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शुक्रवार, 6 जुलाई 2018

मंदसौर की घटना, दोषी को हो तुरंत फांसी


वर्ष की बच्ची या बच्चा। यह आयु मनुष्य की अबोध आयु है। इसमें बच्चे मानसिक और भावनात्मक रूप में खाने-पीने और खिलौनों तक सीमित होते हैं। निश्चिंतता, खेल-कूद, दौड़-भाग, पढ़ने-सीखने और बड़ों के प्रेम में बीतता बच्चों का जीवन इसीलिए निश्छल, निष्कपट और मासूम होता है। लेकिन जीवन के इस काल में यदि किसी बच्चे को यौन शोषण का विकृत रूप झेलना पड़े तो बचे रहने पर यह उसके पूरे जीवन को दुष्प्रभावित करता है। जिस पशुवत तरीके से मंदसौर में बच्ची के साथ बलात्कार हुआ, पता नहीं वह बची कैसे रह गई।
          मध्य प्रदेश के मंदसौर में छह वर्ष की दिव्या के साथ मोहम्मद इरफान नामक वयस्क शख्स ने जिस तरह यौन शोषण किया, वह आदमी की मानसिक विकृति की पराकाष्ठा है। इस तरह की विकृति दिव्या पर बलात्कार करनेवाले शख्स में अपने आप नहीं आई। यह उसके मतावंलबी समाज और समुदाय द्वारा कालांतर से पोषित विकृति है, जिसका परीक्षण वे अपने परिवार-समाज में तो सहजतापूर्वक कर लेते हैं, लेकिन अन्य मतावलंबी स्त्रीवर्ग पर ऐसा कुत्सित परीक्षण करने के लिए उन्हें अपने परिवार-समाज से प्रोत्साहन मिलता है। बेशक इस बात पर विचार करने के लिए हमारे बुद्धिजीवी और राजनीतिज्ञ सहमत हों, पर इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति और आंकड़़े स्पष्ट बताते हैं कि यह एक समुदाय द्वारा दूसरे समुदाय की महिलाओं, चाहे वह किसी भी आयु वर्ग की हों, को लक्षित कर होनेवाली घटनाएं हैं।
          बलत्कृत होने के बाद दिव्या की मरणासन्न स्थिति पर पहले-पहल औपचारिक-आधिकारिक रूप में कोई प्रतिक्रिया कहीं से नहीं उभरी। सोशल मीडिया में बात फैलने और बड़ी संख्या में लोगों के विरोध, प्रदर्शन और बलात्कारी को फांसी देने की मांग के बाद मुख्य मीडिया में इस घटना की चर्चा हुई। अप्रैल में जम्मू-कश्मीर के कठुआ में आसिफा नामक जिस लड़की से बलात्कार होने की खबरें प्रसारित हुईं और जिस तरह मीडिया, फिल्मी जगत और बाकी लोगों ने इस घटना पर प्रतिक्रिया दी, उसकी तुलना में मंदसौर में बलत्कृत बच्ची के लिए इनमें से किसी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
कठुआ में जिस बच्ची को बलात्कार के बाद वीभत्स तरीके से मारा गया था, वह अप्रैल से कई माह पूर्व की घटना थी। और जिन लोगों को बच्ची से बलात्कार करने के लिए पकड़ा गया, वे खुद के निर्दोष होने के लिए राज्य सरकार से सीबीआई जांच की मांग भी खुद कर रहे थे। तीन माह बीत जाने पर भी आसिफा के बलात्कार के दोषियों पर बलात्कार का दोष सिद्ध नहीं हुआ। स्पष्ट है कि कठुआ की बच्ची से बलात्कार उसी के समुदाय के लोगों द्वारा किया गया और केंद्र की मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए हिंदू पुजारी और अन्य हिंदू लोगों को दोषी बताकर मामले को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचा गया। दुर्भाग्य से संयुक्त राष्ट्र में बैठे लोगों ने भी उस घटना पर संज्ञान लेकर भारत के संबंध में महिलाओं को असुरक्षित बताने और भारत को हिंदू मान्यताओं के आधार पर महिलाओं के लिए असुरक्षित बताने का दुष्चक्र रचा।
          यदि समाज और सामान्य लोग बलात्कार पर धर्म, समुदाय आदि के आधार पर भेद करते हैं तो क्या कथित लोकतंत्र के जिम्मेदार स्तंभ सरकार, प्रेस और अदालतों को भी ऐसे ही चलना चाहिए। अगर ऐसा नहीं था तो मंदसौर की घटना पर जिम्मेदार लोकतांत्रिक स्तंभों में से एक मीडिया और उसमें भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एक हिस्से में इस घटना के प्रति संवेदनहीनता क्यों है? क्यों यह हिस्सा मंदसौर की घटना को अपने मीडिया चैनलों पर दिखाना तक नहीं चाहता?
