Tuesday, June 30, 2015

पुरानी वस्‍तुओं की याद, भाग २

च्‍चों को जीवन की कड़वी सच्‍चाई ज्ञात नहीं होती। उन्‍हें जीवन की हर चीज और हर अनुभव बहुत आकर्षिक करते हैं। वे अपनी बढ़ती आयु के साथ अपने परिवेश, बाजार और घर-परिवार में जो भी वस्‍तुएं देखते हैं उनके प्रति उत्‍सुक होते हैं। वस्‍तुओं को अपने हाथों से पकड़ कर उन्‍हें इधर-उधर, चारों तरफ से देखने की जिज्ञासा उनमें बहुत गहरी होती है। इसीलिए तो उन्‍हें निश्‍छल, निष्‍कलंक और मन-के-सच्‍चे कहा जाता है। उनके जीवन में जो कुछ भी घटित होता है या उन्‍हें जो भी नई वस्‍तु कहीं दिखाई देती है, वे उसके प्रति कोई वैचारिक पूर्वाग्रह, कुण्‍ठा, क्रोध या भावना नहीं बनाते। वे उस वस्‍तु को अपने हाथों में लेकर बाल-सुलभ उत्‍सुकता से उसका निरीक्षण करते हैं। और जब किसी वस्‍तु से उनका मन भर जाता है या वे उससे ऊब जाते हैं, तो वे उसे बाल्‍य झुंझलाहट में एक किनारे पटक शीघ्र भूल भी जाते हैं।
किशोरावस्‍था तक पहुंचने पर बच्‍चे बातों, चीजों की स्‍मृतियां संभालने लगते हैं। चाहे-अनचाहे उन्‍हें वह बात या वस्‍तु याद रहती है, जिसके प्रति उनकी भावना बलवान हो। विगत संस्‍मरण में आज से पन्‍द्रह वर्ष पूर्व की उन वस्‍तुओं का वर्णन था, जिनसे आज के पन्‍द्रह वर्षीय किशोर प्रत्‍यक्ष रूप से अपरिचित होंगे।
आज ''पुरानी वस्‍तुओं की यादें'' श्रृंखला के अन्‍तर्गत याद करते हैं बीस वर्ष पहले का जीवन, उस समय की वस्‍तुएं और उनके प्रति तब के बच्‍चों की उत्‍सुकता। बीसवीं सदी का उत्तरार्द्ध यानि कि नब्‍बे का दशक यानि कि सन् 1990। तब की भारतीय सरकार ने देश में एक नीति लागू की-नवउदारीकरण। अधिकांश भारत यहां तक कि महानगरों में भी परंपरागत जीवन व्‍यतीत हो रहा था। रोटी, कपड़े की आवश्‍यकता तक सिमटे भारतीय जीवन में अचानक वित्‍तीय सहायता के नाम पर बैंकों से खूब ॠण (उधार) मिलने लगा।
इससे पहले उद्योगपति अपना उद्योग-व्‍यापार चलाने के लिए ॠण लिया करते थे। लेकिन नवउदारवाद ने आम लोगों के लिए भी ॠण लेकर आधुनिक सुविधाएं जुटाने की व्‍यवस्‍था कर दी। यूरोपीय देशों का आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन भारत में भी लागू हो गया। चार-पांच वर्ष तक नवउदारवाद के नकारात्‍मक प्रभाव सीधे उजागर नहीं हुए। लेकिन उसके बाद इसके प्रत्‍यक्ष दुष्‍परिणाम दिखने लगे। बैंकों से ॠण लेनेवाले अधिकांश लोगों ने ॠण का पैसा विलासिता में उड़ा दिया। उन्‍होंने ऊंची ब्‍याज दरों पर लिए ॠण का प्रतिभुगतान करने के लिए अपना कोई उद्यम नहीं किया। इस प्रकार बैंक ॠण वसूल नहीं कर पाए और हानि की स्थिति में पहुंच गए। इस आर्थिक मंदी का असर भारत पर आज तक है। किशोरावस्‍था से युवावस्‍था की ओर अग्रसर मैं और मेरे जैसे अधिकांश युवक उस समय इधर-उधर से नवउदारवाद के बारे में पढ़ते-सुनते तो थे, पर वह है क्‍या, इसकी सटीक जानकारी हमें न थी।
उस समय भी अनेक वस्‍तुओं के प्रति बच्‍चों की जिज्ञासा रहती। इनमें कुछ वस्‍तुएं देशी यानि कि पारंपरिक थीं तो कुछ विदेशी यानि कि आधुनिक व इलेक्‍ट्रानिक। ग्रामीण जीवन पूरी तरह परंपरागत वस्‍तुओं के उपभोग पर आधारित था। चूल्‍हा-चौका से लेकर खेती-बाड़ी के सभी कार्य पुराने ग्रामीण यंत्रों की सहायता से पूरे होते। पत्‍थर-मिट्टी से निर्मित चूल्‍हे में सूखी लकड़ियां ईंधन के रूप में प्रयोग की जातीं।
