महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

रविवार, 23 दिसंबर 2012

जो मुद्दा है वही तंत्र का व्‍यापार है

 सब कुछ समाज ही सिखाता है
यह वर्ष जाते-जाते कई ऐसी घटनाओं-दुर्घटनाओं का गवाह बन चुका है, जिनसे निश्चित रुप से एक नए भारत की तसवीर बनती नजर आ रही है। नया भारत अच्‍छा होगा या बुरा, यह अभी भविष्‍य की बात है लेकिन यह तो तय हो ही गया है कि अब सरकारें जनता को आसानी से पथभ्रष्‍ट नहीं कर सकेंगी। अण्‍णा आंदोलन से प्रेरित होकर देश के लोगों ने बुराई के विरुद्ध एकजुट होकर लड़ना और आवाज उठाना तो सीख लिया है, लेकिन बुराईयों के सूत्र और स्रोत पहचान कर उनसे लड़ने और उनका विरोध करने में अभी भी व असक्षम हैं। आजकल दिल्‍ली में बलात्‍कार की घटना के कारण जनाक्रोश, विशेषकर युवा क्रोध चरम पर है। क्‍या आक्रोशित जनता और युवाओं ने यह जानने की कोशिश की है कि जिस बुराई के विरुद्ध वे एकजुट हो लड़ रहे हैं, उसके पालन में उनका अप्रत्‍यक्ष रुप से कितना योगदान है! युवावर्ग जिस समस्‍या को लेकर चिंतित और आंदोलनरत् है, उसके प्रसार में उसकी अपनी भूमिका की भी अनदेखी नहीं की जा सकती। एक समाचार के अनुसार जिस देश में इंटरनेट सर्च इंजन गूगल में सबसे ज्‍यादा ढूंढी गई सामग्री में सनी लियोन और पूनम पाण्‍डेय के कामोत्‍तेजक चित्र शामिल हों, वहां बलात्‍कार को लेकर भीड़तंत्र, विशेषकर युवाओं और युवतियों का क्रोध एक खोखला प्रतिकार ही सिद्ध होता है। सड़कों पर बलात्‍कारियों को फांसी पर चढ़ाने की मांग को लेकर एकत्रित भीड़ को स्‍वयं से प्रश्‍न करना चाहिए कि यदि दिल्‍ली के इन बलात्‍कारियों को फांसी पर लटका भी दिया जाए, तो क्‍या इससे भारतीय धरती भविष्‍य में किसी भी किस्‍म के बलात्‍कार से मुक्ति पा लेगी? क्‍या दिल्‍ली के बलात्‍कारी अपनी मां के पेट से बलात्‍कार करने का प्रशिक्षण लेकर पैदा हुए थे? उनमें जो पाशविकता और वीभत्‍सता पहले से लेकर बलात्‍कार करने तक घर कर गई थी, क्‍या यह उनके स्‍वत: ज्ञान से संभव हो सका था? यह सब इसी समाज, सरकार, परिवेश की देन है। जनांदोलन की मांग पांच लोगों को फांसी पर चढ़ाने के लिए नहीं, अपितु इन्‍हें और इनके जैसे असंख्‍य लोगों को घिनौनी वृत्ति में धकेलनेवाली सामाजिक सभ्‍यता को कठघरे में खड़ा करके हिसाब मांगने को लेकर होन चाहिए। 
            कई दशकों से पत्र-पत्रिकाओं, समाचारपत्रों, मैगजीनों में छपनेवाले और आधुनिक युग में टी.वी. चैनलों एवं इंटरनेट पर धड़ल्ले से प्रसारित होनेवाले नंगी महिलाओं के चित्र, सेक्‍स रुझान बढ़ाने के विज्ञापन, दबंग टाइप की फिल्‍मों के द्विअर्थी संवाद और हिंसा प्रदर्शन, ये सब क्‍या और क्‍यों है? क्‍या इनका दिल्‍ली की बलात्‍कार की घटन से कोई सम्‍बन्‍ध नहीं है? निश्चित रुप से है। तो फिर आंदोलनकारी इनके प्रसारण और प्रतिबन्‍ध की मांग क्‍यों नहीं उठा रहे हैं। इस ओर तो उनका ध्‍यान है ही नहीं। यदि समाज का एक तबका बलात्‍कार को प्रेरित पोषित करनेवाली सामग्रियों और संसाधनों की बिक्री से अपने को संभ्रांत बना रहा हो और दूसरे तबके के जीवन को प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष रुप से भोग-विलास के संजाल में फांस रहा हो, सेक्‍सी विज्ञापनों में नारीत्‍व को तार-तार कर रहा हो और नारी भी ऐसा करने में शील-संकोच त्‍याग कर बढ़चढ़ के हिस्‍सा ले रही हो, तो फिर सुगम सेक्‍स-सुविधाओं की पहुंच से दूर अनपढ़ मूर्ख समुदाय से उम्‍मीद करना कि वह नारी सम्‍मान में स्‍वयं को प्रस्‍तुत करे, बड़ी ही अव्‍यावहारिक बात है। सामाजिक बुराईयों से बचने की इच्‍छाएं और जरुरतें आंदोलन बनकर मुखर तो हो रहीं हैं, परन्‍तु इन इच्‍छाओं और जरुरतों को महसूस करनेवाले लोगों को यह विचार तो करना ही होगा कि आखिर वे अपनी मांगें किससे कर रहे हैं? उस तंत्र के सामने अपनी मांगें रख कर क्‍या होगा, जो राजस्‍व कमाने के लिए सेक्‍स के खुलेपन को अनेकों सेक्‍सोन्‍मुख गतिविधियों से संचालित कर रहा है।







मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

23 अप्रैल, 2004 का संस्‍मरण





आज दोपहर को मुरादाबाद से वापस अपनी काल-कोठरी में पहुंचा। पिछली शाम और रात की बारिश ने मौसम को बहुत अधिक आकर्षित बना दिया था। विवाह समारोह में मैंने जितना उत्‍साह और आनंद दिखाया वह सबके लिए लाभकारी रहा। इस समारोह में काश ऐसा भी कोई होता जो मेरे अत:स्‍थल को देख पाता, जहां इस विशेष दिन के अलावा शेष समय एक भयंकर बिखराव है। क्‍या पता! सभी या आधे से अधिक लोगों के साथ यही स्थिति हो! इसलिए मैं सभी के लिए मन से प्रार्थना करता हूं कि वे ऐसे आयोजनों में उपस्थित होकर अपनी दिनचर्या में एक आनंदातिरेक अवश्‍य उत्‍पन्‍न करें।
इस अवसर पर मदहोश करनेवाली कोई बात अगर हुई तो वह यह थी कि मौमस ने गर्मी को दो एक दिन के लिए किनारे करके अच्‍छा रोमांच पैदा कर दिया। सभी लोग प्रफुल्लित हो गए। डांस जंक्‍शन में सभी ने खुल कर नृत्‍य किया। मैं भी सब भूल कर नाचने लगा।
मेरी सहजता को कुछ लोग गलत प्रकार से आंकते हैं। तभी तो विवाह-समारोह में उपस्थित एक महिला मेरी बातों को संदेहास्‍पद और विनोदपूर्ण तरीके से ले रही थी। जबकि मैं उससे बिना किसी स्‍वार्थ के बातें कर रहा था। मैंने जिन्‍दगी में हमेशा यह महसूस किया है कि जिन लोगों के पीछे मैं भागा वे मुझे उल्‍लू बनाते और मूर्ख समझते, और इन सबसे अलग उन स्थितियों में मैं स्‍वयं को बहुत भद्दा महसूस करता। जबकि जो लोग मुझे पूछते, मेरी ओर आकर्षित होते उन्‍हें मैंने उल्‍लू समझा तथा उनकी किसी बात को कभी भी गम्‍भीरता से नहीं लिया। ऐसे लोगों में कई अत्‍यधिक आकर्षित थे। शायद मुझे मेरे द्वारा सताए गए लोगों के फलस्‍वरुप अपने को सताने का फल ऐसे लोगों से मिल रहा है, जिनके पीछे मैं भाग रहा हूं। जीवन के इस प्रकार चलने से मैं रोज मर रहा हूं। एक स्‍वतन्‍त्र जिन्‍दगी क्‍या है! एक खुला और खुशी से सम्‍पूर्ण जीवन क्‍या है! मुझे कुछ भी ज्ञात नहीं है। हर स्थिति में, हर बात में और हरेक स्‍थार पर मेरा असहज होना और हड़बड़ी में हर कार्य करना मुझे अव्‍यवस्थित करता है। मुझे लगता है मैं अदृश्‍य स्थितियों को आत्‍मसात कर रहा हूं। वास्‍तविकता को नकार रहा हूं। मैं चाहता हूं कि मैं एक कल्‍पना बन जाऊं! ठंडी हवा के साथ मेरा सम्मिश्रण हो जाए। समझहीन शारीरिक ढांचा ध्‍वस्‍त हो जाए। जीने की आस में टंगी इच्‍छा को कत्‍ल कर दिलेरी दिखाऊं। जान गवाऊं और अमर हो जाऊं। झंझटों के आडम्‍बर से छिटक कर एक शांत किनारा प्राप्‍त करुं। इतना होने के लिए मैं कई बार सोचता हूं। पर कुछ भी घटित नहीं हो पाता। मन फिर एक बार जीने की इच्‍छा से पृथ्‍वी को कल्‍पना में दिव्‍य बनाता। इच्‍छा पुन: उभरती कि प्राकृ‍तिक अवस्‍थाएं तो सच्‍ची हैं। वे तो मनुष्‍य की तरह धोखा नहीं देतीं। तब क्‍यों न उन्‍हीं के सहारे जीवन काटा जाए। लेकिन कहीं न कहीं से मानवता के खंभे जर्जर होकर मेरी भावनाओं के सिर पर गिरते और मैं परेशान, अचेत और बेहोश हो जाता। जिन्‍दगी का हाथ गन्‍दा नजर आने लगता तथा मृत्‍यु की बांहें सुहावनी लगने लगतीं।
     हजारों सालों से न जाने कितने मानवों ने दुनिया को अपनी दृष्टि से टटोला होगा। न जाने कितने विद्वान इसका रहस्‍य खोजने में असफल होकर पथरायी आंखों से अपनी मौत की प्रतीक्षा करते रहे होंगे।  फिर भी कुछ वर्षों तक जीने के लालच में हम जीवन रहस्‍य को सोचने-विचारने के बजाय दैनिक क्रियाकलापों को निपटाने में ही सारा समय व्‍यतीत कर देते हैं।
     मैं अपनी कहानी कहता हूं। मैं अपना अधिक समय एकांत में गुजारता हूं। यह तो मेरी विवशता है कि अपनी दैनिक उपभोग की वस्‍तुओं के लिए मुझे इस अजीब समाज से जुड़ना पड़ रहा है और नौकरी या रोजगार करना पड़ रहा है। यदि मैं पारिवारिक रुप से धनी होता तो अपने जीवन सिद्धांतों के सहारे पागल होकर बैठा रहता। अभी पागल इसलिए नहीं हो पाया हूं क्‍योंकि आधे से अधिक वक्‍त बेतुके समाज को, इसके व्‍यर्थ कार्यों को देना पड़ता है। स्‍वाभाविक रुप से ऐसे में रहस्‍यात्‍मक अभिवृत्ति संकुचित हो जाती है और सामान्‍य प्रक्रियाओं को निपटाने की हाय-तौबा में शामिल होना पड़ता है। तब भी यदा-कदा जब अपने मनोविचारों में गहरे उतरने का मौका मिलता है तो अपनी उपस्थिति भ्रमात्‍मक हो जाती है, और शायद इसी भ्रम अवस्‍था से मैं जीने के लायक बचा हुआ हूं। यदि मैं यहां समाज के आवरण से जीने की कोशिश करता तो मेरा प्रयास कभी भी सफल नहीं होता। ऐसा करते हुए मैं कई बार मर चुका होता।
     मेरा मजबूत पक्ष यह है कि मैं किसी के द्वारा दर्शाई गई चिंता में शामिल नहीं होता। मैं दूसरे को कम ही सुनता हूं। कभी-कभी अपनी इस आदत से मुझे हानि भी होती है क्‍योंकि अपने लिए अच्‍छे सिद्ध होनेवाले लोगों की सच्‍ची बातें और चिंताएं भी मैं अनसुनी कर देता हूं। निश्चित रुप से यहां मैं मूर्ख हो जाता हूं, और यह सब क्‍या पता इसलिए होता हो कि अधिकांश समय मुझे अविश्‍वास और धोखा मिला। तब इसमें मेरी भी कोई गलती नहीं देखी जा सकती।
     जिस भूखण्‍ड में हम रह रहे हैं, वहां क्‍या-क्‍या नहीं हो रहा! क्रूरता विकसित हो रही है। प्‍यार को दीमक चाट रही है। धोखा साहस और बलपूर्वक आगे बढ़ रहा है। दोस्‍ती दुश्‍मनी में परिवर्तित हो रही है। पता नहीं मनुष्‍य को यह विचार है भी या नहीं कि वह हड्डियों पर खड़ा रक्‍त और मांस का अल्‍पायु जोड़ है। उसका दम्‍भ तो इतना तीक्ष्‍ण हो गया है कि वह लोहे को भी चबाने की चुनौती दे रहा है। वह अपने भग्‍गस और घटिया अस्तित्‍व को धरती से विशाल और आसमान से विस्‍तृत मानने लगा है। उसे अपने जानवर बनने की स्थिति बहुत सुखद लगती है। निर्धन मनुष्‍य को अपनी जिन्‍दगी बड़ी कष्‍टकारी प्रतीत हो रही है। अत्‍यधिक भीड़भाड़ में नामी-गिरामी लोग भी भुला दिए गए हैं। क्‍यों तो लोग जिन्‍दगी की गाड़ी धकेल रहे हैं! कौन सी उपलब्धि ऐसी है, जो जिन्‍दगी गुजार कर प्राप्‍त होगी, और जब सभी ने मृत्‍यु का ग्रास बनना है, तो क्‍यों जिन्‍दगी को स्‍वार्थमय किया जा रहा है? क्‍यों प्रकृति को तहस-नहस किया जा रहा है, और क्‍यों सांसारिक संवेदना का गला दबाया जा रहा है ? 

