महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Cosmetic

loading...

Wednesday, February 27, 2013

गांव, बचपन, होली


कभी-कभी बचपन की यादें स्‍मृति-पटल पर कौंध जाती हैं। तब अपना वर्तमान व्‍यक्तित्‍व दु:खद और हास्‍यास्‍पद लगने लगता है। स्‍वयं से घृणा और समाज से विरक्ति होने लगती है। जीवन के छत्‍तीसवें वर्ष में बालपन की स्‍मृतियों का आगमन कई कारणों से हुआ। सर्वप्रथम तो मैं पिछले तीन दिनों से टूटे-टूटे शरीर और सुन्‍न मस्तिष्‍क के साथ शयन खटोले से चिपका हुआ हूँ। बसंत की छवि से अभिभूत हो कुछ लिखने का अवसर आधे माघ-आधे फाल्‍गुन तक बीमार पड़े रहने के कारण हाथ से छूटा ही जा रहा है। फरवरी के आरम्‍भ से अब तक दो-तीन दिन रोगग्रस्‍त होना चार-पांच दिन ठीक रहना, यही क्रम चल रहा है मेरे जीवन में।
          रोग से पीड़ित और त्रस्‍त हो मैंने कई बार कुछ लिखने का मन बनाया, कितनी बार सोचा कि ऐसे तो बीमारी में बहुत समय व्‍यतीत हो जाएगा। लेकिन डॉयरी और पेन मेरे सिरहाने हिले-डुले बिना पड़े रहे। जब किसी प्रकार का कोई सृजन न हो सका तो मैं स्‍वयं से चिढ़ने और कुढ़ने लगा। ऐसी आत्‍मप्रवंचना में न जाने कब बचपन की यादों में चला गया, पता ही नहीं चला।
मैं उत्‍तराखण्‍ड के पौड़ी जिले का रहनेवाला हूँ। आज से अट्ठाईस वर्ष पूर्व का गांव का जीवन कितना रमणीय और स्‍वाभाविक था। बीस परिवारों का अपना गांव कितना हरा-भरा, प्रसन्‍न, समृद्ध और संतुष्‍ट था। संयुक्‍त परिवार के अनुसार एक घर में यदि पन्‍द्रह-बीस मनुष्‍य रहते होंगे तो बीस परिवारों में चार सौ लोग हुए। इसी प्रकार हरेक घर में दस-बारह मवे‍शी भी होंगे तो बीस घरों में दो, सवा दो सौ मवेशी भी होते थे। कुल मिलाकर छ:-सात सौ प्राणियों से एक गांव, एक जीवन परिवेश प्राकृतिक रुप से संचालित था। ये केवल मेरे गांव का आकलन है। इसी प्रकार अन्‍य गांव भी हैं, वहां भी वहां के परिवारों के अनुकूल मनुष्‍य और मवेशियों की उपस्थिति बनी रहती होगी। ऐसे में गढ़वाल का प्राकृतिक परिवेश वास्‍तविक जीवन के कितने अनुकूल था।
          ऐसा नहीं था कि गांवों में तब वैज्ञानिक उपकरण और वस्‍तुएं नहीं थीं। रेडियो कई घरों में होते थे। उन्‍हें धनी समझा जाता था। टेलीविजन भी निकटस्‍थ बाजार में एकाध घरों में विद्यमान था। ऐसे ही एक बासंती सांझ को छुपम-छुपाई खेल के दौरान मुझे रेडियो पर बजनेवाला जानी दुश्‍मन फिल्म का गाना (मेरे हाथों में पहना के चूड़ियां, कि दिल बंजारा ले गया, कि दिल बंजारा ले गया ले गया) सुनाई दिया। फिल्मी गानों में यह प्रथम गाना था, जिसे मैं इसके बोल और धुन के साथ सुनते हुए याद कर सका था। तब मुझे अपने जीवन में एक नया अनुभव हुआ था। एक ऐसा आभास हुआ, जिससे मेरा हरेक नया भाव-विचार, प्रत्‍येक जीवन-व्‍यवहार प्रभावित होने वाला था।
          अट्ठाईस वर्ष पूर्व का मेरा गांव कितना समर्थ था अपने प्राणियों को एक स्‍वस्‍थ और स्‍वछन्‍द जीवन प्रदान करने के लिए, यह सोचकर आत्‍मा तिलमिलाने लगती है। तब गांव में जितने भी बच्‍चे, किशोर, प्रौढ़वय लड़के-लड़कियां थीं, सब मिलजुल कर कोई न कोई सामूहिक खेल खेला करते थे। दिनभर के कार्य निपटा कर, जरुरी विद्यालयी अध्‍ययन करने के उपरान्‍त सांझ के समय सभी गांव के मध्‍य स्थित बड़े मैदान में एकत्रित होते थे। पचास-साठ युवकों, युवतियों, बच्‍चों और किशोरों का जमघट लगता था। हम लोग कभी पाला-पाला (इसमें मैदान में दाएं-बाएं बीस-तीस चौकर क्षेत्र और इनके मध्‍य सीधी रेखा खींचकर बनाया गया लम्‍बा क्षेत्र होता था, सभी चौकर क्षेत्रों में