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सोमवार, 7 मई 2018

दक्षिण के सहारे तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिश व्यर्थ

ह भारतीय राजनीति में नई बात नहीं कि गैर-कांग्रेसी केंद्र सरकार के विरुद्ध आम चुनाव में उतरने के लिए तीसरा मोर्चा बन रहा है। वास्‍तव में तीसरा मोर्चा का राजनीतिक षड्यंत्र कांग्रेसियों की ही देन है। इसके बनने के दौरान षड्यंत्रपूर्वक कांग्रेस को भी उसकी नीतियों के लिए कोसा जाता है। जनता देखती आई है कि तीसरा मोर्चा की सरकार बनने के दौरान मोर्चा का नेतृत्‍व कांग्रेस कर रही होती है।
विकेश कुमार बडोला  
          भारत में जाति, उप-जाति, छोटी-बड़ी जाति, धर्म, धार्मिक शरणार्थियों के आधार पर राजनीतिक पद प्राप्‍त करने के आसान और घृणित मौके हमेशा से मौजूद रहे हैं। इसके अलावा जातिगत आरक्षण और धार्मिक तुष्टिकरण जैसे राजनीतिक अस्‍त्र तो हैं ही। इनका इस्‍तेमाल करके राजनीतिक दल और उनके अयोग्‍य नेता चुनाव जीतते आए हैं।
          2014 के आम चुनाव से पूर्व मोदी को भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री का उम्‍मीदवार क्‍या बनाया गया कि उनके विरोध की पतित, घृणित व कुत्सित राजनीति ने सारी सीमाएं लांघ दी। उस समय मोदी विरोध का छोटा-बड़ा हर पहलू इतना निम्‍नस्‍तरीय था कि लगने लगा कि इस देश का लोकतंत्र कितना विरोधाभासी, आभासी और अनुचित है। तब कांग्रेसी नेतृत्‍व में तीसरा मोर्चा मोदी विरोध के लिए राष्‍ट्रव्‍यापी आकार ग्रहण करने लगा। कांग्रेस, वामपंथ, तुष्टिकरण की राजनी‍ति पर सत्‍तारूढ़ त्रृणमूल कांग्रेस, जातिगत राजनीति करनेवाले सपा-बसपा, जदयू-राजद, दक्षिण भारतीय राजनीति के क्षेत्रीय राजनीतिक दल, केरल-पूर्वोत्‍तर के वामपंथी सेकुलर सोचवाले सभी दल यह सोचकर फर्जी विपक्षी एकता का राग गाने लगे कि किसी तरह मोदी को सत्‍तारूढ़ होने से रोका जाए।
यदि भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस के स्‍वयंसेवकों ने चुनाव आयोग के साथ चुनावी प्रक्रियाओं पर गहन निगरानी नहीं रखी होती तो निश्चित था कि विपक्षी रानजीतिक दल अपने उद्देश्‍य में सफल हो जाते, वोटों का हेर-फेर कर भाजपा को बहुमत से वंचित कर देते। चुनाव के दौरान और चुनाव जीतने के बाद मोदी के प्रधानमंत्री बनने की अभूतपूर्व घटना तथा देश को सुशासन की राह पर आगे बढ़ाने के मोदी के प्रयासों को विपक्ष, उसके संरक्षित मीडिया द्वारा हमेशा उपेक्षित किया गया। पिछले चार वर्षों में केंद्र सरकार ने जो जनकल्‍याणकारी योजनाएं बनाई हैं, उनके क्रियान्‍वयन और सकारात्‍मकता के बारे में मीडिया ने कोई उल्‍लेख नहीं किया। सरकार की अनगिन उपलब्धियों, विदेश नीति की सफलता पर भी मीडिया शांत है।
यदि इस युग में सोशल मीडिया का अस्तित्‍व नहीं होता तो इस देश में कांग्रेस कभी सत्‍ता से बाहर नहीं हो सकती थी और मोदी या उनके जैसे व्‍यक्ति कभी प्रधानमंत्री नहीं बन पाते। कांग्रेस संरक्षित मुख्‍य मीडिया कभी भी कांग्रेसी भ्रष्‍टाचार के बारे में उतने विस्‍तार से नहीं बता सकता था, जितना कि देश के लोगों को सोशल मीडिया से पता चला है। जितने काम पिछले चार वर्षों में मोदी सरकार ने देश-विदेश में किए हैं, अगर ये काम सुशासन धारणा के बलबूते कांग्रेस ने किए होते तो मीडिया उसके प्रशंसागीत गाते-गाते थकता नहीं। लेकिन अब इन बातों को जनता अच्‍छी तरह से जानती है। अब विपक्ष के रूप में चाहे कांग्रेस हो या अन्‍य क्षेत्रीय दल वे विकास में पिछड़ने के लिए केंद्र सरकार पर अनर्गल आरोप नहीं मढ़ सकते क्‍योंकि सच और झूठ, जो कुछ है, सब लोगों के सामने है। और लोग राजनीति समझने के लिए राजनेताओं से भी तेज तर्कशक्ति वाले बन चुके हैं।
