महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Wednesday, April 13, 2016

सार्वजनिक स्‍थानों पर थूकने पर प्रतिबंध की पहल प्रेरणादायी है

12.04.2016 को
 मूलरूप से जनसत्‍ता के दुनिया मेरे आगे कॉलम में प्रकाशित
विगत दिनों महाराष्‍ट्र सरकार ने सार्वजनिक स्‍थानों पर थूकने पर प्रतिबन्‍ध लगाने के उद्देश्‍य से एक प्रस्‍ताव पारित किया है। सरकार की ओर से बताया गया कि जगह-जगह थूकने से संक्रमणकारी बीमारियां तेजी से फैलती हैं। आशा है जल्‍द ही यह प्रस्‍ताव राज्‍य विधानसभा में एक सार्वजनिक आचार-संहिता बनकर कानूनी रूप धारण कर लेगा और महाराष्‍ट्र में सार्वजनिक स्‍थानों पर थूकने व गंदगी फैलानेवालों पर कानूनी शिकंजा कसना शुरू हो जाएगा। सरकार के इस निर्णय पर बहुत खुशी हुई पर साथ ही इस बात का दुख भी हुआ कि यह खबर जनसंचार माध्‍यमों में उस तरह प्रसारित नहीं हुई, जितना इसका सामाजिक और राष्‍ट्रीय महत्‍व है।
जगह-जगह थूकने से कई तरह के रोग फैलने की आशंका हमेशा बनी रहती है। विशेषकर बच्‍चे जल्‍द ही ऐसे संक्रमण की चपेट में आते हैं। वैसे भी भारतभर में इस तरह से कहीं भी थूकने, कूड़ा-करकट फेंकने, अपशिष्‍ट का समुचित वैज्ञानिक निस्‍तारण न होने के कारण वातावरण विषैल धूल-कणों व हवा से भरा होता है। बीड़ी-सिगरेट और तंबाकू उत्‍पादों का सेवन करनेवाले लोग खुले में थूकते हैं तो परिवेश में लार-थूक-बलगम से उत्‍सर्जित होनेवाले कीटाणुओं की भरमार हो जाती है। विषैले धूल-कणों से भरी धरती और आकाश के बीच की परत इन कीटाणुओं को पनपने का अनुकूल वातावरण मुहैया कराती है। परिणामस्‍वरूप स्‍वस्‍थ लोग और छोटे-छोटे बच्‍चे भी नई-नई बीमारियों, असाध्‍य रोगों की चपेट में आ जाते हैं।
            आज देश में अधिकांश पढ़े-लिखे लोग सार्वजनिक स्‍थानों पर पान-गुटखा-तंबाकू चबाकर थूकनेवालों से परेशान और असहज तो जरूर होते हैं, पर जब कोई राज्‍य सरकार इस असभ्‍य व्‍यवहार को सार्वजनिक रूप से प्रतिबन्‍ध करने का प्रस्‍ताव लेकर आ आती है, तो आश्‍चर्य कि पढ़े-लिखे लोगों के बीच ही इस महत्‍वपूर्ण नीति की चर्चा-परिचर्चा नहीं होती। जो लोग इस सार्वजनिक गंदी आदत से वाकई परेशान हैं, कम से कम उन्‍हें तो सरकार के इस फैसले को युद्धस्‍तर पर क्रियान्वित करने में अपना-अपना सहयोग अवश्‍य देना चाहिए। अगर वे वर्तमान सामाजिक पर्यावरण के साथ-साथ भावी पीढ़ी को स्‍वस्‍थ व नीरोग देखना चाहते हैं, तब तो उन्‍हें ऐसे कार्यक्रमों को एक सामाजिक अभियान बनाने की पहल से अवश्‍य जुड़ना चाहिए। उन्‍हें इतना तो सोचना ही चाहिए कि जब गंदी आदतों से पीड़ित लोग अपनी गंदी आदतों को सरकारी और समाजिक स्‍तर पर मान्‍यता दिलाने के लिए नकारात्‍मक एका बनाए रख सकते हैं, तो अच्‍छी पहल के लिए अच्‍छे लोग सरकार का हाथ क्‍यों नहीं बंटा सकते।
