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शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

समलैंगिक अल्‍पसंख्‍यक और वोटबैंक


किसी देश की परिभाषा क्‍या होती है? यह प्रश्‍न मेरे लिए बहुत जटिल बन गया है। शायद इस प्रश्‍न की जटिलताएं स्‍वतन्‍त्र भारत से पहले और बाद के समय में ही पनपने लगी थीं। परिस्थितियों, मतान्‍तरों और हास-विलास से दिग्‍भ्रमित शासकीय मस्तिष्‍कों ने राष्‍ट्रीय परिभाषा को और भी ज्‍यादा उलझा दिया है। अब तो लगता है कि अपने जैसों का एक समूह तैयार कर एक भूभाग पर एक नया देश बनाया जाए। यहां केवल उन्‍हीं को रहने का न्‍यौता दिया जाए, जो सुबह जागने से लेकर रात सोने तक अपने भाव-विचार में भारत में होने व रहने को एक दुखद भ्रम मानते हैं।
     हमेशा की तरह इस समय भी भारत में अनावश्‍यक बातों और घटनाओं का अंबार लगा हुआ है। एक अनावश्‍यक घटना घटी नहीं कि दूसरी घटने के लिए कतार में विचलित रहती है। घटनाएं क्‍या ये तो दुर्घटनाएं हैं। इनसे किसी का पेट नहीं भरता, किसी को घर नहीं मिलता, किसी को शिक्षा, कपड़े, दवाइयां, अन्‍य जरूरी सुविधाएं नहीं मिलतीं। ये बिना किसी बात के घटती हैं। इन घटनाओं का कोई आधार नहीं हैं। इनका कोई मूल, कोई मान्‍यता नहीं है। बस ये घटे रही हैं ताकि लोगों की स्‍मृति में देश के वास्‍तविक अपराधी और इनके अपराध स्‍थायी रूप से न बस जाएं। अपने साथ होनेवाले धोखों को आम आदमी जब तक बार-बार याद नहीं करेगा तब तक वो भ्रष्‍ट व्‍यवस्‍था के प्रति आक्रोशित नहीं हो सकता। बस यही मूलमन्‍त्र है जो अनावश्‍यक घटनाओं के घटने के केन्‍द्र में विराजमान है। 
     पांच राज्‍यों के विधानसभा चुनाव से पहले केन्‍द्र सरकार द्वारा दंगा विरोधी विधेयक (बिल) लाया गया, लेकिन चुनाव परिणामों ने बिल सम्‍बन्‍धी इस घटना के व्‍यापक प्रसार, विमर्श, वाद-विवाद पर एक तरह से विराम लगा दिया। अल्‍पसंख्‍यक वोट हथियाने के बहाने केन्‍द्र सरकार ने चुनावों की बहती गंगा में अपने हाथ तो गीले कर दिए, पर अपने विरोध में पड़े जनमत देख कर उसने अच्‍छी तरह से धोए बिना ही अपने गीले हाथ झट पोंछ लिए। तथाकथित बिल में प्रावधान जोड़ा गया था कि देश में कहीं भी कोई दंगा होगा तो उसका दायित्‍व बहुसंख्‍यक पर होगा। कोई भी बहुसंख्‍यक अपने विरोध में पारित किए जाने हेतु प्रस्‍तावित ऐसे बिल से क्‍या महसूस करेगा, उसके दिल पर क्‍या बीती होगी इसकी चिंता भला केन्‍द्र को क्‍यों हो, क्‍योंकि उसे पता है कि नाममात्र के लिए अल्‍पसंख्‍यक घोषित समुदाय की जनसंख्‍या कुछ ही वर्षों में बहुसंख्‍यक जनसंख्‍या से ज्‍यादा होगी। ऐसा होगा तो उसके शासन में बने रहने की संभावनाएं हमेशा रहेंगी।
     यदि देश में आतंकी विचारधारा पनपी है तो यह सुगमता से नहीं हुआ। इसके पनपने के कारणों का समर्थन किया गया। आतंकवाद का विस्‍तार हुआ तो आतंकवादियों को आतंक छोड़ कर समाज की मुख्‍यधारा में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया। आंतक फैलानेवालों को दण्‍ड देने के बजाय उन्‍हें शासकीय मदद से बसाने की योजनाएं बनने लगीं। परिणामस्‍वरूप अल्‍पसंख्‍यक अनपढ़, बेरोजगार ये सोच कर आतंकी संगठनों में शामिल होने लगे कि सरकार सामान्‍य जीवन में लौटने के लिए उन्‍हें अपने खर्चे पर बसाएगी, लेकिन ऐसी योजना की कोई समय-सीमा भी तो तय होनी चाहिए। देश पहले आतंकियों का आतंक और फिर उनके पुनर्वास का खर्चा झेले, ऐसी राजनीति के पीछे केवल अल्‍पसंख्‍यक वोट का लालच ही हो सकता था। दुर्भाग्‍य से ऐसी राजनीति के अनेक प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष दुष्‍परिणाम बहुसंख्‍यकों के रूप में देश ने झेले हैं और झेल रहा है।
     आजकल समलैंगिकों के रूप में एक नया अल्‍पसंख्‍यक वर्ग तैयार हो रहा है। सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने समलैंगिकता को अवैध घोषित कर दिया है। मीडिया को इस खबर को न्‍यायालय के एक निर्णय की खबर के तौर पर छापना चाहिए था, इसका प्रसारण करना चाहिए था लेकिन यहां तो समलैंगिकता के पक्ष-विपक्ष में राजनीति, समाज, धर्म के विशेषज्ञों की तू-तू मैं-मैं के विशेष परिशिष्‍ट निकाले जा रहे हैं। इस विषय पर केन्‍द्र सरकार के राजनीतिज्ञों के वक्‍तव्‍य ऐसे टूटे हृदय और स्थिर दिमाग से आ रहे हैं जैसे कि ये आज आम लोगों की जिन्‍दगी से जुड़ा सबसे अहम विषय है। कहने का मतलब ये है कि अल्‍पसंख्‍यकों के दम पर राजनीति करने और मत हथियाने के क्रम में समलैंगिक के रूप में एक और अल्‍पसंख्‍यक वर्ग राजनीति की जमीन पर तैयार हो गया है। देश की वास्‍तविक समस्‍याओं को भूल कर अप्राकृतिक मैथुन को वैध ठहराने के लिए प्रदर्शन कर रहे लोगों की आवाज में अपनी आवाज शामिल करनेवालों की सद्बुदि्ध के लिए प्रार्थना करना जरूरी हो गया है।