समाज के धनी लोगों के घरों में ''स्‍टोव'' नामक यंत्र प्रवेश कर चुका था। इसमें मिट्टी का तेल डालकर इसे जलाया जाता। हालांकि इसकी अग्नि ज्‍वालाएं एलपीजी गैस जैसी ही होतीं पर यह घर..घर..की ध्‍वनि बहुत करता था। मुझे तो इससे बेहतर चूल्‍हे पर लकड़ियां जला भोजन पकाना अधिक सुगम लगता। यदि किसी को उचित प्रकार से लकड़ियां जलाने का सऊर हो तो धुंआ बहुत कम होता था। स्‍टोव एक हाथ लंबा यंत्र था। तीन एकसमान ऊंचाईवाली धातु की डंडियों के सहारे अटकी इसके सबसे नीचे एक टंकी होती थी। और सबसे ऊपर डंडियों पर मध्‍य में आग की लपटों के खुले स्‍थान के चारों ओर भोजन पकाने के बर्तन को अटकाने की धात्विक पटि्टका होती। स्‍टोव की टंकी पीतल धातु की होती। टंकी पर स्‍टोव को खोलने और बंद करने का घुमावदार बटन लगा होता था। टंकी में मिट्टी का तेल होता। टंकी पर ही अंगूठे से दबानेवाला एक पंप लगा होता। इसके सहारे पंपिंग करके टंकी से तेल की बारीक धार नीचे तेलटंकी से लगी एक नली के सहारे नली के ही ऊपरी खुले हिस्‍से तक पहुंचती। इस पर अग्नि प्रज्‍वलित करके फि‍र से तेज-तेज पंपिंग की जाती और घुर..घुर..घुर.. की ध्‍वनि के साथ स्‍टोव जल उठता।
चूल्‍हे में खाना बनाने के दौरान लकड़ी के धुंए से परेशानी महसूस करनेवाले लोग उस समय स्‍टोव के प्रयोग को ही प्राथमिकता देते थे। भोजन पकाने के लिए चूल्‍हे के विकल्‍प के रूप में स्‍टोव के आगमन के साथ ही प्रेशर कूकर का भी प्रचलन समाज में बढ़ने लगा। जबकि प्रेशर कूकर से पहले लोग ढेकची, पतीले का प्रयोग करते थे। और उससे भी पहले मिट्टी की हाड़ी में ही दाल-चावल, खीर, आदि पकवान बनाए जाते थे। सब्‍जी-तरकारी, हलवा आदि बनाने और पूरी-पकौड़ी तलने के लिए प्राय: कढ़ाई का प्रयोग होता था, जिसका विकल्‍प आज तक भी तैयार नहीं हो सका है। यानि कि आज भी कढ़ाई का प्रयोग पहले की तरह ही जस का तस है। स्‍टोव से पहले कोयले की अंगीठी भी भोजन पकाने के लिए एक अग्नि विकल्‍प हुआ करती थी। लेकिन कोयले से निकलनेवाली खतरनाक और प्राणघातक गैस के डर से लोगों ने रसोई में इसके प्रयोग को अधिक बढ़ावा नहीं दिया। अंगीठी का प्रयोग रसोई से बाहर आंगन में होता था।
खेती-बाड़ी के काम भी पारंपरिक उपकरणों और व्‍यवस्‍था के सहारे पूरे किए जाते थे। हल-बैल से खेत जोते जाते थे। ट्रैक्‍टर से खेत जोतना महंगा था। इसके लिए महंगे डीजल की आवश्‍यकता होती थी। धनी किसानों के पास हालांकि ट्रैक्‍टर भी होते थे पर अधिकांश किसान हल-बैल के सहारे ही खेती किया करते थे। खाद्यान बीज, खाद, बुवाई, जुताई, निराई, गुड़ाई आदि सभी खेती आधारित व्‍यवस्‍थाएं पारंपरिक पद्वति से की जाती थीं। परिणामस्‍वरूप जो खाद्यान खेतों में उपजता था, उसमें पौष्टिकता होती थी। फसलों को कीटों और कीड़ों से सुरक्षित रखने के लिए रासायनिक कीटनाशकों का छिड़काव नहीं होता था। इससे अन्‍न में प्राकृतिक शक्ति होती। लोग शुद्ध अन्‍न खाते थे और तन-मन से स्‍वस्‍थ रहते थे।

Thursday, June 25, 2015

पुरानी वस्‍तुओं की यादें, भाग १

मानवीय जीवन के पन्‍द्रह वर्षों में बहुत कुछ बदल जाता है। आज से पन्‍द्रह वर्ष पूर्व यानि सन् २००० का ही दशक लें। उस समय जन्‍म लेनेवाले बच्चे आज पन्‍द्रह वर्ष के होंगे। आज उन्‍हें पन्‍द्रह वर्ष पहले के जीवन और उसकी वस्‍तुओं के बारे में जानना हो तो हम लोग उन्‍हें बता सकते हैं। उन्‍हें पचास-साठ वर्ष पीछे के जीवन और उसके जीवनोपयोगी वस्‍तुओं की सटीक जानकारी तो हम जैसे लोग भी नहीं दे सकते। इसके लिए उन्‍हें संग्रहालयों में जाना होगा।
अपने साथ के वृद्ध जनों से पुराने जमाने की बातें करते हुए उस समय के जीवन और जीवन में प्रयोग होनेवाली विभिन्‍न वस्‍तुओं की बातें होती हैं तो बहुत रोचक लगता है। सोचता हूँ इन लोगों ने अपने जमाने की चीजों का संग्रह क्‍यों नहीं किया! अगर समय के साथ पुरानी वस्‍तुओं के स्‍थान पर नई वस्‍तुएं आ गईं तो क्‍या हुआ! क्‍या उनके सहारे हमारा जीवन सुखपूर्वक व्‍यतीत नहीं हुआ, जो उन्‍हें व्‍यर्थ समझ कर हम इधर-उधर फेंक कर अंतत: भूल ही जाते हैं?