दल विशेष का एक-एक व्‍यक्ति खड़ा रहता था और बीचवाले क्षेत्र में दल विशेष का नेतृत्‍वकर्ता खड़ा होता था। दूसरे दल को इन चौकर खानों में उपस्थित विरोधी दल के रक्षकों और सीधी रेखा में तैनात रक्षक नेतृत्‍वकर्ता से बचकर आगे बढ़ना होता था। यदि आगे बढ़ने के दौरान रक्षक दल का कोई सदस्‍य पालों में आगे बढ़ते दूसरे दल के किसी सदस्‍य को स्‍पर्श भी कर देता था तो वह खेल से बाहर हो जाता था। दोनों दल बारी-बारी से रक्षक और आगे बढ़नेवाले दल की भूमिका निभाते थे), खो-खो इत्‍यादि खेल खेलते तो कभी छुपम-छुपाई। गांव की छुपम-छुपाई में छुपने का क्षेत्र एक किलोमीटर तक होता था। छुपनेवाले कभी गांव के इस किनारे तो कभी उस किनारे छुपते थे। ढूंढनेवाले को बहुत श्रम करना होता था छुपे हुओं को ढूंढने के लिए। लेकिन इस भागम-भाग और दौड़भाग में अत्‍यन्‍त आनन्‍द आता था।
          होली तो गांव में होलिका दहन और रंग लगानेवाले दिन से एक माह पूर्व प्रारम्‍भ हो जाती थी। गांव के केवल किशोर और प्रौढ़वय लड़के एक महीने तक दूर-दराज के गांवों में रात-रातभर होली खेलते थे। चन्‍द्र किरणों से सजीं रातों में होली खेलने दूरस्‍थ गांवों में जाना कितना पावन था जीवन के लिए! इस दौरान वे अनेक वाद्ययन्‍त्रों से सुसज्जित हो गांव-गांव जाते, प्रत्‍येक घर-आंगन में गोला बनाकर होली के मंगल गीत गाते। सबसे सुरीला लड़का होली-गीत की पहली पंक्ति गाता तो बाकी लड़के उसकी गायी हुई पंक्ति को सामूहिक स्‍वर में दोहराते। वाद्ययन्‍त्र गीतों के सुर में खनकते। गीत के अन्‍तरों में अनुभव होता मंगलकामनाओं का परिलक्षण व्यवहृत होता हुआ प्रतीत होने लगता। होली खेलने ए दल के सदस्‍य होलीगीतों और वाद्ययन्‍त्रों का ऐसा समामेलन प्रस्‍तुत करते कि देखने-सुननेवालों का तांता लग जाता। प्रसन्‍न होकर लोग अपने सामर्थ्‍य अनुसार होली खेलने आए दल को होलीदान के रुप में कुछ न कुछ रुपए-पैसे अवश्‍य देते थे। इस प्रकार गांव-विशेष के प्रत्‍येक घर में होली गीतों को गा-गाकर आधी रात के बाद दल-विशेष अपने गांव वापस लौट आता। होलीगीत गानेवाले सभी गांवों के दल एक रात में कम से कम आठ-दस गांवों में घूमकर होली गीत गाते और मुद्रा अर्जित करके लाते। होलिका दहन से पूर्व दल अपने गांव के प्रत्‍येक घर में घूमकर वही गीत गाते, जो वे एक माह पूर्व से कई गांवों में जा-जा कर गा चुके होते। रात्रि को होलिका दहन होता। सारा गांव, सब लोग वहां एकत्रित होते। सूखी लकड़ियों के ढेर के मध्‍य स्थित होलिका के दहनोपरान्‍त सब लड़के रातभर वहीं रुकते। सुबह होते ही वे सर्वप्रथम एक-दूसरे के मुंह पर जलाई गई होलिका की राख रगड़ते। इसके बाद शुरु होता रंग लगाने का कार्यक्रम। भाभियां देवरों की रंग-मार से बचने के लिए दूर-दूर जंगल-खेतों तक भागतीं-छुपतीं कि कोई उन्‍हें रंग न लगा पावै। पर देवर कब माननेवाले। वे उन्‍हें वहीं जाकर रंग लगा आते। संध्‍या समय गांव-गांव जाकर, होली गीत गाकर एकत्रित मुद्रा से सामूहिक भोज और होली मिलन समारोह का आयोजन होता। मुझे अच्‍छी तरह से याद है एक वर्ष हमारे गांव के होली दल ने दस हजार रुपए कमाए थे।
इसके अतिरिक्‍त भी अनेक ऐसी महत्‍वपूर्ण बचपन की यादें हैं, जिन्‍हें याद करते हुए आज की अपनी स्थिति से अत्‍यन्‍त घृणा होने लगती है। ऐसा अनुभव होता है कि उस जीवन की तुलना में यह बनावटी और अप्राकृतिक जीवन कितना मृत है!
रोगावस्‍था में मस्तिष्‍क इतना ही श्रम कर पाया, उंगलियां इतनी ही सशक्‍त हो पाईं कि (गांव, बचपन, होली) संस्‍मरण सम्‍बन्‍धी आधे-अधूर उद्गार लिखे जा सके। बाकी फिर कभी।