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

अधिकारों के प्रति समर्पित अंतर्राष्‍ट्रीय प्रवासी दिवस



अंतर्राष्‍ट्रीय प्रवासी दिवस हर साल १८ दिसंबर को मनाया जाता है। संयुक्‍त राष्‍ट्र महासभा ने सर्वप्रथम ४ दिसंबर, २००० को दुनियाभर में रह रहे प्रवासियों की बड़ी और बढ़ती हुई संख्‍या को ध्‍यान में रखकर यह दिवस आयोजित करने का निर्णय लिया। अट्ठारह दिसंबर, १९९० को महासभा ने प्रवासी कर्मचारियों और उनके पारिवारिक सदस्‍यों के अधिकारों की सुरक्षा पर अंतर्राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन का आयोजन किया था। यह दिवस अनेक देशों, अंतरसरकारी और गैर-सरकारी संगठनों में प्रवासियों के मानव अधिकारों और उनकी मौलिक राजनीतिक स्‍वतंत्रता पर सूचना प्रचार-प्रसार के माध्‍यम से मनाया जाता है। इस दिन प्रवासियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अपनाए गए सुरक्षा सम्‍बन्‍धी उपायों, अनुभवों और कार्रवाईयों की नई रुपरेखा बनाने पर भी सहभागिता की जाती है।
सन् १९९७ में फिलिपिनो और दूसरे एशियाई प्रवासी संगठनों ने १८ दिसंबर को प्रवासी एकजुटता अंतर्राष्‍ट्रीय दिवस के रुप में मनाना और फैलाना शुरु किया। इस दिन को इसलिए चुना गया, क्‍योंकि १८ दिसंबर १९९० को इसी दिन संयुक्‍त राष्‍ट्र महासभा ने समस्‍त प्रवासी कर्मचारियों और उनके पारिवारिक सदस्‍यों के अधिकारों के संरक्षण पर प्रथम अंतर्राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन आयोजित किया था। अट्ठारह दिसंबर की इस पहल पर, सन् १९९९ में अंतर्राष्‍ट्रीय प्रवासी दिवस की संयुक्‍त राष्‍ट्र में आधिकारिक प्रविष्टि के लिए भावी कार्यक्रमण तैयार करते हुए अंतर्राष्‍ट्रीय प्रवासी अधिकार तथा प्रवासी अधिकार अंतर्राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन अनुसमर्थन की वैश्विक अभियान परिचालन समिति और अनेक अन्‍य संगठनों के सहयोग से एक ऑनलाइन अभियान की शुरुआत हुई। इससे दु‍निया के तमाम सरकारी, गैर-सरकारी संगठनों के लोग जुड़ते चले गए और परिणामस्‍वरुप महासभा द्वारा अंतर्राष्‍ट्रीय प्रवासी दिवस की आधिकारिक तिथि की घोषणा कर दी गई। इस प्रकार अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय ने प्रवासियों के मानवाधिकारों को विशिष्‍ट रुप से दर्शाने के लिए वर्ष २००० से १८ दिसंबर को अंतर्राष्‍ट्रीय प्रवासी दिवस के तौर पर मनाना शुरु किया। यह एक महत्‍वपूर्ण कदम था। क्‍योंकि इससे प्रवासियों की सुरक्षा के लिए भीड़ जुटाकर आवाज उठानेवालों को धरना-प्रदर्शन करने की एक तरह से इजाजत दे दी गई। महासभा ने प्रवासियों के मानवाधिकारों और मौलिक आजादी पर सूचना प्रसार, अनुभवों को बांटने तथा प्रवासियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कार्रवाई करने द्वारा अपने सभी सदस्‍य राज्‍यों, अंतरसरकारी और गैर-सरकारी संगठनों को यह दिवस मनाने का निमन्‍त्रण दिया। अंतर्राष्‍ट्रीय प्रवासी दिवस को सर्वप्रथम परदेश और स्‍वदेश की अर्थव्‍यस्‍था में लाखों प्रवासियों द्वारा किए गए योगदान को मान्‍यता देने के एक अवसर के रुप में देखा जाता है। इसके बाद उनके मूल मानवाधिकारों को सम्‍मान देने की बात आती है।
तमाम अंतर्राष्‍ट्रीय प्रवा‍सी दिवस आयोजनों का मकसद प्रवासियों की गुहार सुनकर उनके अधिकारों की संरक्षा के लिए रास्‍ता निकालना ही है। आज दुनियाभर में विभिन्‍न व्‍यापारिक-सामाजिगतिविधियां संचालित की जा रही हैं। लोग रोजगार के लिए अपना देश, मूल निवास छोड़कर परदेश-विदेश में रहते हैं। अकसर अपना मुल्‍क छोड़कर दूसरे मुल्‍क में अपने मौलिक अधिकारों को कैसे प्राप्‍त किया जाए, प्रवासी जनमानस के इस प्रश्‍न पर ही संयुक्‍त राष्‍ट्र महासभा ने प्रवासी दिवस मनाने की परंपरा अपनाई। आज यह परंपरा समूची दुनिया में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए एक वैश्विक एकीकृत प्रयास बनकर उभरी है।
 निश्चित रुप से यही भाव रेडियो १८१२ की चिंता के केन्‍द्र में भी है, जो विश्‍व में प्रवासियों के अधिकारों के मुद्दों को प्रस्‍तुत कर रहा है। मनीला के रेडियो १८१२ की शुरुआत १८ दिसंबर, २००६ को हुई। यह एक वैश्विक आयोजन है, जो दुनियाभर के प्रवासी समूहों और रेडियो केन्‍द्रों के माध्‍यम से प्रवासियों की वैश्विक चिंताओं को प्रदर्शित करते हुए उनकी उपलब्धियों का आयोजन कर रहे कार्यक्रमों का प्रसारण करता है और उनमें सहभागिकता करता है। एक तरफ यह रेडियो है जो विश्‍वभर के प्रवासियों के अधिकारों के प्रति सजग है। इस क्रम में उसने संयुक्‍त राष्‍ट्र महासभा में कई अहम प्रस्‍ताव रखे हैं। इनका मुख्‍य उद्देश्‍य प्रवासियों के मानवाधिकारों की संरक्षा कानून को देश, काल, समय के अनुसार सशक्‍त बनाना है। दूसरी ओर आस्‍ट्रेलियाई रेडियो है, जिसके दो जॉकियों की वजह से निर्दोष भारतीय मूल की नर्स की मौत हो गई। इन रेडियो जॉकियों की मस्‍ती कॉल ने लंदन स्थित किंग एडवर्ड सप्‍तम अस्‍पताल की दो बच्‍चों की मां नर्स जैसिंथा सलदान्‍हा की जीवन लीला समाप्‍त कर दी। उल्‍लेखनीय है कि महारानी एलिजाबेथ द्वितीय और प्रिंस चार्ल्‍स बनकर जॉकी ने नर्स से बात की। डच्‍चेज ऑफ कैंब्रिज केट मिडिलटन की देखभाल कर रही नर्स को किए गए मजाकिया फोन कॉल ने इस रेडियो स्‍टेशन में हड़कंप मचा दिया है। रेडियो स्‍टेशन के फेसबुक एकाउंट पर लोगों की रोषपूर्ण प्रतिक्रियाओं का अम्‍बार लग गया। लोगों ने प्रस्‍तोताओं को रेडियो से निकालने की सिफारिश की है। शनिवार दोपहर ११ बजे तक ११ हजार से अधिक लोगों ने नर्स की मौत की दुखदायी घटना पर अपनी प्रतिक्रियाएं व्‍यक्‍त कीं।
भारतीय मूल के प्रवासियों के साथ कई दुर्घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं। हाल ही में स्‍पेन में भारतीय मूल की महिला दंत चिकित्‍सक सविता हल्‍लपनवार की गर्भधारण के दौरान हुई दर्दनाक मौत से मानव अधिकार उल्‍लंघन पर खूब वैश्विक हलचल हुई। इसके तुरंत बाद आयरलैंड के ओस्‍लो में भारतीय दंपत्ति वल्‍लभनेनी को अपने सात वर्षीय बच्‍चे को डांटने-डपटने पर वहां के कानून द्वारा सजा देना भी एक किस्‍म की अंतर्राष्‍ट्रीय मानवाधिकार उल्‍लंघन की घटना थी। हालांकि इस घटना में मानव अधिकार के उल्‍लंघनकर्ता और इससे पीड़ित एक ही परिवार के सदस्‍य थे। इन अंतर्राष्‍ट्रीय घटनाओं ने मानवाधिकारों के प्रति अंतर्राष्‍ट्रीय समुदाय का ध्‍यान खींचने का काम किया है। इन घटनाओं के परिप्रेक्ष्‍य में अंतर्राष्‍ट्रीय प्रवासी दिवस की प्रासंगिकता पहले से ज्‍यादा हो गई है। इन घटनाओं के तेजी से प्रकाश में आने के पीछे प्रवासी अधिकारों के कार्यकर्ताओं और प्रसारकों का विशेष योगदान रहा। आशा है कि अंतर्राष्‍ट्रीय प्रवासी दिवस मनाते समय इसके मुख्‍य संचालनकर्ता भारतीय मूल के लोगों के साथ हुईं अप्रिय घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने और पीड़ितों को समुचित न्‍याय दिलाने के लिए प्रवासी अधिकार संरक्षण कानून को और लचीला बनाने की दिशा में काम करेंगे।
मंगलवार 18 दिसंबर 2012 को राष्‍ट्रीय सहारा में

