महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Thursday, October 3, 2013

दिव्‍य-दिवस


तीसरी मंजिल का किराए का घर। घर के बाहर अहाते में खड़े-खड़े ही अद्वितीय सौन्‍दर्य से पूर्ण प्रात:काल देख रहा हूँ। पूर्व में व्‍याप्‍त सूर्य किरणों की आभा से अभिभूत। अश्विन यानि कि एक अक्‍टूबर सन दो हजार तेरह का ये दिव्‍य-दिवस। घड़ी सुबह के सवा नौ बजा रही है। अभी कुछ क्षण पूर्व ही कॉलोनी के पार्क में एक घण्‍टा व्‍यतीत करके घर लौटा हूँ। तीसरी मंजिल के घर की छत से भी ऊंचे बेलवृक्ष की दूर-दूर तक फैली, तरुण हरी कोमल पत्तियों पर सूर्य प्रकाश अनोखे आकर्षण के साथ विद्यमान है। प्रकाश के स्‍वर्णिम रंग के संग हवा मध्‍यम वेग से झूम रही है। साथ ही झूम रहा हूँ मैं अपनी आत्‍मा, अंर्तात्‍मा से। झूम रहा है सम्‍पूर्ण जग। पूर्व दिशा का आसमान नीलिमा से परिपूर्ण है। आकाश का नील निखार इसे देखनेवालों के लिए कितना मूल्‍यवान है इसकी कल्‍पना असम्‍भव है। छोटे-छोटे अंशों में आकार-प्रकार के सफेद बादलों के टुकड़े भी आसमान में यहां-वहां बिखरे पड़े हैं। बादलों के टुकड़े धीरे-धीरे आंखों से ओझल होते जा रहे हैं। नभमण्‍डल में तरह-तरह के पक्षियों का विहार देख कर अपने आप से बच्‍चों जैसा हट शुरु कर देता हूँ। कि मैं इन पक्षियों जैसे ही संसार की छत, नीली विशाल छत पर क्‍यों नहीं उड़ सकता? हे संसारकर्ता तूने मानव को कल्‍पना शक्ति तो दे दी पर उड़ने की अनमोल शक्ति क्‍यों नहीं दी? मानव शरीर पर जन्‍मजात पंख क्‍यों नहीं लगाए?
     पार्क में घूमने के बाद जिस स्‍थान पर बैठ कर प्रकृति संस्‍कार देख रहा था वह मेरे लिए एकान्‍त और अनुभूतियों की आनन्‍दमय पाठशाला बन गया। इधर कुछ दिनों से एक दिन वर्षा तो एक दिन धूप का क्रम चल रहा है। इससे प्रकृति का कण-कण स्‍वच्‍छ, साफ होकर चमत्‍कृत हो उठा है। वृक्षों, वनस्‍पतियों की चमक में जैसे संजीवनी बिखरी हुई है। जो इस अमूल्‍य निधि का जितना संग्रहण कर सकता है उसे उतना संग्रहण अवश्‍य कर लेना चाहिए। हरी दूब की ताजा फुनगियों पर तैरती हवा को स्‍पष्‍ट सुन पा रहा हूँ। दूब की ताजगी, ऊर्जा को स्‍वयं में मिला कर आगे बढ़ती हवाओं के सम्‍पर्क में जो भी आता वह स्‍वस्‍थ, आनन्‍दमग्‍न हो जाता। फूलों की खिलखिलाहट में आशाओं के उजाले सुगन्‍धा बन विस्‍तार पा रहे हैं। वृक्षों के परस्‍पर संवाद कितने सार्थक लगते। पंक्तिबद्ध हो चलती चींटियों की बातें भी सुनाई दे रही हैं। बड़ा काला चींटा भी प्राकृतिक संगीत से आत्‍ममुग्‍ध है। इसीलिए वह छोटी चींटियों की पंक्ति के ऊपर से नहीं जाता। पंक्ति के पास रुक कर वापस मुड़ता है और अपना रास्‍ता बदल देता है। जहां बैठा हूँ वहां से केवल आठ हाथ दूर दो कठफोड़वे हैं। अपनी नुकीली लम्‍बी चोंचों को दूब घास के बीच घुसाते। वहां से कुछ उठाते और चोचें ऊपर कर उसे गटक जाते। बीच-बीच में सिर पर लगे कलगी जैसे पंख के डैने फैलाते और झट से समेट देते। मेरे स्थिर शरीर को देख वे निश्चिंत हो अपने कार्य को दोहरा रहे हैं। मेरी आंखें इन पर टिकी हुई हैं। कानों में इधर-उधर उड़ते, एक डाल से दूसरी डाल पर जाते, बैठते और कलरव करते पक्षियों के स्‍वर गूंजते। मनोरम पक्षी गान से कितनी शान्ति मिल रही