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शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

इस बरसात में स्वतंत्रता का आयोजन

संसद भवन के भीतर बैठकर बातें बनाना कितना आसान है!
अंग्रेजों से स्वतन्त्रता मिलने के आयोजन पर प्रतिवर्ष का राष्ट्र के प्रति संकल्प दिखाने का राग आखिर में जाकर कानों को चुभने ही लगता है।
संसद भवन के चारों ओर चारों दिशाओं में दिल्ली की हालत इतनी गंदी है कि इस बरसात में अधिकांश शहर और नगर साक्षात नर्क दिखाई देते हैं।
जब दिल्ली के ये हाल हैं तो शेष भारत के दूरस्थ शहरों, नगरों की स्थिति की नारकीय कल्पना सहज ही होने लगती है।
ऐसे में नेताओं के मुख से कोरी महानता की बातों को सुनकर बड़ी खुन्दक आने लगी है।
सभी समस्याओं का मुख्य कारण असंवेदनशील जनसंख्या पर नियंत्रण की बात सरकार करती ही नहीं।
तथाकथित अल्पसंख्यक कहे जानेवाले भी अभद्रता, असभ्यता और देश-समाज में हर प्रकार के विद्रूप वातावरण को फैलाने में अग्रणी बने हुए हैं।
कहने को ये अल्पसंख्यक हैं पर ये बहुसंख्यकों से भी ज्यादा होने वाले हैं।
अल्पसंख्यक कहे जानेवाले लोग पास-पड़ोस के देशों से भी अवैध रूप में भारत में घुस रहे हैं।
सोचा था कांग्रेसियों के सत्ता में रहने के बाद दक्षिणपंथी सरकार मोदी के नेतृत्व में जनसंख्या नियंत्रण, अवैध घुसपैठ प्रतिबंध और तथाकथित अल्पसंख्यकों की तेजी से बढ़ रही जनसंख्या पर रोक लगाने का उपाय करेगी परंतु वर्तमान सरकार के शीर्ष व्यक्तियों को भी गांधियों की तरह कृत्रिम रूप से महान बनना है।
इसीलिए वे देश के विद्रूप व्यावहारिक वातावरण को देखकर भी जबरन महान वक्तव्य दे रहे हैं।
ऐसी परिस्थितियों में बहुत बेचैनी हो रही है।
लगता है स्वयं को इस देश का नागरिक मानने का शपथपत्र सरकार को सौंप दूं।

1 टिप्पणी:

  1. क्या कहा जाए ? सब के सब फर्क ऊपर - ऊपर ही रह जाते हैं । ऐसे में बेचैन होने के अलावा कोई चारा नजर नहीं आता है ।

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