शनिवार, 15 दिसंबर 2012

जीवन और आत्‍महत्‍या





जीवन...
पिछली रात को इतना दुखी था कि सब कुछ बेकार लग रहा था। अपने को अंधेरे और चाहरदीवारी में ही बन्‍द रखने की इच्‍छा होती थी। इसलिए दोपहर एक बजे सोकर उठा। लेकिन अब मैं खुश हूं। क्‍योंकि दोपहर का आज का मौसम बहुत सुन्‍दर प्रतीत हो रहा है। गर्मी का अनुभव तो हो रहा है, पर साथ-साथ वर्तमान मौसम मुझे मन से पिघलाने में लगा हुआ है।
एक अहसास हो रहा है, जिसमें दुख के बगैर किसी की याद खुशियों से सराबोर होती जा रही है। क्‍योंकि प्राकृतिक स्थिति अत्‍यंत मनमोहक है। धूप अपने सम्‍पूर्णत्‍व पर है। पेड़ों का हवा के सहारे हिलना और ठंडी हवा देना कितना अच्‍छा लग रहा है। आसमान में कहीं-कहीं मेघों का आवरण बना हुआ है। तितलियां अपने रंग-बिरंगे रुप के साथ तेजी से स्‍थान-परिवर्तन कर रही हैं। पीपल के नए खिले हुए पत्‍तों का यौवन अलग से आकर्षित करता है। चिड़ियों और अन्‍य पक्षियों का आवागमन प्रसन्‍नता एवं उदासी का कारण बनता है। लगता है कि इन जीवों का भाग्‍य और शक्ति कितनी उपयोगी है, कि ये जहां चाहे आ-जा सकते हैं। विशेषकर इनका आना-जाना किसी किस्‍म की पाबंदी और रोक के दायरे में नहीं है। मुझे भी यह वातावरण हर ओर से और हर स्‍तर पर निश्‍छल, निष्‍कपट बना रहा है। लगता है जैसे मेरा अब किसी से भी कोई वैर नहीं रहा। जैसे मेरी द्वेत भावना का ह्रास हो गया है। मेरे मतभेदों को भी ये प्राकृतिक दशा नष्‍ट करती लगती है। जिस प्रकार प्रकृति ने अपना भोला रुप ग्रहण किया हुआ है,  मैं भी वैसा ही भोलानाथ बन रहा हूं। सचमुच मेरा नव ह्रदयोदय हो रहा है। कलुष और अहम भाव का विनाश हो रहा है। यदि ऐसे में कोई मुझे बहुत ज्‍यादा नफरत करता है, तो मैं  दोपहर के  इस  वैभवशाली वातावरण में गहराई तक समा जाना चाहता हूं। ताकि कोई मुझे ईर्ष्‍या करे तो तब भी मैं भालेनाथ का ही अनुरागी बना रहूं और कई बार एवं कई मौकों पर जीवन को कष्‍ट समझनेवाले अपने भावों पर, आज के इस स्‍वर्गमय वातावरण की खुशियों के विचारों से, जीवन की सच्‍ची बातों का लेप लगा सकूं। वे सच्‍ची बातें, जो प्रकृति के इस अनोखे रुप के कारण स्‍वभावत: निकल रही हैं। आत्‍महत्‍या करनेवाले यदि कभी इस अवस्‍था से परिचित हुए होते और स्‍वयं को आत्‍महत्‍या के लिए उकसानेवाले इसका अनुभव करतेतो कितना अच्‍छा होता। वे लोग मृत्‍यु का कोपभाजन बनने के बजाय जीवन का आनंद उठा रहे होते। जो लोग तंगदिल रहते हैं, वे ऐसे पलों (दोपहर के) को अपने जीवन में समेटें। तब देखें उनकी स्‍वयं की प्रकृति कैसे इस दोपहरी प्राकृतिक व्‍यवस्‍था में बदल कर शांत हो जाएगी। इसके बाद वे नई जीवन अनुभूतियों से सुसज्जित हो जाएंगे। इनका असर उनको महादयावान बना देगा। वे महसूस करेंगे कि वास्‍तविक जीवन में उनका पदार्पण तो अब हुआ है। पहले तो वे मशीनी सोच के अनुरुप चल रहे थे। 
क्‍या परोपकारी छटा है प्रकृति की। मुझे दुख है कि क्‍यों बचपन से मैं इन दोपहरों से नियम से नहीं मिला। क्‍यों इतनी सुभाषित प्रकृतिप्रदत्‍त अवस्‍थाओं को मैं ह्रदयांगम नहीं कर सका। आज तक मैं वैमनस्‍य और जलन से कितना छुटकारा प्राप्‍त कर चुका होता! कौन नहीं होता जो मेरे स्‍वभाव से तब पिघला न रहता! कितने लोगों के बीच जाकर अब तक मैं उनको भी अपने जैसा बनने के लिए प्रेरित कर चुका होता! मेरे जीवन परिवेश की कितनी सामाजिक कुरीतियां और विसंगतियां समाप्‍त हो चुकी होतीं! लोगों के दयावान बन कर रहने से कितने दुख और कष्‍ट अब तक मिट गए होते! सर्वोपरि शक्ति से प्रार्थना करुंगा कि वो ऐसी दोपहर निरन्‍तर बनाए, जो मुझे निराशा से आशा में परिवर्तित कर दे। 
 ...और आत्‍महत्‍या
परन्‍तु ऐसा नहीं होगा। आज कोई भी रुक कर आराम से सोचना नहीं चाहता कि उसे जीवन क्‍यों प्राप्‍त हुआ? इसका उद्देश्‍य क्‍या है? सामाजिक विघटन बहुत पहले से शुरु हो चुका है। हमारा समय इसकी चरमोत्‍पत्ति देख रहा है। सर्वप्रथम धर्म बिखरे फिर समाज उखड़ा, संयुक्‍त परिवार टूटे और अब एकल परिवार के मात्र दो या तीन सदस्‍यों के दिलों में खटास बढ़ रही है। सबका कारण एक ही है, अंधी आधुनिकता। परिणामस्‍वरुप आत्‍महत्‍याओं की प्रवृत्ति पैर पसार रही है। देश-दुनिया के कर्ताधर्ताओं को अपने उस किए पर तो पछताना ही होगा, जिसकी शायद समाज को कभी जरुरत ही नहीं रही। हाल ही में दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के हिन्‍दु कॉलेज के गोल्‍ड मेडलिस्‍ट शोधार्थी, लंदन स्थित अस्‍पताल में भारतीय मूल की नर्स और गाजियाबाद के किशनपाल ने अपनी-अपनी जीवन लीलाएं जिन परिस्थितियों में समाप्‍त की हैं, उनका निर्माण कोरी और खोखली आधुनिकता के पैरोकारों ने ही किया है।  

शनिवार, 8 दिसंबर 2012

हस्‍ताक्षर मिलान की समस्‍या



हस्‍ताक्षर मिलान की समस्‍या
 सदैव बनी रहती है

उच्‍चतम न्‍यायालय का नया निर्णय कि यदि किसी खाताधारक के चैक पर किए गए और बैंक के पास अभिलेखित उसके हस्‍ताक्षर का मिलान नहीं होता तो उसके विरुद्ध आपराधिक मामला दर्ज होगा। न्‍यायूर्मि टीएस ठाकुर और न्‍यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा की पीठ ने इस मामले में गुजरात उच्‍च न्‍यायालय के निर्णय को निरस्‍त करके यह नया फैसला सुनाया। उच्‍च न्‍यायालय की व्‍यवस्‍था थी कि चेक डिसऑनर होने पर आपराधिक मामला चेक जारीकर्ता के खाते में अपर्याप्‍त राशि पाए जाने की स्थि‍ति में ही बनता है।
      माननीय उच्‍चतम न्‍यायालय का यह निर्णय किसी भी दृष्टिकोण से आम जनता के हित में नहीं है। अपनी व्‍यक्तिगत पहचान के तौर पर कागज-पत्रों में अंगूठा लगानेवालों को यदि छोड़ दिया जाए तो बाकी बैंक खाताधारकों के लिए य‍ह कदम अत्‍यंत ही विचलित करनेवाला है। सूचना प्रौद्योगिकी के इस दौर में जब तमाम कार्यों के लिए हस्‍तलिखित आवेदन या प्रपत्र भर कर देना अब बीती बात हो चुकी हो, हमेशा एकसमान हस्‍ताक्षर करना असंभव तो नहीं पर मुश्किल जरुर है। बैंक और अनेक अन्‍य निजी प्रतिष्‍ठान भी ग्राहकों से लेन-देन करते वक्‍त कम्‍प्‍यूटर मु्द्रित आवेदन, रसीदी पत्र की मांग करते हैं और वे खुद भी इन्‍हें ही जारी करते हैं। बल्कि बैंक के ही कई रसीदी पत्रों में लिखा हुआ रहता है कि चूंकि यह कम्‍प्‍यूटर निर्मित रसीद है, इसलिए इसे हस्‍ताक्षरित करने की जरुरत नहीं है। जब एक प्रतिष्‍ठान हस्‍ताक्षर के झंझट से बचने के लिए प्रौद्योगिकी का सहारा लेकर अपने अनगिन काम विश्‍वसनीयता और गुणवत्‍ता से निपटा लेता है, और ग्राहक या उपभोक्‍ता भी लेन-देन के लिए इन कम्‍प्‍यूटर जनित रसीदों और पत्रों को साक्ष्‍य के रुप में स्‍वीकार कर लेता है, तो पिर समस्‍या कहीं नहीं रहती। ऐसे में चैक पर किए गए हस्‍ताक्षर का बैंक के पास मौजूद खाताधारक के हस्‍ताक्षर से मिलान नहीं होने पर न्‍यायालय की आपराधिक मुकदमे की व्‍यवस्‍था बहुत ही अव्‍यावहारिक कदम है। चूंकि आज ज्‍यादातर काम कम्‍प्‍यूटर या मशीनों के द्वारा पूरे होते हैं, इसलिए इन कार्यों की हस्‍तलिखित रिपोर्टें बना कर, उनकी जांच कर उन पर हस्‍ताक्षर करने का चलन खत्‍म हो चुका है। सरकारी सेवाओं में चपरासी से लेकर उच्‍च पदस्‍थ अधिकारी द्वारा हस्‍तनिर्मित फाइलिंग करने और इनमें अंकित टिप्‍पणियों पर हस्‍ताक्षर करने का रिवाज तो अभी भी है, लेकिन निजी प्रतिष्‍ठानों में लेखा और अन्‍य विभागों के बड़े अधिकारियों को छोड़ दिया जाए तो सभी विभागों के छोटे कर्मचारियों द्वारा अपनी कार्य निष्‍पादन रिपोर्ट में हस्‍ताक्षर करने की कोई कार्यालयी प्रणाली नहीं है। जब अधिकांश कर्मचारी अपनी कार्य संबंधी रिपोर्टों में हस्‍ताक्षर नहीं करते हों, तो वे केवल बैंक चैक में एकसमान हस्‍ताक्षर कैसे कर सकते हैं। वेतनभोगी लोग बैंक में यदा-कदा लेन-देन करते हैं। ऐसे में उनसे ये अपेक्षा करना कि उनके हस्‍ताक्षरों का हर बार, बैंक के पास उपलब्‍ध उनके हस्‍ताक्षर से मिलान हो, बड़ी असम्‍भव बात है। ज्‍यादातर लोगों के हस्‍ताक्षरों का अपने पहले किए गए हस्‍ताक्षर से मिलान नहीं होता। ऐसे में यह नया और निष्‍ठुर न्‍यायालयी आदेश, आम आदमी के पहले से ही कष्‍टकारी जीवन को और ज्‍यादा दुखदायी बनाएगा। न्‍यायालय को अपने इस निर्णय पर पुनर्विचार करने की जरुरत है।
बैंक चैक के माध्‍यम से किए गए दुतरफा लेन-देन में विवाद होने की स्थिति में इस कानून के अन्‍तर्गत आपराधिक मुकदमा चलाना तो ठीक है। ऐसी स्थिति में पीड़ित को नयाय और दोषी को दण्‍ड तो मिलना ही चाहिए। लेकिन यदि उपभोक्‍ता एकल रुप से बैंक लेन-देन के दौरान हस्‍ताक्षर मिलान की समस्‍या में फंसता है, तो इस स्थिति में उस पर आपराधिक मुकदमा चलाना विधि सम्‍मत नहीं हो सकता।

