Thursday, December 8, 2016

शहीदों के मेले और दुश्मन देश का वार्ता राग

विगत दिनों जम्‍मू कश्‍मीर स्थित नगरोटा और सांबा में आतंकियों से हुई मुठभेढ़ में हमारे 7 सैनिक शहीद हो गए। सैनिकों के शहीद होने के बारे में जानना शायद इस देश के लोगों के लिए एक सामान्‍य खबर है। तभी तो पाकिस्‍तान की ओर से जारी आतंकी घुसपैठ के एक अघोषित युद्ध में हमारे सीमा प्रहरी सैनिकों को निरंतर जूझना पड़ रहा है तथा दुख इस बात का है कि पड़ोसी होने के तमाम सामान्‍य संस्‍कार तोड़ कर खुद पर हिंसक व बदमिजाज राष्‍ट्र होने का ठप्‍पा लगा चुके पाकिस्‍तान के साथ भारत की वार्ता की गुंजाइश अभी भी ढूंढी जा रही है। जिस दिन नगरोटा-सांबा में हुए आतंकी हमले में हमने अपने सैनिक गंवाए उससे पहले दिन भारत में तैनात पाकिस्‍तानी उच्‍चायुक्‍त अपने यहां के विदेश मंत्री के साथ भारत सरकार सेे वार्ता करने की जुगत में जुटे हुए थे। और साथ ही एहसान की भाषा में कह रहे थे कि वे हमारे साथ बिना शर्त वार्ता करने को तैयार हैं।
आखिर इस देश की राजनीति को यह हो क्‍या गया है, जो पाकिस्‍तान के लिए इस तरह की कोई गुंजाइश छोड़ती है, जिसमें उसे लगता रहे कि वह तमाम गलतियां करके भी भारत की नजर में वार्ता करने लायक बना हुआ है। भारत स्थित उसके उच्‍चायुक्‍त का यह दुस्‍साहस हुआ ही क्‍यों कि वह कोई प्रेस विज्ञप्ति दे दे कि पाक वार्ता के लिए तैयार है। क्‍या वे दो-ढाई माह पहले उड़ी में शहीद भारतीय सैनिकों का बलिदान तथा उसके बाद भारतभर में आग की तरह व्‍याप्‍त पाकिस्‍तान पर आक्रमण करने तथा भारत की तरफ से उसकी जलापूर्ति रोकने की जनभावना को भूल गए?
कोई देश तब बनता है जब उसका एक-एक नागरिक वहां अपने कर्तव्‍यों के निर्वहन में लगकर देश चलानेवालों से अपनी सुरक्षा की भावना रखता है। कर्तव्‍य निर्वाह करने में तो नागरिक लगे हुए हैं परंतु राष्‍ट्रीय-अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर की राजनयिक व्‍यवस्‍था के दोषों और सड़ी हुई कार्यप्रणाली के कारण नागरिकों का जीवन सुरक्षित नहीं है। विशेषकर सैनिकों और किसानों का जीवन तो विगत 70 वर्षों से इस देश में सरकारी सुरक्षा की कागजी छतरी के बावजूद असुरक्षित ही बना रहा।
राष्‍ट्र के लिए कर्तव्‍य निर्वाहक के रूप में सैनिक और किसान से बढ़कर कौन हो सकता है। और जब हमारे एक नहीं कई सैनिक निरंतर उस देश की तरफ से उत्‍पन्‍न आतंकी हमलों और सैन्‍य उकसावे की गतिविधियों में अपनी कीमती जानें गंवा रहे हों, जो बिना मतलब खून-खराबे को पसंद करता हो तो ऐसे में कम से कम शहीद सैनिकों के अंतर्मन में राष्‍ट्र का अस्तित्‍व धुंधला ही जाएगा। इस प्रकार देश के लिए जान देना उनके लिए फि‍र एक बड़ी देशभक्ति की भावना नहीं रह जाती। यह उनके मन की बात होती है। इसे वे कभी बाहर नहीं निकालते। लेकिन हमें समझना होगा कि बिना किसी घोषित युद्ध के एक देश के सैनिकों का ऐसे ही किसी देश की धार्मिक कार‍गुजारियों के कारण मर जाना कहां और कब तक सहन हो सकता है। 
यदि कर्तव्‍यपरायणता की बात होती है तो हमारे सैनिक अपने देश के लिए ही नहीं बल्कि शांति सैनिक बनकर मित्र देशों के लिए भी सैन्‍यकर्मी के रूप में अपना सर्वस्‍व झोंक देते हैं, अपनी जान की परवाह नहीं करते। लेकिन पाकिस्‍तान की ओर से जारी उकसावे वाले आतंकी युद्ध में षडयंत्र के तहत अपनी जान गंवाना हमारे सैनिकों को भी गवारा नहीं होगा। जो लोग कहते हैं कि युद्ध किसी समस्‍या का हल नहीं उनसे केवल एक प्रश्‍न है। क्‍या वे शहीद सैनिकों के स्‍थान पर खुद को रखकर या उनकी भावना से मौत का साक्षात्‍कार करते हुए कभी कह सकते हैं कि युद्ध समस्‍या का हल नहीं। और फि‍र युद्ध लड़े जाने की शुरुआत इसी युग में तो नहीं होगी। धर्मग्रंथों में समाहित, हजारों वर्षों का प्रामाणिक इतिहास हमें बताता है कि एक-दूसरे के परिक्षेत्रों पर अधिकार जमाने की मंशा से दुनिया में युद्ध हमेशा से होते रहे हैं। युद्ध नहीं करने की भावना अगर इतनी बलवती होती तो आज दुनिया में विभिन्‍न देशों का अस्तित्‍व नहीं होता तथा विश्‍वभर में हथियारों का कारोबार लाइसेंसशुदा नहीं होता। उस पर पूर्ण प्रतिबंध लग गया होता। इन परिस्थितियों में एक अद्वितीय संवेदना जटिल प्रश्‍न बनकर खड़ी होती है कि आखिर युद्ध न होने पर भी संसार में सुखी है कौन।
हम ज्‍यादा पीछे न जाकर एक वर्ष पूर्व पठानकोट के वायु सैनिक केंद्र पर हुए आतंकी हमलों से लेकर उड़ी में शहीद सैनिकों तथा सीमा पार सर्जिकल स्‍ट्राइक होने के बाद लगभग प्रतिदिन शहीद, घायल होनेवाले हमारे सैनिकों के बारे में सोचें तो एक विषाद मन में घर कर जाता है कि अंतत: हमारी रक्षा नीति को कब तक धैर्य के उपबंधों से लिपटे रहना होगा। हमारे सैन्‍यकर्मी एक-एक दो-दो करके शहीद होने पर लगे हुए हैं। शहीदों का वास्‍तविक सांख्यिकीय ब्‍यौरा रखकर भारत-पाकिस्‍तान के रिश्‍तों पर बात करना बिलकुल वैसा ही होगा जैसे कोई किसी को बार-बार विष दे और विष पीनेवाला हर बार बच जाने पर फि‍र विष पिलानेवाले से दोस्‍ती की आशा रखे। पाकिस्‍तान के राष्‍ट्रीय चरित्र में वह राजनीतिक मंशा कभी नहीं होगी कि वह अपने यहां आतंक पर पूरी तरह नियंत्रण पा लेगा। और यदि ऐसा नहीं होगा तो सीमा पर तैनात हमारे निर्दोष सिपाहियों के निरंतर बलिदान पर रोक लगाना बहुत मुश्किल होगा।
हमारी रक्षा नीति में पाकिस्‍तान को लेकर वहां सेना प्रमुख बदले जाने के बाद या उसके द्वारा बिना शर्त वार्ता के लिए तैयार होने की दोनों स्थितियों में कोई समझौतापरक परिवर्तन बिलकुल नहीं होना चाहिए। चाहे भारत-पाकिस्‍तान के तनावपूर्ण रिश्‍ते हों या इस आधार पर दुनिया की राजनीतिक अथवा सामरिक महत्‍वाकांक्षाएं, तय है कि परमाणु और नाभिकीय विस्‍फोट में दुनिया के खत्‍म होने तक पाकिस्‍तान का भारत के साथ दुर्व्‍यवहार जारी रहेगा।
इन परिस्थितियों में हमारी कोशिश यही हो कि पाक के साथ वार्ता के सभी रास्‍ते बंद करके पहले खुद के स्‍तर पर अन्‍यथा विश्‍व बिरादरी को साथ लेकर उसके भीतर के आतंक को उसके चीं-चुपड़ के बिना हमेशा के लिए खामोश कर दिया जाए। इसके बाद यदि वह सुधरने का प्रयास करेगा तो उसके साथ वार्ता की जा सकती है। फि‍लहाल तो सीमा पर अपने सैनिकों के शहीद होने के समाचारों से संवेदनशील भारतवासी संत्रासित हैं। सरकार को पाकिस्‍तान के साथ कोई भी वार्ता करने से पूर्व शहीद और घायल हुए सैनिकों तथा उनकी जैविक भावनाओं के साथ जुड़ी देशवासियों की भावनाओं को अवश्‍य समझना चाहिए।
विकेश कुमार बडोला

