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सोमवार, 2 जुलाई 2018

निराश करती उत्तराखंड सरकार

भाजपा की केंद्र सरकार जिन गंभीर और कष्टकारी विषयों पर आंख मूंदे बैठी है, उनमें से एक है उत्तराखंड की भाजपा सरकार की कार्यप्रणाली। दो-ढाई वर्ष पहले भाजपा राज्य में बहुमत के आधार पर सत्तारूढ़ हुई थी, लेकिन मुख्यमंत्री के स्तर पर उत्तराखंड के हित में ऐसा कोई कार्य या विशेष नीतिगत पहल दिख नहीं रही जिससे लगे कि केंद्र में मोदी तथा यूपी में योगी से प्रेरणा लेकर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भी कुछ नया और क्रांतिकारी कर रहे हैं। जन-जीवन की जो मूलभूत समस्याएं कांग्रेस छोड़कर गई थी, उनके निराकरण के लिए कोई राजनीतिक इच्छाशक्ति कहीं नहीं दिखाई देती। शासकीय-प्रशासकीय अधिकारियों के कहने पर राज्य के सभी काम उसी नीतिगत पंगुता और भ्रष्टाचार की शैली के अंतर्गत चल रहे हैं, जैसे पहले चलते आए थे।
इन परिस्थितियों को देखकर लगता है कि भाजपा का बहुमत से राज्य के शासन पर विराजना और केंद्र में बहुमत की भाजपा सरकार का होना भी उत्तराखंड के लिए कहीं से भी लाभकारी नहीं। उत्तराखंड चुनाव प्रचार अभियान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनता से भाजपा को जिताने और जीतने पर केंद्र राज्य की डबल इंजन की सरकारों के दम पर राज्य के समयानुकूल और समुचित विकास के जो वायदे किए, वे वर्तमान मुख्यमंत्री की राजनीतिक अकर्मण्यता के कारण कोरे ही साबित हो रहे हैं।
त्रिवेंद्र सिंह रावत के बारे में अधिसंख्य संवेदनशील उत्तराखंडवासी इस बात से तो निराश ही थे कि वे प्रधानमंत्री और यूपी के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की राजनीतिक शैली का अनुसरण करते हुए समर्पण और नवदृष्टिकोण के साथ काम नहीं कर रहे, लेकिन विगत 27 जून को जनता मिलन कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने जिस तरह से एक शिक्षिका के साथ दुर्व्यवहार किया, उससे लोगों की निराशा क्रोध में भी बदल गई।
उल्लेखनीय है कि जनता मिलन कार्यक्रम के दौरान उत्तरकाशी जिले के नौगांव प्राथमिक विद्यालय में कार्यरत् शिक्षिका उत्तरा बहुगुण पंत ने मुख्यमंत्री से प्रार्थना की कि उन्हें नौगांव से देहरादून स्थानांतरित कर दिया जाए। उत्तरा ने कहा कि वे विधवा हैं तथा उनके बच्चे अकेले देहरादून में रहते हैं, इसलिए वे देहरादून में स्थानांतरण चाहती हैं। मुख्यमंत्री द्वारा यह पूछे जाने पर कि नौकरी लेते वक्त उन्होंने क्या लिख के दिया था, उत्तरा ने जवाब दिया कि उन्होंने यह लिखकर नहीं दिया कि वे जीवनभर वनवास में रहेंगी। इस पर मुख्यमंत्री धैर्य खो बैठे और उन्होंने उत्तरा को सभ्यता से बोलने को कहा। उत्तरा को आशा थी कि मुख्यमंत्री उनके साथ महिला होने के नाते ऐसा व्यवहार करेंगे इसलिए वे पीड़ाकुल होकर कहने लगी कि अगर ऐसा है तो बेटी पढ़ाओ और बेटी बढ़ाओ का ढोंग क्यों। इस पर मुख्यमंत्री ने उत्तरा को निलंबित करने तथा उन्हें हिरासत में लेने को कहा।
जनता मिलन कार्यक्रम के उक्त घटना के वीडियो में साफ दिखाई दे रहा है कि उत्तरा जब अपनी व्यथा मुख्यमंत्री को बता रही थी तो पृष्ठभूमि में खडे़ कुछ पुरुष उनके दुखड़े पर असभ्यता से हंस रहे थे। इसके बाद उसकी व्यथा को मुख्यमंत्री ने असहज करनेवाले प्रश्न से और बड़ा दिया कि उन्होंने नौकरी करते समय क्या लिख कर दिया था। ऐसे में आम नागरिक का गुस्सा होना स्वाभाविक है। किसी राज्य का मुख्यमंत्री यदि एक स्त्री के साथ सार्वजनिक सभा में ऐसा व्यवहार करता है तो यह उसे बिलकुल शोभा नहीं देता। यदि उस स्त्री की समस्या को सुनकर उस पर अपेक्षित कार्रवाई करने की बात मुख्यमंत्री कह देते तो क्या बिगड़ जाता। क्या 25 वर्षों तक दुर्गम स्थानों पर नौकरी करनेवाला शहर में आने का हकदार नहीं होताघ् फिर मुख्यमंत्री भी तो अपने मंत्रिमंडल और दूसरे नेताओं के साथ चुनाव जीतने के बाद देहरादून में ही तो बैठे हुए हैं। क्या जनता को मुख्यमंत्री सहित उनके पूरे मंत्रिमंडल को यह पूछने का हक नहीं कि आखिर वे लोग अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों की जन समस्याओं की अनदेखी कर देहरादून में बैठे रहकर उनका कौन सा वास्तविक समाधान निकाल रहे हैं। इस बरसात से पहले ज्यादातर पहाड़ी क्षेत्रों में जल संकट व्याप्त था, लेकिन विधायक अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों से नदारद मिले।
