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बुधवार, 21 मार्च 2018

उप-चुनाव के बहाने बनी राजनीतिक लीक के घिनौने पक्ष

(विकेश कुमार बडोला)
देश विचित्र राजनीतिक मोड़ पर है। लोकतंत्र, संविधान और कानून के समग्र विरोधाभास सड़क से संसद तक घृणास्‍पद रूप में मौजूद हैं। इसके बाद भी, इतना वैचारिक-राजनीतिक और इसके परिणामस्‍वरूप सामाजिक-वैयक्तिक पतन देखते रहने के बाद भी, ज्ञानी-अज्ञानी सभी लोकतंत्र का राग अलापते रहते हैं। इस समय देश पूरी तरह दो राजनीतिक ध्रुवों में बंट चुका है। भाजपा के नेतृत्‍व में राजग शासन पांच वर्षीय लोकतांत्रिक कार्यकाल पूरा भी नहीं कर पाया कि सत्‍ता से दूर रहने की कांग्रेसी व विपक्षी राजनेताओं की छटपटाहट व्‍यर्थ, अनावश्‍यक और घिनौने घटनाक्रमों-गतिविधियों का कारण बन रही है।
इस सब के कारण देश में राजनीतिक रूप में भाजपा की स्‍वीकार्यता और प्रासंगिकता की बातें, चिंतन सब कुछ पृष्‍ठभूमि में पहुंच चुका है। कांग्रेस सरकार की तुलना में भाजपा के श्रेष्‍ठ राजनीतिक कार्यों का निष्‍पक्ष मूल्‍यांकन भी नहीं हो पा रहा। कल्‍पना की जा सकती है कि यदि भाजपानीत राजग के कार्य कांग्रेसी सरकार ने किए होते तो मीडिया वर्षों तक इन कार्यों की विरुदावलियां गा रहा होता। ऐसा इसलिए क्‍योंकि ज्‍यादातर मीडिया घराने कांग्रेसी जमाने में स्‍थापित हुए थे और किसी न किसी रूप में वे कांग्रेसी नेताओं या कांग्रेस के व्‍यापारियों से जुड़े हुए हैं। इसीलिए अभी तक उनकी पत्रकारिता की पड़ताल कांग्रेस केंद्रित बनी हुई है। यह जानते हुए भी कि कांग्रेस के काले-कारनामों ने तीन-चार भारतीय पीढ़ियों को मूल जीवन संस्‍कारों से अलग कर उनके जीवन को बर्बाद कर दिया है, तब भी वे कांग्रेस को ही राजनीतिक अतिक्रामक बनाकर लोकतंत्र के लिए सर्वथा उचित मान रहे हैं। कांग्रेसी शासनकाल में इस हेतु गढ़ी गईं या कहें संविधान में संशोधित धर्मनिरपेक्षता, सहिष्‍णुता की परिभाषाएं अब इस समयकाल तक हिन्‍दुओं के लिए लोकतांत्रिक रूप में आत्‍मघाती होती जा रही हैं। संभवत: इस विचार तक कांग्रेसी नीति नियामक पहुंच नहीं पा रहे। आखिर कांग्रेसी चाहते क्‍या हैं? क्‍या वे हिन्‍दुओं के लिए आत्‍मघाती लोकतांत्रिक वातावरण बना उन्‍हें बलात अपनी राजनीतिक महत्‍वकांक्षाओं के अनुकूल निर्मित लोकतंत्र में मात्र मतदाता बनाए रखना चाहते हैं? कांग्रेस के सत्‍तारूढ़ रहने के समय या उनकी राजनीति में ऐसा हुआ या होता रहा, यह कल्‍पना नहीं। एक संवेदनशील हिन्‍दू सरकारी व सार्वजनिक जीवन में ऐसा अनुभव करता रहा है।
