Sunday, April 20, 2014

खुद का चैन

खुद को चैन मिले इसलिए बहुत सी बातों से अनजान रहना ही ठीक होता है। हर बात की जानकारी या सभी बातों का ज्ञान होना तब बहुत दुखी करता है, जब जानकारियों और ज्ञान के पीछे की सच्‍चाई सामने आती है। नींद में हमें बहुत सी बातों या घटनाओं का पता नहीं होता। नींद में होने के दौरान हम कई असामान्‍य घटनाओं को देख-सुन-अनुभव नहीं कर पाते हैं तो बड़ी राहत होती है, लेकिन कभी अचानक नींद खुलने पर ऐसा सुनाई और दिखाई देता है कि खुद पर खीझ होने लगती है। महसूस होता है कि सोए रहते तो वह सब सुनाई और दिखाई ही नहीं देता, जिसे सुन व देख कर मन खट्टा हो गया।
ऐसी घटना के बाद दुनिया और लोगों के बारे में नजरिया ही बदल जाता है। अपनी दृष्टि में असुर‍क्षा की भावना उभर आती है। मन में उस व्‍यवस्‍था के प्रति विद्रोह पैदा हो जाता है, जिसके कारण ऐसी दुखद परिस्थितियां पैदा हुईं। बाहुबल की कमी के कारण मेरे जैसा व्‍यक्ति मानसिक रूप से ही ऐसी दुर्व्‍यवस्‍था के प्रति संघर्ष करता है और आखिर में शारीरिक कमी व दिमागी कमजोरी दर्द का रूप ग्रहण कर लेती है। ऐसी स्थिति के बारे में देर तक सोचने पर एक बात दिमाग में आती है कि जिन बातों और घटनाओं से परेशानी हो रही है, वे तो मेरे शारीरिक व मानसिक रूप से अनुपस्थित रहने पर भी घटित होतीं। घटनास्‍थल पर मैं होता ही नहीं वे तब भी घटतीं। तो क्‍यों मैं इनके लिए इतना विचलित हूं? मैं इनसे जुड़कर, ऐसी घटनाओं की विसंगतियों का विश्‍लेषण करके क्‍या प्राप्‍त कर लूंगा? जब ऐसी बातें और घटनाएं किसी भी परिस्थिति में घटनी ही हैं तो मेरा उन पर क्‍या वश? मेरा उनके विरोध या पक्ष में खड़ा होने का क्‍या अर्थ? मैं तो अपने को इन सबसे अस्‍पृश्‍य रखूं। मन से भी और तन से भी इनसे अलग रहूं। इसी में मेरी और मेरे जीवन की भलाई है।
इन दशाओं में अपनी दीन-हीन गति पर तरस भी आता है। लोकतान्त्रिक, राजनीतिक, भौतिक, आर्थिक रूप से अपनी कमजोरी का अहसास होते ही तन-मन काठ बन जाते हैं। अन्‍त में अव्‍यवस्‍था फैलानेवालों के नजरिए के प्रति स्थिर होता हूं। उनकी दृष्टि से जीवन को टटोलता हूं। उनकी भावनाओं की बेवकूफी समझता हूं। मूर्खता बढ़ानेवाले उनके भावावेश के पीछे के कारणों का विश्‍लेषण करता हूं तो ज्ञात होता कि व्‍यक्ति तो एक इकाई है। अपने और अपने व्‍यक्तित्‍व के लिए वह जो कुछ भी सीखता है, वह अनेक व्‍यक्तियों की इकाई यानि कि समाज के माध्‍यम से ही सीखता है। समाज का संचालन इस युग में जिस सत्‍ता के हाथों में है, समाज को ढालने का काम उसी सत्‍ता का होता है। अगर सत्‍ता संचालन समझ, सोच-विचार से नहीं हो रहा है तो समाज क्‍या बातें ग्रहण करेगा और समाज से व्‍यक्ति क्‍या प्राप्‍त करेगा?
        कुछ दिनों से नींद बेहोशी जैसी बनी हुई है। इसलिए देर रात तक जागना स्‍थगित था। जागरण से उत्‍पन्‍न चिन्‍तन-मनन नहीं होने से दिमाग शान्‍त था। कल रात भी चैन की नींद की आशा में समय पर सो गया। नींद और जागरण के बीच की बेहोशी में स्थिर हुआ ही था कि अचानक कुछ लोगों के बड़बड़ाने की आवाज सुनाई दी। अवचेतन मन ने सोचा सपना होगा, पर सपनों में जो कुछ दिखाई या सुनाई देता है उसकी पुनरावृत्ति कहां होती है! जब बड़बड़ाहट में पुरुष और महिला दोनों की आधुनिक भाषा-शैली पर ध्‍यान गया तो नींद उचट गई। १९ अप्रैल २०१४ की आधी रात आनेवाले हफ्तों तक मेरी नींद उजाड़ने का बड़ा आधार बनी।