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

मतांतर से उपजा भटकाव




आओ सबके कल्‍याण के लिए 
मिलकर आगे बढ़ें
आज देश की स्थिति अत्यन्त जटिल है। भारत के सम्मुख उभरी इस जटिलता के प्रति क्या वाकई व्यक्तिगत लगाव उभरता है\ संसद से लेकर सड़क तक देश की चिंताओं में उठा आक्रोश और गुस्सा क्या सैद्धांतिक सीमा लांघकर परिवर्तनकारी क्रांति का वायस बन सकेगा\ क्या कुछ ऐसा संभाव्य है, जो व्यावहारिक तौर पर भ्रष्टता और धृष्टता को कुचल सके\ सबसे पहले तो भ्रष्ट व्यवस्था के प्रति अपनी मानसिक उद्विग्नता को हम सब प्रबुद्ध लोगों को व्यावहारिक स्वरूप प्रदान करना होगा। हमें समस्याओं की तह तक पहुंचने और उनका समूल निस्तारण करने के लिए अपनी कार्ययोजनाओं को व्‍यावहारिक बनाना होगा। केवल उच्च सिद्धांत व सद् विचार प्रसार से काम नहीं चलनेवाला। विचारों की जीवनोचित और सामाजिक महत्‍ता यदि बुद्धिजीवियों के वैचारिक आदान-प्रदान तक ही सीमित हो जाएगी, यदि इसका देश के पिछड़ेपन और भ्रष्टता के निवारणार्थ व्‍यावहारिक प्रयोग न हो सका, तो यह किसी भी स्तर पर किस काम की रह जाएगी! विशेषकर आज के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और आधुनिक उथल-पुथल के समय में किसी भी बुद्धि, विचार, सत्‍ता, संसद, प्रगति का महत्व मनुष्य के कल्याणार्थ ही होना चाहिए ना कि एक ऐसी दुनिया रचने में, जो लक्ष्यविहीन होकर तमाम मूल्यों, मर्यादाओं की कीमत पर मशीनी गठन तक केन्द्रित हो जाए। स्थिति ये हो चुकी है कि हम सब व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और आधुनिक अवधारणा में दोहरे चरित्र के साथ मौजूद हैं। एक चरित्र हमारे स्वयं के विचारों और धारणाओं से संचालित है तो दूसरे पर हमारे मार्गदर्शकों, प्रतिनिधियों का कब्जा है। सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि ऐसे में निजी नैतिकता के अनेक विचारों और मार्गदर्शनों का, प्रतिनिधिकरण के नाम पर थोपे गए नैतिकता के विचारों से एकीकरण असंभव है। और जब ऐसा है और हमेशा ही ऐसी स्थिति रहेगी तो फिर समग्र सुधार का सपना कभी सच हो ही नहीं सकता।
पिछले साल अगस्त में और इस साल जुलाई में फिर से हुए अण्णा आंदोलन ने आंदोलनकर्ताओं की नैतिकता के अलग-अलग रूप दिखाए। कुछ ने इसे सिर्फ सामाजिक जनजागरण और चेतना जागृति के अभियान के रूप में माना तो अनेक ने इसे व्यवस्था का हिस्सा बनकर भ्रष्टाचार मिटाने के रूप में लिया। हुआ भी यही कि टीम अण्णा भंग कर दी गई और टीम के केवल जनजागृति चेतना के पक्षधर व राजनीतिक विकल्प के रूप में खड़े होकर भ्रष्टाचार से लड़ाई लड़ने को आतुर दूसरे पक्ष के बीच ही अपने-अपने लक्ष्यों के प्रति रास्तों के चुनाव में मतभेद उभरकर सामने आए। हालांकि अण्णा ने राजनीतिक दल बनाकर चुनाव लड़ने की घोषणा तो कर दी और पूरे देश में घूमकर ईमानदार और अच्छे राजनीतिक प्रत्याशी देने की बात भी कही, परन्तु चुनाव जीतने की स्थिति में मंत्रिमण्डल में शामिल नहीं होने की बात भी उन्होंने की। उन्होंने कहा कि वे मंत्रिमण्डल पर नजर रखेंगे और किसी के भी गलत होने पर वे उसके कान खींचेंगे। प्रश्‍न यह है कि क्या यह इतनी सहजता से हो सकेगा\ क्योंकि सरकारी चलाने की स्थिति और सरकार बनने से पहले की स्थिति में एकरूपता कायम नहीं रह सकती। और यहां एकरूपता नहीं रहने के कारक तो आंदोलन के दो धुरियों में मुड़ने से ही पैदा होने लगे हैं। बाद में समूह के सदस्यों में नैतिकता, सामाजिकता और धर्मनिरपेक्षता, धार्मिकता के चलते मतभेद न उभरें, इसकी क्या गारंटी है। क्योंकि पिछले पैंसठ सालों से इस देश की लोकतांत्रिक शासन पद्धति में ऐसा नहीं हुआ कि यहां सज्जन, कर्मठ और देशभक्त नेता हुए ही नहीं। ऐसे बहुत से नेताओं ने देशहित में अनेक सपने संजोकर संसद के गलियारों में बहुत भागदौड़ की। परन्तु यहां भी वही स्थिति उभरकर आई, जो आज अण्णा समूह के सदस्यों के मध्य बरकरार है। तब भी नेताओं की व्यक्तिगत सोच एकरूप और एकनिष्ठ नहीं हो पायी। लोकतांत्रिक नैतिकता और मर्यादा के विपरीत अलग-अलग सोच रखनेवाले नेताओं ने अंततः अपने प्रयास अधर में ही छोड़ दिए और देश की राजनीति को एक नई बौखलाई और लोलुप राजनीतिक-पीढ़ी के हवाले कर दिया। इसने राष्ट्रीय उत्‍तरदायित्व और राष्ट्रधर्म की निष्ठा को ताक पर रखकर सम्प्रदाय, जाति, क्षेत्र के आधार पर नए राज-काज की स्थापना की। यह राज-काज वही है, जिसका दंश आज प्रत्येक संवेदनशील भारतीय झेल रहा है। इसी के विरूद्ध आजकल आंदोलनों की भरमार है। अनेक छोटे बड़े स्तर के आंदोलनों से जनसाधारण सत्‍ता के उस सच को तो जान ही गया है, जो आधुनिक होने के नाम पर शीर्ष स्तरीय अवैध पूंजीगत लेन-देन की पराकाष्ठा है। जनता के साथ किया जा रहा यह ऐसा दुराग्रह है, जिसके विरूद्ध खड़े होनेवालों को अदनी सी गलती के लिए भी अदालती और दण्डात्मक कार्रवाई के लिए धमकाया जा रहा है। ऐसी तमाम परिस्थितियों के मद्देनजर जो सार्वजनिक आग्रह सत्‍ता के विरूद्ध निकलकर सामने आ रहा है, उसके प्रवाह से सत्‍तासीनों को चेत जाना चाहिए। क्योंकि संभलने के मौके भी बार-बार नहीं मिलते।
        ऐसे में तो वही कहावत याद आती है कि जिसकी चलती है उसकी तो बकवास भी अच्छी लगती है। आज हमारे कर्ताधर्ताओं ने आंख मूंदकर देश के जीवन के लिए जो हवा पानी उपलब्ध कराया है, उसमें आम आदमी को घुटन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में विकास, आधुनिकता, जीडीपी, विदेशी मुद्रा भण्डार इत्यादि मानदण्डों के पीछे हो रही देशद्रोही साजिश का तानाबाना आज खुला पन्ना बन चुका है। इसे आम और खास दोनों आसानी से पढ़ सकते हैं। सत्ताधारियों को जिन आंदोलनों की लपटों से अपने महलों के जलने का डर था, वे अब अपने वाहकों और संचालनकर्ताओं के मतांतरों से स्वयं को झुलसाने में लगी हुई हैं। ऐसे में आंदोलन के अधिष्ठाताओं को एक महत्वपूर्ण सामाजिक बिन्दु पर केन्द्रित होकर एक साथ आगे बढ़ना होगा। अन्यथा सामाजिक विखंडन को हवा देनेवालों को इससे अच्छा आभास और क्या हो सकता है कि सही सोच और लक्ष्य के साथ उनके विरूद्ध खड़े होनवाले अपने ही स्तर के मतैक्यों में पड़कर बिखरने लगे हैं। इस समय महंगाई, भ्रष्टाचार, आधुनिक कुरीतियों को मिटाने के लिए एक ऐसी क्रान्ति की जरूरत है, जिसके वाहक सर्वकल्याण की विचारधारा से अत्यन्त मजबूती से जुड़े हुए हों और अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए शुरू से लेकर अन्त तक उनमें एक जबर्दस्त दार्शनिक गठबन्धन हो। अपने इष्ट कर्तव्य के प्रति उनके इस तरह एकनिष्ठ और शक्तिवान बने रहने से निश्चित ही भ्रष्टाचार और भ्रष्टतंत्र को झुकाने में सफलता मिलेगी। परन्तु आम जनता की सामाजिक सजगता के बिना सफलता प्राप्त करना कठिन है। कोई भी आंदोलन, चाहे वह सामाजिक हो या राजनीतिक, जनजागरण की भावी संभावनाओं पर ही टिका रहता है। इसलिए भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हेतु ऐसी संभावनाओं के ज्वार को भाटा बनाने की विशेष जरूरत है।

