महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

शुक्रवार, 6 अक्तूबर 2017

शरणार्थियों को झेलने की स्थिति में नहीं है भारत

विकेश कुमार बडोला 
जकल म्‍यांमार के रो‍हिंग्‍या मुसलमानों को भी बतौर शरणार्थी भारत में बसाने के लिए सरकार विरोधी एक वर्ग बहुत प्रयास कर रहा है। विरोधी नेताओं, अधिवक्‍ताओं, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों तथा इनके समर्थक आम लोगों की राय है कि भारत को रोंहिग्‍याओं को शरण देनी चाहिए। इस हेतु वे अंतर्राष्‍ट्रीय शरणार्थी संधि, मानवाधिकार सिद्धांत तथा उस भारतीय परंपरा का उदाहरण सम्‍मुख रख रहे हैं, जिसमें निर्वासितों को शरण देने की धर्मनीति प्रयुक्‍त है। लेकिन इस युग में जब भारत खुद अति जनसंख्‍या भार से दबकर जीवन हेतु अनिवार्य खाद्यान-आवास-स्‍वास्‍थ्‍य सुविधाएं अपने स्‍वयं के लोगों को उनकी परिश्रमी जीवनचर्या के बाद भी उपलब्‍ध नहीं करा पा रहा, तो शरणार्थियों के रूप में लाखों-करोड़ों मुसलिमों को कैसे अपने देश में बसा सकता है।
शरणार्थी मात्र शरणार्थी हों, संख्‍या में कम हों तथा शरण देनेवाले राष्‍ट्र के नियम-कानून, समाज विज्ञान, धर्म-संस्‍कार और संस्‍कृति को आत्‍मसात कर उस देश के विकास में अपना व्‍यक्तिगत योगदान देने का दृष्टिकोण रखते हों, तो तब शरण देने के लिए विचार किया जा सकता है। परंतु यदि शरणार्थी आतंक और धर्मांध क्रूरता पर आधारित हिंसा, रक्‍तपात व एकाधिकारवादी मानसिकता से ग्रस्‍त हों, तो उन्‍हें शरण देने के लिए किसी भी राष्‍ट्रीय-अंतर्राष्‍ट्रीय दबाव में नहीं आना चाहिए। चाहे फि‍र यह दबाव अंतर्राष्‍ट्रीय संधि का पालन करने के रूप में हो या शरण देने की भारतीय वैदिक परंपरा के रूप में।
इतिहास साक्षी है कि यहां शरण पाए लोगों ने कालांतर से भारतवर्ष को एक कुंठित मिश्रित राष्‍ट्र के रूप में बदल कर रख दिया है। आज हमारे अपने ही देश में अपने सनातन धर्म-संस्‍कृति तथा समाज के लिए जो अन्‍य तरह-बेतरह के धर्म और अपसंस्‍कृतियां चुनौती बनी हुई हैं, वह शरणार्थी नीति को उदार बनाने की हमारे पूर्वजों की महान भूल ही थी। हमें इस भूल से अवश्‍य सीख लेनी चाहिए। भारत को शरणस्‍थल बनाने से पूर्व हमारे पूर्वजों ने यदि हमारे भविष्‍य का विचार नहीं किया, तो क्‍या हम भी उन्‍हीं की तरह तात्‍कालिक उदारता की भावोपलब्धि के मोह में अपनी भावी पीढ़ी का जीवन असुरक्षित कर दें। हमें ऐसा नहीं करना। सरकार को इस संबंध में बहुत ही कठोर दृष्टिकोण अपनाना होगा। रोहिंग्‍याओं को भारत में शरण दिलवाने के लिए संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद के देशों ने अच्‍छी कूटनीति अपनाई है। म्‍यांमार देश की सीमा से चीन बहुत नजदीक है, लेकिन घोर आश्‍चर्य कि अंतर्राष्‍ट्रीय शरणार्थी संधि का हवाला देनेवाले देश तथा मानवाधिकारवादी चीन पर म्‍यांमार से भगाए गए रोहिंग्‍याओं को शरण देने का दबाव नहीं बना पा रहे। आखिर रोहिंग्‍याओं को म्‍यांमार से इतनी दूर भारत में ही क्‍यों शरण लेनी है। क्‍या गजब स्थिति है।
भारत में वर्तमान सत्‍ता के विरोधियों और अंतर्राष्‍ट्रीय शरणार्थी व मानवाधिकार संधि का अनुपालन करवाने वालों के बीच यह कैसा मैत्रीपूर्ण सहयोग है कि वे रोहिंग्‍याओं को केवल और केवल भारत में ही घुसाना चाहते हैं। समझने में बिलकुल दिक्‍कत नहीं कि यह सब कुछ भारत में विरोधियों की राजनीति के लिए वोट बैंक का आधार बनाने हेतु किया जा रहा अंतर्राष्‍ट्रीय षड्यंत्र है।