Thursday, December 1, 2016

ट्रंप विरोध का निरर्थक प्रलाप

मेरिकी राष्‍ट्रपति चुनाव में रिपब्लिकन उम्‍मीदवार डोनाल्‍ड ट्रंप के‍ विजयी होने का झटका यूरोपीय तथा शेष दुनिया के वामपं‍थियों को निरंतर बेचैन किए हुए है। विगत दिनों 45वें अमेरिकी राष्‍ट्रपति के रूप में ट्रंप की विजय-घोषणा से पूर्व तक येन-केन-प्रकारेण विश्‍व-बिरादरी की मीडिया उन्‍हें पराजित व चुका हुआ व्‍यक्ति मान चुका थी। इस बारे में अमेरिकी मीडिया सहित वामपंथियों का प्रतिनिधित्‍व करनेवाले संसारव्‍यापी मीडिया ने ट्रंप के विरोध में अथक प्रचार-प्रसार किया, उन्‍हें राष्‍ट्रपति के रूप में न चुने जाने के लिए भरसक कोशिश करी।

बड़े-बड़े समाचारपत्रों के लिए वर्षों से अंग्रेजी व हिंदी सहित अन्‍य भाषाओं में स्‍तंभ लिखनेवाले तथाकथित विद्वानों ने अनेक निरर्थक कारणों से डेमोक्रेटिक राष्‍ट्रपति उम्‍मीदवार हिलेरी क्लिंटन के बारे में पहले से ही धारणाएं बना ली थीं जिनका गुप्‍त मंतव्‍य किसी प्रकार हिलेरी को चुनाव में जिताना था। यदि मीडिया के बार में यह बात सत्‍य है तो फि‍र संसार का मीडिया अपने आप में एक घृणास्‍पद सूचना तंत्र बनकर ही रह गया है। इस परिस्थिति में तो लगता है कि दीर्घकालीन जनसरोकारों के बारे में सोच-समझ कर उन्‍हें प्रकाशित-प्रसारित करने की मीडिया की त‍टस्‍थ तथा निष्‍पक्ष दृष्टि बाधित हो चुकी है। वास्‍तव में अमेरिकी राष्‍ट्रपति चुनाव को लेकर इससे पूर्व इतना षड्यंत्रकारी पूर्वानुमान मीडिया ने कभी नहीं बनाया जितना कि इस बार। चुनावों के लिए उम्‍मीदवारी तय होने के उपरांत ही यह षड्यंत्र अमेरिका सहित पूरी दुनिया में वामपंथी विचारकों का संक्रमण रहा। इसकी मंशा डोनाल्‍ड ट्रंप को किसी तरह राष्‍ट्रपति के रूप में अयोग्‍य घोषित कर उनके विरुद्ध अमेरिकी मतदाताओं को हतोत्‍साहित करना था।

अमेरिका दुनिया में आधुनिकता के सर्वश्रेष्‍ठ मानदंडों पर चलनेवाले राष्‍ट्रों में सर्वोपरि है। वर्तमान जन-जीवन अनेक जैविक सुविधाओं तथा संसाधनों के रूप में जो कुछ प्राप्‍त कर रहा है उसका आभार अमेरिका को अधिक जाता है। आधुनिक जीवन को संभालने के लिए जो राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक-सामरिक तथा अन्‍य सार्वजनिक राष्‍ट्रीय मानदंड किसी राष्‍ट्र को अपने लिए चाहिए होते हैं उन्‍हें अपनाने, पालने-पोषने में भी अमेरिका विगत शताब्दियों से दुनिया के देशों के लिए अनुकरणीय रहा है। स्‍वाभाविक है इन परिस्थितियों में दुनिया के देशों के लिए अमेरिकी राष्‍ट्रपति चुनाव सदैव ही प्रमुख समाचार रहा। क्‍योंकि इस आधार पर ही उनके विश्‍व के सबसे शक्तिशाली देश व सबसे सामर्थ्‍यवान इसके राष्‍ट्रपति के साथ विभिन्‍न व्‍यापारिक लाभों, सामाजिक संबंधों तथा सामरिक आवश्‍यकताओं के लिए संबंध स्‍थापित हो सकते हैं।

परंतु विगत दिनों यह देखकर घोर आश्‍चर्य हुआ कि बहुमत से चुने गए सबसे शक्तिशाली व्‍यक्ति डोनाल्‍ड ट्रंप के विरुद्ध डेमोक्रेटिक राजनीतिक दल के समर्थक अमेरिकी लोग सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। उनकी घोषणा थी कि वे ट्रंप को अमेरिका का राष्‍ट्रपति मानने के लिए तैयार नहीं होंगे। एक सफ्ताह तक हजारों प्रदर्शनकारी न्‍यूयार्क, लॉस एंजिलिस और शिकागो में लोकतांत्रिक तरीके से बहुमत के आधार पर नवनिर्वाचित राष्‍ट्रपति ट्रंप के विरुद्ध नारे लगाते रहे। उनका कहना था कि वे ट्रंप की आश्‍चर्यजनक विजय के विरुद्ध हैं। न्‍यूयार्क में लोगों ने ट्रंप के आवास के निकट भी अपना विरोध प्रदर्शित किया।

