महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Friday, November 17, 2017

विमुद्रीकरण देशहित में

जार और पांच सौ मूल्‍य के रुपयों की बंदी का आज पूरा एक वर्ष व्‍यतीत हो चुका है। गत वर्ष 8 नवंबर रात 8 बजे जब प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने बड़े मूल्‍य की मुद्रा को आधिकारिक रूप में अमान्‍य किए जाने की भारत सरकार की ओर से घोषणा करी, तो जैसे भारत की सामाजिक और आर्थिक जीवन-व्‍यवस्‍था कुछ क्षण के लिए थम गई। लोगों को समझ नहीं आया कि सरकार ने एकाएक यह क्‍या कर डाला।
विमुद्रीकरण की घोषणा किए जाने के दिन से लेकर अगले एक माह तक भारतीय जन-जीवन अपने सामान्‍य जीवन-व्‍यवहार से विपरीत अत्‍यंत असहज हो गया। राजनीतिक विरोधियों ने राष्‍ट्र हित में सरकार के निर्णय की दूरदर्शिता का विचार किए बिना, विमुद्रीकरण से जनता को हो रही तात्‍कालिक समस्‍याओं की ओट लेकर हो-हल्‍ला मचाना शुरू कर दिया। आरंभ में तो निष्‍पक्ष अर्थशास्त्रियों, समाजशास्त्रियों, विचारकों सहित मोदी समर्थकों ने भी विमुद्रीकरण को देश पर आर्थिक आपातकाल माना और इसको लेकर हर तरीके से मोदी सरकार की आलोचना करी।
विकेश कुमार बडोला 
मोदी के राजनीतिक विरोधियों के साथ-साथ सामान्‍य लोगों द्वारा विमुद्रीकरण के कारण उत्‍पन्‍न होनेवाली जिन सामाजिक तथा आर्थिक विपत्तियों की आशंकाएं प्रकट की गईं, विमुद्रीकरण का एक वर्ष व्‍यतीत हो जाने पर वैसा कुछ भी नहीं हुआ। विमुद्रीकरण की प्रक्रिया में लगे बैंक कर्मचारी तथा सामान्‍य लोग समय गुजरने के साथ जैसे-जैसे सहज होते गए, वैसे-वैसे उन्‍हें विमुद्रीकरण के दीर्घकालीन राष्‍ट्रीय उद्देश्‍य व लाभ समझ आने लगे।
          मोदी सरकार को अधिकांश भारतीय जनता ने इसलिए चुना था कि वह कांग्रेसी भ्रष्‍टाचार, अवैध मुद्रा प्रसार तथा करोबार पर स्‍थायी नियंत्रण करे और देश को एक सत्‍यनिष्‍ठ कार्य-व्‍यवस्‍था उपलब्‍ध कराए। लेकिन क्‍या मोदी यह कार्य सामान्‍य ढंग से कर सकते थे? जो कांग्रेस 6 दशकों से सत्‍तारूढ़ रही हो, क्‍या उसके माध्‍यम से देशीय व्‍यवस्‍था के पोर-पोर में समाए भ्रष्‍टाचार को मोदी सरकार अपने सहज राजनीतिक वक्‍तव्‍यों, विरोध तथा सामान्‍य कामकाज के आधार पर ही समाप्‍त कर सकती थी? नहीं, इतना गहन भ्रष्‍टाचार परंपरागत राजनीतिक सोच, नीतियों और कार्यों से तो बिलकुल समाप्‍त नहीं होता। इसीलिए विमुद्रीकरण जैसा राष्‍ट्रीय निर्णय लिया गया।
पूर्व राजनीतिक कारस्‍तानियों के कारण व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार की बीमारी से छुटकारा पाने के लिए बड़ी व अनोखी नीतियों की आवश्‍यकता थी। विमुद्रीकरण इनमें से ही एक है। जनता को विचार करना चाहिए कि देश में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार मात्र मुद्रा आधारित नहीं था। भ्रष्‍टाचरण का यह रोग बहुत पहले से आतंकवाद, धर्मांतरण, लव जेहाद, हिन्‍दू विरोध और सर्वोपरि राष्‍ट्र विरोधी प्रवृत्ति का हो चला था।
