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Monday, May 11, 2015

कोयल बोले पुरवा डोले

कोयल सी तेरी बोली------कोयल कूके, हूक उठाए यादों की बंदूक चलाए-----कोयल बोले पुरवा डोले----जैसे कितने ही गीत होंगे कोयल की कुहूक पर। संगीत में ढलकर ये गीत लोगों के अवचेतन मन में बस गए।
इस बैसाख माह में मुझे कोयल की कुहूक अनेक बार सुनने को मिली। घर, कार्यालय या कहीं भी आते-जाते कोयल की मंद-मीठी ध्‍वनि कानों में अमृत सरीखी गिरती रही। कार्यालय में पहली बार कुहूक सुनी तो कोयल को देखने की इच्‍छा से नजरें विशाल नीम के पेड़ पर तेजी से घूम गईं। सघन पत्तियों के बीच कोयल नहीं दिखी। सहकर्मियों से जिज्ञासा प्रकट की, ''विगत वर्षों में तो कोयल की कुहूक यहां कभी नहीं सुनी। इस बार ही क्‍यों सुनाई दे रही है!!'' उत्‍तर में वे इतना ही कह पाए, ''नहीं! हर साल बोलती है। आप सुन नहीं पाते होंगे।''
मन में सोचा मेरी स्‍मृति प्रकृति के बारे में इतनी कम नहीं हो सकती। मैं अधिकांश समय प्राकृतिक घटनाओं, कार्यक्रमों के प्रति जागरूक रहता हूँ। मेरे कान क्‍यों विगत वर्षों में इस मौमस के दौरान कोयल की कुहूक नहीं सुन पाए! एकांत आकलन किया कि नहीं मैं ठीक हूँ, मेरी स्‍मृति ठीक है। वास्‍तव में पिछले वर्षों में मुझे इन दिनों कोयल की कुहूक कभी नहीं सुनाई दी। इस बार जो कोयल की कुहूक सुनाई दे रही है, वह वास्‍तव में जीवन में एक नवीन उल्‍लास, उत्‍कृष्‍ट घटना है। 
कोयल की बोली सुनना कितना आनंददायी है! काश यातायात के सभी वाहनों के हॉर्न की आवाज कोयल की बोली जैसे होती! तब वे अगर निरंतर हॉर्न बजाते तो भी कोई पीड़ा न होती। लाल-संतरी-पीले रंगों के पुष्‍पों से सुसज्जित गुलमोहर, पीले फूलों से लदे अमलतास और नीम, पीपल, जामुन आदि वृक्षों में बैठकर कोयल का प्रकृति गायन मधु बिखेरता प्रतीत होता है। ऐसे लगता कि वर्षों से एकत्रित सांसारिक सिरदर्द कर्णांगों से बाहर निकल गया।
कई बार तो मैं कोयल की अप्रतिम कुहूक सुनने पेड़ों के नीचे देर तक खड़ा हो गया। लोगों की संदेहभरी दृष्टि भांपकर समझ गया कि उन्‍हें मेरा ऐसा खड़ा होना ठीक नहीं लगा। आधुनिक कल-पुर्जों के  मनोविज्ञान में गुम  होती  दुनिया के अनुसार जीवन व्‍यतीत करते ज्‍यादातर लोगों की दृष्टि में एक मिनट भी सड़क पर खड़ा होना व्‍यर्थ है। जिस स्‍थान पर वृक्षों की हरियाली के बीच से कोयल कुहूक-कुहूक करती, वहां खड़े या उस स्‍थान से आते-जाते लोगों के लिए यह सामान्‍य बात थी। मैंने देखा, उन लोगों में से किसी ने भी कोयल की कूक सुनने और कोयल देखने की जिज्ञासा प्रकट नहीं करी। उन्‍हें तो जैसे किसी ने नकारात्‍मक रूप से आत्‍मकेन्द्रित रहने का विष पिला रखा था। जो लोग जीवन के आधारस्‍तंभ प्रकृति के प्रति इस तरह उदासीन हो जाएं, उनके बीच रहकर जीवन और मानव का अनुभव कैसे हो सकता है!!
          पिछले एक वर्ष के दौरान आई प्राकृतिक आपदाओं, विपत्तियों की बारंबारता ने ढंग से सिद्ध कर दिया है कि मानवों द्वारा धरती का अत्‍यधिक दोहन किया जा चुका है। दुर्भाग्‍य से मानव मन में यह चेतना भी शायद नहीं बची कि यदि आगे भी पृथ्‍वी का विकास के प्रयोजनार्थ ऐसा ही अतिदोहन होता रहा, तो निश्चित है कि कोयल की कुहूक और इसे सुनने की इच्‍छा रखनेवाले मानवों का अस्तित्‍व ही मिट जाएगा।
विकेश कुमार बडोला

