Sunday, August 6, 2017

हिन्दू विरोधी समाचार पत्र

एक हिन्दी समाचार पत्र के संपादकीय पर नजर पड़ी। इसमें कांग्रेसी सरकार में वित्त मन्त्री रहे एक व्यक्ति के विचार पढ़कर लगा कि पढ़ना-लिखना ही व्यर्थ है। यही समाचार पत्र अपने अगले संपादकीय पेज पर आज देश में उपजे हालातों को सबसे खराब बता रहा था।
सबसे पहले तो उन लोगों पर अचरज हुआ जो ऐसे समाचार पत्र को खरीद और पढ़ रहे हैं। और फिर जिस सरकार और सरकार को चुनने वाले बहुसंख्यक हिन्दुओं के विचारों की उपेक्षा कर यह पत्र वर्तमान सरकार को अनुचित बता रहा है, क्या ये पत्र यह बता सकता है कि वह तब किन लोगों का अभिवेदन (Representation) अपने पत्र के माध्यम से प्रकट कर रहा है। 
इन पत्रों के संपादकीय विभागों में ऐसे लोग बैठे हुए हैं, जिन्होंने रचनात्मक कार्य पत्रकारिता को कांग्रेसी राजनीति से भी घिनौना बना दिया है। इन लोगों के कारण लिखना-पढ़ना, भाषा सम्बन्धी शोध कार्य करना, साहित्य रचना-कर्म तथा स्वस्थ सामाजिक संवाद बनाना अत्यन्त घृणित हो चुका है। दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से ऐसे समाचार पत्रों के पास कांग्रेसी सरकार के दौरान हुए अवैध वित्तीय लेन-देन का बहुत बड़ा हिस्सा जमा है, जिसका दुरुपयोग ये आज तक, कांग्रेस के सत्ता में होने के बावजूद भी कर रहे हैं। 
हमारे हिन्दी पट्टी के पाठक भी भोलेभाले ही हैं, जो ऐसे पत्रों के प्रकाशन की मूल मंशा से अवगत नहीं हैं। पत्रकारिता के नाम पर ऐसे पत्र कुछ भी सकारात्मक और रचनात्मक नहीं कर रहे। ये मात्र अवैध धन-संसाधनों के बल पर जमे हुए हैं। इनका वर्षों से परिचालित प्रकाशन उद्योग अच्छी प्रसार संख्या के आधार पर अधिक विज्ञापन भी बटोर रहा है। इससे भी इनकी आय बढ़ी और बढ़ रही है। लेकिन यदि व्यक्ति समाज के प्रति गहन सरोकारों तथा रचनात्मकता, विशेषकर पत्रकारीय रचनात्मकता के सन्दर्भ में इन पत्रों का विश्लेषण किया जाए तो इनका मूल्यांकन निराश ही करेगा। यह हमारे देश में संवेदनशील लोगों की कमी का ही दुष्परिणाम है कि ऐसे पत्र चल रहे हैं, लोग उन्हें खरीद कर पढ़ रहे हैं। 
जिन राजनीतिक दलों तथा उनके वोट बैंक से सम्बन्धित लोगों के पक्ष में उनकी अनेक बुराइयों विसंगतियों के बावजूद गांधियों के हाथों रचित लोकतन्त्र के व्यर्थ प्रकरणों को यह पत्र प्रकाशित करता है, वास्तव में वह सब कुछ धरती पर एक खतरनाक राजनीति करने का दुष्परिणाम मात्र है। संवेदनशील लोग गांधियों द्वारा निर्मित तन्त्र, विधान या संविधान के अन्तर्गत निर्धारित समाज, धर्म, राष्ट्र की परिभाषाओं को कदाचित उचित नहीं मानते।
मानते क्या, यह उचित है भी नहीं। भला एकता के साथ रहने के लिए दो धर्म, दो मत या दो पंथ होने का क्या तात्पर्य! यह विचार स्वयं में ही व्यर्थ है। विभिन्न धर्मों, पंथों, मतों या विचारों की आवश्यकता ही क्यों हो, जब मनुष्य का मूल शरीर, मूल प्रकृति एक है। मनुष्य की खाद्य अन्य आवश्यकताएं शैशवकाल से एक समान हैं। इनका विभाजन या विद्रूपीकरण तो किशोरावस्था के बाद समाज शासन की कुटिल मंशा से होना शुरू होता है। जो कुछ भी समाज-शासन के मिश्रित कार्य-व्यवहार से अस्तित्व में आएगा वही सब समाज के किशोर मनुष्य सीखेंगे। और वयस्क होने पर उन्हीं बातों, विचारों तथा घटनाओं को महान भी समझेंगे जो ऐसा समाज-शासन उन्हें सिखाएगा। 