20 टिप्‍पणियां:

  1. ठीक कहा । समस्या होती कहाँ है। बना दी जाती है।

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  2. देश की वास्‍तविक समस्‍याओं को भूल कर ऐसे गैर जरूरी मामलों को तूल देकर राजनीति करने और मत हथियाने के क्रम में प्रदर्शन कर रहे लोगों की आवाज में अपनी आवाज शामिल करनेवालों की सद्बुदि्ध के लिए प्रार्थना करना वाकई बेहद जरूरी हो गया है।
    'सबको सन्मति दे भगवान'

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  3. कुछ ऐसे लोग जो भारत और भारतीय संस्कृति को नापसन्द करके पाश्चात्य जीवन शैली व संस्कृति के पुजारी हैं ,सशक्त हो रहे हैं । इसमें अखबार टीवी आदि संचार माध्यम उनका प्रसार कर रहे हैं । अभी हाल में ही लिव इन रिलेशन की वैधता पर खूब चर्चाएं हुईं । चैनल वालों ने जानबूझकर इसका विरोध करने वाले एक दो ही रखे और समर्थकों में वे लडकियाँ व महिलाएं अधिक थीं जिनके लिये नैतिक मूल्यों ,चरित्र ,परिवार आदि का कोई महत्त्व नही । जाहिर है कि समर्थन की आवाजें ज्यादा तेज और आक्रामक थीं । हालाँकि फैसला कोर्ट का ही रहेगा पर इससे माहौल व विचार तो प्रभावित होते ही हैं । राजनीति इतनी भ्रष्ट हो चुकी है ?