जगह-जगह थूकने की यह आदत हमारे देश में नेताओं से लेकर आम आदमी तक की है। अचरज की बात यह है कि ऐसे लोग थूकने के लिए केवल सार्वजनिक खुली जगह का ही चुनाव नहीं करते बल्कि निजी-सरकारी संस्‍थानों के कूड़ेदानों, शौचालयों में भी थूकने से बाज नहीं आते। यहां तक कि अपने घर के सदस्‍यों के स्‍वास्‍थ्‍य की चिंता भी इनको नहीं होती और अपनी इस बुरी आदत को ये लोग घर पर भी बनाए रखते हैं।
            इस संदर्भ में सालों पुरानी एक बात याद आती है। उत्‍तर प्रदेश की हाई टेक सिटी नोएडा की अट्टा मार्किट में पहले श्रमिक न्‍यायालय हुआ करता था। न्‍यायालय एक भवन की दूसरी मंजिल पर स्थित था। मैं वहां किसी कार्य के सिलसिले में अकसर जाया करता। वहां पहली मंजिल से शुरू और दूसरी मंजिल तक निर्मित सीढ़ियों के किनारों व दीवाल पर गुटखा, पान-तम्‍बाकू की पीकें थूकी हुई मिलती। मैं सोचता कि श्रम न्‍यायधिकारी यह सब देखते हुए कैसे ऊपर अपने कार्यालय में जाकर चुपचाप बैठ जाते हैं और इस सामाजिक बुराई के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं करते। शायद मेरी मन की बात न्‍यायालय में नवनियुक्‍त न्‍यायाधिकारी ने सुन ली। जब एक दिन मैं वहां पहुंचा तो देखा जहां-जहां लोग थूका करते थे, दीवाल के उन हिस्‍सों को बढ़िया ढंग से रंग-रोगन करके उन पर देवी-देवताओं के चित्रोंवाली चमचमाती टाइलें चिपका दी गई थीं। उसके बाद मैं वहां जाता तो वहां जाना अच्‍छा लगता।
            कहने का तात्‍पर्य यह है कि एक सरकारी अधिकारी ने कानून से अलग धार्मिक प्रतीक चिहनों का सहारा लेकर अपने कार्यालय भवन को गंदा होने से बचाने का एक अनूठा प्रयास किया। चाहता तो वह कठोर कानूनी कार्रवाई करके भी लोगों की इस गंदी आदत को प्रतिबंधित करने का प्रयास कर सकता था। लेकिन मादक और तंबाकू पदार्थों के उत्‍पादन, वितरण और ब्रिकी से सरकारी खजाने में जो धन आता है, उसके लालच में कहीं न कहीं सामाजिक शुचिता से एक भ्रष्‍ट समझौता सरकार और इसके अफसरों द्वारा किया जाता रहा है। और निसंदेह ईमानदार सरकारी अफसर को भी इस तरह के समझौते को मानने को विवश होना पड़ता है। इसलिए उन्‍होंने अपने कार्यालय को गंदा होने से बचाने के लिए एक अनोखा प्रयोग किया। और जो उनके कार्यालयी परिवेश में सफल भी हुआ।
            और आज जब एक युवा मुख्‍यमंत्री देवेंद्र फडणवीस महाराष्‍ट्र में सामाजिक शुचिता, स्‍वास्‍थ्‍य को बढ़ावा देने के उद्देश्‍य से सार्वजनिक स्‍थानों पर थूकने को रोकने के लिए कानून बनाने के मुहाने पर खड़े हैं, तो देखकर हैरानी होती है कि उनका पक्षसमर्थन करनेवाले लोग गिने-चुने ही हैं। अगर लोग इस दिशा में उदासीन हैं तो मीडिया की तो जिम्‍मेदारी बनती ही है कि वह इस खबर को एक सामाजिक स्‍वच्‍छता प्रेरणा के रूप में व्‍यापकता से दिखाए और प्रकाशित करे।
विकेश कुमार बडोला

5 comments:

  1. दरअसल ये बात मिर्च मसाले से लैस नहीं है इसलिए मीडिया तो इस तरफ कुछ कहेगा नहीं ... हाँ ये एक स्वागत योग्य बात है इसका समर्थन जरूरी है औए इसे एक लोक अभियान की तरह लेना भी बहुत जरूरी है ...

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