आश्‍चर्य यह कि पिछली सरकारों में भ्रष्‍टाचार के ऐसे विरूपों को आधिकारिक मान्‍यताएं देने की कोशिशें होने लगी थीं। इसलिए वर्तमान में बहुसंख्‍यक जनापेक्षाओं के अनुसार आर्थिक मूल की इस विकृति पर कठोर नियंत्रण हेतु विमुद्रीकरण की अत्‍यंत आवश्‍यकता आन पड़ी थी।
निस्‍संदेह य‍ह निर्णय किसी भी सरकार को प्रथम दृष्‍टया जनता की नजर में अलोकप्रिय बना सकता था। विमुद्रीकरण को लेकर विरोधी राजनीतिक दलों द्वारा फैलाए गए भ्रम के कारण शुरू में ऐसा हुआ भी। लेकिन मोदी सरकार की सत्‍यनिष्‍ठा के कारण अधिकांश लोग विमुद्रीकरण किए जाने के कुछ दिन बाद से ही सकारात्‍मक तथा संवेदनशील बनने लगे और सरकार के निर्णय के साथ खड़े होने का संकल्‍प दोहराने लगे। लोगों ने आत्‍मचिंतन से विमुद्रीकरण के सरकारी निर्णय को उचित माना। उन्‍हें भलीभांति समझ आ गया कि सच्‍चा जननेता वही है, जो अपने लोगों की दीर्घकालीन भलाई तथा सुरक्षा के लिए अलोकप्रिय निर्णय लेने से भी न हिचके।
          विरोधी राजनीतिक दलों तथा उनके मीडिया संस्‍थानों द्वारा विमुद्रीकरण का अर्थव्‍यवस्‍था के अनुरूप निष्‍पक्ष तरीके से विश्‍लेषण ही नहीं किया गया। कांग्रेस सरकार के प्रभाव और दबाव में काम कर चुके अर्थशास्त्रियों ने भी अर्थशास्‍त्र की समदृष्टि से विमुद्रीकरण का आकलन, आलोचना या प्रशंसा नहीं की।
वर्तमान केन्‍द्र सरकार के विरोध में राजनीति करना कांग्रेस तथा अन्‍य राजनीतिक दलों के लिए राजनीतिक प्रतिस्‍पर्द्धा के हिसाब से भले ही अपरिहार्य हो, लेकिन देशहित में लिए गए विमुद्रीकरण के निर्णय को मात्र राजनीतिक विरोध का आधार बनाना कदाचित उचित नहीं। विपक्ष में बैठे जनप्रतिनिधि भी जनता ही चुनकर भेजती है। ऐसे जनप्रतिनिधियों का चुनाव करके क्‍या जनता का यह लोकतांत्रिक अधिकार नहीं रहता कि वे उन तक किसी भी तरह यह संदेश पहुंचाए कि सत्‍तारूढ़ सरकार के जनहितैषी निर्णयों का हर स्‍तर पर स्‍वागत किया जाना चाहिए, क्‍योंकि ऐसे निर्णय उनके जीवन के लिए भी सार्थक होते हैं।  
          अर्थव्‍यवस्‍था बहुत जटिल विषय है। किसी राष्‍ट्र में भ्रष्‍ट तंत्र और उसके संपूर्ण कार्यबल के कारण, स्‍थापित अर्थव्‍यवस्‍था के समानांतर जो अवैध और असंस्‍थागत आर्थिक गतिविधियां चलती हैं, उनके बने रहने के दौरान तो स्‍थापित और वैध अर्थव्‍यवस्‍था का परिचालन भी दुष्‍कर हो जाता है। इस परिस्थिति में वैध अर्थव्‍यवस्‍था भी एक नजर में अवैध ही प्रतीत होती है। इस देश में यह घालमेल पिछले 50 वर्षों से बहुत अधिक बना हुआ है। इतनी बड़ी आर्थिक अराजकता, विषमता को जड़ से मिटाने के लिए मात्र वार्षिक कराधान और बजटीय व्‍यवस्‍था कभी कारगर नहीं हो सकती थी।
यही कारण रहा, जो मोदी सरकार को विमुद्रीकरण जैसा ऐतिहासिक निर्णय लेना पड़ा। सरकार ने इस अलोकप्रिय निर्णय की चुनौती को न केवल स्‍वीकार किया, वरन् इस पर दिन-प्रतिदिन उमड़ते जनता के रोष को सटीक अर्थपूर्ण तथ्‍यों व आर्थिक विश्‍लेषण के द्वारा धीरे-धीरे कम भी किया।