मेरे गांव का वह मैदान, जहां सामूहिक खेल खेले जाते

Wednesday, February 20, 2013

मेरी नई दुनिया



चन्‍द्रमा से दूसरे चन्‍द्रमा का हाल पूछता हूँ
 
मध्‍यरात्रि
सुन्‍दर नील गगन
इसके मध्‍य स्थित चन्‍द्रमा
साथ में सितारों का प्रभाव
धरती पर मैं मेरी आंखों के स्‍वप्‍न
शीतल-मंद-मधुर हवा का स्‍पन्‍दन
तुम्‍हारी याद
मैं सांसारिक शरीर से विभक्‍त
हृदय पर हाथ
सांसें लेने में कठिनता
तुम्‍हारी आहों की शीतलता
मेरी आंखों को लगती
मेरे चहुं ओर की धरती
प्रेम करने लगती
मैं जहां तक नभ निहारता
वह तुम्‍हें याद करने लगता
तुम्हें मैं याद हो रहा हूँ
ये मैं अन्‍तर्यामी बन
अनुभव कर रहा हूँ
पवन के झोंके
हमारे भाव अभिव्‍यक्‍त कर रहे
संवेदना की सूचनाएं भेज रहे
चन्‍द्रमयी रोशनी व्‍याप्‍त हर ओर
तरुवर, पवन गति, घर-आंगन
प्रत्‍येक अंत:स्‍थल इससे सराबोर
मैं अपने रहने के स्‍थान को
चन्‍द्रप्रकाश से सुशोभित पाता
अंग-प्रत्‍यंग मेरा
तुम्‍हारी यादों से भर जाता
मेरे जन्‍म से भी पहले मेरी भावनाएं
तुम्‍हारी भावनाओं से
मिल गईं होंगी
मेरे मरने के बाद भी
तुम्‍हारी यादें
मेरी नई दुनिया होंगी
आसमान से
अपने मन की बात करता हूँ
चन्‍द्रमा से दूसरे चन्‍द्रमा का
हाल पूछता हूँ
यहां तारों की श्रृंखलाएं
मेरी सांसें बन व्‍याप्‍त हैं
तुम नभ देखना
तारे वहां तुम्‍हारी याद में
रंगे हैं
चन्‍द्र को अपनी दृष्टि देना
वह धन्‍य हो जाएगा
इस प्राणजीवन के लिए
स्‍वयं की उपस्थिति
नियमित बनाएगा
हवा की सरसराहटें
अपने अहसासों से भर
अपने अनुभवों से महसूस कर
आगे बढ़ाना
मैं उनमें जीवन संगीत सुनूंगा
वह सब देखूंगा
अनुभव करुंगा
जो तुम स्‍वयं के साथ होकर
मेरे लिए सोचती होंगी।