है! दृष्टि उठा कर पक्षियों को देखा। बहुत हलके हरे और भूरे रंग की छोटी-छोटी चिड़ियों के झुण्‍ड अप्रवासी प्रतीत होते हैं। इस मौसम के अलावा और तो कभी इन पक्षियों को इस शहर में नहीं देखा था। नीलनभ, स्‍वर्णिम सूर्य प्रकाश, पावन पवन लगातार और अधिक प्रभाव उत्‍पन्‍न करने लगे। दस इंच व्‍यास के वृक्ष के तने पर गिलहरी धरती की ओर मुंह करके पसरी हुई है। रोटी के टुकड़े को तेजी से कुतर रही है। जितनी तेजी से वह रोटी कुतरती उतनी ही तेजी से दाएं-बाएं देखती। सहसा तीन कुत्‍ते गिलहरी को झपटने के लिए तेजी से दौड़ कर आए। गिलहरी सरपट रेंगते हुए पेड़ के शीर्ष पर पहुंच गई। एक कुत्‍ता पेड़ पर चढ़ने के प्रयास में अपनी आगे की दो टांगों को देर तक इसके तने पर टिकाए रहा। अन्‍त में हताश होकर तीनों वहां से चल दिए। ये मौसम का प्रभाव ही था जो गुस्‍से में कुत्‍तों के कान खड़े नहीं हुए। पूंछ हिलाते हुए वे दूर निकल गए। एक छोटा बच्‍चा अपने पिता के साथ अभी-अभी पार्क में आया। एक व्‍यक्ति पहले से घूम रहा है। अब पार्क में कुल चार मानवजीवी हैं।
धूप अब सीधे मेरे मुंह पर पड़ने लगी। आंखें बन्‍द कर लेता हूँ। काले-महरुनी रंग के मिश्रण से बने भम्रजाल बन्‍द आंखों के अन्‍दर लहराने लगे हैं। भ्रमचित्रों के कितने ही प्रकार मेरी अनुभूतियों के मित्र बनते जा रहे हैं। कर्णप्रिय गीत भी सुनाई दे रहे हैं। गीत का संगीत आसमान का रंग-बिरंगा बादल बन अत्‍यंत प्रभावित करता है। संगीत की धुनों पर ध्‍यान बढ़ते ही उसके भावों ने असीम सहजता ग्रहण कर ली है। दिमाग और शरीर का भार जैसे संगीत की स्‍वर लहर के बराबर हो गया। दर्द जैसे धूलकण बन कर संगीत लहरों के सुखद तूफान में विलीन हो गए। इस स्थिति से पूर्व का अपने होने का अहसास जैसे इस समय छिनाल बन गया। कानों को जो कुछ सुनाई दे रहा है उसमें शास्‍त्रीय रागों ने मधुरस बिखेरा हुआ है। यह श्रवण भाव आन्‍तरिक चेतना को सींच रहा है। चेतना के आयामों को उत्‍तरोत्‍तर बढ़ा रहा है। व्‍याप्‍त सूर्यप्रकाश और गीत-संगीत परस्‍पर गुंथ गए। हवा की लगन ने उनके बन्‍धन को और प्रगाढ़ बना दिया। सब कुछ, संसार और इसकी सब दिशाएं जैसे इस भाव में एकाकार हो गए। आनन्‍दानुभव ने अपने तन्‍तुओं के रेखाचित्र बनाते हुए व्‍यावहारिक स्‍वरुप ग्रहण कर लिया है। विचार ज्‍योति का प्रकाश अन्‍धेरे कोनों में भी फैल गया है। अन्‍धेरों में उत्‍सव की चमक आ गई। मैं जैसे आकाश में स्थित एक खुली खिड़की पर खड़ा हथेली पर ठुड्डी को टिकाए हुए बादलों को देखता हूँ। ध्‍वनि उत्‍पन्‍न किए बिना अत्‍यन्‍त धीमे-धीमे चलते बादलों के अस्तित्‍व से प्रेरित होता हुआ।
आज के इस अनुभव से पूर्व अपने दो पैरों की दस उंगलियों से धरती को कितना रौंद चुका था। लेकिन सोने जैसी मिट्टी को ऐसा सम्‍मान नहीं दे पाया जितना आसमान के बादलों को दे रहा हूँ। ये जानते हुए भी कि भावनाओं, भ्रम के इन बादलों की अपेक्षा धरती की मिट्टी का सच्‍चा, सार्थक अस्तित्‍व ही मेरे जैसों का जीवन आधार है। इसलिए आंखें खोलीं। मिट्टी हाथ में उठाई। इसके प्रति दायित्‍व का निर्वाह करना है यह विचार आया। झट से उठा और पार्क में बिखरे कूड़े को एकत्रित करके कूड़ादान में डालने लगा। अन्‍त में घर की ओर चला आया।