     हिन्‍दुओं के प्रति ऐसी कांग्रेसी मानसिकता ने ही 2014 में कांग्रेस का राजनीतिक मान-मर्दन किया और भाजपा को राजसेवा का अवसर प्रदान किया। तब से भाजपा विभिन्‍न राज्‍यों के विधानसभा और अन्‍य चुनाव निरंतर जीतती रही है। भाजपा ने मार्च में पूर्वोत्‍तर के त्रिपुरा में दो दशक से अधिक समय तक सत्‍तारूढ़ रहे वामपंथ के पैरोकार राजनी‍तिक दल को पराजित कर सत्‍ता प्राप्‍त की। नगालैंड व मेघालय में भी वह सरकार बनाने में कामयाब रही। राजनीतिक रूप में यह ऐतिहासिक उपलब्धियां हैं। लेकिन भाजपा विरोधी मीडिया ने इस पर चुप्‍पी बनाए रखी। जबकि उत्‍तर प्रदेश की गोरखपुर, फूलपुर और बिहार की अररिया लोकसभा सीट पर हुए उप-चुनाव में भाजपा पराजित क्‍या हुई कि चुप्‍पी साधे बैठा मीडिया पुन: सक्रिय हो गया। विगत एक-डेढ़ वर्ष में मध्‍य प्रदेश, पंजाब, राजस्‍थान, उत्‍तर प्रदेश और बिहार में कुछ संसदीय और विधानसभा सीटों पर भाजपा की हार ने पूरे राजनीतिक विपक्ष को भारतीय राजनीति के केंद्र में आने के लिए एक मृगमरीचिका जैसा विचार दे दिया है। गोरखपुर, फूलपुर और अररिया के उप-चुनाव परिणामों ने विपक्षी राजनीतिक दलों और उनके पक्ष में सक्रिय मीडिया को फि‍र से उछल-कूद करने का मौका दे दिया है।
     जो भी आम और खास उप-चुनावों की एकाधिक सीटों पर भाजपा के हारने का राजनीतिक उत्‍सव मना रहे हैं और जिन क्षेत्रीय दलों के जीतने पर मना रहे हैं, उन्‍हीं के एक नेता के भाजपा में शामिल हो जाने पर भाजपा विरोधियों को वह (नरेश अग्रवाल) पतित नजर आने लगे। यह सच है कि नरेश अग्रवाल के ऊल-जुलूल वक्‍तव्‍य और राजनीतिक गतिविधियां घिनौनी रही हैं, पर वह जिस दल को छोड़ आए हैं, वह सपा और सपा ने उप-चुनावों के लिए जिस धुर विरोधी बसपा से गठबंधन किया, वह बसपा तथा इन दोनों दलों के नेता, कार्यकर्ता कितने सज्‍जन हैं, यह सभी जानते हैं। दल बदलू नेता के रूप में नरेश अग्रवाल को कोसना ही है तो वही क्‍यों, सपा-बसपा और कांग्रेस, यहां त‍क कि भाजपा में भी अपराधी और अनुत्‍तरदायी राजनेताओं की लंबी सूची है। क्‍या उन सभी को इस बात के लिए कठघरे में खड़ा नहीं किया जाना चाहिए कि उनकी चहुंमुखी कमियों के होते हुए भी राजनीति में वे आए ही क्‍यों और किस अधिकार से। क्‍या इस स्थिति में लोकतांत्रिक जनप्रतिनिधित्‍व कानून अपने आप में अवैध प्रतीत नहीं होता कि उसने ऐसे लोगों को जनप्रतिनिधित्‍व करने ही क्‍यों दिया या करने दे रहा है। इस संबंध में सबसे अनिवार्य प्रश्‍न तो यह है कि ऐसा कानून किस राजनीतिक दल के संरक्षण में रचा गया और राजनीतिक हितों को साधने के लिए दशकों तक जबरन बना ही रहा। लेकिन स्‍वार्थ पोषित राजनीतिक आरोपों-प्रत्‍यारोपों के चलते ऐसे वास्‍तविक प्रश्‍न सामने आते ही नहीं। समस्‍या यह है कि नरेश अग्रवाल जब तक सपा में थे, तब तक वे पतित होकर भी मीडिया के लिए उचित थे। उनका पतित होना तब सिद्ध और प्रसिद्ध हो रहा है, जब वे भाजपा के पाले में आ गए हैं। इससे बड़ा राजनीतिक विरोधाभास कांग्रेस सहित यूपी व अन्‍य प्रदेशों के क्षेत्रीय दलों का क्‍या हो सकता है।