Tuesday, February 19, 2013

रहस्‍यंभावी यात्रा










खुले नीले आकाश को
छूने के निकट
श्‍वेत तुषार पर्वत
हरियाली का विस्‍तार
सुश्‍वेत घन समूह
भरपूर नील नभ में
कहीं-कहीं हैं विद्यमान
इस प्राकृतिक छटा को
दूर से देख लगता
कि इसके निकट सन्निकट होते
तो क्‍या बात होती
इन प्राकृतिक दृश्‍यों के निकट पहुंच
एक बार पुन: हम किसी की
बहुत कमी महसूस करते
यह अभाव कभी प्रकृति के
सुरम्‍य दृश्‍यों को देख
वहाँ उनके निकट जाने की सोचता
और यदि वहां पहुंच भी जाता
तो एक संग एक रहस्‍यमय साथ
होने के अभाव में
कहीं और भटकने के लिए
तैयार हो जाता
प्रकृति सौंदर्य और जनशून्‍य स्थिति से
मन एक प्‍यार-भरा साथ
होने के लिए तड़प उठता है
यदि अपने प्रियतम के साथ रहकर भी
प्रकृत सुन्‍दरता से
मन इधर-उधर भटकता रहे
एक रहस्‍मय रिक्‍तता
का बोध होता रहे
तो इसे क्‍या कहें
किसी के लिए प्रेम
या संसार में होने का अनोखा रहस्‍य
किसी के लिए प्रतीक्षा
या संसार-विछोह का रहस्‍यंभावी दुख



Saturday, February 16, 2013

चन्‍द्र निशा


चन्‍द्र निशा

अम्‍बर को एक रंग से
परिभाष नहीं कर पा रहा हूँ
चन्‍द्र सितारों को देखकर
स्‍वयं को सतत् शांतिमय
निर्मल कर रहा हूँ
चन्‍द्रप्रभा मेरी घुटन, कुढ़न
विसंगत हृदय को
असंसार कर गई
सितारों की टिमटिम झिलझिम
मुझे भौतिकता से पार ले गई
रात्रि का सुस्थिर प्रशांत स्‍वर्गमयी मौसम
चन्‍द्राभा रजनी का गूढ़ समागम
मेरी मरणासन्‍न अन्‍तर्दशा को
अपनी धवल-उज्‍ज्‍वल छवि से
साकार करता है
प्राणामृत दे मुझे
एक नव-संसार रचता है
मैं आह्लादित हो प्रेम बयार से
प्रेम करता हूँ नवास्त्वि अवतार से
समग्र सितारे जैसे मेरे मित्र बन गए
मैं लगता जैसे चन्‍द्रमा हो गया
हे ईश्‍वर
एक रात्रि का ये स्‍वप्‍न दिखा दे
कि यह चन्‍द्रप्रकाश अनन्‍त हो जाए
कि ये सितारे मेरे निकट सो जाएं
मैं चन्‍द्र उजाला बन
सर्वत्र व्‍याप्‍त हो जाऊँ
प्रत्‍येक बार नेत्र खोलने पर
स्‍वयं को चन्‍द्रमा
और संसार को
चन्‍द्रप्रकाश पाऊँ

Thursday, February 14, 2013

नागरिकता वर्गीकरण


पार्क में नीम के पेड़ के नीचे बैठकर बासंती आगमन में शिशिर हवा का सेवन कर रहा था। नीला आकाश हरे पेड़ों की ओट से शरीर और मन दोनों को तन्‍दुरस्‍त कर रहा था। प्रकृति के नजारों से अभिभूत होने में मग्‍न था कि विसंगतियों का दर्शन आंखों के समक्ष आने-जाने लगा। एक व्‍यक्ति तेज-तेज चलता हुआ गुटखा खाते हुए वहां से निकल गया। गुटखे का प्‍लास्टिक पैकेट उसने पार्क में उड़ा दिया। ठीक उसी समय पार्क में एक व्‍यक्ति तिपहिया रेहड़ा लेकर पिछले दिन-रात के गंद को उसमें एकत्रित कर रहा था। एक अन्‍य व्‍यक्ति धू्म्रपान कर रहा था। सरकारी स्‍कूलों के लड़के मां-बहनों को अपनी अभद्र टिप्‍पणियों से अपमानित कर रहे थे। कहने को एक नहीं अनेकों विसंगतियों से सुबह के शिशिरमय वातावरण का दम घुट रहा था।