विमुद्रीकरण की घटना देश को पवित्र, पारदर्शी और जनकल्‍याणोन्‍मुखी शासन व्‍यवस्‍था उपलब्‍ध कराने की दिशा में महान घटना थी। इस घटना ने न केवल भारत को, अपितु न्‍यूनाधिक मात्रा में अनेक राष्‍ट्रों को प्रभावित किया। विभिन्‍न वैश्विक वित्‍तीय संस्‍थाओं, शक्तिशाली राष्‍ट्रों के योगदान से संचालित विश्‍व बैंक, अंतर्राष्‍ट्रीय मुद्रा कोष और देशों की अर्थव्‍यवस्‍था की रेटिंग जारी करनेवाले प्रमुख वैश्विक अभिकरणों ने भारत सरकार के विमुद्रीकरण के निर्णय को निष्‍पक्षता से सराहा है।
अभी हाल ही में सुगमतापूर्वक व्‍यवसाय संचालित करने के संदर्भ में विश्‍व बैंक की रेटिंग में भारत ने ऊंची श्रेणी प्राप्‍त की है। जबकि मोदी सरकार द्वारा लागू किए गए वस्‍तु एवं सेवा कर (जीएसटी) से होनेवाली कारोबारी सुगमताओं व लाभों की गणना अभी विश्‍व बैंक ने नहीं की। कारोबारी सुगमता के हिसाब से जीएसटी भी भारत को विश्‍व स्‍तर पर अत्‍‍यधिक विश्‍वसनीय, पारदर्शी तथा सकारात्‍मक बनाएगा। इस स्थिति में यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि अगले वर्ष विश्‍व बैंक की रेटिंग में भारत और उच्‍च श्रेणी प्राप्‍त कर ले। हालांकि जीएसटी के सहज व सरल क्रियान्‍वयन में अभी समस्‍याएं आड़े आ रही हैं। ऐसा जीएसटी सॉफ्टवेयर के जीएसटी प्रक्रिया के अनुरूप बने व संचालित न होने तथा जीएसटी के बारे में सरकारी व निजी स्‍तर पर संपूर्ण ज्ञान के अभाव के कारण हो रहा है।  
          इस समय मोदी सरकार के आर्थिक, व्‍यापारिक शासन-प्रशासन के प्रारंभिक सकारात्‍मक कार्यों का विश्‍लेषण भारत स्थित कोई रेटिंग एजेंसी या मीडिया संस्‍थान नहीं कर रहा। सरकार के कार्यों का यशगान वैश्विक संस्‍थाएं कर रही हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो मोदी सरकार द्वारा लिया गया विमुद्रीकरण का निर्णय वाकई अद्वितीय है।
          लेकिन कांग्रेस के नेतृत्‍व में संपूर्ण विपक्ष ने आठ नवंबर को विमुद्रीकरण के विरोध में जो काला दिवस मनाने का निर्णय लिय, वह यही दर्शाता है कि कांग्रेसी न केवल राजनीतिक रूप से अपितु आर्थिक रूप से भी देश संभालने के लिए दक्ष नहीं हैं। उन्‍हें काला दिवस मनाने के बजाए इस बात पर आत्‍ममंथन करना चाहिए था (करना चाहिए) कि वे देश की अधिकांश जनता की नजर में घिनौने स्‍तर तक हास्‍यास्‍पद बन चुके हैं।

Monday, November 6, 2017

हिन्दू आतंक का वक्तव्य निराधार है

भारत बड़ा विचित्र राष्‍ट्र है। पौराणिक तथा ऐतिहासिक रूप में हिन्‍दू राष्‍ट्र होने के बावजूद यहां हिन्‍दुओं के समर्थन में विद्यमान सनातनी तथा सांस्‍कृतिक विचारों, उत्‍सवों और अन्‍य उपक्रमों को अपराध की नजर से देखा जाता है। मात्र उनहत्‍तर वर्ष पूर्व अस्तित्‍व में आए विरोधाभासी संविधान के माध्‍यम से भारत को बलात धर्मनिरपेक्ष राष्‍ट्र बनाने की कोशिश की गई। स्‍वतंत्र रूप में विचार करने पर किसी भी संवेदनशील व्‍यक्ति को सहज ही ज्ञात हो जाता है कि धर्मनिरपेक्ष की अवधारणा विधिसम्‍मत ढंग से जनता पर थोपी नहीं जा सकती। हिन्‍दू धर्म के प्रादुर्भाव की