तृतीय तल के कमरे की पीछेवाली खिड़की से तीन मीटर की दूरी पर दूसरी गली के मकान हैं। मेरी व पिछली गली के मकानों के पृष्‍ठभाग के बीच में दो मीटर खाली जगह है। मेरी खिड़की से पीछे के जो मकान दिखाई देते हैं, वे अभी तृतीय तल तक निर्मित नहीं हैं। उनकी द्वितीय तल की छतें साफ दिखाई देती हैं। छह-सात लड़के और पांच या छह लड़कियां उनमें से एक छत पर एकत्रित थे। वे आपस में जोर-जोर से बातें कर रहे थे। नींद में समाने से पहले जो बड़बड़ाहट सुनाई दे रही थी, वह इन्हीं की थी। स्‍पष्‍ट समझ गया कि शनिवार की रात को लड़के-लड़कियां दारू पार्टी के लिए इकट्ठे हुए हैं। पीछे के किसी मकान में कुछ लड़के किराए पर रहते होंगे। उन्‍हीं की जान-पहचान के कुछ और लड़के-लड़कियां आज वहां एकत्रित थे। सभी दारू पीकर धुत थे। उन सभी की वार्तालाप के दौरान लड़कियों के मुख से मां-बहन की गालियां सुनकर मैं अपने कानों पर विश्‍वास नहीं कर पाया। आधी रात को जोर-जोर से भद्दी, गंदी और यौनिक बातें करते हुए उन्‍हें थोड़ा सा भी संकोच नहीं था कि आसपास परिवारवाले लोग रहते हैं।
उनमें से कोई लड़का कह रहा था, मैं कनाडा, इंगलैंड और पेरिस घूम के आ गया हूं, पर अपनी बंदी की जुदाई बर्दाश्त नहीं कर पाया और वापस इंडिया आ गया। तुरन्‍त एक लड़की ने प्रतिवाद किया, अबै तू च...या है। बंदी के लिए विदेश की नौकरी छोड़ के आ गया। तेरे जैसा मा...द मैंने कहीं नहीं देखा। तुझे पता है बंदियां आजकल केवल पैसा और सेक्‍स से मतलब रखती हैं। इसी तरह की इधर-उधर की बातें करते हुए वे एकाध घंटे तक छत पर जमे रहे। इतने में उनके कमरे से कोई लड़का आया और चिल्‍लाया, अबै नीचे आ जाओ सब लोग। चिकन उबल गया है। दारू भी खत्‍म हो गया है। सोसाइटी के लोग उठ जाएंगे। अब बकवास बंद करो और नीचे आ जाओ।
मैं उनके जाने के बाद देर तक सोचता रहा, लड़के तो मैंने बहुत से देखें हैं, जो बिन परिवार के अकेले रहते हुए आवारागर्दी करते हैं, दारू पीते हैं। पर अब लड़कियां भी इस सीमा तक पहुंच गई हैं कि असभ्‍य व्‍यवहार में लड़कों से होड़ ले रही हैं!’
राक्षसी प्रवृत्तियां हमेशा सुबह के सूर्यप्रकाश से चिढ़ती हैं। इस समय उनका अस्तित्‍व छिन्‍नभिन्‍न हो जाता है। यही सोचकर खिड़की से पीछे के मकान की उस छत को देखा, जहां कल रात देशकाल की सभ्‍यता का दम निकल रहा था। इस समय वहां सन्‍नाटा था। पत्‍नी ने पूछा, कल रात को तुम कुछ कह रहे थे। क्‍या हुआ था? मुझे तो नींद में पता ही नहीं चला। मैंने कहा, काश मैं भी ऐसे होने-घटने के समय नींद में ही रहता तो कितना बढ़िया होता!’ जो बिगड़ गए, बर्बाद हुए उनको तो रोका नहीं जा सकता, पर जो छोटे-छोटे बच्‍चे हैं उन्‍हें तो हम लोगों को सही रास्‍ता दिखाना ही पड़ेगा। देश-दुनिया के साथ-साथ हमें खुद को भी तभी चैन मिल पाएगा।

15 comments:

  1. यह आज का यतार्थ है ....