कभी किसी समयकाल में यह उचित था कि कोई राष्‍ट्र अपने यहां दूसरे राष्‍ट्र से आए लोगों को शरण दे। लेकिन आज शरणार्थ के संबंध में कुछ प्रश्‍न स्‍वाभाविक रूप से पीड़ित करते हैं। प्रथम, क्‍या ऐसा कोई भी राष्‍ट्र जो प्रवासियों को अनुदान देने या आतंकी पृ‍ष्‍ठभूमि के मुसलमानों को अपने यहां बसाने की बात कर रहा हैपहले उसे अपने मूल नागरिकों का जीवन स्‍तर ऊंचा नहीं उठाना चाहिएद्वितीय, क्‍या उसे सर्वप्रथम अपने राष्‍ट्र के लोगों की निर्धनताअसहायता और आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक सुरक्षा के बारे में विचार नहीं करना चाहिए?
  सरकार को अपनी देशी-विदेशी विकास संबंधी नीतियां बनाते समय इस पहलू पर अवश्‍य ध्‍यान देना चाहिए। अपने करोड़ों-अरबों नागरिकों का जीवन-स्‍तर सुधारे बिना यदि कोई राष्‍ट्र किसी भी तरह के राष्‍ट्रीय-अंतर्राष्‍ट्रीय संघर्ष में किसी प्रतिष्‍ठामूलक विचार से ग्रस्‍त होता है और उसे लगता है कि इसमें उसकी कूटनीति उसे सफल बनाएगी, तो उसे ऐसी सफलताओं के दूरगामी परिणामों पर भी अनिवार्यत: विचार कर लेना चाहिए। क्‍योंकि बहुधा ऐसा देखा गया कि वर्तमान की सफलताओं के बहुत नीचे भावी कंटक भी दबे होते हैं।
देश में एक ओर दिनों तक भूखे रह दम तोड़नेवाले असंख्‍य भारतीय नागरिक हैंजिन्‍हें अपने मूल नागरिक अधिकारों से भी हाथ धोना पड़ता है और दूसरी ओर शरणार्थी। क्‍या इ‍स स्थिति में हमें अपने राष्‍ट्रीय नेताओं की अपने नागरिकों के प्रति एक ऐसी विरोधाभासी दृष्टि परिलक्षित नहीं होतीजिसमें हम गहराई तक यह सोचने को विवश होते हैं कि अभी भारत के वैकासिक मानदंडों में दूरदर्शितापरिपक्‍वता और न्‍यायिक चेतना की बहुत अधिक कमी है।
स्‍वाभाविक है कि पूर्ण रूप से विकसित होने के लिए कोई भी विकासशील या अर्द्धविकसित राष्‍ट्र विकसित देशों की नीतियों का ही अनुसरण करता है। भारत भी यदि विकसित देशों  जैसा बनना चाहता है तो उसके नीति-निर्धारकों को यह सोचना चाहिए कि वैज्ञानिक तथा आर्थिक सिद्धांतों व धारणाओं के आधार पर विकास के स्‍वप्‍न देखनेवाले विकसित देशों ने अपने यहां विकास की पहली शर्त के रूप में जनसंख्‍या नियंत्रण का उपाय अपनाया। किंतु भारत ने अपने यहां जनसंख्‍या नियंत्रण के लिए अपने लोकतांत्रिक अस्तित्‍व से लेकर आज तक कोई ठोस नीति नहीं बनाई। किसी राष्‍ट्र को विकास के शिखर पर पहुंचने के लिए जिन अति आवश्‍यक नीतियों को निरंतर ईमानदारी से लागू करना पड़ता हैउनमें जनसंख्‍या नियंत्रण नीति अग्रगामी होनी चाहिए। दुर्भाग्‍य से विकासशील राष्‍ट्रों की सरकारों को यह नीति फूटी आंख भी नहीं सुहाती। भारत में भी विसंगत और विद्रूप राजनीतिक धारणाओं के अंतर्गत अति जनसंख्‍या को सत्तारूढ़ होने का आधार मान लिया गया है।
यह भी अत्‍यंत विचारणीय है कि अत्‍यधिक विकसित होने या सर्वाधिक विकसित राष्‍ट्र बन जाने की महत्‍त्‍वाकांक्षाओं के कारण भले ही विकसित देशों को अपने वैज्ञानिक और भौतिक उत्‍पादन के उपभोग हेतु कालांतर में विशाल जनसंख्‍या वाले देशों की ओर ताकना पड़ापरंतु उन्‍होंने भी इन महत्‍त्‍वाकांक्षाओं के दूरगामी दुष्‍परिणामों पर कभी विचार नहीं किया। और आज इसकी परिणति कई तरह की प्राकृतिक आपदाओं, अतिवृष्टियोंनिरंतर बढ़ते आतंकतृतीय विश्‍वयुद्ध होने की प्रकट आशंकाओं और इनके परिणामस्‍वरूप अनंत अव्‍यवस्‍थाओं से घिरे विश्‍व के रूप में सामने है।
