Monday, September 7, 2015

दृष्टिकोण बदलने से मिलती सुख-शांति

ब इस बात की कोई संभावना न हो कि भविष्‍य में आपके जीवन में क्‍या होगा, तो आप के पास क्‍या उपाय बचता है? हममें से बहुत लोग इस विचार बिन्‍दु पर निरुपाय ही रहते हैं। लेकिन यदि हम कुछ अलग तरह से सोचें तो पाएंगे कि यहीं से हममें सभी भौतिक व प्राकृतिक घटनाओं के प्रति एक उन्‍मुक्‍त दृष्टि जन्‍मती है। इसी से हमारे लिए हर जीवन अनुभव नया व विशेष बन जाया करता है। हम अपने परिवेश को उसके पुराने आवरण की तुलना में एक नए स्‍वरूप में देखने लगते हैं। यह सब कुछ हम सबके दैनिक जीवन में सामान्‍य रूप से घटता है। आवश्‍यकता इस घटनाक्रम को विशेष बनाने की होनी चाहिए।
            आप स्‍वयं सोचें कि आखिरी बार आपने अपनी मां को भोजन बनाते हुए कब देखा। आपके सामने पका हुआ भोजन आ जाता है। आप उसे किसी तरह पेट तक पहुंचाने का ही कष्‍ट कर पाते हैं। यहां तक कि आप मां द्वारा प्रेमपूर्वक पकाए भोजन का मूल स्‍वाद भी नहीं चखते। ह्रदय से सोचें कि मां तरह-तरह के व्‍यंजन बनाने के लिए कितना परिश्रम करती है। उसके पाक-कौशल, पूरे परिवार के भोजन की व्‍यवस्‍था करने में संयुक्‍त उसके उत्‍तरदायित्‍व के बारे में सोचें। कभी इस ओर भी ध्‍यान दें कि आपके सम्‍मुख बनकर तैयार भोजन कैसे व कितने समय में बना। इसे बनाने में किन-किन सामग्रियों को कितनी मात्रा में परस्‍पर मिलाया गया आदि। निश्चित रूप से यह सोचने के बाद आप मां के प्रति सुन्‍दर भावनाओं की एक संपूर्ण नई दुनिया से भर जाएंगे।
            कितना कुछ है जीवन में--घर व बाहर चारों ओर बहुत कुछ फैला है जो हमें जीवन के बारे में मीठी भावनाओं से उन्‍मुक्‍त करने को तैयार है। घर, इसके द्वार व रोशनदान, सूर्यप्रकाश व चन्‍द्रप्रकाश के घर में बिखरे अमूल्‍य रत्‍न, मोहिनी हवा, पक्षियों की चहचहाहट, नीले नभ का शांतिपूर्ण विस्‍तार, इसमें विचरते पक्षी, धरती के अंदर अपनी समृद्ध जड़ों को गहराई तक फैलाए वृक्ष-वनस्‍पतियां, जलवायु का आकलन करते धरती से बाहर के इनके पत्र-पुष्‍प-शाख व उप-शाख, जीवन को सुगम बनाती असंख्‍य भौतिक वस्‍तुएं आदि।
            हमें निष्‍ठापूर्वक स्‍वयं से पूछना चाहिए कि क्‍या हम इन उपरोक्‍त प्राकृतिक व भौतिक कार्यक्रमों को कभी अपनी वृद्ध दृष्टि के बजाय युवा दृष्टि से देखते हैं? और यदि नहीं देखते तो इसमें किसकी हानि है। लघु जीवन में हमारे पास क्‍या व्‍यर्थ-निरर्थक होने का इतना अधिक समय है? दृष्टिकोण में थोड़ा सा भी अच्‍छा-सच्‍चा परिवर्तन हमें सुख-शान्ति की उन संवेदनाओं से परिपूर्ण करता है, जो हम अपने लिए स्‍वयं निर्मित करते हैं। तो ऐसी परिपूर्णता के लिए हम दूसरों पर निर्भर क्‍यों रहें!
विकेश कुमार बडोला

8 comments:

  1. सार्थक विवेचना ...

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  2. प्रकृति, समाज और परिवार के पास कितना कुछ होता है देने के लिए. और एक हम हैं जिन्होंने अपनी एक ऐसी दुनिया बना रखी है जो सिर्फ स्वयं तक ही सीमित है. फिर पूछते हैं अवसाद क्यों होता है.

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  3. सार्थक चर्चा ... ये सच है की आज किजिंदगी में हम बहुत कुछ भूल गए हैं विशेष कर छोटी छोटी बातें जो अक्सर ढेर सा सुख देती रही हैं ... या दे सकती हैं ... अपने कोकून में अवसाद में घिरे रहना मंजूर है हमें ....

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  4. बहुत ही अच्छी बात कही है आपने इस लेख में..वास्तव में अपनी भागती दौड़ती दिनचर्या में हम न केवल अपने आसपास के वातावरण बल्कि करीबी लोगों को भी देखना समझना छोड़ देते हैं..थोडा समय निकाल कर अगर अपनी दृष्टि को व्यापक करें तो जीवन में नया रंग भरेगा.
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  5. पहले दृष्टिकोण को परखने की भी दृष्टि हो तो , यहां तो सब आँख बंद कर भागे जा रहे हैं .

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  6. हमें अपने दृष्टिकोण में व्यापक बदलाव लाने की जरुरत है ,ताकि हम अपने आस-पास घटित हो रही घटनाओं , चीज़ों , मूल्यों को उनके वास्तविक स्वरुप में देखें और उनकी अहमियत को समझें। दृष्टिकोण में छोटा सा बदलाव जीवन में बड़े बदलाव का वाहक बन सकता है।

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  7. हमें अपने दृष्टिकोण में व्यापक बदलाव लाने की जरुरत है ,ताकि हम अपने आस-पास घटित हो रही घटनाओं , चीज़ों , मूल्यों को उनके वास्तविक स्वरुप में देखें और उनकी अहमियत को समझें। दृष्टिकोण में छोटा सा बदलाव जीवन में बड़े बदलाव का वाहक बन सकता है।

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  8. ऐसा तो तभी संभव है जब हम मेरा घर मेरा परिवार मेरी जरूरतें इत्यादि से हटकर समग्र रूप से कुछ और सोचने का प्रयास करें। और यह तभी संभव है जब हम इस मशीनी युग से निकलकर प्रकर्ति की शरण में जाएँ। जिसके लिए हमारे पास सर्वाधिक समय का अभाव है।

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