ट्रंप का राष्‍ट्रपति के रूप में चुनाव बहुमत के आधार पर हुआ है। यह अमेरिका की लोकतांत्रिक प्रणाली के अंतर्गत ही संपन्‍न हुआ। तब भी आज अमेरिका के अनेक प्रांतों में यदि ट्रंप का विरोध हो रहा है तो उसका एकमात्र कारण यही है कि ऐसे लोगों को भड़कानेवाली वामपंथी विचारधारा बुरी तरह से खतरे में पड़ चुकी है, जो विश्‍व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के बहुमत को धता बताकर अपना बेकार शून्‍य प्रतिरोध प्रकट करने पर तुली हुई है।

जिन बहुसंख्‍यक लोगों ने रिपब्लिकन राजनीतिक दल के उम्‍मीदवार ट्रंप को अपना राष्‍ट्रपति चुना है क्‍या वे अमेरिकी सड़कों पर ट्रंप का विरोध कर रहे लोगों से कम लोकतांत्रिक अधिकार वाले नागरिक हैं? क्‍या ट्रंप समर्थक अधिसंख्‍य मूल अमेरिकी लोग, प्रवासियों के रूप में अमेरिका में बसे व कालांतर में वहां की नागरिकता ग्रहण करनेवालों से कम अधिकार संपन्‍न हैं जो वे अपने ही देश में अप्रवासी मुसलिमों, अश्‍वेतों, अफ्रीकियों, नाइजीरियायियों तथा विशेषकर अप्रवासी एशियाई मुसलिमों का विरोध झेलें? क्‍या इन परिस्थितियों में अमेरिका के अपने क्षेत्रीय और सीमांकन अधिकार आप्रवासन सिद्धांतों तथा अप्रवासियों की अति अधिकारपूर्ण मंशा के कारण खतरे में नहीं हैं? यह बात केवल अमेरिका ही नहीं बल्कि अन्‍य अनेक देशों पर भी लागू होती है। आखिर में इन आत्‍मघाती आप्रवासन अधिकारों पर चलने की परिस्थितियां किसी देश को अपने मूल स्‍वरूप में रहने भी दे सकती हैं या नहीं?

यह अति महत्‍वपूर्ण प्रश्‍न है जो अप्रवासियों के अधिकारों तथा इस संदर्भ में मानवाधिकार का व्‍यापार करनेवालों से अवश्‍य पूछा जाना चाहिए। यदि भारत में भी अप्रवासी भारतीय मोदी का इसलिए विरोध करने लगें कि वे मुसलिम आतंकवादियों पर प्रतिबंध लगाने को संकल्‍पबद्ध हैं तो यह विरोध अमेरिका सहित किसी भी दूसरे देश में मूल्‍यांकन योग्‍य नहीं हो सकता। विचार यह भी होना चाहिए कि आखिर उन परिस्थितियों में किसी राष्‍ट्र की अपनी राष्‍ट्रीय स्‍वायतत्‍ता क्‍या रह जाती है जब अप्रवासी नागरिक अपनी घातक मंशाओं को उस राष्‍ट्र के लोकतांत्रिक अस्तित्‍व पर थोपने पर उतारू हो जाएं।

ट्रंप यदि राष्‍ट्रपति के उम्‍मीदवार के रूप में चुनाव अभियानों में अमेरिका को आतंकवाद, भ्रष्‍टाचार सहित दूसरी बुराइयों से बचाने का संकल्‍प लेते हुए दिखे तथा इस उपक्रम में उन्‍होंने आतंक के केंद्र में विचाराधीन आत्‍मघाती मुसलिम विचारधारा को लक्ष्‍य कर उस पर नियंत्रण की बात करी तो इसमें गलत क्‍या हुआ। इसका मंतव्‍य यह तो नहीं कि वह सज्‍जन मुसलिमों को भी आतंकवादी समझेंगे। यदि उनके इस संकल्‍प से दुनिया में आतंकवाद समाप्‍त होता है या आतंकी समूहों में बौखलाहट होती है तो समझा जाना चाहिए कि वे आतंक को वास्‍तव में समाप्‍त करने के लिए कटिबद्ध होंगे। यह तो दुनिया के लिए अच्‍छा ही सिद्ध होगा। तब क्‍यों उनके विरोध को सड़क से लेकर विचारों तक में स्‍थान दिया जा रहा है। य‍ह बात समझकर ऐसी विरोधी विचारधारा को सड़क से लेकर मीडिया घरानों तक प्रतिबंध करने की आवश्‍यकता अब आन पड़ी है। ट्रंप का इस तरह का विरोध आइएस जैसे आतंकी समूहों का गुप्‍त समर्थन ही है, जो आदर्श विश्‍व के समर्थकों को कभी भी किसी स्थिति में सहन नहीं हो सकता।
विकेश कुमार बडोला

Friday, November 11, 2016

सोशल मीडिया की गति-दुर्गति

ब से सोशल मीडिया अस्तित्‍व में आया, पारंपरिक पत्रकारिता की सच्‍चाई सामने आ गई। सोशल मीडिया के जितने भी उपक्रम हैं, उनके निर्माण के पीछे की भावना पहलेपहले यह बिलकुल नहीं थी कि ये आम आदमी की अभिव्‍यक्ति के लिए हैं और इनसे दुनिया के सभी लोगों को स्‍वयं को अभिव्‍यक्‍त करने का एक अवसर मिलेगा। सोशल मीडिया के माध्‍यमों का एकमात्र और सोचा-विचारा गया उद्देश्‍य सूचना प्रौद्योगिकी व्‍यापार के आधार पर धनार्जन करना था। इसलिए जिस देश में सूचना प्रौद्योगिकी उपक्रमों और संसाधनों का जितना अधिक विकास हुआ, उस देश के श्रेष्‍ठ सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों ने इनफॉर्मेशन मोबिलाइजेशन यानि चल-सूचना तंत्र विकसित किए और आज इससे खूब धनार्जन कर रहे हैं।

          आज फेसबुक, ट्विटर, इंस्‍टाग्राम, लिंक्‍ड इन, व्‍हाट्स ऐप जैसे वर्तमान लोकप्रिय सोशल मीडिया माध्‍यमों से जुड़कर लोग स्‍वयं की बातों, अनुभवों और जिज्ञासाओं को प्रकट कर रहे हैं। विशेषकर सहस्राब्दियों की अस्‍वस्‍थ मानवीय सोच-समझ के परिणामस्‍वरूप पनपी मनुष्‍यों की कुंठाएं आज के युग के मनुष्‍यों द्वारा सोशल मीडिया के माध्‍यमों पर स्‍पष्‍ट रूप से इस तरह प्रकट हो रही हैं कि सोशल मीडिया खुद के सदुपयोगी स्‍वरूप से विमुख होकर विभिन्‍न लोगों के मध्‍य अनेक अनावश्‍यक विषयों पर वाद-विवाद करने का खतरनाक अड्डा बन चुका है।