16 comments:

  1. सुन्दर
    अति-सुन्दर
    शुभकामनायें आदरणीय-

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  2. वाह!!! आज तो आपने प्रकृतिक छटा का बड़ा ही मनोरम दृश्य खींच दिया आँखों के सामने सच इस दृश्य को पढ़ भर लेने का एहसास मात्र ही मन में एक सकरात्मकता ऊर्जा का संचार कर रहा है। वरना यहाँ तो सूर्य नारायण के दर्शन भी दुर्लभ ही होते हैं :)आभार

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  3. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (04-10-2013) को " लोग जान जायेंगे (चर्चा -1388)
    "
    पर लिंक की गयी है,कृपया पधारे.वहाँ आपका स्वागत है.

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  4. बहुत खूब ,सुंदर लेखन |
    सकारात्मक लेखन |

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  5. प्रकृति हमें नित पालती है, पोसती है। यह समझने के लिये भी आप जैसी दृष्टि चाहिये। बहुत सी सुन्दर वर्णन प्रकृति तत्वों का।

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  6. बहुत सुन्दर भाई | जय हो

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  7. आपके पोस्ट की ताजगी प्रातः समीर की तरह हिलोरें ले ले मन से टकराती रही. प्रकृति में कितना कुछ है मन को आनंदित करने के लिए.पुराने दिनों की याद भी आ गयी. अगर आप शक्ति नगर की तरफ गए होंगे तो वहाँ नांगिया पार्क देखा होगा. दिल्ली में शुरूआती तीन साल के दौरान मैं वहीँ रहा था.वही पास में रोशनआरा बाग भी था. कई बार वहाँ जाता था.

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  8. जिंदगी की भागदौड, शहरीकरण, उद्योग के चलते प्रकृति की ओर देखने का समय नहीं मिलता। हमारे आस-पास वह होकर भी आंखें मानो बंद होती है। आपकी नजर और मन का प्रकृति के प्रति आकर्षण प्रस्तुत आलेख दिखाता है। सुंदर वर्णन।

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  9. बस अपने ही बंद झरोखों को थोड़ा खोलने की जरुरत है फिर जिस मधुर अहसास को आपने शब्दों में ढाला है वो तो प्रतिपल हम पर बरसता रहता है और हम ही उलटे होते हैं..

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  10. aankhon ke saamne ke drashye ka aapne bhut sundar varnan kiya hai

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  11. हर एक का अनुभव लेकिन शब्दों का जादू। आप की तरह हर कोई ये पर्यावरण स्वच्छ रखने के लिये अपना हाथभार लगाये।

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  12. सुंदर प्रकृति के नजारों का चित्रण ...

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  13. नहुत अच्छी प्रस्तुति

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  14. आपके पोस्ट की ताजगी प्रातः समीर की तरह हिलोरें ले ले मन से टकराती रही, सुंदर सकारात्मक लेखन, सुन्दर वर्णन प्रकृति तत्वों का।

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  15. सटीक प्रस्तुति.!
    नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें!

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  16. सुंदर शब्दचित्र

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