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  2. बहुत खूब सच्चाई बयां की भाई - जय हो

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  3. बहुत खूब सच्चाई बयां की भाई - जय हो

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  4. पतन कि और जाते समाज, समय को आँखे खोल के देखना होगा तभी इससे बचाव भी संभव होगा ... औए ये बचाव भी कुछ समय तक है जब तक हम आदी नही हो जाते .. फिर सब कुछ वैसे ही चलने वाला है .. बदलाव है ये जो दिशा ले चुका है अब ...

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  5. दुखद है पर सच है ... सटीक अवलोकन है

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  6. theek kahaa aapne ... jitna aaj ke waqt mein kam jaane samjhe utna hi achha .. kuchh vaham bane rahein to hi achha.

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  7. आज का कटु यथार्थ...लगता नहीं कि हमारे कोई प्रयास इस राह पर उन्हें जाने से रोक पायेंगे...बहुत दुखद स्तिथि...

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  8. जो कुछ आपने देखा सुना ..उसे जानकर आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि मेट्रो के किस्से सड़कों पर बेझिझक किस करना ..उनका रात को ड्रिंक करके लौटना,उनके बेख़ौफ़ लिव इन सम्बन्ध आदि ख़बरों में पढ़ा है.
    मैं इन सब में बहुत हद तक जिम्मेदार फिल्मों को भी मानती हूँ जहाँ पीना पिलाना उत्सव उल्लास को मनाने का सभी तरीका बताया जाता है...नशे को गलेमेरस दिखाया जाता है .टी वी विज्ञापनों में सीरियल्स में कहाँ नहीं स्वछंदता के नाम पर नैतिक मूल्यों का ह्रास करने वाले इन व्यवहारों को बढ़ावा नहीं दिया जाता !हमारे देश का दुर्भाग्य है जो युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति भूल रही है .इस में उनके अपने अभिभावक भी कम ज़िम्मेदार नहीं हैं पीना पिलाना आदि को आधुनिकता की निशानी जो मान ली जाती है ...

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  9. विश्वास नहीं होता कि ज़माना इतना बदल गया है। स्वतन्त्रता सस्ती नहीं, उसकी कीमत भी चुकानी पड़ती है।

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  10. अब आँख से देख कर भी तो ऐसी माडर्न मक्खी निगली नहीं जाती ..उफ़..

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  11. निश्चित ही इस तरह के शब्द हमें विचलित कर देते है और एक बेचैनी पैदा कर देते हैं किंतु यदि इस बात पर किसी को समझाइश दो तो वो हमें ही हंसी का पात्र बना देता है...सुंदर प्रस्तुति।।।

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  12. ऐसे दृश्य को देखकर व्यथित होना लाजिमी ही है और इसके कारक भी कई हैं. अब देखना यह है कि पश्चिमी तर्ज़ पर शराब सेवन को पुरुषार्थ से कब जोड़ा जाता है अपने समाज में. काफी दुखद होगा वह दिन देखना.

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  13. न कहाँ जा रहा है आज का समाज।

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  14. यही है आज के सो कॉल्ड प्रगतिशील देश का एक कड़वा सच, सच में ऐसा सब देख-सुनकर तो किसी भी समझदार व्यक्ति को ऐसा ही लगेगा, जैसा आपको लगा. बात आपकी सही है. जो बिगड़ चुके उन्हें तो संभाला या सुधार नहीं जा सकता है, अब बारी है छोटे-छोटे बच्चों की उन्हें सही राह दिखाना या सही और गलत में अंतर बताना और सिखाना हमारा फ़र्ज़ है. लेकिन इस सामज का क्या करें !!! घर में चाहे हम कितनी ही अच्छी शिक्षा दे लेने लेकिन घर से बाहर निकलते ही जो दुनियादारी बच्चों के सामने आती है उसके प्रभाव से बच्चे ऐसे ही दो चेहरे वाली प्रवर्ती के बन ही जाते है. यानी परिवार वालों के सामने कुछ और अपने दोस्तों क बीच कुछ ओर ... नहीं ?

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