अति दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति रही कि सनातन हिन्दू धर्म को वैदिक काल के बाद अनेक सामाजिक, शासकीय, धार्मिक तथा आर्थिक उपनिवेशवादियों ने अपने-अपने अधिकार में लिया। इसके अनेक दुष्परिणाम हुए। सर्वप्रथम हिन्दुओं के मध्य ही अपनी सनातन रीतियों-नीतियों के प्रति मतभेद उभरने लगे। बाहर से आए व्यापारियों और आक्रान्ताओं ने इस मतभेद को उभारने के लिए आधिकारिक वातावरण तैयार करवाया। इससे अपनी ही धार्मिक मान्यताओं के प्रति अनुदार रहनेवाले हिन्दू, आक्रान्ताओं के षड्यन्त्र में सहायक बनने लगे। कालान्तर से भारतीय भूखण्ड यही सहता आया है।
आक्रान्ताओं का वर्तमान रूप कांग्रेस है। इसने अपने दशकों के कार्यकाल में मुसलिम और इसाइयों के विदेशी धनाड्यों (जो अपने देश के अलावा पूरे विश्व में अपने-अपने कृत्रिम धर्मों की कुत्सित जीवनचर्या थोपना चाहते थे) के लिए भारत में हर हिन्दू विचार गतिविधि को नियन्त्रित करने की कोशिश की। हिन्दुओं पर अप्रत्यक्ष अत्याचार करवाए। यदि कांग्रेसी सत्ताच्युत होते, तो हिन्दुओं के पास दो ही विकल्प बचते। या तो वे अपने सनातनी होने के लिए अस्त्र उठाते या मौनवश हो हिन्दूविरोधी कांग्रेसी गतिविधियों में बुरी तरह पिसते।  
लेकिन 2014 में भाजपा के लोकतान्त्रिक उत्थान ने कांग्रेस की यह मंशा पूर्ण होने से पहले ही खत्म कर दी। इसी की भड़ास आजकल निकल रही है। पूर्व वित्तमंत्री नाम और वेश-भूषा से तो हिन्दू हैं परन्तु इनके विचार इनके मौलिक चिन्तन का परिणाम नहीं हैं। ये कांग्रेसी आक्रान्ताओं की भाषा बोल रहे हैं। ये तो इसलिए बोल रहे हैं क्योंकि इनका राजनीतिक मान-सम्मान नहीं रहा और उसके बल पर अवैध धन-संसाधन अर्जित करने के अवसर भी नहीं रहे। पर पत्रों को तो अपनी पत्रकारीय मर्यादा बनाए रखनी चाहिए। ये समाचार पत्र कैसे भूल रहे हैं कि जिस पूर्व वित्त मंत्री को वे अपने संपादकीय पृष्ठों पर भाजपा के व्यर्थ विरोध में आलेखों के रूप में परोस रहे हैं, कभी इन्हीं की सरकार के आए दिन होनेवाले घपलों-घोटालों-अवैध वित्तीय लेन-देनों से इन पत्रों के मुख्य पृष्ठों के शीर्षक काले होते रहते थे। इन्हीं कांग्रेसी मन्त्री की सरकार में आए दिन आतंकवादी राजधानी दिल्ली सहित देश के प्रमुख शहरों में अपने कारनामों को आसानी से अंजाम तक पहुंचा देते थे।
क्या इन समाचार पत्रों को इन दो घटनाओं के आधार पर कांग्रेसी और भाजपाई सरकारों की तुलना नहीं करनी चाहिए? यदि ये ऐसा नहीं कर सकते तो कम से कम यह भी नहीं छापें या लिखें कि आजकल देश में रहना बहुत मुश्किल हो गया है। रहना मुश्किल गलत लोगों का हुआ है वित्त मन्त्री। ऐसे पत्रों के संपादकों को अपनी बिकी हुई आत्मा को थोड़ा सा सच्चाई के उजाले में रखना चाहिए। यदि ये ऐसा नहीं करेंगे तो स्वयं की चौतरफा हानि तो करेंगे ही करेंगे साथ में पत्रकारिता को भी संवदेनशील लोगों की दृष्टि में नकारात्मक उपेक्षित बना कर छोड़ देंगे।  
विकेश कुमार बडोला

3 comments:

  1. बहुत ही बेहतरीन article लिखा है आपने। Share करने के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। :) :)

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  2. सोचने को मज़बूर करता प्रभावी आलेख...

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  3. शुभ संकेत है कि धीरे - धीरे ही सही मगर बाजारू मुखौटा उतर रहा है उन बिके हुए चेहरों से । लोग अंतर भी समझने लगे हैं तो आखिर दुकानदारी कबतक चलेगी ?

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