गणना तो अभी तक नहीं हो पाई कि यह कितना पुरातन धर्म है। जबकि धर्म के नाम पर अस्तित्‍व में आई अन्‍य जीवन-पद्वतियों की काल गणना आसानी से उपलब्‍ध है। जीवन-पद्वतियों को राजनीतिक महत्‍तवाकांक्षाओं के लिए धर्म की श्रेणी में रखना नई बात नहीं है। भारत में यह अभ्‍यास हिन्‍दू धर्म को चुनौती देने के लिए हजारों वर्षों से चला आ रहा है। आज भी इसमें कमी नहीं आई। किसी न किसी प्रकार से हिन्‍दुओं के अस्तित्‍व को मिटाने के षड्यंत्र आज भी जारी हैं। तीन वर्ष पूर्व संप्रग 2 सरकार ने मुसलिम वोटों के लालच में लोकसभा में हिन्‍दू विरोधी विधेयक प्रस्‍तुत किया था। तत्‍कालीन सरकार के गृहमंत्री से लेकर अनेक प्रमुख नेताओं ने हिन्‍दू आतंक का हौवा बनाकर अल्‍पसंख्‍यकों के संरक्षण के नाम पर हिन्‍दुओं के मौलिक अधिकारों को दबाने का असफल प्रयास किया था। इसका परिणाम यह रहा कि कांग्रेस 2014 का लोकसभा चुनाव बुरी तरह हार गई। लेकिन आज भी हिन्‍दू विरोधी कांग्रेसी नीति के समर्थक नेता, अभिनेता और अन्‍य लोग हिन्‍दू आतंकवाद पर वक्‍तव्‍य देने से बाज नहीं आ रहे।
विकेश कुमार बडोला
इसी संदर्भ में दक्षिण भारतीय फि‍ल्‍मों के चर्चित अभिनेता कमल हासन ने किसी पत्र के लिए लिखे गए अपने आलेख में भारत में बढ़ते हिन्‍दू आतंक को लेकर अपना रोष प्रकट किया है। कमल जैसे अभिनेता, जो अपनी विभिन्‍न फि‍ल्‍मों में बुराई के परिहार हेतु उग्र हिंसा का सहारा लेकर अच्‍छाई स्‍थापित करने का संदेश देते रहे हैं, समझ नहीं आता कि वैश्विक स्‍तर पर आतंक फैलाने के लिए सिद्धदोषी मुसलिम आतंकी समूहों, इन समूहों के सरगना मुसलिम आतंकियों को आतंकी न कहकर, वे हिन्‍दुओं को किस आतंक के लिए आतंकी कह रहे हैं। भारत में मुसलिमों द्वारा फैलाए जा रहे आतंकवाद का दमन करने के लिए हिन्‍दुओं ने ऐसी आतंकी गतिविधियों पर पिछले तीन वर्षों में राजनीतिक, सामाजिक व व्‍यक्तिगत रूप में अत्‍यधिक साहसी प्रतिक्रिया दिखाई है, तो इसमें गलत क्‍या है। क्‍या भारत के नागरिक आत्‍मरक्षा तथा राष्‍ट्रीय गौरव के सम्‍मान हेतु वैश्विक स्‍तर पर दोषी मुसलिम आतंकवादियों का विरोध भी न करें। क्‍या हिन्‍दुओं द्वारा किया जानेवाला ऐसा विरोध हिन्‍दू आतंक कहलाएगा? क्‍या कमल हासन या कोई भी व्‍यक्ति अपनी जान की रक्षा के लिए प्रतिहिंसा नहीं करता? हिन्‍दू भी आत्‍मरक्षा में प्रतिहिंसा ही कर रहा है। ऐसा करना विरोधाभासी निर्णयों के लिए ख्‍यात राष्‍ट्रीय-अंतर्राष्‍ट्रीय कानून में भले ही अपराध आंका जाता हो, लेकिन न्‍याय के प्राकृतिक सिद्धांत के अनुरूप आत्‍मरक्षा हेतु यही एकमात्र उपाय है।