ऐसी ही कुछ वस्‍तुएं हैं, जिनके बारे में क्रम और विस्‍तार से लिखने की बड़ी इच्‍छा है। बात पन्‍द्रह वर्ष पहले के जीवन से शुरू हुई थी। पन्‍द्रह वर्ष पहले तक हालांकि बड़े-बड़े शहरों और धनी लोगों के पास रंगीन टेलीविजन और मोबाइल फोन के भारी उपकरण उपलब्‍ध थे पर ग्रामीण भारत में अधिकांश घरों में श्‍वेत-श्‍याम टेलीविजन (ब्‍लैक ऐंड व्‍हाइट टीवी) की ही उपलब्‍धता थी। टेलीविजन उपकरण बहुत भारी हुआ करता। इसे उठाकर इधर-उधर रखने के लिए दो व्‍यक्तियों की जरूरत होती। टेलीविजन चलाने के लिए घर की छत पर एंटीना भी लगाना होता था। मेरे देखते-देखते तो एंटीना की मुड़ी हुई डंडियां एल्‍यूमीनियम की होती थीं पर कई लोगों से सुना कि जब टेलीविजन शुरू-शुरू में आया तो ये डंडियां तांबे की होती थीं। यह भी ज्ञात हुआ कि एंटीना का भार ही चालीस किला होता था। अपने उन दिनों की स्‍मृतियां तेजी से मस्तिष्‍क में दौड़ने लगती हैं, जब हम दूरदर्शन और मेट्रो चैनल के कार्यक्रमों के स्‍पष्‍ट, साफ प्रसारण के लिए एंटीना से लगी टेलीविजन की तार इधर-उधर हिलाते-जोड़ते रहते। कई बार एंटीना को चारों दिशाओं में घुमाते ताकि टेलीविजन के कार्यक्रम साफ-साफ दिखाई दें। उस समय तक टेलीविजन चलाने के लिए रिमोट कंट्रोल तक भी जनसाधारण की पहुंच नहीं हुई थी। टेलीविजन यंत्र पर लगे बटनों से ही उसे खोला और बंद किया जाता। कार्यक्रम बदलने के लिए उस पर एक घुमानेवाला बटन लगा होता था। उस समय टेलीविजन के कार्यक्रम बच्‍चों को ध्‍यान में रखकर बनाए जाते थे। अधिकांश कार्यक्रम ज्ञानवर्द्धक, सामाजिक और मानवीयता की भावना को केन्‍द्र में रखकर बनाए जाते थे।  
उस समय मोबाइल फोन नया-नया आया था। मोटारोला कंपनी का आधा हाथ लंबा और आधा किलो भारी फोन जिसके पास होता, वह स्‍वयं को अपने परिवेश के उन सभी लोगों का राजा समझता, जिनके पास मोबाइल फोन नहीं होता। उस कालखण्‍ड में मोबाइल फोन का खर्चा वहन करना सबके वश में न था। मोबाइल फोन पर आनेवाली कॉल पर भी बहुत ज्‍यादा पैसा लगता।
तब जनसाधारण के पास अचल दूरभाष (लैंडलाइन फोन) की सुविधा ज्‍यादा थी। एमटीएनएल (महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड) और बीएसएनएल (भारत संचार निगम लिमिटेड) जैसे शब्‍द अस्तित्‍व में न थे। सम्‍पूर्ण भारत में अचल दूरभाष सुविधा प्रदान करने का उत्‍तरदायित्‍व भारतीय दूरसंचार मंत्रालय का था। मंत्रालय ही दूरभाष का संचालन भी करता था। इसी के अन्‍तर्गत राज्‍यों में भारतीय दूरसंचार विभाग और दूरसंचार केन्‍द्र (टेलीफोन एक्‍सचेंज) स्‍थापित थे।
उस समय पांच-छह इंच लंबा-चौड़ा ''पेजर'' नामक उपकरण भी होता था। यह उपकरण मोबाइल फोन के रूप में कम सुविधाओं के साथ कार्य करता था। अचल दूरभाष (लैंडलाइन फोन) से इस पर आवश्‍यक संदेश भेजे जाते थे। इस पर संदेश आते ही एक ध्‍वनि संकेत होता और इसे रखनेवाला व्‍यक्ति इसकी छोटे से दृश्‍य-पट (स्‍क्रीन) पर आए संदेश को पढ़ लेता। पेजर से पेजर में संदेश का आदान-प्रदान भी होता था। प्राय: पेजर का प्रयोग करनेवाले इसे कमर पर कमरपट्टी (बेल्‍ट) के पास बांधे रखते थे। पेजर अधिक दिन नहीं चला। यह एक वर्ष में ही चलन से बाहर हो गया। मोबाइल फोन ने इसका स्‍थान लेना शुरू कर दिया।
उसी समय दूरसंचार विभाग में मैंने अपनी पहली नौकरी शुरू की थी। मैं दूरसंचार विभाग के लेखा विभाग में तदर्थ (एडहॉक) आधार पर कार्यरत् था।
................अगले अंक में अन्‍य पुरानी वस्‍तुओं के बारे में।
विकेश कुमार बडोला

Tuesday, June 23, 2015

छह दशक पुरानी शासकीय विसंगति एक वर्ष में कैसे दूर हो सकती है