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शनिवार (14-12-13) को "वो एक नाम" (चर्चा मंच : अंक-1461) पर भी है!
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. प्रयास, प्रयोग तक तो ठीक है, पर जब विचारधारा ध्वंस प्रेरित हो जाये तो उसका भस्म हो जाना ही उचित।

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  6. व्होट के लिए राजनेता कुछ भी कर सकते हैं |लिव इन रिलेसन,समलैंगिक मैथुन सभी को कानूनी दर्जा मिल जायेगी !
    नई पोस्ट विरोध
    new post हाइगा -जानवर

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  7. वास्तविकता से मुह छिपाने कि शुतुरमुर्ग प्रवृति बढ़ती जा रही है। तभी तो ऐसे विचार समय कि बर्बादी के अलावा कुछ नहीं। गम्भीर समस्याओ से भागने के अलावा ये कुछ और नहीं तभी तो राजनितिक दल विचार व्यक्त कर नई बहस छेड़ने देर नहीं लगाते। इसमें सहयोग पूर्ण रूप से मिडिया का होता है जिसे अपने लिए अर्थ कि प्राप्ति को देख किसी भी अनर्थ अतार्किक विषय पर बहस छेड़ने से नहीं चूकते। । सम्भवतः इस प्रकार के प्रचलन का प्रभाव विगत में भी हो किन्तु समाज में मान्यता आखिर हर वर्जना को तोर के दे दिया जाय इसका औचित्य समझ से परे है। हर तथ्यो को सिर्फ और सिर्फ मुलभुत और मानवाधिकारो से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता है। अधिकार बेसक प्रभावित न हो किन्तु मान्यताओ का प्रचार अनर्गल रूप में कर अतार्किक विचारो के प्रसार से बचना ही किसी समाज के हित में है।.. सुन्दर आलेख ....

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  8. विकेष, आप की यह बात सच है कि मीडिया के समाचार बनाने के निर्णय मार्किटिन्ग और टीआरपी की सोच पर बनते हैं, जनहित की दृष्टि से उनका क्या महत्व होना चाहिये, यह उनके शोर में दब जाता है. यह भी सच है कि भारत में बहुत सी महत्वपूर्ण समस्याएँ हैं जिन पर विचार विमर्श नहीं होता. लेकिन यह कहना कि समलैंगिक व अंतरलैंगिक लोगों के अधिकार की बात करना समय बरबाद करना है क्योंकि वे अल्पसँख्यक हैं और क्योंकि वह "अप्राकृतिक मैथुन" की बात है,सही नहीं लगी. अप्राकृतिक तो वह होता है जो प्राकृति में न हो या जिसे भगवान ने नहीं लेबोरेटरी में बनाया गया हो, पर दोनो बातें इस विषय पर लागू नहीं होतीं. किसी न किसी दृष्टि से हममें से हर एक अल्पसंख्यक है, कोई लिँग की दृष्टि से, कोई जाति की दृष्टि से, कोई उम्र की दृष्टि से, कोई धर्म की दृष्टि से, ... जब कोई समाज किसी अल्पसंख्यक गुट के मानव अधिकारों को नकारता है, तो हम सब के मानव अधिकारों को खनन होता है.

    बहस तो बहुत लम्बी हो सकती है लेकिन शायद उसे समझने के लिए भारतीय संस्कृति, पश्चात्य संस्कृति जैसी विचारधाराओं से ऊपर उठ कर मानव संस्कृति की बात करनी पड़ेगी.

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  9. भगवान् उन सबकी मति-गति दुरुस्त करें जिन्होंने इस विषय को यूँ ही उछाल-उछाल कर सब कुछ चौपट कर दिया है...
    कमाल है भाई, अब तो बहस बंद करो..

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  10. समलैंगिता को अवैध घोषित कर सुप्रीम कोर्ट बिल्कुल सही.... किया विरोध करने वाले सिर्फ वोट बैंक के लिए ये सरे हथकंडा अपना रहे हैं...

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  11. समलैंगिता को अवैध घोषित कर सुप्रीम कोर्ट बिल्कुल सही.... किया विरोध करने वाले सिर्फ वोट बैंक के लिए ये सरे हथकंडा अपना रहे हैं...

