Sunday, April 26, 2015

भूकंप में बेचारा मानव-जीवन

चैत्र अप्रत्‍याशित मौसमीय परिवर्तन के साथ व्‍यतीत हुआ। बैसाख भी चैत्र की ही तरह चलते हुए उत्तरार्द्ध में पहुंच चुका है। रबी की फसल बर्बाद करने के बाद प्रकृति ने प्रचंड तूफान से बिहार में जन-जीवन ठप कर दिया था। और आजकल पूरे उत्‍तर-पूर्वी भारत सहित पड़ोसी देश नेपाल में हुए भूकंप से कई सौ लोग मर गए। कई व्‍यक्ति बड़े-बड़े भवनों के उजड़ने के बाद उनके मलबे के नीचे दबे हुए हैं। नेपाल इस भूकंपन का केन्‍द्रीय स्‍थल था। भारत में बिहार और उत्‍तर प्रदेश में भी अनेक लोग भूकंप से काल-कवलित हुए। प्रकृति के इस कोप के आगे मानवीय जीवन और उसकी व्‍यवस्‍था अत्‍यंताल्‍प लगती है।
          भारत की राजधानी दिल्‍ली सहित राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र, उत्‍तर-पूर्वी पहाड़ियों पर हुई वर्षा से सुहावना बना हुआ था। कल रात से ठंडी हवा चल रही थी। गर्मी के महीने में हवा की ठंडक कंक्रीट के शहर में रहनेवालों को अच्‍छी ही प्रतीत होगी। एक सप्‍ताह में दो बार भीगीं हिमालय की पर्वत शिखाएं मैदानी जन-जीवन के लिए गर्मी से बचने का प्राकृतिक वातानुकूलन होती हैं।
          नोएडा में रहते हुए मैं प्रकृति द्वारा वातानुकूलित जीवन में पत्‍नी और बिटिया के साथ घर की तीसरी मंजिल पर था। बिटिया बिस्‍तर पर लेटे-लेटे कह रही थी, ''अरे कोई बिस्‍तर हिला रहा है। कोई बुड्ढा बाबा है क्‍या?'' वह मेरा कहना नहीं मान रही थी। शांत बैठने के लिए कई बार कहने के बाद भी वह अपनी मर्जी से उछल-कूद मचा रही थी। इसलिए उसके प्रति क्रोध व आवेश से भरा था और इसी कारण उसकी बात पर ध्‍यान नहीं दिया। नहाने के लिए चौकी पर बैठा तो झटका लगा। ऐसे, जैसे किसी ने मेरी दोनों बांह पकड़ मुझे उठाकर एक ओर रखने के प्रयास में हिलाया हो। पत्‍नी बर्तन धो रही थी। उसे बताया तो उसने भूकंपन की अनुभूति को नकारा। अचानक पत्‍नी की नजर फ्रिज पर पड़ी। उसने मुझे दिखाया कि देखो फ्रिज कैसे हिल रहा है! मैं घबराए बिना, किसी अनहोनी की आशंका से अछूता चुपचाप फ्रिज को हिलते देखता रहा। संयत होकर पत्‍नी और‍ बिटिया को नीचे सड़क पर जाने को कहा, पर पत्‍नी नहीं गई। दो मिनट का यह समय असमंजस में व्‍यतीत हो गया। भूकंप के झटके थम गए।
          जीवन पहले ही इतने कष्‍ट-पीड़ाओं से घिरा हुआ है कि भूकंपन से जान जाने का भय पलांश में भी महसूस न हुआ। पास-पड़ोस की भूकंपन से होनेवाली प्रतिक्रियाओं को सुनने, देखने की जिज्ञासा से बाहर बॉलकनी में आया। दोपहर की तेज धूप में सड़क निर्जन थी। कुछ महिलाओं-लड़कियों की अचरजभरी आवाजें जरूर सुनाई दीं, पर वह भी शीघ्र बंद हो गईं। शायद लोग समाचार चैनलों पर भूकंप संबंधी समाचार देखने की इच्‍छा के चलते दोपहर के सन्‍नाटे में बाहर नहीं निकले होंगे।
          मेरे घर में टेलीविजन सालों से पेटी में बंद है। इसलिए भूकंप से कहां कितना उजाड़ हुआ, कितने जीवन बर्बाद हुए तत्‍काल इसकी जानकारी नहीं मिल पाई। कार्यालय जाकर पूरी जानकारी मिली।
मैं भूकंप की इस घटना को अप्रत्‍याशित नहीं मानता। जैसी शहरी रचना हो रही है, सीमेंट और लौह से चिपकाकर ईंटों के भवन खड़े किए जा रहे हैं, वे भूगर्भ में होनेवाली हलचल से हिलेंगे और गिरेंगे ही। लोग समझदार, विवेकवान और सज्‍जन बन जाएं तो सीमेंट, लौह, ईंट से निर्मित होनेवाले घरों की जरूरत ही न हो। घास-फूस और लकड़ी से तैयार घर होंगे तो प्राकृतिक संतुलन भी बना रहेगा। ऐसे घर भूकंप में गिर भी जाएं तो उससे मानव जीवन की हानि नहीं हो सकती। इन घरों को भूकंप में बिखरने के बाद भी शीघ्र ही रहनेयोग्‍य बनाया जा सकता है।
लेकिन ऐसे घरों की व्‍यवस्‍था क्‍यों की जाएगी। इससे बहुमंजिला भवनों के नाम पर चले रहे रियल स्‍टेट के कारोबार को झटका लगेगा। भूकंप से लगनेवाले झटकों से मानवीय जीवन को होनेवाली क्षति से अधिक चिंता व्‍यवस्‍था को रियल स्‍टेट कारोबार को बनाए रखने की है। ऐसा न होता तो बहुमंजिला भवनों का निर्माण कबका बंद करा दिया जाता।
रात को घर लौटते हुए जीवन की भावना निष्‍तेज लगी। बहुत गहरे हृदय में महसूस हुआ कि रात्रि साढ़े दस बजे और पौने ग्‍यारह बजे का समय जैसे ठहरा हुआ है। दोपहर के भूकंप को भूलकर लोग घरों में दुबके हुए हैं। मार्ग के दोनों ओर बड़ी-ऊंची कोठियों में अंधेरा अमानवीय बन कर पसरा हुआ है। मार्ग पर एक-दो पथिक या वाहन ही आ-जा रहे हैं। शीतल पवन में दुख के बाद की छितरी हुई सांत्‍वना का अनुभव है। इसमें जीवन की वेदना-संवेदना-मानवीयता-दयालुता-प्रेम-परोपकार-बलिदान जैसी पवित्र भावनाएं अनुपस्थित हैं। इस समय जीवन के कटु-प्रमाण से सिद्ध विचारों के बल पर लगता है कि मृत्‍यु सब जगह, सबसे छोटी बात हो गई है।
          देर रात छत पर टहल रहा था। घर के सामने बेलवृक्ष के पत्‍ते झड़ रहे हैं। ठंडी, सरसराती हवा में किंकर्तव्‍यविमूढ़ भावनाओं से लिपटा हुआ हूँ। तेज हवा से झड़झड़ाता, फड़फड़ाता हुआ बेलवृक्ष अपने शुष्‍क पत्‍तों को छोड़ रहा है। किर-किरकुर-कुरखर-खरसिर-सिरसिर-सिर की ध्‍वनियां करते बेल के सूखे पत्‍ते धरती पर मधुर स्‍पंदन करते हुए बिछ रहे हैं। पश्चिमी आकाश बादलों से घिरा हुआ है। छोटा बादल का घेरा धीरे-धीरे छितराया तो पीले रंग का कटा-फटा अर्द्धचंद्र दिखाई दिया। उसके ऊपर टिमटिमाता एकमात्र सितारा आंखों को देर तक शीतल करता रहा। वह मेरे अंत:स्थल में व्‍याप्‍त जीवन के विष को कम करता रहा।
इस धूल-धूसरित रात्रि से पहले के भूकंपित दिन-दोपहर के अनुभव मेरे जीवन के अप्राकृतिक कष्‍टों के अनुभवों से बड़े नहीं हो पाए। भूकंप से मिल जानेवाले भौतिक-जैविक अपशिष्‍ट में मेरा मिलना अर्थात् मरना उतना कष्‍टकारी नहीं होता, जितना मानवों के रूप में यहां-वहां हर स्‍थान पर विचरण करनेवाले असुरों के साथ जीवन गुजारने पर जीवन हो रहा है।
विकेश कुमार बडोला