2014 की ही तरह 2019 के लिए भी कांग्रेस के गुप्‍त नेतृत्‍व में तीसरा मोर्चा मोदी विरोध में देशव्‍यापी आकार लेने लगा है। केंद्र की राजनीति की धुरी कहलानेवाले यूपी-बिहार-मध्‍य प्रदेश-राजस्‍थान-महाराष्‍ट्र सभी बड़े राज्‍यों में भाजपा सरकार है। इन राज्‍यों में लोगों को विश्‍वास में लेकर विकास और जनकल्‍याणकारी कार्यों को जन-जन तक पहुंचाया जा रहा है। इसीलिए क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के लिए इन राज्‍यों से तीसरा मोर्चा के लिए जरूरी गठबंधन की उम्‍मीदें नहीं हैं।
यहां तीसरा मोर्चा बनाने के लिए आवश्‍यक भाजपा विरोधी जनाधार नहीं मिला तो सपा-बसपा के नेता आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल और अन्‍य गैर-भाजपाई राज्‍यों में जा-जा कर तीसरा मोर्चा बनाने में जुटे हैं। हाल ही में सपा अध्‍यक्ष अखिलेश तेलंगाना के मुख्‍यमंत्री के. चन्‍द्रशेखर राव से मिलने हैदराबाद पहुंचे और तीसरा मोर्चा के लिए चर्चा की। कुछ दिन पहले आंध्र प्रदेश के मुख्‍यमंत्री चंद्रबाबू नायडू भी केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा बनाने पर जोर दे रहे थे। वास्‍तव में केंद्र की सहयोगी नायडू की तेदेपा और महाराष्‍ट्र की शिवसेना, दोनों क्षेत्रीय दल राजग के साथ बने रहने में दिक्‍कत महसूस कर रहे हैं। वे राजग से अपने-अपने राज्‍यों के लिए आशा के अनुरूप बजट व काम नहीं निकलवा पाए हैं। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना राज्‍यों में लोगों के प्रिय मुख्‍यमं‍त्रियों के सत्‍तारूढ़ रहते और इन राज्‍यों में भाजपा का जनाधार न के बराबर होने के चलते पूरे भारत के विपक्षी राजनीतिक दल तीसरा मोर्चा का नेतृत्‍व इस बार इन दो राज्‍यों को सौंपना चाह रहे हैं। हालांकि इस बार तीसरा मोर्चा बनने के प्रयास इसलिए आगे नहीं बढ़ पा रहे थे क्‍योंकि प्रदेशों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के हारने और भाजपा के जीतने का क्रम टूट नहीं रहा।
इस सब के प्रभाव में यह आशा करना बिलकुल आश्‍चर्यजनक नहीं कि 2019 आम चुनाव से पूर्व भाजपा कर्नाटक, मध्‍यप्रदेश और राजस्‍थान जैसे बड़े राज्‍यों में चुनाव जीतकर विपक्षी ताबूत पर आखिरी कील ठोक दे। यदि आगमी आम चुनाव से पूर्व भाजपा निर्धारित तीन-चार राज्‍यों (विशेषकर कांग्रेस शासित कर्नाटक) में सत्‍तारूढ़ होती है या बढ़े हुए जनाधार के सहारे सत्‍तासीन हुई तो निश्‍चित है कि तीसरा मोर्चा बनने की प्रक्रिया स्‍वत: ही ध्‍वस्‍त हो जाएगी। साथ ही इस बात में भी कोई आश्‍चर्य नहीं कि तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिश में शामिल कुछ क्षेत्रीय दल और विभिन्‍न राष्‍ट्रीय-क्षेत्रीय दलों के नेता अपना राजनीतिक अस्तित्‍व बचाने के लिए अपने बचे-खुचे जनाधार के साथ राजग में शामिल हो जाएं। 
इसलिए यह निष्‍कर्ष राजनीतिक रूप में सत्‍य प्रमाणित होने जा रहा है कि सपा-बसपा, त्रृणमूल कांग्रेस, केसीआर-तेदेपा, राजद, डीएमके-एआईडीएमके तथा अन्‍य क्षेत्रीय दलों की 2019 से पहले जो राजनीतिक कोशिश तीसरा मोर्चा के रूप में उभर रही है, वह बहुत ही दुस्‍साहसी कोशिश है। इस बात की प्रबल संभावना है कि इस कोशिश का उनके राजनीतिक रूप में अनस्तित्‍व हो जाने से सीधा संबंध तैयार हो रहा है। इसलिए उन्‍हें तीसरा मोर्चा के मोह से बाहर आना चाहिए। कांग्रेस के झांसे में आने से बचना चाहिए। हो सके तो क्षेत्रीय पार्टियां अपने स्‍तर पर अपने परंपरागत जनाधार का सम्‍मान करते हुए ही आम चुनाव में उतरें। इसी में उनका कल्‍याण है। भाजपा से राजनीतिक प्रतिस्‍पर्द्धा करने में क्षेत्रीय दलों की ही हानि होगी।

1 टिप्पणी:

  1. सत्ता के खेल में कुछ भी संभव है ...
    नापाक गठजोड़ बनेंगे ... अगर देश की जनता ने नहीं सोचा तो कुछ भी संभव है देश में ...

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