बालमन की संवेदना






बेटी को चार साल पूरे हो गए। पांचवे वर्ष में प्रवेश के साथ ही उसमें जीवन र‍हस्‍य को जानने-समझने की वृत्ति घर कर गई। इसका अंदाजा मुझे तब हुआ जब वह मोबाइल फोन पर जिन्‍दगी का सफर है ये कैसा सफर गीत को सुनते हुए फटी-फटी आंखों से शून्‍य में निहारती रही। मुझे आभास हो गया कि बालमन ने थोड़ी देर के लिए रहस्‍यात्‍मक गंभीरता ग्रहण कर ली है। बचपन में उसका ऐसा सयानापन मुझे अपनी बेटी के प्रति श्रद्धा और चिंता दोनों से भर गया। मैं सोचने लगा कि बचपन इंसान की संवेदना नापने का सही पैमाना है। इस आयु में उसके जीवन दर्शन की दिशा तय होती है। बेटी के बारे में सोचते-सोचते मैं अपने बचपन में जा पहुंचा। मैं भी चार पांच साल की अवस्‍था में अकेले बैठकर विचार करता था कि जीवन क्‍या है, क्‍यों है! सोचता था कि अगर संसार में कुछ भी नहीं होता तो क्‍या होता! आकाश, धरती, पेड़-पौधे, जीव-जन्‍तु, आग, पानी, हवा, हरियाली कुछ भी नहीं होता तो क्‍या होता! इन जीवन पर्यायों की अनुपस्थित का भाव मुझे अत्‍यंत डरावना प्रतीत होता। माथे पर पसीने की बूंदें छलक आतीं। दुनिया में कुछ भी न होने और सर्वत्र अंधकार व्‍याप्ति की भावना से मैं इतना घबरा जाता कि बचपन की सामान्‍य मौज-मस्‍ती भी भूल जाता। खेलकूद, दौड़भाग और उछलकूद के दिनों में, मैं जीवन दर्शन के पहलुओं से उलझने लगा। इसका बुरा असर मेरे शारीरिक विकास पर हुआ। इसके साथ मेरी मानसिक स्थिति भी अत्‍यधिक विश्‍लेषणात्‍मक हो गई। हर बात, विचार और कार्य से पहले मैं इनके विभिन्‍न परिणामों की कल्‍पना करने लगता। मतलब मेरे जीवन की हरेक गतिविधि सुचारु हो गई और उसके स्‍वाभाविक रुप से घटने का कोई रास्‍ता नहीं बचा। अपने ऐसे व्‍यक्तित्‍व परिवर्तन से समाज और दुनिया के लिए तो मैं संवेदनशील हो गया। पर स्‍वयं को मैंने मानसिक ऊहापोह और भ्रम के संजाल में फांस दिया। परिणामस्‍वरुप मानसिक तौर पर मैं अत्‍यधिक संवेदनशील हो गया। सद्भावना, ऊंची सोच, उत्‍तम विचार, गहन चिंतन-मनन, पठन-पाठन और अध्‍ययन के दौरान तो यह संवेदनशीलता सकारात्‍मक ऊर्जा का संचार करती है। लेकिन सामाजिक विसंगतियों, विद्रूपताओं के चलते ये मुझे ऐसे दिमागी झंझावातों में फंसा देती है कि पागल होने तक की नौबत आ जाती है। त‍ब लगने लगता है कि सामाजिक समस्‍याओं के बीच जीने के लिए संवेदनशील नहीं बल्कि दिमागी रुप से परिवर्तनशील होना चाहिए। बेशक ये परिवर्तन आज मानव को जानवर बनने पर मजबूर करते हों, पर इन्‍हें ही स्‍वीकार करके, इन्‍हें ही अपना कर देहावसान से पहले तक जिंदगी चैन से गुजारी जा सकती है। 
      अल्‍पायु में बिटिया की जीवन संवेदना से उपजी श्रद्धा और चिंता के पीछे मेरा अपना जीवन एक उदाहरण है। अपनी जिंदगी में संवेदना के प्रति मैं जितना समर्पित रहा, उतना संवेदनामयी प्रतिफल मुझे नहीं मिला। समाज के दोहरे रवैये के कारण मेरी संभावनाएं कुंठित हो  स्थिर हो गईं हैं। दिल और दिमाग में ही ऐसे नकारात्‍मक असर होने की बात होती तो ठीक था। शारीरिक रुप से तो जिंदगी प्रफुल्लित और स्‍वस्‍थ रहती। लेकिन नहीं, कुंठाग्रस्‍त संभावनाओं ने तो शरीर पर भी बुरा प्रभाव डाला।
बिटिया का विकसित होता जीवन-दर्शन और संवेदन मन मुझे यदि उसके प्रति श्रद्धेय बनाता है, तो उसके प्रति चिंतित भी करता है। यदि संवेदनशील बन कर वह मुझे सदाचारी, सज्‍जन, सचरित्र और अच्‍छी प्रतीत होगी, तो उसके ऐसे बने रहने में मेरा स्‍वार्थ है। क्‍योंकि सदाचारी संस्‍कृति के पूर्वाग्रहों से पोषित अपनी मान्‍यताओं के अनुसार मैं उसे ऐसा ही बनाना चाहूंगा। लेकिन इन पूर्वाग्रहों से होकर गुजर रही मेरी अपनी जिंदगी जब चैन व सुकून से नहीं कट रही तो फिर अपनी ‍बेटी के लिए मैं क्‍या नया सोचकर ऐसे पथ पर बढ़ने की अपेक्षा करता हूं! मुझे दृढ़ आभास है कि ढकोसलों से भरी दुनिया और द्विअर्थी सामाजिक ताने-बाने में उसकी ये खूबियां बड़े होते-होते कुत्सित और कुण्ठित हो जाएंगी। इसलिए बाल-जीवन में उभरी उसकी गम्‍भीरता से खुश होने के बजाय मैं बड़े होते-होते तक उसके नटखटपन से परेशान होने के लिए तैयार हूं। पर ऐसा हो तो! आजकल के बच्‍चों पर टेलीविजन विज्ञापनों में प्रसारित सुविधायुक्‍त, सरल जीवन दर्शन का बुरा प्रभाव पड़ता है। वे वास्‍तविक जीवन को भी ऐसा ही मान लेते हैं। जबकि पूंजी, मुद्रा लाभार्जन के उद्देश्‍य से टी.वी. विज्ञापनों में दिखाई जा रही आभासी दुनिया वास्‍तविकता से बहुत दूर है। यही अन्‍तर बचपन को जीवन के स्‍पष्‍ट व्‍यवहार से मिलने नहीं देता। और अंतत: बड़े होते बच्‍चे कठोर जीवन सच्‍चाइयों को झुठला कर आभासी कोण पर आ कर स्थिर हो जा रहे हैं। इसके दु‍ष्‍परिणाम सभी देख रहे हैं।
बच्‍चों के प्रति उभरती प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष सामाजिक विसंगतियों से मानुषिक जीवन अत्‍यंत संकीर्ण हो गया है। यह तो अंधेरी गुफा में लक्ष्‍यविहीन होकर चलने की जिद्दी मानव प्रवृत्ति है। इससे अंततोगत्‍वा विनाश ही तय होगा। बालमन की संवेदनाओं को पल्‍लवित-पुष्पित करने के लिए हमें बेढंगी सामाजिक रुढ़ियों को समूल मिटाना होगा। बच्‍चों के हृदयाकाश में टिमटिमाते मासूम और निश्‍छल भावों के अनुकूल सामाजिक-सांस्‍कृतिक दायरे का विकास करना होगा। सम्‍पूर्ण संसार में सुखद जीवन की कल्‍पना तब ही साकार होगी जब बच्‍चों के लिए संस्‍कारसम्‍म्‍त सामाजिक वातावरण बन सकेगा।