3 comments:

  1. विकेश ,आपका कहना सही है .हम मानवों ने ही अपनी मनमानियों से प्रकृति को आहत किया है .प्रकृति के लिए आपके विचार और भाव सचमुच अभिनंदनीय हैं .

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  2. अपनी भौतिक जरूरतों के चलते प्राकृति से खिलवाड़ करना इंसान के लिया बहुत आम हो गया है आज जिसका नतीजा किसी क किसी रूप में सामने अत रहता है ... आपने अपने अनुभव को साझा किया .. सच में कितना भयावह होता है ऐसा मंजर ...

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  3. भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा पर किसका बस है. लेकिन सही है कि अपने आस-पास विषदंत लिए व्याल चतुर्दिक तत्पर दिखते हैं डसने के लिए. नोएडा में नए उठ रहे अट्टालिकाओं के रूप में एक नए जंग का भान होता है. सुख की नयी परिभाषा बताने वाले लोगों से वितृष्णा सी होने लगी है. चारों ओर 'वर्किंग कपल' अपने जन्म देने वालों के वक्ष पर हथौड़ा मार कर फ्लैट बुक करवा रहे हैं. शहर से गाँव तक फेनिल मदिरा ने सबका मन मोह लिया है. आजकल मैं यही सोचता है- क्या जीवन बस अपने ही लिए हो?

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