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  12. हमेशा की तरह इस समय भी ‘भारत’ में अनावश्‍यक बातों और घटनाओं का अंबार लगा हुआ है। एक अनावश्‍यक घटना घटी नहीं कि दूसरी घटने के लिए कतार में विचलित रहती है। घटनाएं क्‍या ये तो दुर्घटनाएं हैं। इनसे किसी का पेट नहीं भरता, किसी को घर नहीं मिलता, किसी को शिक्षा, कपड़े, दवाइयां, अन्‍य जरूरी सुविधाएं नहीं मिलतीं। ये बिना किसी बात के घटती हैं। इन घटनाओं का कोई आधार नहीं हैं। इनका कोई मूल, कोई मान्‍यता नहीं है। बस ये घटे रही हैं ताकि लोगों की स्‍मृति में देश के वास्‍तविक अपराधी और इनके अपराध स्‍थायी रूप से न बस जाएं......

    बहुत ही सही फरमाया..इन अनावश्यक बातों को ही हेडलाइंस बनाया जा रहा है..और समलैंगिक रिश्तों के फेवर में राहुल गाँधी जैसे नेताओं के बयान इस बात को जाहिर करने के लिये काफी है कि लोगों का ध्यान कांग्रेस की भ्रष्ट सरकार से हटकर इस अनावश्यक मुद्दे पर चला जाय...सुंदर लेख।।।

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  13. जब जनता मँहगाई की मार से उबर नहीं पा रही है, लोगों को रोटी के लाले पड़े हुए हैं, ऐसे में समलैंगिगता जैसी ओछी बात पर लोग टसुए बहा रहे हैं, कमाल है !
    ये सब काँग्रेस कि राजनीति है, ध्यान भटकाने की और देश को गर्त में ले जाने की, सही कहा आपने काँग्रेस ने हमेशा अल्पसंख्यकों की राजनीति खेली है आगे भी ये यही करेंगे इस लिए बीजेपी को आगे आना चाहिए।
    अगर बीजेपी को राष्ट्रीयता और हिंदुत्व ज़रा सी भी फ़िक्र है तो उसे अभी दिल्ली में सरकार बनानी चाहिए वर्ना अगर 'आप' और कांग्रेस आपस में मिल गए तो अगले चुनाव् में दिल्ली में बीजेपी का ख़तम होना निश्चित है … दिल्ली में एक बार बीजेपी की सरकार बन जाती फिर वो और भी सशक्त होकर आ सकते थे, लेकिन वाह रे बीजेपी ....... :(

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  14. अब गर्व से कहना चाहिए कि हम वास्तव में इन मुद्दों के साथ आधुनिक हो रहे हैं..

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  15. thought provoking badiya lekh... sachmuch aaj k waqt mein prayer karna hi ek raasta rah gaya hai.

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  16. वोट बैंक के लिए इस विषय को भुनाना गलत है लेकिन इसपर चर्चा और इसी तरह पर्दों के पीछे छुपे कई विषयों पर चर्चा अपने समाज के लिए बिलकुल जरूरी है.

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  17. नई समस्या उठा कर पुरानी और प्रमुख समस्या से जनता का ध्यान हटाने की कोशिश करना आज की राजनीति का मुख्य तरीका है...बहुत विचारोत्तेजक आलेख..

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  18. बहुत सही भाई यही व्यंग्य विडंबन हैं हमारे समय का। वोट के लिए कुछ भी करेगा। ज़रुरत पड़ी तो वर्ण संकर गांधी निदर्शन भी करेगा समलैंगिकता का।

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  19. बहुत सही भाई यही व्यंग्य विडंबन हैं हमारे समय का। वोट के लिए कुछ भी करेगा। ज़रुरत पड़ी तो वर्ण संकर गांधी निदर्शन भी करेगा समलैंगिकता का। वर्ण संकर का गांधी की संकर किस्म ही पढ़ें।

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  20. आज का छोटा वोट बेंक आने वाले समय में निर्णायक वोट बेंक भी तो बन सकता है ... बार यही सोच के कुछ नेता ऐसे कामों में लगे रहते हैं ... और कांग्रेस इन सबमें आगे है ...

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