          सोशल मीडिया के दुष्‍परिणाम इसके प्रयोगकर्ता दो विपरीत विचारों के व्‍यक्तियों को केवल अपने मंच पर ही वैरी नहीं बना रहे बल्कि इसका प्रभाव व्‍यक्तियों के सामान्‍य जीवन में भी देखा जा सकता है। व्‍यक्ति सोशल मीडिया की लत में इतना डूब चुका है कि वह इससे, जितना संभव हो, हर समय जुड़ा रहना चाहता है और अपने द्वारा लिखी गई किसी बात या प्रस्‍तुत किए गए किसी चित्र पर अपने सोशल मीडिया मित्रों की पंसद और टिप्‍पणियों की प्रतीक्षा में कई सूचना प्रौद्योगिकी जनित भ्रमों, रोगों और लिप्‍साओं से घिरता जा रहा है।

सोशल मीडिया के साथ बने रहने की लत के कारण अधिकांश लोगों का सामान्‍य जीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। लोग खाना-पीना और अन्‍य दैनिक गतिविधियां भूलकर इससे चिपके हुए हैं। सोशल मीडिया के कतिपय मंचों जैसे फेसबुक, ट्विटर और व्‍हाट्स ऐप पर बड़ी जनसंख्‍या की आसन्‍न व्‍यस्‍तता की स्थिति यह है कि उसे प्रतिपल-प्रतिदिन मानव जीवन की अनुभूति से विरक्ति हो रही है। ऑनलाइन बहु स्‍तरीय भ्रमावरण रोग से ग्रस्‍त होकर न चाहते हुए भी अधिकांश लोग धीमे-धीमे मशीन में परिवर्तित हो रहे हैं।

कैसी विडंबना है कि एक ओर तो सूचना प्रौद्योगिकी के समस्‍त उपक्रम व्‍यापार करने और पैसा कमाने का शक्तिशाली तंत्र बने हुए हैं, तो दूसरी ओर सार्वजनिक जनसंचार के रूप में यह अरबों लोगों की चेतन-अवचेतन भावनाओं-दुर्भावनाओं के ज्‍वार से निकली अभिव्‍यक्तियों के माध्‍यम भी बने हुए हैं। जैसे कि मानव जीवन में किसी भी बात, घटना, सेवा, संसाधन और विचार के अच्‍छे-बुरे दोनों पहलू होते हैं, वैसे ही सूचना प्रौद्योगिकी के अंतर्गत सोशल मीडिया माध्‍यमों के भी हैं। लेकिन चिंताजनक प्रश्‍न है कि बाकी क्षेत्रों की तरह इस क्षेत्र के अच्‍छे-बुरे पहलुओं का मूल्‍यांकन कौन करेगा। कौन यह निर्णय करेगा और कैसे यह सहज ही सर्वमान्‍य होगा कि सोशल मीडिया का यह पहलू अच्‍छा या वह पहलू बुरा है। इसी तरह अनेक लोगों के विचारों का अध्‍ययन कर कौन यह निर्धारित करेगा कि यह विचार मूल्‍यवान है या वह विचार मूल्‍यहीन तथा कैसे मूल्‍यवान व मूल्‍यहीन विचार निर्धारित करनेवाले व्‍यक्ति का इस कार्यक्रम के लिए जीवनोचित योग्‍यता के बहुमत के आधार पर चयन हो सकेगा। ये कुछ प्रश्‍न हैं, जो अभिव्‍यक्ति के नाम पर व्‍याप्‍त जन भावनाओं और दुर्भावनाओं से पटे पड़े सोशल मीडिया माध्‍यमों को देखने के बाद स्‍वत: ही मन-मस्तिष्‍क में आ रहे हैं।

          केवल सोशल मीडिया ही नहीं अपितु मुख्‍यधारा के मीडिया में भी कई समूह हैं, जो जीवन की अच्‍छी-बुरी विचारधाराओं में बंटे हुए हैं। कुछ समूह मानव जीवन की आस्तिक धारणाओं का समर्थन करते हुए जनसंचार का दायित्‍व संभाल रहे हैं, तो कुछ समूह नास्तिक विचारों से सहमति प्रदर्शित करते हुए उस प्रकार का जनसंचार बना रहे हैं।

मनुष्‍य जब तक अपरिपक्‍व होता है, वह इनमें से किसी भी समूह की ओर आकर्षित हो सकता है। बल्कि अपरिपक्‍व मानव तो उत्‍तरदायित्‍वों से हीन नास्तिक विचारों के पोषक जनसंचार समूहों के प्रति शीघ्र लगनशील हो जाता है। निस्‍संदेह परिपक्‍व होने और अपने विवेक से सोचने-विचारने की अवस्‍था में उसे नास्तिक विचारों का जनसंचार समूह अरुचिकर लगने लग जाए या उसे उस पर अनास्‍था होने लगे, लेकिन उस पर नास्तिक विचारों का प्रारंभिक दुष्‍प्रभाव जीवनभर रहता है। एक प्रकार से वह आस्तिक होने की इच्‍छा रखते हुए भी और नास्तिकता के दुष्‍चक्र से बाहर न निकल सकने की विवशता के कारण वैचारिक रूप से किंकर्त्‍तव्‍यविमूढ़ हो रहता है। वह अंतत: दो विपरीत विचारधाराओं के कारण दोनों के प्रति मध्‍यमार्गी बन जाता है तथा यही स्थिति मनुष्‍य के लिए सबसे अधिक हानिकारक है। इस तरह वह अपना जीवन बर्बाद ही कर देता है।

दूसरी ओर आस्तिक भाव-विचारों के साथ प्रारंभ से जुड़े मानवों का जनसंचार भी श्रेष्‍ठ होता है। उनमें परस्‍पर सेवा, कल्‍याण, प्रेम, उदारता, परोपकार की सद्भावनाएं विकसित होती हैं जिनके बल पर वे अपने जीवन को प्रतिपल सार्थक करते चलते हैं। ऐसे लोग नास्तिक लोगों के लिए भी मित्र होते हैं, उनके लिए भी उदारता रखते हैं। लेकिन चूंकि नास्तिक लोग असुर होते हैं, उनकी नियति में सदाचरण और सन्‍मार्ग अपनाना नहीं होता, इसलिए वे सदैव आस्तिकता के सिद्धांतों और आस्तिक लोगों से वैर-भाव बनाए रखते हैं। उनका ज्ञान उन्‍हें इतना भी उदार नहीं बना सकता कि वे आस्तिक-नास्तिक के द्ंवद से निकलकर जीवन में सामान्‍य मानवीय संबंध स्‍थापित कर पाएं या प्रमुदित होकर एक-दूसरे का अभिनंदन कर पाएं।

आज सोशल मीडिया पर ऐसे ही आस्तिक और नास्तिक लोगों का विचार-युद्ध चल रहा है। नास्तिक लोगों के विवादों और कुतर्कों की स्थिति यह है कि यदि आस्तिक-समूह के व्‍यक्ति कहते हैं कि शुद्ध जल के सेवन से स्‍वस्‍थ हो सकते हैं तो नास्तिक शक्ति के मोहपाश में बंधे लोग शुद्ध जल को भी ईर्ष्‍या भाव से देखने लगते हैं। यदि नास्तिक-समूह के लोगों के साथ अनेक विषयों से संबंधित वाद-विवाद की प्रतिपल की तनातनी से मुक्ति के लिए आस्तिक-समूह के लोगों द्वारा उन्‍हें विचार-युद्ध से अलग मल-युद्ध के लिए चुनौती दी जाती है तो वे कायरों की तरह अपने कुतर्की विचारों को ओढ़ चुप्‍पी साध लाते हैं।