भारत में यह आम व्‍यवहार है कि पस्‍त गृहस्‍थ होकर भी आदमी राजनीति में गहन रुचि रखता है। रुचि होनी स्‍वाभाविक है क्‍योंकि इस युग में आम आदमी का गृहस्‍थ जीवन राजनीति से निर्धारित होनीवाली जीवन गतिविधियों पर जो निर्भर है। राजनीति कई प्रकार की हो सकती है। लेकिन भारत में लोकतांत्रिक शासन पद्धति में आम जनता का राजनीतिक दर्शन, जीवनचर्या हेतु सर्वश्रेष्‍ठ किन्‍हीं मानदंडों के अनुरूप नहीं है। यहां का राजनीतिक दर्शन विभिन्‍न राष्‍ट्रीय, क्षेत्रीय स्‍तर के राजनीतिक दलों और स्‍वयं की हितसाधक उनकी स्‍वार्थी मानसिकता के हिसाब से बनता-बिगड़ता है। आम आदमी कभी भी ऐसी राजनीतिक विचारधारा का व्‍यक्तिगत आकलन नहीं कर पाता। वह ऐसी राजनीति का विश्‍लेषण सामूहिक दृष्टिकोण से ही कर पाता है। वास्‍तव में ऐसी राजनीति की कोई वैचारिक प्रगति होती भी नहीं है, जो इससे जुड़े लोगों में लोक व्‍यवहार और लोक संस्‍कार डाल सके।
            स्‍वातंत्र्योत्‍तर भारत में कांग्रेस नामक राजनीतिक दल उभरा। यह इसलिए भी हुआ कि भारत जिन-जिन देशों का उपनिवेश रहा या जो भी साम्राज्‍यवादी शक्तियां भारत पर शासन करके यहां से गईं, उनके अपने देशों में कांग्रेस शब्‍द और इसके पीछे की राजनीतिक अवधारणा का गुणगान उपनिवेशवाद* और साम्राज्‍यवाद** के दौरान खूब प्रसारित किया गया। परिणामस्‍वरूप औपनिवेशिक भारत के समय, जो भारतीय विदेशी शासकों के निकट रहे, उनका विदेशी जीवन-व्‍यवहार के संपर्क में आना स्‍वाभाविक था। फि‍र ऐसा होता भी क्‍यों नहीं, क्‍योंकि जिन शक्तियों के कब्‍जे में भारत की संपूर्ण व्‍यवस्‍था थी, वे विज्ञान और आधुनिक ज्ञान के बलबूते दुनिया को बुरी तरह प्रभावित करने की स्थिति में जो थे।
            इस प्रकार स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के अलग-अलग राज्‍यों या रजवाड़ों या साम्राज्‍यों से मिलकर एक राष्‍ट्र निर्मित हुआ और इसे चलाने के लिए संविधान और संसद अस्तित्‍व में आए। किसी भी विशाल देशस्थान में यह कैसे संभव है कि वहां का जो संविधान या संवैधानिक परिभाषाएं किन्‍हीं विचारकों द्वारा बना दी गई हों, उनके अनुरूप ही उस देश के प्रत्‍येक नागरिक की विचारधारा बन जाएगी। यह समझना सरल है कि किसी एक विषय पर किसी राष्‍ट्र में उसके अपने नागरिकों के मतभेद मिट नहीं सकते--जिस प्रकार चार-पांच सदस्‍यों का कोई परिवार भी किसी बात पर सहमत नहीं हो पाता, उसी धारा में यदि देश के अरबों लोगों के विचारों को देखा जाए और प्रयास हो कि वे किसी एक विषय पर एकमत हों, तो यह किस आधार पर होगा! निस्‍संदेह किसी आधार पर नहीं हो सकता।  
          इन्‍हीं परिस्थितियों में कांग्रेस के अपने मतभेद उभरे। फलस्‍वरूप नए राजनीतिक दल अस्तित्‍व में आए। एक नहीं अनेक राष्‍ट्रीय और क्षेत्रीय दल पिछले साठ साल में देश के कई-कई लोगों को अपने राजनीतिक समूह और विचारधारा से जोड़ चुके हैं। कितने ही राजनीतिक दल इस परिदृश्‍य में उभरे हों या उनके कितने ही समर्थक उन्‍हें समर्थन करते रहे हों, पर जोड़-तोड़ करने में सबसे पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस से वे राष्‍ट्रीय स्‍तर पर राज करने की प्रतियोगिता कभी नहीं कर पाए। अस्‍सी के दशक के कुछ वर्षों को छोड़ दें तो सन् 1948 से पिछले वर्ष तक कांग्रेस ने ही पूरे साठ साल की केन्‍द्रीय राजनीतिक यात्रा की।
          इस प्रकार सदैव ही संविधान की कार्यपालिका में कांग्रेसी नेताओं की बहुतायत रही। विधायिका में भी कांग्रेसी नेताओं का बहुमत था। स्‍पष्‍ट था कि न्‍यायपालिका में बैठे न्‍यायाधीशों के न्‍याय-विचार पर भी इनकी राष्‍ट्रीय नीतियों और निर्णयों का प्रभाव जाता। इन तीनों लोकतांत्रिक स्‍तंभों को संभालने के लिए जो शासन-प्रशासन तंत्र तैयार हुआ, उसकी व्‍यक्तिगत और नागरिक मानसिकता अलग कैसे हो सकती थी। जो कुछ राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और मानवीय संदेश लोकतांत्रिक पटल की तीन पालिकों के माध्‍यम से शासन-प्रशासन तक फैला, उसी के अनुरूप देश के जन-जीवन की मानसिकता और प्रवृत्ति तय हुई। दुर्भाग्‍य से यह संदेश बहुत ही नकारात्‍मक रहा। सरकारी एवं अर्द्ध-सरकारी संस्‍थानों, प्रतिष्‍ठानों, विभागों और उप-विभागों के माध्‍यम से पंचायत और ग्राम प्रधान जैसी ग्रामीण लोकतांत्रिक इकाइयों तक देशी बाबूगीरी फैली। सरकार की तरफ से प्रस्‍तावित कोई भी काम अपनी परिणति तक पहुंचने से पहले कई लोगों और अनेक सरकारी व्‍यवस्‍थाओं को भ्रष्‍ट करता चला गया।