      सर्वप्रथम भारत को अपने देश के नागरिकों का जीवन-स्‍तर ऊंचा उठाना चाहिए। इसके बाद ही देश की नीतियों में शरणार्थियों को बसाने की बात होनी चाहिए। इस देश में न जाने कितने स्‍वाभिमानी लोग हैंजो कठोर परिश्रम के बावजूद अपना इतना आर्थिक मूल्‍यांकन होने का अधिकार भी नहीं रखते कि उनकी रोटी-कपड़ा-मकान-स्‍वास्‍थ्‍य की आधारभूत जरूरतें पूरी हो सकें और ऐसे में शरणार्थियों को बसाने को लेकर देश में हलचल होना अत्‍यंत कष्‍टदायी विचार है।   
अब वो समय नहीं कि किसी भी देश के हजारों-लाखों निर्वासितों, शरणार्थियों को अपने यहां बसाने पर परोपकार और जनकल्‍याण करने की प्रशंसा पाई जाए। यह सिद्धांत तब ही प्रशंसनीय हो सकता हैजब शरण देनेवाले की अपनी स्थिति दुरुस्‍त हो तथा उसके अपने नागरिक सुखी-संपन्‍न हों। अपने दीन-हीन, विपन्‍न और लोकतांत्रिक अधिकारों से पूरी तरह वंचित नागरिकों पर शरणार्थियों को अधिमान देने से समस्‍याग्रस्‍त राष्‍ट्र एक नए वर्ग-संघर्ष को ही जन्‍म देता है। इससे शरणार्थियों के बजाए अपने नागरिकों को कई तरह की दिक्‍कतें झेलनी पड़ती हैं।
इस संपूर्ण प्रकरण में लज्‍जाजनक निष्‍कर्ष यही है कि सत्‍ता विरोधी दल और उसके अधिवक्‍ता और समर्थक किसी तरह रोहिंग्‍याओं को शरणार्थी बनाकर उनकी निरंतर बढ़नेवाली जनसंख्‍या का अपने लिए वोट बैंक के रूप में इस्‍तेमाल करना चाहते हैं। जबकि नैतिक रूप में भारत ऐसी आबादी को शरण देने की स्थिति में कदापि नहीं है और न हो सकता है। इस हेतु भारत को चाहे अंतर्राष्‍ट्रीय शरणार्थी संधि का उल्‍लंघन ही क्‍यों न करना पड़े और उस एवज में प्रतिबंध या पक्षपात ही क्‍यों न झेलना पड़े, पर उसे रोहिंग्‍याओं को शरण देने के लिए केवल और केवल कठोरतापूर्वक न ही कहना चाहिए।
मनुष्‍य जीवन पृथ्‍वी पर प्राकृतिक रूप से व्‍यतीत हो रहा होता तो अत्‍यधिक जनसंख्‍या चिंता का कारण कभी न होती। क्‍योंकि प्रकृति में अपने अनेक जीवों (मनुष्‍य सहित) का पालन-पोषण करने की प्राकृतिक योग्‍यता हैजिसे मनुष्‍य कभी अर्जित नहीं कर सकता। लेकिन विलासिता आधारित मनुष्‍य-जीवन अति जनसंख्‍या के साथ कभी संतुलितसुखी नहीं रह सकता। यह बात देशी-विदेशी सत्‍ता-प्रतिष्‍ठानों पर आरूढ़ सत्‍ताधारियों और उनके विद्वान नीति-निर्माताओं को अवश्‍य गांठ बांध लेनी चाहिए।
यदि महासागरों ने यूरोपअफ्रीका और एशिया महाद्वीपों के बीच अपनी प्राकृतिक उपस्थिति दर्ज न कराई होती तो जनसंख्‍या का दबाव एशिया और अफ्रीका तक ही सीमित न रहता। यह यूरोप के विकसित देशों के लिए भी कष्‍टकारी होता। तब शायद यूरोप के विकसित राष्‍ट्र अपनी विकसित मानवीय सभ्‍यता के बावजूद भी जनसंख्‍या के अति दबाव से वैसे ही जूझते जैसे एशिया में भारतपाकिस्‍तानबांग्‍लादेशचीन तथा अफ्रीका में अनेक देश जूझ रहे हैं। देश के मूल नागरिकों की छोटी-छोटी सुख-सुविधाओं का तो स्‍थायी प्रबंध हो नहीं पा रहाऊपर से उन पर शरणार्थियों को आर्थिक सुरक्षा व अन्‍य सुविधाओं के साथ लादना, कहां की समझदारी है। यह कौन सा न्‍यायिक औचित्‍य है भला।  

3 टिप्‍पणियां:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, सूचना जनहित मे जारी ... “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  2. कुछ लोग सच्चाई से मुंह फेर सिर्फ राजनीती करते हैं !

    उत्तर देंहटाएं
  3. दरअसल कुछ लोग भारत विचारधारा से ही सहमत नहीं हैं और दुर्भाग्यवश उन्होंने सत्ता की मलाई लम्बे समय तक चखी है ... और लोगों की नसों में धीरे धीरे ये जहर भी बोने का काम किया है ... इसलिए कुलबुलाहट है देश में ...

    उत्तर देंहटाएं

Your comments are valuable. So after reading the blog materials please put your views as comments.
Thanks and Regards