राज्य में मदिरा के करोबार को सुगम और सहज करने के लिए सरकार जितने कार्य कर रही है, यदि उतने कार्य जनता के विकास के लिए किए होते तो परिदृश्य कुछ और होता। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा। भू, शराब, राशन, बिल्डिंग मैटीरियल माफियाओं के हिसाब से ही राज्य की सरकार और उसका शासन-प्रशासन चल रहा है। यदि ऐसा ही चलना था तो कांग्रेस बुरी थोड़े थी। वह ऐसे ही कामों को जनता के साथ सद्व्यवहार बनाकर पूरा कर रही थी। राज्य के आर्थिक हित की चिंता करते हुए उसकी भरपाई यदि शराब के कारोबार से पूरा करने की नीतियां बन रही हैं, तो ऐसे राज्य की आवश्यकता ही क्या है। ऐसे बीमारू राज्य को केंद्र के ही अधीन क्यों नहीं रख लिया जाता।
पिछले दो-ढाई वर्ष के कार्यकाल में भाजपा के मुख्यमंत्री ने ऐसे राजनीतिक संकल्प, दिग्दृष्टि और ऊर्जा नहीं दिखाई कि लोगों को लग सके कि सरकार पूर्व की सरकारों से कुछ विशेष और अलग कर रही है। यहां तक कि केंद्र की जनकल्याणकारी योजनाओं को भी राज्य सरकार अपनी नौकरशाही के माध्यम से ढंग से लोगों तक नहीं पहुंचा पा रही। खाद्यान, शिक्षा, स्वास्थ्य, वन क्षेत्र, खेती, रोजगार, पलायन, अवैध मुसलिम प्रवासन अनेक विषय हैं जिन पर वर्तमान सरकार ने कोई ऐसा काम नहीं किया जो उल्लेखनीय और प्रशंसनीय हो।
उत्तराखंड में भूमि की चकबंदी की जरूरत कब से महसूस की जा रही है। यह काम ऐसा है जिससे पलायन भी रुकेगा और स्थानीय स्तर पर रोजगार भी सृजित होगा। लेकिन स्थानीय नेताओं और छुटभैये नेताओं के कारण यह काम भी टलता हुआ रहा है। उत्तराखंड की तरह हिमाचल प्रदेश भी पहाड़ी राज्य है। वहां चकबंदी होने का परिणाम यह रहा कि आज कोई हिमाचलवासी प्रदेश से बाहर नौकरी के लिए भटकता हुआ नहीं दिखाई देता।
विगत दिनों तापमान बढ़ने से उत्तराखंड के जंगलों में आग लगी। आग हर वर्ष लगती है और बरसात के बाद इस बारे में जनता से लेकर सरकार बात करना तक पसंद नहीं करते। जिन कारणों से आग लगती है, उनमें से बड़ कारण है चीड़ के पेड़। इतने वर्षों से कोई सरकार ऐसा संकल्प नहीं दिखा पाई कि वन अधिनियम में संशोधन कराकर चीड़ के पेड़ों की कटान की व्यवस्था की जाए। यदि पूरे पहाड़ी क्षेत्र से चीड़ के पेड़ भी काटे जाएं, पर उन स्थानों से तो काटने ही होंगे, जहां ऊंचाई वाले क्षेत्रों में गांववासियों के प्राकृतिक जलस्रोत हैं। लेकिन इस दिशा में भी वर्तमान सरकार कुछ नहीं कर रही।  
जिस राज्य का मुख्यमंत्री इतनी गंभीर और जटिल समस्याओं पर चिंतन-मंथन करने और कुछ कार्य करने के स्थान पर एक सामान्य जनता मिलन कार्यक्रम में एक महिला की शिकायत पर अपना आपा खो दे, ऐसे व्यक्ति को शीर्ष पद पर बैठने का कोई हक नहीं होना चाहिए। इन परिस्थितियों में मोदी सरकार को उत्तराखंड में केवल योग्य मुख्यमंत्री नियुक्त करने की आवश्यकता है, अपितु राज्य के सभी विधायकों को अपने-अपने क्षेत्रों में जमीनी स्तर पर लोगों की समस्याओं का समाधान करने के लिए भी दौड़ाना होगा। जरूरी नहीं कि मुख्यमंत्री उत्तराखंड में रह रहे किसी व्यक्ति को ही बनाना है, यदि देश-विदेश में बैठा कोई योग्य उत्तराखंडवासी मोदी-योगी की तरह कार्य कर सकता है, तो उसे ही मुख्यमंत्री के रूप में निर्वाचित कर दिया जाना चाहिए।

1 टिप्पणी:

  1. राजनीति का तकाजा यही है की धैर्य हो, आलोचना सुनने का मादा हो ... और कर्म के प्रति समर्पित हो ...
    बदलाव की राजनीति जब बदलती नहीं है तो सबसे ज्यादा मोह भंग होता है ... आशा है भाजपा सोचेगी इस बारे में ...

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