Thursday, June 25, 2015

पुरानी वस्‍तुओं की यादें, भाग १

मानवीय जीवन के पन्‍द्रह वर्षों में बहुत कुछ बदल जाता है। आज से पन्‍द्रह वर्ष पूर्व यानि सन् २००० का ही दशक लें। उस समय जन्‍म लेनेवाले बच्चे आज पन्‍द्रह वर्ष के होंगे। आज उन्‍हें पन्‍द्रह वर्ष पहले के जीवन और उसकी वस्‍तुओं के बारे में जानना हो तो हम लोग उन्‍हें बता सकते हैं। उन्‍हें पचास-साठ वर्ष पीछे के जीवन और उसके जीवनोपयोगी वस्‍तुओं की सटीक जानकारी तो हम जैसे लोग भी नहीं दे सकते। इसके लिए उन्‍हें संग्रहालयों में जाना होगा।
अपने साथ के वृद्ध जनों से पुराने जमाने की बातें करते हुए उस समय के जीवन और जीवन में प्रयोग होनेवाली विभिन्‍न वस्‍तुओं की बातें होती हैं तो बहुत रोचक लगता है। सोचता हूँ इन लोगों ने अपने जमाने की चीजों का संग्रह क्‍यों नहीं किया! अगर समय के साथ पुरानी वस्‍तुओं के स्‍थान पर नई वस्‍तुएं आ गईं तो क्‍या हुआ! क्‍या उनके सहारे हमारा जीवन सुखपूर्वक व्‍यतीत नहीं हुआ, जो उन्‍हें व्‍यर्थ समझ कर हम इधर-उधर फेंक कर अंतत: भूल ही जाते हैं?
ऐसी ही कुछ वस्‍तुएं हैं, जिनके बारे में क्रम और विस्‍तार से लिखने की बड़ी इच्‍छा है। बात पन्‍द्रह वर्ष पहले के जीवन से शुरू हुई थी। पन्‍द्रह वर्ष पहले तक हालांकि बड़े-बड़े शहरों और धनी लोगों के पास रंगीन टेलीविजन और मोबाइल फोन के भारी उपकरण उपलब्‍ध थे पर ग्रामीण भारत में अधिकांश घरों में श्‍वेत-श्‍याम टेलीविजन (ब्‍लैक ऐंड व्‍हाइट टीवी) की ही उपलब्‍धता थी। टेलीविजन उपकरण बहुत भारी हुआ करता। इसे उठाकर इधर-उधर रखने के लिए दो व्‍यक्तियों की जरूरत होती। टेलीविजन चलाने के लिए घर की छत पर एंटीना भी लगाना होता था। मेरे देखते-देखते तो एंटीना की मुड़ी हुई डंडियां एल्‍यूमीनियम की होती थीं पर कई लोगों से सुना कि जब टेलीविजन शुरू-शुरू में आया तो ये डंडियां तांबे की होती थीं। यह भी ज्ञात हुआ कि एंटीना का भार ही चालीस किला होता था। अपने उन दिनों की स्‍मृतियां तेजी से मस्तिष्‍क में दौड़ने लगती हैं, जब हम दूरदर्शन और मेट्रो चैनल के कार्यक्रमों के स्‍पष्‍ट, साफ प्रसारण के लिए एंटीना से लगी टेलीविजन की तार इधर-उधर हिलाते-जोड़ते रहते। कई बार एंटीना को चारों दिशाओं में घुमाते ताकि टेलीविजन के कार्यक्रम साफ-साफ दिखाई दें। उस समय तक टेलीविजन चलाने के लिए रिमोट कंट्रोल तक भी जनसाधारण की पहुंच नहीं हुई थी। टेलीविजन यंत्र पर लगे बटनों से ही उसे खोला और बंद किया जाता। कार्यक्रम बदलने के लिए उस पर एक घुमानेवाला बटन लगा होता था। उस समय टेलीविजन के कार्यक्रम बच्‍चों को ध्‍यान में रखकर बनाए जाते थे। अधिकांश कार्यक्रम ज्ञानवर्द्धक, सामाजिक और मानवीयता की भावना को केन्‍द्र में रखकर बनाए जाते थे।  
उस समय मोबाइल फोन नया-नया आया था। मोटारोला कंपनी का आधा हाथ लंबा और आधा किलो भारी फोन जिसके पास होता, वह स्‍वयं को अपने परिवेश के उन सभी लोगों का राजा समझता, जिनके पास मोबाइल फोन नहीं होता। उस कालखण्‍ड में मोबाइल फोन का खर्चा वहन करना सबके वश में न था। मोबाइल फोन पर आनेवाली कॉल पर भी बहुत ज्‍यादा पैसा लगता।
तब जनसाधारण के पास अचल दूरभाष (लैंडलाइन फोन) की सुविधा ज्‍यादा थी। एमटीएनएल (महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड) और बीएसएनएल (भारत संचार निगम लिमिटेड) जैसे शब्‍द अस्तित्‍व में न थे। सम्‍पूर्ण भारत में अचल दूरभाष सुविधा प्रदान करने का उत्‍तरदायित्‍व भारतीय दूरसंचार मंत्रालय का था। मंत्रालय ही दूरभाष का संचालन भी करता था। इसी के अन्‍तर्गत राज्‍यों में भारतीय दूरसंचार विभाग और दूरसंचार केन्‍द्र (टेलीफोन एक्‍सचेंज) स्‍थापित थे।
उस समय पांच-छह इंच लंबा-चौड़ा ''पेजर'' नामक उपकरण भी होता था। यह उपकरण मोबाइल फोन के रूप में कम सुविधाओं के साथ कार्य करता था। अचल दूरभाष (लैंडलाइन फोन) से इस पर आवश्‍यक संदेश भेजे जाते थे। इस पर संदेश आते ही एक ध्‍वनि संकेत होता और इसे रखनेवाला व्‍यक्ति इसकी छोटे से दृश्‍य-पट (स्‍क्रीन) पर आए संदेश को पढ़ लेता। पेजर से पेजर में संदेश का आदान-प्रदान भी होता था। प्राय: पेजर का प्रयोग करनेवाले इसे कमर पर कमरपट्टी (बेल्‍ट) के पास बांधे रखते थे। पेजर अधिक दिन नहीं चला। यह एक वर्ष में ही चलन से बाहर हो गया। मोबाइल फोन ने इसका स्‍थान लेना शुरू कर दिया।
उसी समय दूरसंचार विभाग में मैंने अपनी पहली नौकरी शुरू की थी। मैं दूरसंचार विभाग के लेखा विभाग में तदर्थ (एडहॉक) आधार पर कार्यरत् था।
................अगले अंक में अन्‍य पुरानी वस्‍तुओं के बारे में।
विकेश कुमार बडोला