          शास्‍त्रों में उद्धृत है कि विसंगत विचारों का समर्थन करनेवालों को पहले प्रेम व शांति से समझाया जाता है किंतु धर्म की मर्यादा के अंतर्गत इसकी भी एक सीमा होती है और यदि यह सीमा समाप्‍त हो जाती है, तो विसंगत विचारों के समर्थकों का संहार करना ही पड़ता है ताकि संसार में मानवीयता का धर्म बचा रहे।

          भारत में नास्तिक व आसुरी लोगों, कई वर्षों तक जीवन को कुतर्कों से परिचालित करते हुए आए विचारकों और इनके वर्षों के वैचारिक राज को अंत करने का शंखनाद हो चुका है। सोशल मीडिया इसमें देश का साथ दे रहा है, तो यह प्रसन्‍नता की बात है। यदि सोशल मीडिया के इस अभियान में कुछ अनर्गल भी होता है, तो उसकी यह समझकर अनदेखी की जानी चाहिए कि यह अभियान सहस्राब्दियों की अनर्गल सामाजिक-राजनीतिक सत्‍ता के नास्तिक-कुतर्की-विवादित संचार व्‍यवस्‍था को ध्वस्‍त करने के लिए ही प्रारंभ हुआ है। निस्‍संदेह लोगों द्वारा सोशल मीडिया इंटरनेट साइट से जुड़ने और उसमें अधिकाधिक समय व्‍यतीत करने का लाभ अमेरिकी व चीनी सोशल मीडिया साइट नियंत्रक कारोबारियों को ही क्‍यों न हो, परंतु यह उपक्रम दीर्घकालीन भारतीय-विचार स्‍थापना के लिए अब उस मीडिया से तो लोगों को छुटकारा दिलाने लगा है जो अंग्रेजों से भी अधिक अमानवीय शासकों-प्रशासकों की छत्रछाया में पिछले 70 वर्षों से जनमानस को हांक रहा था, राजनीतिक दलों व इनके नेताओं के संकेतों पर परिचालित होता आ रहा था।

लेकिन सोशल मीडिया वेबसाइटों में भी ऐसा सद्प्रयास कुछेक लोगों द्वारा ही किया जा रहा है। शेष लोगों की भीड़ तो इस पर अनावश्‍यक और व्‍यर्थ कथोपकथन को प्रसारित करने तथा उस पर क्रिया-प्रतिक्रिया देने पर ही लगी हुई है, जिसका कदाचित सदियों के वैचारिक पृष्‍ठांकन में कुछ भी मूल्‍यांकन न हो सकेगा। 

विकेश कुमार बडोला

Monday, October 17, 2016

भाषाई समझौता केवल हिन्‍दी में ही क्‍यों हो

ल्‍पना करिए यदि हम अमेरिका या किसी दूसरे देश में होते और तब हिन्‍दी दिवस मनाते तो यह भारत और भारतीय राजभाषा हिन्‍दी के लिए महत्‍वपूर्ण होता। परंतु अपने ही देश में अपनी ही राजभाषा के लिए हिन्‍दी दिवस मनाना राजभाषा के लिए सम्‍मान है या उसका अपमान, इस पर भावपूर्ण विवेचन किए जाने की अति आवश्‍यकता है। हिन्‍दी भाषा तीन प्रमुख समस्‍याओं से अधिक जूझ रही है। पहली, हिन्‍दी के राजभाषायी स्‍वरूप का जन-जन में स्‍थान न बना पाना। राजभाषा की धारणा बनाने वालों द्वारा इसके व्‍यापक प्रसार के लिए देश के विद्यालयों में इसका समुचित भाषाई क्रियान्‍वयन नहीं कराया जाना। दूसरी समस्‍या राजभाषा हिन्‍दी को पचास वर्षों से भी अधिक समय तक न तो शासकीय और ना ही निजी प्रतिष्‍ठानों में पत्रकारिता की भाषा बनाया गया। तीसरी और सबसे बड़ी समस्‍या जो रही, वह थी हिन्‍दी भाषा का पत्रकारिता के रूप में स्‍वयंमेव मनचाहा प्रयोग होना। इसका दूरगामी दुष्‍परिणाम यह हुआ कि आज भारतीय राष्‍ट्र की राजभाषा हिन्‍दी को अपने साथ चाहे-अनचाहे उस मानवीय समाज, समूह और व्‍यापारियों की मुंहबोली व सर्वथा भावहीन तथा आडंबरपूर्ण शब्‍दों से युक्‍त कथ्‍य-भाषा का प्रयोग करना पड़ रहा है जो भारतीय धर्म-संस्‍कृति-सभ्‍यता की धारणाओं को कुचलने के लिए पृथ्‍वी पर हजारों वर्षों से आक्रांता बन घूम रहे हैं। ऐसे आक्रांता कभी तुर्कों, कभी मुगलों तथा कभी अंग्रेजों के वेश में रहे। आज भी हिन्‍दी भाषा जहां-जहां खटकती है तथा हिन्‍दी के संवेदनशील सृजक को भाषायी विरोधाभास कराती प्रतीत होती है, उसका कारण आक्रांताओं के आडंबरपूर्ण व भावहीन शब्‍दों का हिन्‍दी से मिल जाना ही रहा।  
       
        कुछ लोग उर्दू भाषा के हिन्‍दी में लिखे जानेवाले शब्‍दों को बड़ा महत्‍व देते हैं। वे कहते हैं कि समाज में यही शब्‍द आम बोलचाल में ज्‍यादा शामिल हैं तो लिखने के लिए भी इनका ही प्रयोग किया जाना जरूरी है। इस अभियान को भारतीय हिन्‍दी समाचारपत्रों और डेढ़ दशक पहले अस्तित्‍व में आए इलेक्‍ट्रानिक मीडिया ने समर्थन ही नहीं दिया, सराहा ही नहीं, बल्कि इसका अपने-अपने स्‍तर पर क्रियान्‍वयन भी खूब किया। समाचारपत्र वास्‍तव में आम बोलचाल के उर्दू शब्‍दों से भरे होते हैं। विशेषकर जिन पढ़े-लिखे लोगों पर वामपंथ का असर रहा, उन्‍होंने तो आम जीवन में बोले जानेवाले उन शब्‍दों का अपने लेखन में खूब इस्‍तेमाल किया, जिनके शब्‍द का शब्‍द से ही अर्थ नहीं समझा जा सकता। संस्‍कृत से निकली देवनागरी, हिन्‍दी, मैथिली, बिहारी, बंगला, तमिल, तेलुगू, उड़िया, गढ़वाली, कुमाउंनी आदि प्रादेशिक भाषाओं का भाषाई एकता के रूप में जो प्रयोग हिन्‍दी लेखन-सृजन में सर्वश्रेष्‍ठ तरीके से हो रहा था उसमें उर्दू, अरबी, फारसी, अंग्रेजी और अन्‍य यूरोपीय भाषाओं ने एक भाष्‍य-रुकावट उत्‍पन्‍न कर दी। इन भाषाओं के शब्‍दों का हिन्‍दी और संस्‍कृत से निकली प्रादेशिक भाषाओं के शब्‍दों के साथ जो विवशतापूर्ण मेल हुआ उसने हिन्‍दी की उपयोगिता, स्‍वच्‍छंदता, स्‍वाध्‍याय आधारित उसके शिक्षण और उसके प्रति भाषाई आकर्षण को सीमित कर दिया।
       