गुरुवार, 29 नवंबर 2012

ये मेरी दृष्टि थी


जीवन-मृत्‍यु के रहस्‍य पर
 मासूम बच्‍चे का चिन्‍तन
रिश्‍ते, सम्‍बन्‍ध, लगाव, जुड़ाव, भाईचारा, बन्‍धुत्‍व आज की आधु‍निक दौड़-धूप में खत्‍म होने को हैं। इनके बने रहने की उम्‍मीद ऐसे संवदेनशील लोगों को अब भी है, जो धूर्तता और मक्‍कारी से बचे हुए हैं। महानगरीय ताना-बाना या‍नि कि दैत्‍याकार सड़कें और इन पर कई किलोमीटर तक दुपहिया, चार पहिया वाहनों का तांता। खुदरा व्‍यापार, सरकारी व निजी प्रतिष्‍ठानों के कार्यालय। इनके लिए और इनसे निरुपित आदमी। जो भी आता-जाता है, उसका मकसद बस पैसा। मनुष्‍यों की परस्‍पर दृष्टि में प्रेम का नितांत अभाव। इनमें व्‍यापार भाव है। पैसा अर्जित करने का आग्रह-अनुग्रह है। इन्‍हीं में शामिल मैं चाचा के छोटे लड़के के संग चार पहिया में सवार होकर पहले भारद्वाज अस्‍पताल और वहां से फिर सेक्‍टर-49 नोएडा स्थित एक घर में पहुंचा। हमारे पहुंचने से पहले अस्‍पताल से आई एम्‍बुलेंस उस घर के सम्‍मुख खड़ी थी। उसमें से मृत शरीर को बाहर निकाला गया। उसे उठाकर घर के फर्श पर रखा गया। शव देखकर महिलाओं का रुदन शुरु हो गया। अन्तिम स्‍नान और बाकी क्रियाओं के बाद शरीर को फिर नीचे लाया गया। मातमी घर प्राइवेट बिल्‍डर द्वारा निर्मित बहुमंजिला इमारत के द्वितीय तल पर था। रो रहीं महिलाएं नीचे तक आईं। पार्थिव शरीर को अन्तिम संस्‍कार के लिए ले जाने को बांधा जा रहा था। दुखित परिवार को ढांढस बंधाने पास-पड़ोसवालों, सगे-संबंधियों का आना-जाना जारी था। बगलवाले प्रथम तल के घर से एक नौजवान आंखें मलते हुए बाहर आया। मृतात्‍मा के लिए रो रही जीवितात्‍माओं के दुख क्रन्‍दन, तीव्र विलाप रुदन सुनकर ही शायद उस लड़के की नींद उचट गई थी। उसकी नींद में महिलाओं की विलाप ध्‍वनि ने व्‍यवधान डाला तो वह कारण जानने बाहर आया। मृत शरीर और उसके पास खड़े लोगों को खीझ व क्रोधपूर्वक देखने लगा। उसकी भंवें इस परिस्थिति के प्रति भावहीन होकर लहराने लगीं। नौजवान के लिए पड़ोसी की मृत्‍यु इतनी बोझिल और डरावनी थी कि वह पार्थिव देह को ऐसे देखते हुए निकला मानो वह ऐसी दुर्घटना से अनभिज्ञ है। या वह ऐसा देखना ही नहीं चाहता हो। उसने कान पर मोबाइल सटाया और कुछ पल पूर्व के परिदृश्‍य से अपने अस्तित्‍व को ऐसे अलग किया जैसे आदमी गंदगी को हटाता है। मैं उस लड़के को दूर जाते हुए देखता रहा। मेरी दृष्टि को वहां मौजूद मेरे एक भाई की दृष्टि ने भी सहयोग प्रदान किया। शायद या निसंदेह वह भी वही महसूस कर रहा था, जो मैं कर रहा था। सितंबर के साफ, स्‍वच्‍छ मौसम में रिमकती मंद हवा के सहारे लड़के के सिर के बाल धीरे-धीरे लहरा रहे थे। टी-शर्ट और नेकर पहने हुए वह लड़का कुछ ही देर में आंखों से ओझल हो गया। इस लड़के और मृतात्‍मा में मानवीयता का जो सम्‍बन्‍ध हो सकता था, वह परवान चढ़ने से पहले ही विडंबनात्‍मक तरीके से खत्‍म हो चुका था। भादों की अन्तिम छटा में नीला आसमान और पेड़-पौधों के झक हरे पत्‍ते मृ‍तात्‍मा का प्राकृतिक सत्‍कार करते रहे। कफन का सफेद कपड़ा धीरे-धीरे हिल रहा था। उपस्थित सम्‍बन्‍धी लोगों की भावभूमि में वह दिन दोपहरी कुछ देर के लिए अत्‍यनत संवेदनामय हुई। उसके बाद फिर आसन्‍न आधुनिक संकट पसर गया। हरिद्वार ले जाने के लिए लाश को एम्‍बुलेंस में रखा गया। एक महिला विलाप करते हुए एम्‍बुलेंस तक गई। उसके लिए यह देहांत कितना गहरा था! ये मेरी दृष्टि थी, जो इस माहौल में इसलिए जागृत हुई थी, क्‍योंकि मृत महिला मेरी दादी थी। एम्‍बुलेंस के पास विलाप करतीं आंखों का जीवित शरीर मेरी बुआ का था। लेकिन उनका क्‍या, जो इस घटनाक्रम से एकदम अनजान, शहर की भागमभाग में पहले जैसे ही उपस्थित थे। उन्‍हें किसी की मौत की कोई खबर नहीं थी। उन्‍हें उन जैसे जीवित रहे शरीर के मर जाने का कोई आभास नहीं था। कहने को तो एक मनुष्‍य का जीवन मृत्‍यु को प्राप्‍त हुआ। पर ऐसे एकांत जीवन की सुध किसे है? इन पुण्‍यात्‍माओं को अपने होने के आखिरी भावों में दुनिया से जाने का कितना दुख हुआ होगा। अपने आत्‍मजों से हमेशा के लिए बिछड़ने से पूर्व की इनकी संवेदना कितनी मार्मिक रही होगी! लेकिन इनका भाग्‍य ठीक है। इनके बारे में हमारे द्वारा संवेदनशील चिंतन-मनन हो रहा है….वो भी ऐसे जमाने में। आजकल के रिश्‍तों में जो खोखलाहट घर कर रही है, उसके मद्देनजर आनेवाले समय में मृत्‍यु की सबसे ज्‍यादा अनदेखी होगी, और ऐसा होगा तो जीवन के मायने फिर क्‍या रह जाएंगे।