7 comments:

  1. आत्मकेंद्रित लोगों की भीड़ में ऐसे भाव उम्मीद की किरण हैं .सचमुच आज प्रायः ऐसा देखने मिल जाता है .बहुत हुआ तो मोबाइल फोन की रिंगटोन से कोयल बुलबुल या मोर की आवाजों से प्रकृति प्रेम दर्शा लेते हैं . एक दिन मैंने देखा कि भास्कर जैसे पत्र में गुलमोहर के फूलों को एक बार पलाश के फूल और एक बार अमलताश के फूल बताया गया .
    आपके विचार और अभिव्यक्ति सचमुच प्रभावित करती है .

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  2. प्रकृति से दूर होता मनुष्य मशीनी हो रहा है इस में दो राय नहीं...मुझे तो कोयल की कूक बहुत ही मधुर और बाँध लेने वाली लगती है..आप को इस स्वर को सुनने का सौभाग्य मिला ...आगे आगे कुछ सालों में इस तरह के स्वर सुन पाना दुर्लभ ही हो जाएगा...जैसे आज गोरैय्या दिखनी कम हो गयी हैं वैसे ही ये भी कुछ समय बाद दिखाई नहीं देंगे.पर्यावरण बचाव के कितने सार्थक उपाय किये जा रहे हैं यह तो ईश्वर ही सही सही बता सकेंगे.

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  3. आपने सच लिख है ... प्रकृति का दोहन कितना कुछ नष्ट करेगा ये सोच भी बहुत भयावह है ... पर कहीं कहीं जागरूकता भी फ़ैल रही है प्राकृति के प्रति ... जैसे दुबई में जहां में रहता हूँ वहां अक्सर सुबह सुबह पंछियों की आवाजें मन को गुदगुदाती हैं ... नीम पीपल के पेड़ उगाये जाते हैं ...

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  4. कोयल या गोरैया का न दिखना एक खतरनाक संकेत है। दरअसल मेरा मानना है कि हम मनुष्य अपने उन्माद व अहंकार में पेड़-पौधे या छोटे-छोटे जीव-जंतुओं के अस्तित्व को मिटाने पर तुले हुए है. परिणाम सबके सामने है।

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  5. Shahron me prakriti ke liye asamvedanshel ravaiya khulkar saamne dikh raha hai. bechaare panchhi do pal sustaaane, gaane jaaye to jaayein kahan. lekin main apne gaaon me aajkal koyal ke saath jugalbandi kar raha hai. koyal waakai jugalbandi karte hain.yah pahli baar aabhaas ho raha hai. aapka lekh padhkar achha laga.

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  6. आलेख सामयिक है। मैं भी दो हफ्ते हर दिन कोयल की कूक सुनकर वापस लौटा हूँ काली गिलहरियों के बीच।

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  7. बहुत अच्छा लगा पढ़कर विचारणीय प्रस्तुति पढ़कर। ।
    सुबह सुबह मेरे घर के बगीचे में नीम और आम के पेड़ पर जब कोयल कुहु कुहू की रट लगाती है तो मन को बहुत अच्छा लगता है की शहर में मैं प्रकृति के करीब हूँ। . मैंने तो उसे मोबाइल में रिकार्ड कर रिंगटोन बना रखी हैं कभी कभी जब किसी का फ़ोन आता है तो मैं खुद समझ नहीं पाती की आवाज बाहर से है मोबाइल से। ऑफिस में तो कई लोग मेरा फ़ोन आने पर बाहर देखने लगते हैं। … इस विषय पर थोड़ा लिखा है किसी दिन ब्लॉग पर लिखूंगी। ।

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