        जब कहा जाता है कि आम बोलचाल की भाषा में लिखना चाहिए, यह भाषा लोगों को आसानी से समझ आती है और इसी से आम लोगों को विद्वतजनों के सोचने-समझने के तौर-तरीके सीखने के लिए प्रेरित किया जा सकता है, तब मन में एक सहज जिज्ञासा प्रकट होती है कि क्‍या वास्‍तव में आम बोलचाल की भाषा लिखने योग्‍य है, क्‍या वास्‍तव में विद्वतजनों का सोचने-समझने का तरीका सीखने-सिखाने योग्‍य है और क्‍या आम लोगों के अनुसार भाषा निर्धारित करने के स्‍थान पर समाज के विद्वानों का यह कर्तव्‍य नहीं कि वह श्रेष्‍ठ भाषागत व्‍यवहार आम लोगों को सिखाएं?
       
        आम बोलचाल में तो अपशब्‍दों, अश्‍लील बोलियों-गालियों, निर्लज्‍ज बातों, असभ्‍य लोकोक्तियों और बिना किसी सशक्‍त भाषाई आधार के ऐसी मिश्रित भाषा बोली जाती है, जिसे सुनकर लगता है कि क्‍या भाषा के रूप में समाज में व्‍याप्‍त इन भाषाई विकारों के साथ समझौता कर लिया जाना चाहिए? आज जिस तरह लोग सामान्‍य भाषा व्‍यवहार करते हैं, उसका प्रयोग तो केवल उपन्‍यास, कथा-कहानियों में समाज के सच को व्‍यक्‍त करने के लिए किया जा सकता है। समाचारपत्रों और इलेक्‍ट्रानिक मीडिया वालों को तो ऐसी भाषा रचनी चाहिए जो सभ्‍य समाज का एक अंग बने। जिसका प्रयोग करते समय लोगों को अपने जीवन में भाषाई उत्‍कृष्‍टता का अनुभव हो।
       
        फि‍र जिस जेएनयू के पोषक वामपंथ के कारण (दरअसल, लिहाजा, बहरहाल, मसलन जैसे शब्‍द वास्‍तव में, इसलिए, जो भी है, जैसे के स्‍थान पर) हिन्‍दी की देवनागरी लिपि में बिना किसी विचार के लिप्‍त हो गए और निरंतर प्रयोग में बने हुए हैं, उनका उद्देश्‍य तो आम बोलचाल के रूप में केवल उर्दू और अंग्रेजी का मिश्रण परोसने से था। 'नाबालिग', 'हिरासत', 'गिरफ्तार', 'तनख्‍वाह' जैसे कई उर्दू-अरबी शब्‍दों को आम बोलचाल की भाषा के शब्‍दों के रूप में स्‍वीकार कर लिया जाता है लेकिन 'अवयस्‍क', 'कारावास', 'अभिरक्षा' 'वेतन' जैसे सहज-सरल-सुनियोजित हिन्‍दी शब्‍दों को मेरे जैसे लोगों द्वारा अपने आम जीवन में और भीतर हृदय में अनुभव किए जाने के उपरान्‍त भी आम बोलचाल की भाषा के रूप में अधिमान नहीं मिलता। मैं एक गंभीर व्‍यक्ति हूं। जो कुछ सोचता हूं और सोचने की प्रक्रिया में भाषा का जो प्रवाह होता है उसमें लिहाजा, दरअसल, बहरहाल जैसे शब्‍दों के लिए कोई स्‍थान नहीं होता। ऐसे में मैं अपने हृदय की भाषा के स्‍थान पर संवाद, लेखन के लिए बाहरी या मुझे अरुचिकर भाषा कैसे लिखूंगा या लिख सकता हूं?
       
        भाषा के विषय में उदारता अपनाने की बात होती है तो यह शर्त केवल समस्‍त भारतीय भाषाओं का सौंदर्यगत और शिल्‍पगत प्रतिनिधत्‍व करनेवाली भाषा हिन्‍दी के लिए ही क्‍यों हो? अंग्रेजी, उर्दू, अरबी, फारसी और अन्‍य यूरोपीय भाषाओं में तो हिन्‍दी के लिए उदारता नहीं दिखाई जाती। इन भाषाओं की लिपि में कहीं या कभी भी 'सूर्य', 'शशि', 'नभ', 'प्रकृति' आदि शब्‍दों का उल्‍लेख नहीं किया जाता। तब सारे भाषाई प्रयोग हिन्‍दी में ही क्‍यों हों? विशेषकर जब हिन्‍दी भाषा अपने आप में हर कोण से सशक्‍त हो तब तो इसमें कई कमजोर आधारों पर खड़ी भाषाएं सम्मिलित करके इसे सुदृढ़ नहीं शक्तिहीन ही किया जा सकता है।
       
        जब कोई लेखक साहित्‍य या पठन-पाठन की प्रवृत्ति में स्‍वानंद प्राप्‍त करने लगता है तो उसे मेरे द्वारा उठाई गई उपर्युक्‍त भाषाई आपत्तियां अवश्‍य दिखनी शुरू हो जाती हैं। अपने किसी जैव या जीवन-निर्वाह हित के कारण वह इन आपत्तियों का प्रत्‍यक्ष विरोध भले न करता हो, किंतु कहीं न कहीं उसके हृदय में खटास तो पड़ ही जाती है कि अन्‍य भाषाओं के विचित्र शब्‍दों को मिलाकर हिन्‍दी के साथ भाषाई दुराग्रह तो चल ही रहा है। 
       
        हिन्‍दी भाषा के शब्‍दों में शब्‍द के अर्थ उसके एक, दो, तीन, चार या कितने ही अक्षरों में छिपे होते हैं। भाषा विज्ञानी इनका सन्धिविच्‍छेद कर इनका समानार्थ सुगमता से जान सकता है। शब्‍दों के ये समानार्थ आवश्‍यक नहीं कि जीवन में इनकी व्‍यवहारगत घटनाओं के बाद ही दृष्टिगोचर हों। हिन्‍दी शब्‍दों के अंतर्निहित अर्थों में ही इनके मूल, गूढ़ और समाजोपयोगी अर्थ गुप्‍त रहते हैं। समझ, विवेक तथा बुद्धि शक्ति से इनकी जानकारी हो जाती है। जबकि इनके विपरीत अंग्रेजी, उर्दू, अरबी, फारसी और अन्‍य यूरोपीय भाषाओं के शब्‍दार्थ हम बचपन से ऐसे शब्‍दों के व्‍यवहारगत वाड.मय, इनसे संबंधित वस्‍तुओं के नामों और संबंधित परिघटनाओं के कारण ही जान पाते हैं। ऐसी भाषाओं में प्रयोग होनेवाले शब्‍द अपने भीतर कोई सहज, प्राकृतिक अर्थ नहीं रखते। इनके अर्थों को जीवन में घटनेवाली कृत्रिम घटनाओं के संकेतों या वास्‍तविक घटनाक्रमों के आधार पर ही समझा जा सकता है।