    इसी समय दिमाग में आया कि क्‍यों नहीं भारतीय शासन व्‍यक्ति-व्‍यक्ति के अच्‍छे-बुरे कामों के अनुरुप नागरिकता का वर्गीकरण कर दे। जो अच्‍छे काम करें वो प्रथम और विशिष्‍ट नागरिक त‍था जो गन्‍दे असभ्‍य व्‍यवहार करें वे द्वितीय नागरिक। इस द्वितीय श्रेणी में उन सभी को रखा जाए जो गुटखा, तम्‍बाकू, धूम्रपान, मदिरापान करते हों। इसमें उन सभी व्‍यक्तियों को सम्मिलित किया जाए जो स्‍थापित शासकीय मूल्‍यों का अनादर करें, सार्वजनिक स्‍थानों पर नितान्‍त निजी गतिविधियों का असभ्‍य प्रदर्शन करें।

    प्रथम एवं विशिष्‍ट नागरिक को शासन सभी जीवनोचित सुविधाएं उपलब्‍ध कराए। उन्‍हें द्वितीय घोषित नागरिकों से अधिक अधिकार दिए जाएं, जिनका वे सामाजिक हित में निसंकोच और निडरता से प्रयोग करें। द्वितीय नागरिकों द्वारा उनके विरुद्ध उत्‍पन्‍न हो सकनेवाले अमानवीय व्‍यवहार की आकांक्षा को ध्‍यान में रखते हुए, उन्‍हें शासकीय सुरक्षा प्रदान की जानी चाहिए। यदि वे द्वितीय नागरिक के किसी दुराचार का दमन करने के लिए अपनी शारीरिक शक्ति से उसको कठोर दण्‍ड देते हैं तो ऐसी स्थिति में विधि के प्रावधान इतने लचीले हों कि प्रथम नागरिक के विशिष्‍ट अधिकारों की ससम्‍मान संरक्षा हो सके। ऐसी स्थिति में यह नहीं होना चाहिए कि दुराचारी के प्रभाव में प्रथम नागरिक को कानूनी प्रताड़ना झेलनी पड़े।

    इन सबके अतिरिक्‍त समय-समय पर प्रथम एवं द्वितीय नागरिक पहचान कार्यक्रमों का आयोजन किया जाए। ऐसे कार्यक्रमों में नागरिकों का वर्गीकरण करनेवाले अधिकारी मानवीयता और सामाजिकता के पक्षधर तो हों ही, साथ ही उनका नैतिक और मौलिक विवेक भी उच्‍च स्‍तरीय होना चाहिए। यदि वे नागरिक वर्गीकरण की क्षमता विशिष्‍टताओं से परिपूर्ण हों और उनके स्‍थायी रुप से ऐसे बने रहने के सार्वजनिक संकेत मिलते हों तो उन्‍हें वर्गीकृत किए गए नागरिकों को स्‍वतंत्र रुप से शासित करने का विशेषाधिकार भी हो। इससे उनको प्रथम एवं द्वितीय नागरिकों को उनके अच्‍छे-बुरे व्‍यक्तिगत निष्‍पादन पर त्‍वरित सम्‍मान देने व दण्डित करने का अवसर प्राप्‍त होगा।

    प्रथम नागरिकों को सुविधाएं, सम्‍मान और विशेषाधिकार मिलते देख स्‍वाभाविक रुप से द्वितीय नागरिकों में एक अच्‍छा संदेश प्रसारित होगा, और यदि उनमें अच्‍छे बन कर सुविधा, सम्‍मान, विशेषाधिकारों को प्राप्‍त करने की उत्‍कंठा होगी तो उसी क्षण बुराई पर अच्‍छाई की विजय का सतत् मार्ग प्रशस्‍त हो जाएगा।