8 comments:


  1. बीते कल को खंगालना यादों का जीवंत दस्तावेज़ होता है हमारा आज हमारा तनिक संशोधित कल ही तो है और हमारा कल आज का संशोधित रूप ही होगा। एक सातत्य है चीज़ों के बीच।

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  2. पूरी श्रृंखला पढ़ने की उत्सुकता रहेगी. मुझे भी वो दिन याद आ रहे हैं जब सेलफ़ोन के नाम पर बस एस्सार की सेवा मिली करती थी और कॉल रिसीव करने की ही कीमत १६-१८ रुपये पारी मिनट हुआ करती थी.

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  3. आपकी प्रत्येक टिप्पणी हमारे लिए कीमती है ,लेखनी चलाते रहिये रिपोर्ताज़ /संस्मरण लिखने में आप माहिर हैं।

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  4. श्वेत श्याम टीवी पार्कों में भी लगे होते थे , बैठने के लिए सीमेंट की बेंचें .पेजर रखने वाला भी खुद को न जाने क्या समझता था :) भारी बड़े मोबाइल फोन ..और भी जाने क्या क्या ..अच्छा लगा यह अंक पढ़ना...रोचक शृंखला रहेगी ...

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  5. बीते हुए कल में जाने कुछ छूट गया है जिसका जिक्र रोमांच तो पैदा करता है ... एक अच्छी शुरुआत होगी ये ...

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  6. अब रोज़ नया कुछ जुड़ रहा है जीवन में

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  7. peechhe mud kar dekho to bahut anikha sa lagta hai ki we bhi kya din the...ab bhi bure to nahi hai....parivartn hamesha hi achha hota hai ..bahut sundar alekh...!

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  8. बीते समय में जाना सच में रोचक लगता है. एक समय था जब लैंड लाइन फ़ोन के लिए भी वर्षों इंतजार करना पड़ता था और आज आप के घर पर रोज नयी फोन कम्पनियाँ अपना फोन लगवाने के लिए आग्रह करती हैं. भूत काल के गलियारे में झांकना बहुत अच्छा लगा...रोचक प्रस्तुति..

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