आजकल पूरी दुनिया आतंकी हमले झेल रही है। विकसित देश अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, स्‍पेन, ब्रिटेन में भी पिछले वर्षों में अनेक आतंकी हमले हो चुके हैं। इनमें कई निर्दोष लोगों के प्राण चले गए। आतंकी हमले करनेवाले सभी आतंकी मुसलिम समुदाय से संबंधित होते हैं। कानूनी रूप से कमजोर दुनिया के अविकसित देशों में आतंकी समूहों ने अपने आतंक के अड्डे बना रखे हैं। लगभग सभी ऐसे देश मुसलिम देश हैं। आतंकी समूहों को इन देशों की सरकार व जनता का भी समर्थन मिल रहा है। आतंक से पीडि़त भारत के वर्षों के अनुभव के बाद मोदी सरकार किसी तरह दुनिया के शक्तिशाली राष्‍ट्रों को आतंक की परिभाषा, धर्म और उद्देश्‍य समझाने में सफल हुई है। पूरे विश्‍व के प्रभावशाली देश भले ही आधिकारिक रूप में यह घोषणा नहीं करते, लेकिन वे मान चुके हैं और पूर्णत: संतुष्‍ट हैं कि वैश्विक आतंक के पीछे का खेला विश्‍व में मुसलिम धर्म की स्‍थापना ही है।
मुसलिम धर्म के नाम पर यहां-वहां जितनी भी निकृष्‍ट गतिविधियां परिचालित हो रही हैं, उन्‍हें देखकर तो कोई अपरिपक्‍व किशोर भी समझ सकता है कि धर्म के नाम पर यह कितना घिनौना काम चल रहा है। तो क्‍या कमल हासन ऐसे घिनौने सामाजिक स्‍वरूप में खुद को ज्‍यादा सुरक्षित व संपन्‍न मानेंगे, जो वे आदर्श व सभ्‍य हिन्‍दुओं को अनावश्‍यक ही आतंक की परिधि में लाने की कुचेष्‍टा कर रहे हैं। कमल हासन जैसे लोगों की मंशा ऐसे ओछे वक्‍तव्‍यों की आड़ लेकर राजनीतिक लीक पर चलने की ही है। उन्‍हें लगता है‍ कि भाजपा विरोधी राजनीतिक दल कांग्रेस में राजनीतिक संरक्षण पाने के लिए यही सर्वोपरि तरीका है। चूंकि अभिनेता के रूप में अब उनका भविष्‍य चुक गया है, इसलिए वे नेता के रूप में कहीं न कहीं स्‍थापित होने के लिए कोई न कोई रास्‍ता तो ढूंढेंगे ही। लेकिन राजनीति में आने का उनका यह रास्‍ता दुर्भाग्‍यपूर्ण ढंग से अत्‍यंत घिनौना है। एक अभिनेता के रूप में जन-जन में उन्‍होंने जो ख्‍याति अर्जित की थी, हिन्‍दुओं को आतंकवादी कहने की उनकी प्रवृत्ति ने उस पर तुषारापात कर दिया है। एक प्रतिष्ठित व्‍यक्ति की इतनी न्‍यून सामाजिक समझ पर कुढ़न तो होती ही है, साथ ही साथ यह भी लगता है कि धर्मनिरपेक्ष राष्‍ट्र की व्‍यर्थ कल्‍पना को संवैधानिक स्‍वरूप प्रदान कर भारत देश के बहुसंख्‍यक हिन्‍दुओं के साथ कितना बड़ा विश्‍वासघात किया गया।
इस संबंध में अब प्रत्‍येक मंच पर खुलकर वार्ता किए जाने की आवश्‍यकता है कि जब एक परिवार के दो लोगों के बीच भोजन के स्‍वाद को लेकर मतभेद उभर सकते हैं, तो धर्म के नाम पर बंटे अनेक समुदायों के बीच राष्‍ट्रीय एकता कैसे संभव है। और जब यह संभव नहीं तो धर्मनिरपेक्ष शब्‍द ही अपने आप में पूरी तरह व्‍यर्थ है। कम से कम हिन्‍दुओं के पौराणिक हितों और सामाजिक अधिकारों की कीमत पर मुसलिम धार्मिक विकृति को बिलकुल स्‍वीकार नहीं किया जा सकता। और ऐसी विकृति के समर्थक कमल हासन जैसे लोगों के हिन्‍दू विरोधी बयान तो और भी ज्‍यादा अस्‍वीकार्य हैं।   

Monday, October 30, 2017

स्तरहीन राजनीति से अप्रासंगिक होती कांग्रेस