    मैं पार्क के चहुंओर व्‍याप्‍त विसंगतियों से पुन: एकाकार हुआ, जब उपरोक्‍त विचार-उद्वेलन से बाहर आया। मैंने सोचा कि यह धारणा केवल मेरे अकेले की तो हो नहीं सकती। जब भी, जिसका भी ऐसी विसंगत सामाजिक स्थितियों-परिस्थितियों से सामना हुआ होगा, उसने इनसे बचने के उपाय के रुप में ऐसी धारणाएं बनाईं होंगी। परन्‍तु मात्र धारणाएं बनाने से क्‍या होगा। यदि ये व्‍यावहारिक नहीं बन पाईं तो सब व्‍यर्थ है। पुन: मैंने सोचा कि मुझसे पूर्व न जाने कितने लोगों ने ऐसा उपकारी विचार प्रस्‍तुत किया हो, परन्‍तु जब तक शासन-सत्‍ता द्वारा इसे व्यवहृत नहीं बनाया जाएगा तब तक कुछ नहीं हो सकेगा। प्रथम और द्वितीय नागरिक का विचार जिन विसंगतियों के कारण मेरे मस्तिष्‍क में आया, क्‍या वे शासकीय विचरण के लिए सहयोगी नहीं हैं? यदि धू्म्र व मद्यपान, गुटखा, बीड़ी, सिगरेट, इत्‍यादि मदांध करनेवाले उत्‍पादों का कारोबार समाज में चल रहा है तो किसकी अनुमति से? शासन-सत्‍ता की अनुमति से ही और उनके लिए ही ना, तो तब वह इन पर रोक क्‍यों और किसके लिए लगाएगी। उसे अच्‍छे, सभ्‍य नागरिकों से अधिक चिंता असभ्‍य, अमानवीय नागरिकों की है। इसलिए देश में प्रथम एवं द्वितीय नागरिक वर्गीकरण के अपने विचार को मैंने पार्क के किसी कोने में दबा दिया और विसंगतियों से प्रताड़ित होता हुआ घर चला गया।

Wednesday, February 13, 2013

उसे प्रतीक्षा थी मेरे विद्वान बनने की


मैं पारिभाषिक सांसारिक जटिलताओं
को नहीं, बल्कि आत्‍मसात् की हुईं
जगत विषमताओं को
अपने लिए अभेद्य समझता
प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष स्‍थायी-अस्‍थायी
रुप से छन-छन कर आती
विसंगतियों को अपनी
कमजोरी बनाता उन्‍हें बढ़ाता
क्‍या जानता था कि
एक समय एक विश्‍वाससम्‍पूर्ण छवि
मेरी प्रेरणा बनेगी
एक अदम्‍य साहसी, विराट ह्रदय मानसी
मेरी संजीवनी बनेगी
पर ऐसा होने पर भी
मैं उसके और अपने लिए
द्विअर्थी बना रहा
इससे मुझे स्‍वयं धोखा हुआ
अपने लिए जन्‍मी संवेदना को
मैंने संदेहास्‍पद समझा
मैं हमेशा गलत हुआ
सब लुटने पर
इस बात पर उलझा
मेरी छोटी बहिनें मेरी
बाल्‍य-सी लगनेवाली आदतों को
देख कर कहतीं
कि मुझे सबसे छोटा होना चाहिए था
पर उनके कहे गए वाक्‍यों से
मैं अपने अन्‍दर किंचमात्र भी
अव्‍यवस्‍था महसूस नहीं करता था
उलट उनके ऐसे कहे जाने को
मैं अच्‍छा मानता
और कामना करता कि
वे दोबारा, बारम्‍बार निरन्‍तर ऐसा बोलें
ताकि मैं बचपना महसूस करुं
बाल-हृदय अपनाऊं
सभी सांसारिक विसंगतियों से अनभिज्ञ हो जाऊं
लेकिन इस मेरे बालपने के समान
मुझे कोई अपना साथ न मिला
मेरे संग-सम्‍मेलनवाले सभी प्राण
बेअन्‍त विद्व होते
और इस प्रसंग में
वे अपने विद्वत तरीके से
मुझे प्रेम करते
तो बालपन की मानसिकता से आरुढ़
मैं ठगा-सा नासमझ रहता
अपने लिए किसी के ऐसे
प्रेम-बलिदान को मैं
अनापेक्षित समझता
ऐसे प्रेमी-जन के लिए
यदि कोई मुझे भड़काता
तो मैं एकदम बुद्धू की तरह
सब कुछ स्‍वीकार करता
अपने स्‍नेही-प्राण को तिरस्‍कृत
और घृणास्‍पद दृष्टि से देखने लगता
अंतत: मैं एकान्‍तवास के सहारे
जब अपनी बुद्धि का कहा मानता
अपनी आत्‍मा की आहें अनुभव करता
तो अपने प्रेमीजन की यादों में
मेरी जान जाती सी
मुझे लगती
मेरी सांस ऊपर उठने से पहले
अपने को दबाने लगती
कि किसलिए ऊपर जाना
तेरा तो अब कोई नहीं है
साथ निभानेवाला
पर मैं अपनी बहनों द्वारा
मेरे लिए आभाषित
बुद्धू और बालपन के अंलकारों से
अपने लिए आधार ढूंढता
कि मैंने यदि मुझे प्‍यार करनेवाले को
गलत समझा तो केवल
अपनी बाल्‍य समझ से
जिसमें मैं एक निपट अविवेकी था
और अपनी क्षमा के लिए
मैंने अपने प्रेमी के समक्ष
मेरी बहनों की
मेरे बाबत कही गई
उक्‍त उक्ति प्रस्‍तुत की
प्रेमी को भी
मेरी परिस्थिति ज्ञात थी
वह जानकार तो था ही
विद्वान तो था ही
उसे प्रतीक्षा थी
प्रेम शब्‍द को समझने के लिए
केवल मेरे विद्वान बनने की।

