Saturday, January 17, 2015

हम सब

म सब अपने
नहीं होने के बाद के
शून्‍य के लिए
चितप्रवृत्‍त होते हैं
भावनाओं के
आयत बनाते हैं
समाज व संसार के लिए
आहों पर बोई
आशाएं उगाते हैं
पर एक क्षण रुक
हम सोचें...शान्‍त हो विचारें
कि हमारे जैसे
 कितने जीवन
यह सब करते
 व्‍यतीत हुए
लेकिन उनके लिए
उनकी आशाओं का हमने
क्‍या प्रतिकार किया....
अपने समय के
अगणित मतभेदों
के बीच पिसकर
उन्‍हें मानव स्‍वभाव के बिना
भ्रमास्तित्‍व हो
 याद करने के अलावा.....
हम सब अपने
होने के
शून्‍य के लिए
तन-मन से चंचल होते हैं
अभिनय के
खण्‍डहर बनाते हैं
समाज व संसार के लिए
लालसाओं पर उगी
निराशाओं की खरपतवार
छांटते हैं
पर एक क्षण रुक
हम सोचें....प्रशान्‍त हो विचारें
कि हमारे जैसे
लगभग सभी मानवजीवी
यह सब करके
व्‍यतीत हो जाएंगे
लेकिन हमारे लिए
आनेवाली पीढ़ी
हमारी निराशाओं का
क्‍या प्रतिकार करेगी....
अपने समय की
 आसुरी वृत्तियों में
रंगे-लगे होने पर
भुलावे, अन्‍धेरे, अकाल में
हमें ठूंसकर
भूलभुलैया में विलीन हो
हम सबको
भूल जाने के अलावा.....

विकेश कुमार बडोला

14 comments:

  1. हम सब सामान्य मनुष्य हैं ..इस से अधिक सोच समझ नहीं पाते हैं..जो इस से अधिक समझ गया और कर पाया वह महान हो जाता है.यह तो पूरे एक चक्र है न ..अगली पीढियां भी यही करेंगी.कहाँ तोड़ें इस क्रम को कैसे?

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  2. इस पोस्ट की पहली प्रतिक्रिया ये है कि एक सहज,सरल ह्रदय से सनातन जीवन का स्वभाव स्वत; ही उमड़ पड़ा है और दूसरी प्रतिक्रिया ये है कि कभी-कभी उम्दा रचनाएं प्रतिक्रियास्वरूप अनायास ही पढ़ने को मिल जाती है। दूसरी प्रतिक्रिया में आप शायद जोड़ सकते हैं.

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  3. एक सरसरी निगाह डालने से ऐसा लगता है कि अगर मानव जीवन के पिछले ३००० साल के विकास को देखा जाय तो क्रमिक विकास ही दिखता है. ३००-४०० साल पीछे का वह जीवन जब चारों तरफ तलवारों, तोपों, साम्राज्यवाद और दासता के बीच पिसते मानव जीवन की दुश्वारियां थी. दूसरी ओर वर्तमान देखा जाय तो लगता है स्थिति बहुत बेहतर हो चुकी है. लेकिन शान्ति अभी भी नहीं है ..ना ही सामजिक स्तर पर और ना ही वैश्विक स्तर पर. विकासशील देशों में भूख, गरीबी चुनौतियां है. विकसित देश गर्भपात और समलैंगिकता को धर्म के साथ जोड़कर गर्म मुद्दा बनाए हुए है. इस सब के बीच सवाल है..आदमी कहाँ जा रहा है? इस सब का उत्तर डार्विन देते हैं: मेरी समझ से. बहुत सुन्दर चिंतन पेश किया है आपने इस रचना से.

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  4. होने व न होने के बीच का जो भ्रमजाल है हम सब उसी में उलझे हैं . यही जीवन है यही माया हैं . अल्पना जी ने सही कहा है कि इस चक्र से जो निकल पाता है वही कुछ परे सोच पाता है .
    गहन दर्शन से परिपूर्ण यह कविता इस बात की प्रतीक है कि आपका लेखन ऐसे ही चलते चलते किया गया सृजन नहीं है विकेश.

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  5. होने व न होने के बीच का जो भ्रमजाल है हम सब उसी में उलझे हैं . यही जीवन है यही माया हैं . अल्पना जी ने सही कहा है कि इस चक्र से जो निकल पाता है वही कुछ परे सोच पाता है .
    गहन दर्शन से परिपूर्ण यह कविता इस बात की प्रतीक है कि आपका लेखन ऐसे ही चलते चलते किया गया सृजन नहीं है विकेश.

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  6. होने और न होने के बीच के शून्य को जीना ... वो सच में जीना ही होता है चाहे कुछ भी नाम दें उसको ... और हाँ आने वाली पीढ़ी तो वैसे भी भूलने ही वाली है ... हम भी तो भूल ही गए हैं ... आज हद से हद अपने परदादा से पहले की पीढ़ी को कितने जन याद रहते हैं .... इसलिए आने वाली पीढ़ी भी यही करने वाली है ...
    एह अच्छे रचनाकार को उत्पत्ति हुयी है .. इसे जीवित रखें ...

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  7. सभी ने इतना कुछ कह दिया की अब कहने को शेष नहीं वैसे मैं निहार रंजन जी की बात से सहमत हूँ।

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  8. बेजोड़ , बहुत सही और सधा रेखांकन करते शब्द

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  9. बहुत सुन्दर रचना...

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  10. किसी भी सत्य के साथ बस यही किया जा सकता है कि हम उसकी ओर मुंह करके खड़ा हो सकते हैं पर उसमें कुछ जोड़ा या घटाया नहीं जा सकता है . कुछ ऐसा ही भाव अभी उठ रहा है .

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  11. हरेक पीढी अपने आने वाली पीढी से कुछ आकांक्षाएं रखती है और यह क्रम चलता रहता है. होने और न होने के बीच का संघर्ष हरेक पीढी के साथ रहा है.'हमारे जैसे लगभग सभी मानवजीवी यह सब करके व्‍यतीत हो जाएंगे लेकिन हमारे लिए आनेवाली पीढ़ी हमारी निराशाओं का क्‍या प्रतिकार करेगी.' यह चक्र हमेशा चलता रहा है और किस पीढी ने अपनी पूर्व पीढी की निराशाओं का प्रतिकार किया है? आगे बढ़ने की चाह में बहुत कुछ पीछे छूट जाता है. शायद ऐसा ही आगे चलता रहेगा और पिछली पीढी की शून्यता/निराशायें केवल इतिहास के पृष्ठों में दब कर रह जायेंगी....बहुत गहन चिंतन...एक लाज़वाब अभिव्यक्ति...

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