दो प्रदेशों में विधानसभा चुनाव से पूर्व देश के दो प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं के बीच आरोप-प्रत्यारोप अत्यंत निम्न स्तर तक पहुंच चुका है। कांग्रेसी नेताओं में हताशा, निराशा कुंठा होना स्वाभाविक है। पिछले तीन वर्षों के दौरान विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों से लेकर पंचायत चुनावों तक में कांग्रेस को जनता ने नकारा ही नकारा है। दो हजार चौदह में लोकसभा चुनाव बुरी तरह हारने के बाद भी प्रमुख कांग्रेसी नेताओं में आत्ममंथन की चेतना नहीं उभर पा रही तो यह उनकी इसी मानसिकता का द्योतक समझा जाएगा कि वे इस देश पर शासन करने को अपना एकाधिकार मान चुके हैं।
   विकेश कुमार बडोला  

कांग्रेसी यदि वर्तमान केन्द्र सरकार के प्रधान नरेन्द्र मोदी का केवल विरोध के लिए विरोध कर रहे हैं और हर छोटे-बड़े चुनाव से पूर्व भाजपा की केन्द्र राज्य सरकारों के काम-काज पर अनावश्यक टीका-टिप्पणी कर रहे हैं, तो ऐसा विरोध ऐसी टीकाएं वे केवल विरोधी भाजपा के लिए ही नहीं कर रहे होते। जिस बहुसंख्यक जनता ने भाजपा को सत्तारूढ़ किया है, ऐसा विरोध उस जनता का भी होता है। कांग्रेस के शीर्षस्थ नेताओं को इस राजनीतिक स्थिति पर गंभीरतापूर्वक मनन करना होगा। वैसे अब कांग्रेस कुछ भी कर ले, यह लेखक दावे के साथ कह रहा है कि वह भविष्य में कभी भी देश पर एकाधिकारवादी शासन नहीं कर पाएगी। एकाधिकारवाद ही क्यों वह तो जिन राज्यों में अभी सत्तारूढ़ है, भविष्य में वहां से भी बुरी तरह सत्ताच्युत होगी।
गुजरात में आजकल कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए स्थानीय छुटभैये नेताओं से राजनीतिक गठबंधन कर खुद को सुरक्षित मानने का दिवास्वप्न देख रही है। छुटभैये नेताओं की चुनावी सभाओं या किसी अन्य सभा में एकत्र भीड़ को देखकर कांग्रेस कांग्रेसी सर्व हितैषियों द्वारा जो राजनीतिक लाछंन दो दशक से राज्य में शासन कर रही भाजपा पर लगाए जा रहे हैं, वे भीड़ को मनोवैज्ञानिक रूप से भाजपा विरोधी बनाने के लिए अपर्याप्त हैं।
आंदोलनों या चुनावी सभाओं में जमा होनेवाली अधिसंख्य जनता स्थानीय चुनावों के राजनीतिक हितों से अपरिचित होती है। गुजरात में छुटभैये नेताओं की सभाओं में एकत्र भीड़ चुनावी तैयारियों को ध्यान में रखकर सभाओं में नहीं आई है। पूरे राज्य के पिछड़ी जाति के लोगों मुसलमानों को किसी तरह एक सभा में इकट्ठा करने के लिए छुटभैये नेताओं को कितना पसीना बहाना पड़ता है, यह नेताओं को ही पता है। कांग्रेस के साथ छुटभैये नेताओं के राजनीतिक दलों का गठबंधन अत्यंत गिरी हुई राजनीति का परिणाम है। चुनाव के बाद ऐसे गठबंधन ऐतिहासिक गणना में भी नहीं पाते। इनका बुरा हश्र होना तय है। ऐसा हम उत्तर प्रदेश के बीते चुनाव में भी देख चुके हैं।
कांग्रेस की निरंतर खराब हो रही राजनीतिक स्थिति के बारे में चर्चा कर कुछ मीडिया संस्थान कांग्रेस के पक्ष में हर चुनाव में नकली हवा भरने का काम करते हैं। इसका परिणाम हर चुनाव के बाद एक जैसा ही होता है। मीडिया चैनलों के चुनावी सर्वेक्षणों में भाजपा द्वारा दोनों राज्य में अधिकांश सीटों पर जीत प्राप्त करने का समाचार आने के बाद कांग्रेस और इसके सहयोगियों का उत्साह कुछ हद तक कम हुआ है। चुनावी सर्वेक्षणों को भी किसी किसी विधि से कांग्रेस के समर्थन में परोसा जाता है, जबकि वास्तविक परिणाम चुनावी सर्वेक्षणों के उलट भाजपा के पक्ष में ही आते हैं।
