किस तरह आधुनिक हो रहा है। क्‍या आधुनिकता यही है कि तरह-बेतरह की चीजों का उपभोग करके धरती को प्‍लास्टिक कूड़े के ढेर में बदल दो। उचित निपटान न होने पर उस कूड़े पर आग लगा दो। और आग से उठने वाले भारी, सड़े, तमाम दुर्गंधों से दम घोट रहे धुंए में जीवन को घुटते हुए देखो।
दो कौड़ी की राजनीति, मूर्ख राजनेताओं, भ्रष्‍ट-दुष्‍ट सरकारी कर्मचारियों और विचारशून्‍य लोगों वाले किसी देश-समाज में जीवन भला ठीक हो भी कैसे सकता है। ऐसे वातावरण में अच्‍छा सोचने व अच्‍छा काम करने वाले हैं ही कितने, जो उनकी प्रेरणा से सब ठीक हो जाएगा। जिधर देखो, उधर लालची नजरें पसरी हुई हैं। किसी को शांति, संतुष्टि नहीं चाहिए। सभी को भागना है। यहां से वहां। वहां से यहां। अंतिम उद्देश्‍य क्‍या है, यह जाने बिना, बस भागना है। इसलिए सब भागे जा रहे हैं।
हमें स्‍वयं को देखना होगा। अपना आत्‍मपरीक्षण करें। अपने मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य के बारे में सोचें। क्‍या हम खतरनाक तरीके से कुंठित व अव्‍यवस्थित नहीं हो चुके हैं? हमारी सोचने की शक्तियां बिलकुल नहीं बचीं। कुछ सोचने से पहले ही हम गुस्‍से में बोलने लगते हैं। अपना बोला गया हमें भी याद नहीं रहता। यह प्रतिदिनि का एक अभ्‍यास हो गया है कि हमें गुस्‍से में कुछ बोलना है। दुनिया-समाज की बुराइयों से पीड़ित खुद के दुख को गुस्‍से में कुछ भी बड़बड़ाते हुए या मन में गलत-नकारात्‍मक-हीन विचारों को सोचते हुए बड़ा करते जाना है।
यह सब क्‍यों हो रहा है? क्‍या कभी हमने इस बारे में सोचा है? यह सब इसलिए हो रहा है क्‍योंकि हमने अपने प्राकृतिक जीवन को आधुनिक रंग में रंग लिया है। मोबाइल, मोटरसाइकल, टेलीविजन के व्‍यर्थ नाटकों से खुद को चिपका दिया है। आधुनिक जीवन का दुरुपयोग दो देशों के बीच परमाणु युद्ध होने और प्राकृतिक आपदाओं के रूप में तो बाद में होगा पर मोबाइल, मोटरसाइकल, टेलीविजन, कम्‍प्‍यूटर और इंटरनेट के आगे खुद को समर्पित कर देने के रूप में यह आठ-दस वर्षों से खतरनाक तरीके से हो ही रहा है।
हमारा मनोविज्ञान फेसबुक की लाइक्‍स की गिनती, फ्रेंड्स लिस्‍ट की बढ़ोतरी, कौन हमें इग्‍नोर कर रहा है या कौन क्‍या लिख रहा है, आदि निरर्थक बातों तक सिमट गया है। हमें इन निरर्थक बातों के लिए केवल दो बातें याद रहती हैं। एक, मोबाइल फोन हमेशा साथ हो। दूसरा, मोबाइल हर समय चार्ज रहे। इसके अलावा हम मानव के रूप में अपनी ही नजर से ओझल हो चुके हैं। गांव, देश, धर्म तो छोड़ दीजिए। धीरे-धीरे हम अपना, माता-पिता का नाम भी भूलने लगेंगे। सोशल मीडिया पर अपने ही पैसे खर्च करके, हम प्राकृतिक रूप में मरने से पूर्व ही, अपनी बुरी तरह मरने की व्‍यवस्‍था कर रहे हैं। और मरते-मरते हम अपने दिल-दिमाग को इतना सुन्‍न, सुप्‍त और भ्रमलीन कर देंगे कि मरने के बाद हमारे शरीर से बाहर निकलने वाला हमारा आखिरी सहारा, हमारी आत्‍मा भी विलुप्‍त हो चुकी होगी।
अभी भी समय है। एक उपाय है। जिससे हमारा जीवन सरल, शांत और प्राकृतिक तरीके से बचा रह सकता है। हमें आधुनिक उपकरणों और सुविधाओं पर निर्भर रहने की अपनी आदतें धीरे-धीरे कम करते हुए एक दिन पूरी तरह खत्‍म करनी होंगी। इसके लिए हमारा मार्गदर्शन देश, नेता, पूंजीपति, व्‍यवसायी, संस्‍थान, विद्यालय या हमारे महत्‍वाकांक्षी माता-पिता नहीं करेंगे। ये लोग इसलिए मार्गदर्शन नहीं करेंगे क्‍योंकि आधुनिक उपकरणों और सुविधाओं पर हमारे निर्भर रहने से इनके आर्थिक-सामाजिक स्‍वार्थ जुड़े हैं।
जो कुछ करना है हमें खुद करना है। जिन लोगों की मजबूरी है उनका तो समझ आता है, पर जिन्‍हें मोबाइल, मोटरसाइकल, टेलीविजन, इंटरनेट आदि वस्‍तुओं-सेवाओं से कोई काम नहीं वे क्‍यों इन्‍हें अपने गले की फांस बना रहे हैं और जो लोग अपने रोजगार, काम-धंधे के लिए भी इन चीजों-सुविधाओं से जुड़े हुए हैं, उनका भी इनसे बुरी तरह मोहभंग हो चुका है। मोबाइल, मोटरसाइकल, टेलीविजन, इंटरनेट आदि चीजों से दूर रहकर हम न केवल अपने लिए अच्‍छा जीवन तैयार करेंगे बल्कि प्रकृति को बचाने में भी अपना सहयोग देंगे। सरकारें, नेता या कोई और हमारे लिए प्रकृति को नहीं बचाएगा। प्रकृति को बचाने का तरीका हमारे ही पास है। हम आधुनिक गैजेटों, वस्‍तुओं, सेवाओं और चीजों से दूर होते जाएंगे तो इन्‍हें बनानेवाले पूंजीपति, कारखाने भी बंद हो जाएंगे। और इन चीजों के लिए होनेवाला प्रकृति का दोहन भी बंद हो जाएगा।