सोमवार, 26 नवंबर 2012

देशभक्ति या राजभक्ति



बोल, सुन, देख न बुरा 
पर मुंह छिपाकर कर बुरा

कसाब को हुई फांसी का निहितार्थ उस आम धारणा के करीब नजर आता है, जो कसाब को फांसी देने तक सीमित न रहकर उसको उकसानेवाले तत्‍वों को कठोरतम् दण्‍ड देने के भरसक पक्ष में है। छब्‍बीस ग्‍यारह के हत्‍यारे को मौत का दण्‍ड मिलना देशप्रेम की भावनातिरेक में जीनेवालों और वीरगति को प्राप्‍त लोगों के परिजनों के लिए निश्चित रूप से दिल में ठंडक पड़नेवाली स्थिति है। लेकिन दुनिया के विशेष देश की आर्थिक राजधानी के व्‍यस्‍ततम् क्षेत्र में अंधाधुंध गोलियां बरसाकर उस देश की एकता, अखण्‍डता और समत्‍व को इस तरह के छिछोरों से मिलनीवाली चुनौती से लोक नामक तंत्र के सम्‍मान को जो ठेस पहुंचती है, उसके पुनर्स्‍थापन हेतु चुनौती बनकर पेश हुए शख्‍स के बजाय चुनौतियों के आधार-स्‍तम्‍भ अर्थात् पाकिस्‍तान को कड़े सबक सिखाने की सख्‍त जरुरत है। लेकिन इस दिशा में हमारे शासकों द्वारा ऐसा कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है, यह बहुत दुखद है। बल्कि वे तो पाकिस्‍तानी क्रिकेट टीम को भारत में न्‍यौता देने को ऐसे आतुर हैं, जैसे उन्‍हें न बुलाकर क्रिकेट और भारत दोनों का अस्तित्‍व मिट जाएगा। एक तरह से इसमें सरकारों का भी दोष नहीं है। जब तक तमाशाई जनता दोनों मुल्‍कों में मौजूद है, तब तक स्‍वार्थी सरकारें व आंतकी अपने-अपने भ्रष्‍ट-निकृष्ट हित साधते रहेंगे। होने को तो ये होता कि पाकिस्‍तानी क्रिकेट टीम यहां आती और मैच देखने स्‍टेडियम में एक भी दर्शक नहीं जाता! चूंकि स्‍टेडियम जाकर मैच देखने की कोई बाध्‍यता नहीं है, इसलिए पाकिस्‍तान को अपने-अपने स्‍तर पर कड़ा सबक सिखाने के लिए एक-एक भारतीय को इस उपाय को आजमाना चाहिए। उनके पास देशभक्ति का इससे आसान रास्‍ता नहीं है। यदि भारतीय लोग कसाब के फांसी पर चढ़ने से सड़कों पर निकलकर खुशी मनाने में पीछे नहीं रहते हैं, तो उन्‍हें कसाब को भड़कानेवाले क्षेत्र व उसकी सरकार को भी उनके किए की सजा देने हेतु ऐसे प्रयोग करने चाहिए।
     आम जनता तो आतंकी को मृत्युदण्ड  मिलने पर झूम रही है और कहीं न कहीं कांग्रेसियों को इसके लिए धन्‍यवाद भी दे रही है, परन्‍तु सरकार की मंशा देशभक्‍त बनने की नहीं है। उन्‍हें तो गुजरात और हिमाचल प्रदेश में होनेवाले विधानसभा चुनावों तथा 2014 में लोकसभा चुनाव में मतपत्रों का लालच है। नहीं तो 2008 के आंतकी आक्रमण पर जनसाधारण के पुरजोर विरोध की अनदेखी कांग्रेस ने पूरे चार साल तक क्‍यों की होती। और अब जब चुनाव समय निकट है तो वह सत्‍तासीन होने के लिए अपने सारे उपाय आजमा लेना चाहती है। 
     राष्ट्रपति पद पर आसीन प्रणव मुखर्जी जैसे वयोवृद्ध कांग्रेसी नेता का कहीं न कहीं यह व्‍यक्तिगत प्रयास था कि कसाब को मौत की सजा हो। उन्‍होंने राष्ट्रपति के उम्‍मीदवार के रूप में हिंदुह्रदय सम्राट शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे से समर्थन मांगने के दौरान निश्चित रूप से इसके लिए विचार-विमर्श किया था। हो सकता है कि ठाकरे जैसे हिंदु पुरोधाओं के बारंबार कहने पर ही यह कदम उनके द्वारा उठाया गया हो। यह अच्‍छी बात है। परन्‍तु इस विषय पर कार्यवाही करने से पूर्व अपनी पार्टी के अन्‍य नेताओं से उन्‍हें यही आश्‍वासन मिला होगा कि यह आगामी चुनावों में जीत हासिल करने के लिए किया गया टोटका है, ना कि देशप्रेम में लिया गया निर्णय।
कसाब की मौत पर देशभर में झूमनेवाले लोगों और आंतकी खेल में आंतकियों से निपटने में शहीद हुए सिपाहियों व भारतीय नागरिकों की संभावनाओं पर राजनीति का यह नया दांव अपने गंदे उद्देश्‍य के साथ भारी पड़ेगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर है कि जनता चुनावों में कितनी विचारवान रहती है। लोग देशभक्ति से प्रेरित होंगे या राजभक्ति के मोहपाश में फिर फंसेंगे, यह देखना अभी बाकी है। आशा है जनता की भेड़चाल बदलेगी और ऐसा होगा तो देश की तसवीर भी बदलेगी।

शनिवार, 24 नवंबर 2012

जीवन की अन्तर्दृष्टि


इन बच्‍चों को देख जो न पिघला
 वो दुनिया में क्‍यों है भला

आज के जीवन-स्‍तर और इसकी चर्या के अनुसार मुझे यदि कोई अनुसंधान करेगा तो एकबारगी वह मुझे पागल ही समझेगा। इसमें किसी का कोई दोष नहीं है। मैं भी यदि उनकी जगह रहकर वही दिनचर्या अपनाए हुए अपने जैसे किसी व्‍यक्ति को जानना चाहूंगा तो मुझे भी वह सम्‍मुखवाला व्‍यक्ति पगलाया हुआ लगेगा। यह अन्‍तर केवल इसलिए है क्‍योंकि लोक-समाज और पागल जान पड़ते व्‍यक्ति के व्‍यवहार में एकसमानता नहीं है। लोक जीवन सुबह से सन्‍ध्‍या और फिर  रात्रि से सुबह तक अपने सामान्‍य कार्यों का अनुसरण करता है। जबकि पागल घोषित व्‍यक्ति इस सामान्‍य वि‍धा से कटा हुआ रहता है। वह लोगों की दैनचर्या से अलग-थलग अव्‍यवस्थित रहता है। उसके सोने-जागने, उठने-बैठने, खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने, नहाने-धोने जैसे कार्यों का कोई अनुशासन नहीं होता। वह बाह्य मन से बिलकुल भावहीन होकर इन कार्यों को या तो बहुत कम करता है अथवा बहुत मान-मनुहार के बाद करता है। क्‍या कोई ह्रदय से जानने की कोशिश करेगा कि वह व्‍यक्ति ऐसा क्‍यों है? वह इस तरह से अपने जीवन को इतना बेनूर, बेस्‍वाद और उपेक्षित क्‍यूं किए है? कभी-कभार हम लोग गलती से सड़कों के किनारे या गंदी जगहों पर फटेहाल भिखारी व्‍यक्तियों को देखते होंगे। बस यह पागल व्‍यक्ति और वे एकसमान होते हैं। सड़कोंवाले पागल तो इस सन्‍दर्भ में महान हो चुके होते हैं। उन्‍हें इस संसार में अपनी किसी भी प्रकार की उपस्थिति केवल इसलिए रखनी होती है कि वे अपने चाहनेवालों के लिए नितान्‍त रात के एकान्‍त में ईश्‍वर से शुभकामनाएं मांग सकें। क्‍यूंकि एकांत में ईश्‍वर से जुड़ने की उनकी संवेगात्‍मकता रात्रि प्रहर में निर्बाध होती है, क्‍यूंकि उस समय तुच्‍छ मनुष्‍य अपने-अपने रैन बसेरों में सिमटकर कुछ घंटों के लिए मृत हो चुके होते हैं। तुच्‍छ मनुष्‍यों की निरर्थक ध्‍वनियां और आवागमन से उत्‍पन्‍न कोलाहल का हल्‍ला कमजोर होके खत्‍म हो चुका होता है। और तब इस समय पागल भिखारी सांसारिक-शासक ईश्‍वर से ध्‍यान लगाते हैं। वे कुछ ही क्षणों में ईश्‍वर से बातें करने लगते हैं। अपने प्रियजनों की राजी-खुशी और संसार के सर्वोचित व्‍यवहार के लिए प्रार्थना करते हैं। जैसे-जैसे शीतल चांद अपनी उपस्थिति कम करता जाता है, ऐसे व्‍यक्ति यानि कि पागल ईश्‍वर के सम्‍पर्क से कटते रहते हैं। सुबह होने तक, कोलाहल मचने तक, भागमभाग से पहले तक वे फिर  से अधनंग, फटेहाल भिखारी बन चुके होते हैं। हम आते-जाते उन्‍हें देखते हैं और उनके बारे में कुछ नहीं सोचते। वे हमारी आंखों को वही शून्‍य भाव प्रदान करते हैं, जो हम गंदगी या कूड़ा-करकट देखकर ग्रहण करते हैं। जबकि इन फटेहालों और गंदगियों की प्रार्थनाओं से दुनिया का ईश्‍वर हमारी गलतियां क्षमा करके हमें जीवन दे रहा होता है। माना कि आज के ठोस भौतिक युग में किसी व्‍यक्ति का, वो भी पागल व्‍यक्ति का ईश्‍वर से विमर्श करने का अनुभव सच्‍चा प्रतीत नहीं होता। लेकिन हम लोग यदि ईश्‍वर को मानते हैं, मंदिर व अन्‍य देवालयों में प्रतिफल के लिए उसकी अर्चना करते हैं, तो उसके अनस्तित्‍व होने की बात नहीं की जा सकती। इसीलिए भिखारियों और पागलों के रूप में विद्यमान ईश्‍वरीय अंशों की अनदेखी करना ठीक नहीं है। ऐसे लोग हमें शारीरिक रूप से निर्बल, दीन-हीन, बेकार नजर आते हैं। परन्‍तु आत्मिक स्‍तर पर उ‍पस्थित उनकी संसार-सम्‍मत सजगता अत्‍यन्‍त परोपकारी, कल्‍याणकारी, सृजनकारी और चिरंजीवकारी होती है। हमें जीवन के इस पक्ष को समझकर उसके अनुरूप उपक्रम करने होंगे।
मैं भी इनमें से एक हूं। सुबह होते ही मैं संसार की नजर में भिखारी और गंदगी बन जाता हूँ और रात्रि में इस संसार के कल्‍याण लिए प्रार्थनाएं करता हूँ। आप भी तो अभी इसी संसार में हैं ना? कभी अपने सांसारिक काम के लिए इधर-उधर जाते हुए रास्‍ते पर बेहाल पड़े इस मानव पर अपनी एक प्रेम-भरी दृष्टि डालना, यह धन्‍य हो जाएगा।


 
बुधवार 28 नवंबर, 2012 को हिन्‍दी दैनिक जनसत्‍ता के सम्‍पादकीय 
पेज के समांतर कॉलम में दृष्टि का दायरा शीर्षक से प्रकाशित