Sunday, February 10, 2013

एक गांव में चांदनी रात में



एक गांव में  
चांदनी रात में
दो ऊँचे पहाड़ों की गहराई में
पहाड़ों की गहराई में अन्‍धेरा, आकाश पर चांद उजियारा
फैला अन्‍धेरा
वृक्षों, पत्‍तों के हिलने से
धरती पर बनता
उनकी परछाई का घेरा
एक अनजान प्राण के लिए
आहें निकलवाता, उदासी बढ़ाता
मन बहकता, स्‍मृति-संसार उमड़ता
रहस्‍यमय यात्रा प्रारम्‍भ हो जाती
ठोस द्रव्‍यप्रधान समाज
एकदम से पीछे छूट जाता
हृदय मेरा नभ बन कर
भाव-सितारों से घिर जाता
पृथ्‍वी पर पसरीं हुईं
पेड़-पौधों की शांत छायाएं
दूर तक स्‍नेह-पथ का निर्माण करतीं
शीतल पवन झोकों से आती अमृताभा
सांसों में स्‍वर्गमयी जीवन के प्राण भरती
रोगों, कष्‍टों, दर्द-पीड़ाओं का
निवारण होता
मनुष्‍य सुख-शांति चरमोत्‍कर्ष पर
दुखों का विसर्जन होता
एक गांव में
चांदनी रात में


Thursday, February 7, 2013

ईश्वर का सत्यांश




एक बच्चे की
आंखों की भाषा
प्रत्येक प्राकृतिक उपक्रम
देखने की उसकी अभिलाषा
कितनी संसार सम्मत है
अनंत संवेदनाओं में मस्त है
पक्षियों की आवाजाही
प्रौढ़ता को जो
अब सूझती भी नहीं पलांश को
बच्चे के लिए
अद्भुत आश्चर्य है
नील-नभ की
रंग-बिरंगी छटा में उभरते
मानव जनित चिन्ह
जैसे हवाई जहाज, राकेट का लम्बा धुंआ
उड़ती पंतगें और कतारबद्ध हो उड़ते खग
बच्चे को गुदगुदा जाते हैं
वह रोना बन्द कर देता है
निरपराधी हृदय के सहारे
एकटक हुईं मासूम आंखें
संसार के इन उपक्रमों को देखकर
संवदेनशील संजीवन बन जाती हैं
बच्चे का हाथ उठता है
वह अंगुलि को
इन विचित्र से लग रहे
दृश्यों की ओर करता है
और अपने को ईश्वर का
सत्यांश सिद्ध करता है