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Thursday, December 3, 2015

लोकहित तलाशने की प्रवृत्ति से भरपूर संस्‍मरण

जिंदगी खूबसूरत है, खुशनुमा है और रोमांचक है। यह मानने से ज्यादा महसूस करने की बातें हैं। क्‍योंकि जिंदगी मान्‍यताओं से नहीं, बल्कि जज्बे के सहारे जी जाती है। दरअसल मान्यताएं दिमागी और जज्बा दिली उपज है। इसलिए जज्बा कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी जीने की कूव्वत बरकरार रखता है, मगर मान्यताएं अक्सर नाजुक मौकों पर जिंदगी के प्रति अजब-सी ऊब पैदा कर देती हैं। जिंदगी में कदम-दर-कदम ऐसे मौके आते रहते हैं, जब जिंदा होने का एहसास भी खटकने लगता है। ऐसे मौके पर जरूरत होती है उस नजरिए की, जो जिंदगी में नया जज्बा भर सके। ''अन्‍धेरे उजालों के बीच'' एक हद तक यही कोशिश करती है। इस पुस्तक में सिमटे दर्जनों संस्मरण अपनी लघुता के बावजूद पाठकों की अंतर्दृष्टि को विस्तार देने का काम करते हैं।
          युवा लेखक विकेश कुमार बडोला की यह पहली पुस्तक है। इस कारण स्वाभाविक रूप से इसमें कई नवीनताएं हैं, मगर उनके उल्लेख से पहले पुस्तक की विषय-वस्तु पर चर्चा आवश्यक है। लेखक ने अपने परिवेश, समाज और व्यक्तिगत जीवन से उपजी अनुभूतियों को पुस्तक में संस्मरण की शक्ल में दर्ज किया है। यहां यह प्रश्न उठ सकता है कि क्या किसी आम व्यक्ति के संस्‍मरणों में व्यापक समाज के लिए कुछ उपयोगी हो सकता है? मगर पुस्तक को पढ़ते हुए कहीं भी इसकी उपयोगिता पर संदेह नहीं होता। एक नजर में सभी संस्मरण रोजमर्रा का सामान्य लेखा-जोखा प्रतीत होते हैं, मगर वास्तविकता में ऐसा नहीं है। संस्मरण-दर-संस्मरण जब लेखक की अंतदृष्टि से परिचय होता है, तो महसूस होता है कि हम दिन काटने की जद्दोजहद में जीना भूल गए हैं।
          हमें पेड़ों पर नई कोंपलों का आना, ऋतुओं का बदलना या साफ आसमान में चांद का चमकना किसी उमंग या उल्लास से नहीं भरता। मशीनों की तरह काम करने की विवशता ने हमारी संभावनाओं को भी जड़-सा कर दिया है। इस कारण लोग प्रकृति के सान्निध्य में निहित आनंद की कल्पना से भी दूर हो चुके हैं। विकेश जब संस्‍मरणों में संपन्न होते समाज की इस विपन्नता की ओर संकेत करते हैं, तो सहसा अपनी दुनियावी दृष्टि पर क्षोभ होने लगता है। ''आधुनिकता से लिपटा जीवन-भ्रम'' शीर्षक लिए संस्मरण के कुछ अंशों को इस संदर्भ में देखें, ''जीवन अंकुर फूटे हुए सदियां बीत चुकी हैं। तब से अब तक जीवन-स्तर कई चरणों से होता हुआ इस सदी के इस समय तक पहुंच चुका है। वैज्ञानिक आविष्‍कारों और अनुसंधानों से तैयार अनेक मानव सहायक मशीनों की उपलब्धता ने जहां आदमी को बड़ी राहत दी है, वहीं दूसरी ओर इससे जीवन का स्वाभाविक चलन भी खत्म हुआ है।...मुझे लगता है कि यदि मानवता की कीमत पर मशीनी उत्पादन ऐसे ही होता रहा तो आविष्कारक और उत्पादक ही दुनिया में नजर आएंगे। मनुष्य मिट जाएगा और यदि वह ही नहीं रहेगा तो मशीनी गठन-पुनर्गठन किसके लिए।...आधुनिकता से लिपटे जीवन-भ्रम को सच का दर्पण दिखाने की सख्त जरूरत है। इसके लिए हमें परंपरा से जुड़ना होगा। परंपरा को फिर से जीवन बनाना होगा। मशीन के बजाए मानवता से प्रेम करना होगा।''