जब से कांग्रेस अनेक राज्यों में सत्ताहीन हुई है, तब से इसके समर्थक मीडिया विश्लेषकों की नजर में चुनाव आयोग भी संदेहास्पद बन चुका है। जब तक कांग्रेस चुनावों में जीतती रही, तब तक चुनाव आयोग, उसके समस्त कार्यक्रम, उसकी अधिसूचनाएं और आचार संहिता सहित उसके अनेक चुनाव संबंधी निर्णय ठीक रहे। इन पर तब कभी उंगली नहीं उठी। लेकिन जब से भाजपा केंद्र सहित अनेक राज्यों में सत्तारूढ़ हुई तब से चुनाव आयोग भाजपा विरोधियों को सत्ता के प्रभाव में काम करता हुआ नजर आने लगा है। गुजरात में चुनाव की अधिसूचना जारी होने से पूर्व कतिपय कांग्रेसियों, इसके समर्थकों और लेखकों ने आयोग को भाजपा के प्रभाव में काम करने वाला संस्थान घोषित कर दिया। वे अधिसूचना जारी होने से पूर्व तक भाजपा पर यही आरोप लगाते रहे कि अपने प्रमुख प्रभावशाली नेताओं की चुनावी सभाओं, रैलियों जनसभाओं के दृष्टिगत जानबूझकर केंद्र सरकार के दबाव में चुनाव आयोग गुजरात हिमाचल में विधानसभा चुनावों की तिथियां घोषित नहीं कर रहा। ऐसे अनर्गल आरोपण करनेवाली कांग्रेस इसके समर्थकों को देखते हुए तो यही लगता है कि खुद के सत्तारूढ़ होने के दौरान संभवतः इन लोगों के हिसाब से ही चुनाव आयोग परिचालित होता हुआ आया है।
आज कांग्रेस राष्ट्रीय राजनीति में दिन-प्रतिदिन अप्रासंगिक होती जा रही है। मीडिया संस्थान हों या सोशल मीडिया अथवा देश के प्रधानमंत्री भाजपा के नेतागण, यदि ये सभी अपने-अपने स्तर पर कांग्रेस के बारे में नकारात्मक और निराश वक्तव्य दे रहे हैं, तो अपनी मर्जी से नहीं दे रहे। कांग्रेस की देश विरोधी राजनीति के प्रति उनहत्तर वर्षों के दौरान बहुलांश हिन्दुस्तानी जनता के भीतर जो विरोध की अग्नि जल रही थी, यह सब उसी की राजनीतिक स्वीकार्य प्रतिक्रिया का हिस्सा है। कांग्रेस प्रदत्त अंतहीन भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुकी जनता को उसका विरोध करने के लिए किसी मोदी, भाजपा, मीडिया या सोशल मीडिया का कंधा नहीं चाहिए था। ये सब जैविक और अजैविक कारक तो सहसा उसके लिए कांग्रेस के तटस्थ विरोध में उतरने हेतु एक पुल का कार्य कर गए।
कांग्रेस को यदि अपनी राजनीतिक साख बचानी है तो उसे एक रचनात्मक विपक्ष की भूमिका का निर्वहन करने के लिए तैयार रहना होगा। वह कम से कम ऐसे मुद्दों को तो राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति करने के लिए बिलकुल उछाले, जो उसे हंसी का पात्र बनाएं और जनता को उसके प्रति स्थायी रूप में वैर भाव बनाए रखने के लिए दुष्प्रेरित करे। वर्ममान में कांग्रेस का राजनीतिक चरित्र देखकर तो यही प्रतीत होता है कि वह शीघ्र ही अपनी स्तरहीन राजनीतिक गतिविधियों से उन लोगों का विश्वास भी खो देगी, जो अब तक भावनात्मक रूप में उससे जुड़े हुए हैं। क्योंकि रचनात्मक और विकासपरक राजनीति के अभाव में उसके बचे-खुचे समर्थक भी उसे कब तक यूं निरर्थक ढोते रहेंगे।