          सन् 1950 में जो सरकारी नौकर नियुक्‍त हुआ होगा, उसका कार्यकाल उसके जीवित होने और 60 वर्ष की सेवावधि पूर्ण किए जाने की स्थिति में सन् 2010 था। कहने का तात्‍पर्य यह है कि इस देश की पूरी की पूरी नौकरशाही (उन सरकारी नौकरों से क्षमा मांगना चाहूंगा जो जीवनभर भ्रष्‍ट नहीं थे), जिसे भ्रष्‍ट और दुष्‍ट कहा जाता है, उसकी उत्‍पत्ति भी उसी कांग्रेसी राज से हुई थी, जिसकी काली छाया इस देश पर छह दशक तक रही। आज यदि कोई कहे कि भाजपा नेतृत्‍व वाले राजग ने सरकारी कर्मचारियों या विभागों की कार्यप्रणाली को चुस्‍त-दुरुस्‍त नहीं किया है, तो क्‍या सरकारी कर्मचारियों या विभागों के चाक-चौबंद हो जाने में केवल भाजपा सरकार की ईमानदारी ही सहायक होगी? क्‍या इस विफलता में कांग्रेस द्वारा उत्‍पन्‍न पिछले साठ सालों के सरकारी कर्मचारियों की भूमिका पर प्रश्‍न नहीं उठाए जाने चाहिए? जिन कर्मचारियों को साठ साल से भ्रष्‍टाचार में बुरी तरह संलिप्‍त होने की कभी न छूटनेवाली बीमारी लगी हो, वे नवगठित केन्‍द्रीय शासन के स्‍वच्‍छ व पारदर्शी प्रशासन देने के संकल्‍प के साथ आसानी से कैसे जुड़ सकते हैं?
          केन्‍द्र सरकार के सामने प्रधानमंत्री या उनके मंत्रिमंडल के नेताओं की ईमानदारी या उनके ढंग से काम करने की चिंता इतनी नहीं है, जितनी दशकों के कांग्रेसी शासन में पथभ्रष्‍ट हुए प्रशासनिक तंत्र को ठीक करने की चुनौती है। जो पूरे साठ साल तक भ्रष्‍टाचार में सने रहे, उन्‍हें एक या दो साल में, कम से कम लोकतांत्रिक तरीके से तो सीधा, सच्‍चा, सज्‍जन बिलकुल नहीं बनाया जा सकता। हां, सरकारी सेवाओं में आज नियुक्‍त होनेवाले कर्मचारी कर्मठ, कर्त्‍तव्‍यनिष्‍ठ, उत्‍तरदायी केन्‍द्रीय शासन से प्रेरणा लेकर अवश्‍य ही भ्रष्‍टमुक्‍त प्रशासनिक तंत्र बनाने की दिशा में उन्‍मुख हो सकते हैं।
*   उपनिवेश शब्‍द अट्ठारहवीं और उन्‍नीसवीं सहस्राब्दि में अस्तित्‍व में आया। व्‍यापारिक अनुसंधान के लिए एक देश के शासकों ने दूसरे देश की यात्रा की। उन्‍होंने वहां शासकीय तथा सामाजिक रूप से अपने देश का समानांतर तंत्र स्‍थापित कर दिया। वर्षों तक ऐसी स्थिति बनी रही। इसे ही उपनिवेशवाद कहा गया।
** साम्राज्‍य शब्‍द से तात्‍पर्य किसी एक व्‍यक्ति के एकाधिकार में एक बड़े क्षेत्र के होने से है। ऐसे क्षेत्र की पूरी व्‍यवस्‍था उस व्‍यक्ति के विवेक से निर्धारित होती है। राजाओं के जमाने और पिछली बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक यही स्थिति दुनिया के ज्‍यादातर देशों में बनी रही। आज भी कई देशों में इस तरह की शासन-प्रणाली है।
विकेश कुमार बडोला

Monday, June 22, 2015

अर्थशास्‍त्र द्वारा सरकारी आकलन

नुष्‍य जीवन की प्रमुख आवश्‍यकता है भोजन, वस्‍त्र और घर। वस्‍त्र और घर न हो और भूख लगने पर केवल भोजन मिलता रहे तब भी जीवन ठीक से गुजर सकता है। रोग हमें तब घेरते हैं जब हमारे जीवन का निर्धारित चाल-चलन बिगड़ जाता है। इसके बाद हमें दवाई और चिकित्‍सा की आवश्‍यकता भी होती है। यहां तक भी ठीक है। इतनी आवश्‍यकताएं लोगों को उपलब्‍ध कराई जा सकती हैं।
