महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Wednesday, September 10, 2014

दो रचनाएं


की हुई ख्‍वाहिशें चलती जा रही हैं
किसके असर से मचलती जा रही हैं
एक आदमी की ख्‍वाहिशें हजार, उनसे
जीने की उम्‍मीदें बनती जा रही हैं

कौन किससे बेहतर है ये कौन जान पाया है
बावजूद इसके इम्तिहानों का दौर आया है
सही आदमी जब रसातल में पहुंच गया 
तो नौसिखिए तैराकों ने अपना ठौर पाया है
गरज मेरी दान उसका दुनिया का नया दस्‍तूर है
झुककर नहीं मांगा तो कहेगी कि चोर आया है
कितने विद्वान, मसीहा आए औ चले गए, उनकी
बातें भूलकर जीनेवाले कहते अब हमारा दौर आया है

11 comments:

  1. दोनों ही रचनाएं बहुत ही उम्दा और हकीकत वयां करते हुए......

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  2. बेहतरीन रचनाये विकेश जी !

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  3. khwahishein apne poore hone ke intezar mein chalti jaa rahi hain

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  4. जीवन के यथार्थ का सटीक चित्रण करतीं दोनों ही रचनाएँ बहुत सुन्दर...

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  5. बहुत खूब ... अब ऐसा ही दौर आ गया है .. हर कोई खुद ही मसीहा हो गया है ..

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  6. aaj ke samay aur halaaton se rubru karaati rachnayen.Achchhee lagin.

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  7. बेजोड़ रचनाएँ है..... बहुत सुन्दर

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  8. उत्कृष्ट गद्य के बाद काव्यरूप में यह अभिव्यक्ति भी काफी अच्छी है विकेश जी ।

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  9. दोनों रचनाएँ बहुत पसंद आई. यही ख्वाहिशें हैं जो जीते रहने का बहाना देती रहती है.वरना सब कुछ ठहर सा जाएगा.

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  10. वाह...सुन्दर और सार्थक पोस्ट...
    समस्त ब्लॉगर मित्रों को हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं...
    नयी पोस्ट@हिन्दी
    और@जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ

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  11. विकेश भाई रचना का एक एक लफ्ज़ माला में मोती की तरह शोभ रहा है।

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