        आजकल हिन्‍दी प‍त्रकारिता में एक नई वाक्‍य रीति चल रही है। इसमें स्‍त्रीलिंग संज्ञा की प्रथम और द्वितीय दोनों क्रियाओं को पुल्लिंग क्रिया-शब्‍दों से जोड़ कर लिखा जा रहा है। निस्‍संदेह यह भाषा प्रयोग कुछ प्रदेशों में बोली के रूप में स्‍वीकार है, लेकिन जहां हिन्‍दी को लिखने की बात है तो उसे राजभाषा के अनुसार ही लिखा जाएगा। 'धारा बह रहा है', 'कीमत चुकाना पड़ा' जैसे वाक्‍य प्रादेशिक वाक्‍य प्रयोग हैं। किन्‍हीं अंचलों में ऐसा बोला जाता है। लेकिन राजभाषा के नियमानुसार लिखने के लिए इन्‍हें 'धारा बह रही है', 'कीमत चुकानी पड़ी' ही लिखा जाएगा। आंचलिक स्‍तर पर भाषा को इस तरह बोलने का गलत प्रचलन भी हिन्‍दी और इसकी प्रादेशिक भाषाओं में अंग्रेजी, उर्दू, अरबी, फारसी और अन्‍य यूरोपीय भाषाओं के आने के कारण ही हो रहा है। हिन्‍दी भाषा का इस प्रकार का भाषाई प्रयोग करने से हिन्‍दी का पारं‍परिक शिल्‍प-सौंदर्य तो बिखरता ही है, उसके प्रादेशिक भाषांश भी व्‍याकरण के स्‍तर पर गलत होने लगते हैं।