          लेकिन जब प्रमुख जीवन आवश्‍यकताओं के अलावा भी अन्‍य आवश्‍यकताएं प्रतिदिन बढ़ रही हों और लोभ, लालच और भौतिक महत्‍वाकांक्षाओं से मानव का मन-मस्तिष्‍क भरता जा रहा हो, तब हमारे जीवन की स्थिति कैसी होगी, इसकी कल्‍पना की ही नहीं जा सकती। जिस कालखंड से भी जीवन में प्रमुख आवश्‍यकताओं के इतर आवश्‍यकताएं उभरीं, तब ही से संसार में अनेक वस्‍तुओं का उत्‍पादन शुरू हुआ। धीरे-धीरे इन वस्‍तुओं को बेचकर समाज में अधिक लाभ कमाने की इच्‍छा उभरी। छोटी से लेकर बड़ी वस्‍तु के उत्‍पादन, विज्ञापन, विपणन की सदियों पुरानी प्रक्रिया अनेक परिवर्तनों, विरोधाभासों और विसंगतियों से होते हुए इस समय तक पहुंची है। आज संसार के सभी देश धनार्जन करने और पूंजीगत लाभ बढ़ाने के लिए अपने कल-कारखानों में निर्मित उत्‍पाद दूसरे देशों को बेचते हैं। वे अलग-अलग देशों के लोगों की जीवन-रुचियों का ध्‍यान रखकर उत्‍पादन करने और बेचने के कारोबार में शामिल हैं।
          अलग-अलग देशों की यह निर्माण, उत्‍पादन व्‍यवस्‍थाएं पूंजीगत लाभार्जन के लिए एक-दूसरे पर निर्भर हो गई हैं और इस प्रकार पूंजीगत गणना के लिए सम्‍पूर्ण विश्‍व के परस्‍पर जुड़े उत्‍पादन कारोबार एक नई अर्थव्‍यवस्‍था में बदल गए। जिस देश के उत्‍पादन की गुणवत्‍ता जितनी अधिक होगी, उसका लाभांस उतना ज्‍यादा तय होगा, धीरे-धीरे यह धारणा भी बन गई। गुणवत्‍ता का आकलन और लाभांस का निर्धारण कैसे हो, इस हेतु सम्‍पूर्ण विश्‍व के वस्‍तु-उत्‍पादन के क्रय-विक्रय के बाद लाभांस वितरण की श्रेणियां निर्धारित की गईं। जो देश सबसे अधिक लाभांस अर्जित करेगा, उसकी मुद्रा का मूल्‍यांकन सबसे अधिक होगा। इस प्रकार मुद्रा अस्तित्‍व में आती है। इसके बाद मुद्रास्‍फीति और मुद्रा संकुचन की श्रेणियां तय करने की आवश्‍यकता हुई। इसके लिए उत्‍पादन के बराबर मुद्रा की उपलब्‍धता सुनिश्चित हो, यह मानक रखा गया। और इस मानक पर योग्‍य घोषित देश की अर्थव्‍यवस्‍था मुद्रास्‍फीति से बच जाती है। उत्‍पादन से कम मुद्रा की उपलब्‍धता, तरलता अर्थव्‍यवस्‍था में न हो तो मुद्रा संकुचन की स्थितियां बनती हैं। इसके लिए भी पर्याप्‍त उपाय करने की कोशिश की जाती है। उत्‍पादन के बराबर मुद्रा की तरलता निश्चित की जाती है। यानि कि उत्‍पादन के रूप में मौजूद वस्‍तुओं की क्रयशक्ति समाज की है या नहीं, इसी आधार पर मुद्रा संकुचन की परिभाषा तय होती है।
          औद्योगिक विकास, सकल घरेलू उत्‍पादन, मुद्रा के रूप में रूपए का मूल्‍यांकन यह सब कुछ संसार की अर्थव्‍यवस्‍था को आधार मानकर निर्धारित होता है। आज अर्थव्‍यवस्‍था को अर्थशास्‍त्र की निर्धारित वैश्विक मान्‍यताओं के अनुसार ठीक से समझना अर्थ विशेषज्ञों के लिए भी मुश्किल है। कारण, अवैध औद्योगिक उत्‍पादन के अनुसार एक अलग अर्थव्‍यवस्‍था का अस्तित्‍व में आना और अप्रत्‍यक्ष रूप से वैध वैश्विक आर्थिक सूचकांक में शामिल होना है।
          इन सब आर्थिक स्थितियों से देश-दुनिया सालों से गुजर रहे हैं। और अगर कोई सरकार इस भेढ़चाल से अलग कुछ नया, विकासोन्‍मुखी कदम उठाती है, तो उससे यह उम्‍मीद नहीं की जा सकती कि सालों की अव्‍यवस्‍था साल-दो साल में व्‍यवस्थित हो जाए। 
          सरकार को पिछले एक वर्ष के कार्यकाल में कुछ नहीं करने के लिए लताड़ने वाले क्‍या अर्थव्‍यवस्‍था की गहन जानकारी रखते हैं? यदि नहीं, तो वे किस ज्ञान के आधार पर सरकार के आर्थिक कामकाज का आकलन कर रहे हैं। विपक्ष यदि यह कहता है कि औद्योगिक उत्‍पादन घटा है, आर्थिक स्थिति डगमगाई है और रूपए की कीमत अस्थिर और कम हुई है, तो फिर वह भूमि अधिग्रहण कानून के संशोधन के लिए किसानों और आम भारतीय को क्‍यों गलत संदेश दे रहे हैं कि यह विकास के नाम पर कृषि और किसानों को बर्बाद कर देगा। अगर आप कृषि और किसानों के पक्ष में खड़े होकर भूमि अधिग्रहण के उपयुक्‍त संशोधन का विरोध करते हैं, तो आप औद्योगिक उत्‍पादन में कमी के साथ आर्थिक अस्थिरता और रूपए के अवमूल्‍यन की बात कैसे कह सकते हो। यह तो ऐसा ही है कि कुत्‍ते से बचने के लिए बिल्‍ली का पक्ष लेते हैं और कुत्‍ता बिल्‍ली को मार नहीं पा रहा है, सुस्‍त है, क्‍यों नहीं मार पा रहा