क्या इसलिए कि मंदसौर में जिस बच्ची के साथ बलात्कार हुआ वह हिन्दू थी और जिसने बलात्कार किया वह मुसलमान था। और मीडिया का यह हिस्सा अपनी संरक्षक कांग्रेस पार्टी के आदेश पर मुसलमानों द्वारा किए जा रहे किसी भी अपराध, अत्याचार और सामाजिक-राजनीतिक विध्वंस पर कुछ कहना ही नहीं चाहता। ऐसे में यदि ये लोग कठुआ बलात्कार की घटना पर हिन्दुओं का अपमान करने के लिए षडयंत्र के तहत दोषी बनाए गए हिन्दुओं को केंद्र में रख एक निश्चित एजेंडा पर खबरें चलाएंगे और देश-विदेश में हिन्दू मत से खार खानेवाले इस एजेंडे से प्रभावित होकर पूरी दुनिया में हिन्दू विरोधी दुष्प्रचार में लिप्त होंगे, तो क्या यह स्थिति किसी भी लोकतंत्र के लिए सुखद होगी? क्या ऐसे राजनीतिक षड्यंत्र स्पष्ट रूप में मुसलिम वोटों के लालच में नहीं किए जा रहे? क्या इससे भारत या किसी भी देश में लोकतांत्रिक संतुलन स्थापित किया जा सकता है?
          ये ऐसे प्रश्न हैं जो इस देश के अधिसंख्य भारतीयों को यानि कि बहुसंख्यक भारतीयों को विचलित करते हैं। ऐसे में लोकतंत्र के प्रति आस्थावान रहना लोगों के लिए संभव नहीं। मोदी सरकार को इस दिशा में सोचकर कुछ कड़े निर्णय लेने ही होंगे। और सबसे पहले लिए जानेवाले निर्णय के अंतर्गत जनसंख्या नीति केंद्र सरकार के मुख्य कार्यों में सर्वोपरि कार्य होना चाहिए।
यदि हम जन-जीवन की सभी समस्याओं के केंद्रक कारण की पड़ताल करते हैं, तो सबसे बड़ी समस्या जनसंख्या वृद्धि की है। यह समस्या केवल जन-जीवन को खतरे में डाल रही है अपितु प्रकृति-पर्यावरण के असंतुलन का भी कारण बन रही है। राष्ट्रीय नियम-कानूनों के प्रति उदासीन होकर मुसलमान जिस तेजी से अपनी जनसंख्या बढ़ा रहे हैं, उससे शिक्षा लेकर कई देशों में लोकतांत्रिक प्रणाली को संशोधित किए जाने पर मंथन चल रहा है। रूस, चीन, इजरायल जैसे देश इस दिशा में संवेदनशील तरीके से कदम बढ़ा रहे हैं।
भारत को भी देश के शहरों में बढ़ती और जनतांत्रिक व्यवस्था तथा प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ने का कारण बनी जनसंख्या पर नियंत्रण करना होगा। मंदसौर जैसी घटनाएं हमारे लिए जनसंख्या वृद्धि को रोकने की बड़ी प्रेरणा बन सकती हैं। लोगों को इस काम को पूरा करने की आशा वर्तमान मोदी सरकार से ही है, अन्यथा कांग्रेस तो देश-समाज का बेड़ा गर्क पहले ही कर चुकी है। जिस बच्ची का बलात्कार हुआ हो और बलात्कार करनेवाले समुदाय के लोग इस पाप के लिए दोषी की धार्मिक अंधविश्वास के आधार पर प्रशंसा कर रहे हों, देश का तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग मौन धारण किए बैठा हो, मीडिया का एक वर्ग इस खबर पर ध्यान नहीं दे रहा हो और कांग्रेस पार्टी के मध्यप्रदेश स्थित नेता बलात्कारी के पक्ष में राजनीतिक संरक्षक बनकर खड़े हों, इन परिस्थितियों में बच्ची के अभिभावकों तथा दूसरे संबंधियों पर क्या बीतती होगी, इसकी कल्पना करने से ही शरीर में रक्त जम जाता है।
वैसे तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सार्वजनिक सभा में दिव्या के बलात्कारी को जल्द से जल्दी फांसी पर चढ़ाने का वचन दिया है, लेकिन अपराधियों के साथ अदालतों के माध्यम से जैसा व्यवहार होता हुआ आया है, उस स्थिति में लगता नहीं कि चौहान अपना वचन पूरा कर पाएंगे। दिल्ली में दामिनी के बलात्कारियों पर अभी तक अदालत द्वारा अंतिम निर्णय नहीं हो सका है। राजकाज और न्यायालयों की ऐसी कार्यप्रणाली लोगों में लोकतंत्र के प्रति अविश्वास उत्पन्न करती है। कालांतर में लोकतंत्र का विघटन इन्हीं कारणों से होता है। मध्य प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार को इस दिशा में ठोस और त्वरित निर्णय लेने चाहिए और बलात्कारियों को एक महीने नहीं बल्कि पन्द्रह दिन में ही फांसी पर चढ़ा देना चाहिए। तब जाकर दिव्या जैसी बच्चियों के साथ थोड़ा सा न्याय हो पाएगा।

2 टिप्‍पणियां:

  1. इस मामले में फ़ास्ट ट्रेक कोर्ट के गठन की बात हुयी थी पर शायद अभी सरकार सो रही है .।।
    और राजनीति बाक़ी है अभी इस मामले में ... शर्म की बात है ...
    न्याय कैसे मिलेगा क्या पता ...

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  2. ऐसे जघन्यतम अपराधों का भी राजनीतिकरण होगया है . पर बच्चियाँ तो एकसी मासूम हैं चाहे किसी जाति धर्म की हों उनपर हुए अत्याचार का प्रतिकार निष्पक्ष रूप से होना चाहिए पर कैसे होगा जब लोगों पर कुर्सी का जिन्न हावी होगया हो .

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