विकेश कुमार बडोला

Tuesday, October 11, 2016

सर्जिकल स्ट्राइक पर ओछी राजनीति असहनीय

भारत में घुसपैठ करने की कोशिश के चलते नियंत्रण रेखा के पार पीओके में एकत्रित आतंकियों को सेना की सर्जिकल स्ट्राइक (सीमित सैन् कार्रवाई) में मार गिराने के बाद पूरा देश जब उड़ी आतंकी हमले में शहीद 19 सैनिकों को सच्ची श्रद्धांजलि देने की स्थिति में हो, देशभक्ति की भावना से ओतप्रोत हो और उसी दौरान कुछ विपक्षी दलों के नेताओं तथा फिल् उद्योग से जुड़े कलाकारों की देशविरोधी ओछी बयानबाजी सर्जिकल स्ट्राइक को तब तक फर्जी बताने के रूप में हो जब तक कि उन्हें इसके साक्ष् उपलब् करा दिए जाएं तो इसे क्या समझा जाए। क्या यही कि उन्हें देश में केंद्र सरकार, सेना तथा बहुसंख्यक सैनिकप्रिय जनता के लोकतांत्रिक अधिकार का अपमान अनादर ही करना है? क्या उनके लोकतांत्रिक रूप से राजनेता चुने जाने का कूटार्थ सर्जिकल स्ट्राइक के संदर्भ में उनके देशविरोधी वक्तव् को ध्यान में रख यही समझा जाए कि वे कहीं या किसी किसी रूप में राष्ट्रविरोध के लिए ही सत्तासीन हुए? जो भी है आज देश में इस संबंध में एक नई राजनीतिक चर्चा शुरू हो गई है, जो देश के सर्वांगीण विकास और विकास के आधार पर प्राप्त हो सकनेवाले राष्ट्रगौरव की भावना से कोसों दूर तथा सर्वथा निरर्थक है।   
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, कांग्रेसी नेता पी. चिदंबरम तथा संजय निरुपम के बाद राहुल गांधी और कपिल सिब्बल ने जिस तरह सेना की सर्जिकल स्ट्राइक पर संदेह व्यक् करते हुए अपनी बात कही, उससे साफ पता चलता है कि देश में कांग्रेस के नेतृत् में विपक्षी राजनीतिक दलों की येन-केन-प्रकारेण राजनीति में बने रहने की लिप्सा कितने खतरनाक स्तर तक जा पहुंची है! केजरीवाल सहित लगभग उन सभी राजनीतिक दलों के नेताओं, जो सर्जिकल सट्राइक के साक्ष् मांग रहे हैं, को भला ऐसे राष्ट्रविरोधी वक्तव्यों के बाद नैतिक आधार पर लोकतांत्रिक देश का जनप्रतिनिधि कैसे स्वीकार किया जा सकता है! क्या केंद्र सरकार तथा न्यायपालिका को संविधान की धाराओं को, इस परिस्थिति में राष्ट्रविरोधियों को दंडित करने के लिए, अत्यंत लचीला करने की आवश्यकता नहीं, जब कुछ राजनेता अपने राष्ट्र, इसकी सैन् शक्ति तथा इसके केंद्रीय राजनैतिक नेतृत् को लेकर एक प्रकार से दुश्मन देश पाकिस्तान के मिथ्या प्रचार का हिस्सा बनने को अति उत्सुक हैं।
जो पाकिस्तान दशकों से भारत पर छदम युद्ध थोपता रहा, भारत में आतंकवाद का प्रचार-प्रसार करने के साथ-साथ जब-तब निर्दोष भारतीय सैनिकों नागरिकों का रक् बहाता रहा वह भला कैसे दुनिया की दृष्टि में एक विश्वसनीय देश रह सकता था। अपनी आतंकी नीतियों तथा इनके क्रियान्वयन के लिए सदैव तत्पर पाक किसी किसी रूप में दुनिया के अधिकांश देशों को चुभता रहा है। लेकिन मोदी सरकार से पूर्व की केंद्र सरकारें हमेशा ही पाकिस्तान प्रायोजित आतंक को समझौतों तथा वार्ताओं के माध्यम से निपटाने की पक्षधर रहीं। हालांकि यह प्रयास मोदी सरकार ने भी किया। बल्कि इस सरकार ने तो पाक के साथ पूर्व की सरकारों से भी श्रेष् नवीन तरीकों से परस्पर सद्भावना बढ़ाने के अनेक प्रयास किए। परंतु जब पाक की नीयत में ही जन्मजात तथा धर्मांध खोट हो तो कहना चाहिए कि उसे साक्षात ईश्वर भी पड़ोसी राष्ट्र के साथ प्रेम शांति से रहने के लिए नहीं समझा जा सकता।
भारत पर पाक द्वारा किए जाते रहे आतंकी हमलों तथा इसके बाद भी भारत की दोस्ती के प्रस्तावों पर उसके द्वारा हमेशा किए गए विश्वासघात के कारण कांग्रेसी नेतृत् की सरकारें उसके खिलाफ विश्वभर में वैसा विरोधी वातावरण कभी नहीं बना पार्इं, जैसा भाजपा की मोदी सरकार ने बना दिया। पिछले दो-ढाई वर्षों में मोदी की विश् बिरादरी में जैसी राजनीतिक कूटनीतिक पकड़ रही आज उसके फलस्वरूप ही पाकिस्तान अपनी आतंकवाद संरक्षण की दुर्नीति के कारण विश् के लगभग सभी देशों की नजर में कुत्सित तथा नकारात्मक राष्ट्र बनकर उभरा है। बल्कि इस समय तो विश् के वह देश जो संयुक् राष्ट्र सुरक्षा परिषद से लेकर अनेक अन् वैश्विक मंचों का प्रतिनिधित् करते हैं तथा जिन मंचों की सदस्यता के लिए दूसरे देशों को अभी पता नहीं कितना परिश्रम करना पड़ेगा, उनकी दृष्टि को भी नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान के संदर्भ में उसी रूप में मांझ डाला, पाक को हर मोर्चे पर परास् करने के जिसकी आज भारत को अत्यंत आवश्यकता है।
आज जब अमेरिका, रूस, फ्रांस, जापान, ब्रिटेन जैसी वैश्विक महाशक्तियां भी भारत के साथ विकास की धारणाओं को ही नहीं अपितु जग कल्याण के प्रति उसके सामाजिक आध्यात्मिक दृष्टिकोण को भी सम्मानपूर्वक अंगीकार करने की स्थिति में हैं तथा ये महाशक्तियां किसी किसी रूप में भारत के चहुंमुखी ज्ञान योग्यता के गुणात्मक लाभों को अपने देशों में आयात कर रहे हैं यदि उस समय हमारे अपने देश के मोदी विरोधी विपक्षी राजनीतिक दलों के नेता पाकिस्तान के इस कथन का समर्थन करते हैं कि पीओक में भारतीय सेना की सर्जिकल स्ट्राइक फर्जी थी, तो इन परिस्थितियों में देश के सभ् देशभक् नागरिकों के सम्मुख ऐसे नेताओं को सबक सिखाने का तरीका केवल लोकतांत्रिक चुनावों में उनके विरुद्ध मतदान करने तक ही सीमित नहीं हो सकता। इन परिस्थ्ितियों में तो जनता कहीं ऐसे नेताओं इनके समर्थकों के प्रतिमारो-मारोका अभियान छेड़ दे। क्योंकि इन्होंने लोकतंत्र के अधीन सत्ता संचालन को इतना निम् स्तरीय अभ्यास बना दिया है कि एक समझदार विवेकवान व्यक्ति अब कम से कम लोकतांत्रिक मान्यताओं को मानते हुए तो ऐसे लोगों को बर्दाश् करने की स्थिति में कदापि नहीं है।
नेता ही नहीं बल्कि खुद को कलाकार कहने वाले चित्रपट के कुछ अभिनेता तथा वामपंथी बुद्धिजीवी से लेकर वामपंथी विद्यालयों विश्वविद्यालयों के छात्रों की दृष्टि में विद्वता की जो धारणाएं आज बनी हुई हैं वह अत्यंत विरोधाभासी तथा देश के लिए सर्वथा अनुपयोगी और घातक मंतव्यों पर आश्रित हैं। ऐसे में इनका नेता, अभिनेता, बुद्धिजीवी या कलाकार होना अपनेआप में ही व्यर्थ-निरर्थ हो जाता है। वास्तव में ढाई वर्ष पहले तक लोकतंत्र के नाम पर केंद्र शासन के साथ तमाम क्षेत्रों के अगुवा तथाकथित प्रतिष्ठित लोगों की भ्रष्टाचार अवैध मुद्रा लेन-देन के संबंध में एक गुप्तनीति चल रही थी। इस शीर्ष स्तरीय गुप् षडयंत्र के तहत भारत को हिन्दू धर्म-संस्कारों से विमुख करने का यह कुचक्र पिछले दशकों से सुगमता से चल रहा था। साथ ही भारत इसके धर्मविरोधी ऐसे षडयंत्रकारी बाह्य रूप से जनसाधारण के लिए महानता की प्रतिमूर्ति भी बने हुए थे। ऐसे लोगों के समस् कल-कपट धत्क्रर्मों पर मोदी सरकार के आने के बाद बहुत अधिक नियंत्रण होने लगा था। और जैसे-जैसे मोदी सरकार के निरंतर केंद्र में बने रहने के साथ-साथ राज्यों में भी शासन करने की संभावनाएं समाज में व्याप् हो रही हैं, ऐसे लोग बुरी तरह छटपटा रहे हैं। इसी के परिणामस्वरूप इन्होंने किसी किसी कारण मोदी सरकार को नीचा दिखाने की साजिश रची है। लेकिन ऐसे राजनेताओं और इनके साधारण तथा विशिष् कलाकार, बुद्धिजीवी रूपी समर्थकों को देश पर आसन् आतंकी युद्ध संकट के समय इस तरह का क्षुद्र राजनीतिक व्यवहार नहीं करना चाहिए। इससे दुश्मन देश की कूटनीतियां हमारे विरुद्ध एक नए ढंग से बढ़ जाती हैं।
केजरीवाल जैसे नेताओं को एक सामाजिक कार्यकर्ता तथा भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़नेवाले व्यक्ति के रूप में सम्मान देकर उनके साथ जुड़े लोगों को अब उस जुड़ाव प्रभाव से बाहर निकल आना चाहिए। नागरिकों को नागरिक के रूप में सर्वप्रथम उस देश के लिए एकजुट होने का विचार रखना चाहिए जिसके वे नागरिक होते हैं। और अगर इसमें उनका संदेहास्पद जननायक बाधा उत्पन् करता है या राष्ट्र विरोधी आचार-व्यवहार करता है तो उन्हें उसका मंतव् समझकर शीघ्र ही उससे किनारा भी कर लेना चाहिए। इस समय जब देश पर शत्रु का आतंक के रूप में प्रकट संकट प्रबल हो, समस् देशवासियों को विभिन् राजनीतिक दलों के साथ अपने हित जुड़े होने के कारण ही उनका अंधसमर्थन नहीं करना चाहिए। यदि केंद्र की मोदी सरकार उनकी व्यक्तिगत राजनीतिक इच्छा पूर्ण नहीं करती तो कोई बात नहीं। उन्हें तो इस समय सिर्फ इतना देखना है कि यह सरकार देश के लिए शक्तिसंपन् होकर दुश्मन राष्ट्र के आतंकियों से लोहा ले रही है। इसी आधार पर सभी लोगों को मोदी सरकार का साथ निभाना चाहिए। इस समय देश के भीतर राजनीतिक भितरघात करनेवालों या देशविरोधी हरकतों के आधार पर अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश करनेवालों को लोकतांत्रिक नियमों से परे जाकर कठोरता से सबक सिखाए जाने की अत्यंत जरूरत है। इसी में देश लोकतंत्र की दीर्घकालीन भलाई निहित है।  
विकेश कुमार बडोला