वास्‍तव में यूपी और बिहार के उप-चुनावों को न केवल जातिगत, धार्मिक आधार पर भाजपा के विरोध में लामबंद किया गया, अपितु चिटफंड का कारोबार करनेवाले कुछ कॉर्पोरेट्स ने भ्रष्‍टाचार की अपनी हिलती बुनियाद के डर, भाजपा के कानूनी शासन के भय से चिटफंड से जुड़े अपने कार्यकर्ताओं को मोटा बोनस देकर निवेशकर्ताओं को भाजपा के विरोध में जाने का लालच दिया। यह काम पेशेवर ढंग से और गहन षड्यंत्र कर किया गया। इसके लिए सार्वजनिक घोषणाएं, भाषण नहीं हुए। चिटफंड कंपनी चलानेवाले माफि‍याओं ने यह सब निवेशकर्ताओं के घर-घर जाकर किया। बल्कि सपा-बसपा का गठजोड़ कोई राजनीतिक गठजोड़ नहीं। इसमें बसपा को ऊंची कीमत देकर गठबंधन किया गया और उप-चुनाव में अपना प्रत्‍याशी नहीं उतारने के लिए तैयार किया गया। चिटफंड, रेत, स्‍कूल, हास्पिटल, इत्‍यादि का कारोबार चलानेवाले माफि‍याओं के लिए सपा जैसा राजनीतिक दल ही सरकार के रूप में ठीक था। ये लोग भाजपा शासन में पस्‍त हो रखे हैं। इनके काले चिट्ठे और कारनामे इन्‍हें बहुत जल्‍दी कालकोठरी में पहुंचा सकते हैं, इस डर से इन्‍होंने उप-चुनावों में पूरा जोर लगा दिया। ऐसा नहीं कि इन चुनावों में भाजपा का मत प्रतिशत बहुत ज्‍यादा गिरा। बल्कि सपा को सत्‍तारूढ़ देखने के इच्‍छुक धन-संसाधन संपन्‍न माफि‍या-कॉर्पोरेट कॉकटेल ने मुसलिमों और निम्‍न जाति के सभी मतदाताओं को वोट करने के लिए पैसे आदि का लालच दिया। देखा-सोचा जाए तो तीनों सीटों पर सपा व राजद का लाख-डेढ़ लाख वोट से जीतना कोई बड़ी बात नहीं।
भाजपा की हार का दूसरा महत्‍वपूर्ण पहलू अपने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा है। किसी भी राजनीतिक दल के लिए सुशासन व पारदर्शी शासन का तात्‍पर्य यह नहीं होना चाहिए कि वह अपने कार्यकर्ताओं के वेतन और मूलभूत आवश्‍यकतों की अनदेखी करने लगे। कोई भी दल कार्यकर्ताओं से बनता है। और कार्यकर्ता सर्वप्रथम एक सामाजिक व पारिवारिक प्राणी है, जिसे परिवार चलाने और समाज में गुजर-बसर करने के लिए धन-संसाधन की आवश्‍यकता है। नोटबंदी और जीएसटी जैसे राजनीतिक निर्णयों के दूरगामी सुखद परिणाम जब आएंगे तब आएंगे, लेकिन इन्‍होंने भ्रष्‍टाचारियों के साथ-साथ दैनिक श्रमिक के रूप में कार्यरत राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए भी कठिनाइयां खड़ी की हैं। कठिनाइयां बेरोजगारी, मंदी के रूप में हों या नकदी के अभाव में जीवन का गुजारा न होने के रूप में, इनकी चपेट में राजनीतिक कार्यकर्ता भी आते ही आते हैं।

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सटीक और सारगर्भित आंकलन...

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  2. शेर का विरोध जंगल के अधिकाँश जीव करते होंगे ...
    ऐसे ही देश में घूर विरोधी भी मिल रहे हैं और देश के लिए नहीं ... बस अपनी गन्दी राजनीति को पनपाने के लिए ... समाज नहीं खड़ा होगा तो मिटेगा ... सारगर्भित आलेख ...

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  3. कितनी पारखी नजर है , कितना महीन विश्लेषण है । सबों की आँख खुले तो परिवर्तन अवश्य होगा ।

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