पारिवारिक संबंधों में होते बिखराव और औपचारिकता बनते सामाजिक संबंधों की दशा भी कई संस्‍मरणों में गंभीरता से व्यक्त हुई है। ''आगे बढ़ने में पीछे छूटा जीवन'' की इन पंक्तियों में इसे महसूस किया जा सकता है, ''जो लोग पेट के लिए दो रोटी, तन ढंकने के लिए कपड़ा, एक छत और बीमार होने पर दवा के अलावा जीवन में और कोई आकांक्षा नहीं रखते, उनसे प्रेरणा लेकर राजकाज होता,तो पक्का था कि सब कुछ एकदम शांत बहते जल की तरह रहता। सौ बरस की जिंदगी में हजारों-लाखों की संख्या में सामान इकट्ठा करने-करवाने की होड़ आखिर किसने लगवाई। वह तो न जाने कौन से जीवाश्म में बदलकर कहीं निर्जीव पड़ा होगा, लेकिन उसने मानव जीवन का स्वाभाविक आनंद छीन लिया। ''आगे बढ़ना'' जैसे दो शब्द अभी न जाने कितने इतिहास बनाएंगे और उनको पूरा पढ़ने के लिए न जाने कब मानव जीवन अमर होगा।...कंप्यूटर के एचटीएमएल प्रोसेस पर नाचती आज की दुनिया शायद वह सब कुछ बनाए बिना नहीं रुकना चाहती, जो आने वाले सालों में मनुष्य को करना पड़े।...इतना भी क्या आगे बढ़ना कि हमारा आस-पास ही खत्म हो जाए, हमारा वर्तमान ही हम से कट जाए।''
          प्रस्तुति के स्तर पर यह रचना, संस्मरण विधा में नई लीक की मानिंद है। आमतौर पर संस्‍मरणों में कई दशकों का कालखंड देखने को मिलता है, जबकि इसमें बमुश्किल दो वर्षों का जीवन वृत्तांत है। लेखक ने रोज समाप्त होते दिन-रात के प्रहरों, साधारण लगने वाली घटनाओं और आम जिंदगी का सामान्य अनुभव समझी जाने वाली बातों के बीच जीवन-दर्शन के जो बीज तलाशें हैं, वह जिंदगी को नए सिरे से समझने और सहेजने को प्रेरित करते हैं। प्रस्तुति से इतर शैली के स्तर पर भी संस्‍मरणों में नवीनता है। शायद यही वजह है कि कुछ शुरुआती संस्‍मरणों को छोड़कर पुस्तक बोझिल नहीं करती।
          आमतौर पर संस्मरण विधा को नामचीन लोगों के अनुभवों की थाती माना जाता है। मगर ''अन्‍धेरे उजालों के बीच'' यह साबित करती है कि संस्मरण के लिए अनुभवों में लोकहित तलाशने की प्रवृत्ति मायने रखती है, सार्वजनिक जीवन में कद या पद नहीं।
--अभिषेक चतुर्वेदी
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पुस्तक: अन्‍धेरे उजालों के बीच
मूल्य: 300/- रुपए
लेखक: विकेश कुमार बडोला
प्रकाशक: ज्ञानोदय, 57-बी, पॉकेट-ए, फेज-।।,
अशोक विहार, दिल्ली-110052
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नोट: समीक्षा मूलरूप से रविवार 29 नवंबर 2015 को दैनिक राष्ट्रीय सहारा के मंथन पृष्ठ पर प्रकाशित हो चुकी है।

2 comments:

  1. सर ,पहली पुस्तक प्रकाशन हेतु बहुत बहुत शुभकामनायें !

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  2. बधाई एवं शुभकामनायें स्वीकारें!

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