है, इस बात पर भी अड़े रहते हैं। यह वैचारिक विरोधाभास केवल राजनीति चमकाने के लिए है। जनता को इसे समझना चाहिए। किसी भी तंत्र में विपक्ष का कार्य उन बातों, योजनाओं और नीतियों के बारे में सत्‍ता पक्ष से विमर्श करना होना चाहिए, जो विषय-विशेष की अज्ञानता के कारण सत्‍तापक्ष से छूट जाती हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए कि सत्‍ता पक्ष के सही कार्यों में टांग अड़ा कर केवल अपने राजनीतिक लाभ के लिए देश और लोगों का नुकसान करना चाहिए। सरकार का पक्षसमर्थन सही सिद्ध करने के लिए यह कम है कि केन्‍द्रीय कोषागार से एक रुपए की अवैध निकासी नहीं हो पाई है। और जब खुद प्रधानमंत्री ईमानदार हो तो विपक्ष और विरोधियों को देश के विकास की चिंता छोड़ देनी चाहिए।
विकेश कुमार बडोला

Sunday, June 21, 2015

'अच्‍छे दिन' का तात्‍पर्य कैसे समझा जाए

जीवन बहुत ज्‍यादा परिवर्तनशील है। भौतिक रूप में जीवन में जो परिवर्तन होता है, उसे देखा जा सकता है। आवश्‍यकता अनुसार उसमें सुधार किया जा सकता है। लेकिन अपने ह्रदय में घट-बढ़ रहे कितने ही बदलावों से हम सामान्‍य मनुष्‍य के रूप में अनजान ही रहते हैं। इन बदलावों के बारे में भी हम तब जान पाते हैं, जब हम जीवन में प्रतिपल एक नई सोच और नया विचार बनाते हैं।
            आजकल मन में कई महत्‍वाकांक्षाएं हैं। इनके पूरे होने की स्थिति तब बने जब इनकी शुरुआत हो। अन्‍य लोगों की तरह मैं भी सांसारिक ज्ञान से संचित होना चाहता हूँ। ऐसा सांसारिक ज्ञान, जो एक वैचारिक सीमा में जाकर घनघोर अज्ञान प्रतीत होता है। इस समय का ज्ञान सूचनाओं के एकत्रीकरण पर टिका हुआ है। सूचनाओं और जानकारियों के भराव से हरेक आदमी का दिमाग कूड़ाघर बन गया है। ऐसी लहर चल रही है कि यदि आप एक भी सूचना से अनभिज्ञ रहे तो जीवन पिछड़ जाएगा। हम यह भी नहीं सोचते कि जो हम बनना चाह रहे हैं, जो विद्वता ग्रहण करना चाह रहे हैं, उस तक पहुंचने के लिए यह सूचना व जानकारियों से भरा मार्ग काम नहीं आएगा। लेकिन नहीं आगे बढ़ना है। दैनिक पत्रों में व्‍यंग्‍य,विनोद और मजाक में लिख-लिख कर लेखन जगत में छा जाना है। क्‍या सच में जीवन की बातें मजाक हैं या क्‍या जीवन का उत्‍थान व्‍यर्थ मजाकिया बातों से हो सकता है? आजकल के लेखकों के लेखन को देखकर तो यही लगता है।
            देश में पिछले एक वर्ष से भाजपा के नेतृत्‍व में राष्‍ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का शासन है। सबसे पहले तो देश के अधिकांश लोगों (कांग्रेसियों, उग्र वामपंथियों व इन जैसे अन्‍य लोगों को छोड़कर) को धीरज है कि देश में कोई राजनीतिक दल शासन कर रहा है। शासन का संचालन अत्‍यंत पारदर्शी तरीके से हो रहा है। देश के केन्‍द्रीय शासन में जन सहभागिता भी बढ़ी है। पिछले एक साल में एक भी घोटाला नहीं हुआ। जिन सेवाओं के आबंटन से यूपीए सरकार ने देश के कोष से लाखों करोड़ रुपए लुटाए, उन्‍हीं की स्‍वच्‍छ व पारदर्शी नीलामी से एनडीए शासन में लाखों करोड़ रुपए सरकारी कोष में आए। केन्‍द्रीय शासन के स्‍तर पर एक रुपए का भी हेर-फेर नहीं हुआ। प्राकृतिक आपदाओं के दौरान त्‍वरित जान-माल बचाव अभियान शुरू हुए। किसानों के लिए जरूरी कल्‍याणकारी मंचों की स्‍थापना हुई। मृदा स्‍वास्‍थ्‍य परीक्षण, खेती-किसानी आधारित दूरदर्शन चैनल आदि योजनाओं का विस्‍तारपूर्वक अध्‍ययन करने के बाद कोई मूर्ख ही इन्‍हें किसान विरोधी कह सकता है। प्रधानमंत्री जीवन सुरक्षा, दुर्घटना सुरक्षा, अटल पेंशन योजना, मुद्रा बैंक जैसी योजनाओं से असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों और कामगारों के जीवन को बहुस्‍तरीय सुरक्षा मिली। इतना सब होने के बाद भी कांग्रेस के प्रतिनिधित्‍व में उग्र लोग, इनका समर्थक मीडिया और देश-विदेश में लेखक-पत्रकार के रूप में शब्‍दों और अंकों के ज्ञानीजन ''अच्‍छे दिन'' वाक्‍य-युग्‍म के सहारे नरेन्‍द्र मोदी का अनुचित विरोध कर रहे हैं।
            यदि कांग्रेस के बहुमत वाले यूपीए से छुटकारा पाने के लिए 2014 लोकसभा चुनाव में नरेन्‍द्र मोदी ने बहुमत से चुनाव जीतने पर लोगों से 'अच्‍छे दिन' आने का वादा किया था, तो उसका तात्‍पर्य यह नहीं था कि देश का एक-एक आदमी एक वर्ष में पान-गुटखा चूसते-थूकते, दारू पीकर मां-बहन की गालियां देते हुए धन-सम्‍पत्ति से संपन्‍न बन जाएगा। देश के अच्‍छे दिन लाने के लिए प्रधान सेवक ने शुरुआत कर दी है। लोगों को भी अपने-अपने स्‍तर पर अपने कार्य देश हित का ध्‍यान रखते हुए करने होंगे।
            साठ वर्ष से चले आ रहे बुरे दिन एक साल में कैसे खत्‍म हो सकते हैं। हां, बुरे दिनों को खत्‍म करने के लिए केन्‍द्रीय शासन की जो योजनाएं, नीतियां पिछले एक साल में बनीं और उनका जो दीर्घकालिक प्रभाव होगा, निश्चित रूप से उससे देश में लोगों के अच्‍छे दिन जरूर आएंगे। बुरे दिनों के आभास से छूटने के लिए क्‍या यह कम सुखद अनुभव है कि एनडीए शासन के एक वर्ष में एक भी बड़ा घोटाला नहीं हुआ! क्‍या यह छोटी बात है कि आज देश के समझदार आदमी को देश में कोई राजनीतिक पार्टी शासन करती हुई लगती है! पिछले तीन सौ पैंसठ दिनों में संसद, संविधान, विधि-विधान की मौलिकता स्‍थापित हुई है। जब‍कि एक साल पहले तक तो केन्‍द्रीय शासन का आभास ही जनमानस से मिट चुका था। लगता ही नहीं था कि देश में कोई सरकार है। कांग्रेस की आवाज बनकर जो लोग कहते हैं कि इस सरकार ने पूंजीपतियों, बड़ी-बड़ी कंपनियां चलानेवालों या व्‍यापार करनेवालों को फायदा पहुंचाया, तो उन्‍हें ढंग से ज्ञात हो जाना चाहिए कि कंपनियों, उद्योगों, व्‍यापारिक उपक्रमों और पूंजी आधारित व्‍यवस्‍था की स्‍थापना कांग्रेस के ही प्रमुख दिवंगत नेताओं की अवधारणा थी। जब पूरा विश्‍व छोटी से बड़ी वस्‍तु के उत्‍पादन-उपभोग और क्रय-विक्रय के लिए एक सदी से अधिक समय से परस्‍पर निर्भर हो चुका हो, तो इस व्‍यवस्‍था को केवल राजनीतिक लाभ लेने और गरीबों को पूंजीपतियों के विरोध में उकसाने मात्र से कैसे बदला जा सकता है।
            कृषि आधारित परंपरागत जीवन किसे अच्‍छा नहीं लगता। जो पीढ़ी बीसवीं सदी का उत्‍तरार्द्ध और इक्‍कीसवीं सदी का पूर्वार्द्ध जी चुकी होगी, चाहे वह देशी पीढ़ी हो या विदेशी, उसे परंपरा और आधुनिकता दोनों कालखण्‍डों में जीवन गुजारने का मौका मिला। और अपने इस अनुभव के आधार पर वह दोनों प्रकार के जीवन की तुलना करती है, तो निश्चित रूप से परंपरागत जीवन को ही अधिक उचित मानती है। इस मान्‍यता में पीढ़ी किसी राजनीतिक पार्टी, औद्योगिक प्रवृत्ति, कॉर्पोरेट जीवन-शैली या सामाजिक प्रभाव से प्रभावित हुए बिना ही अपने स्‍वयं के जीवन पर पड़ते इन सबके दुष्‍प्रभाव के कारण परंपरा के प्रति झुकाव रखती है। इस स्थिति में तो संवदेनशील कांग्रेसी या भाजपाई या कोई अन्‍य व्‍यक्ति औद्योगीकरण, पूंजीवाद और इनके आत्‍मघाती सामाजिक असर को नापसंद ही करेगा। लेकिन जब उद्योग संचालित करनेवाले पूंजीपति एक बड़े निजी रोजगार सेवा क्षेत्र के रूप में बदल चुके हों और करोड़ों लोग राष्‍ट्रीय नागरिकता के बावजूद जीविका के लिए इन उद्योगों पर निर्भर हों, तो इनका विरोध कैसे किया जा सकता है कैसे यह बोला जा सकता है कि कोई सरकार गरीबों और किसानों का अहित कर उद्योगपतियों की हितैषी बन रही है? आज जीवन की जरूरतों के लिए कृषि और उद्योग एक-दूसरे पर निर्भर हैं। इन दोनों में से किसी एक की तरफदारी और दूसरे की अनदेखी नहीं हो सकती। दोनों को संतुलित तरीके से संचालित करना होगा। दोनों क्षेत्रों के सामाजिक, पारिश्रमिक और मानवीय हितों की रक्षा तो करनी ही होगी। कम से कम इस आधार पर तो केन्‍द्र सरकार को 'बुरे दिन' के लिए घेरना क्षुद्र राजनीतिक लालसा ही होगी।
विकेश कुमार बडोला