Wednesday, September 11, 2013

किसका सहारा ले मानव-जीवन


पने दिल का हाल किसे बताऊं! मैं बहुत परेशान हूँ। रातों की नींद उजड़ गई। नींद से पहले जैसे रोज ही मौत से लड़ता हूँ। लगता रहता है कि अभी निष्‍प्राण हुआ कि तभी। पता नहीं कौन सी ललक होती है, जिसके सहारे नींद तक पहुंच कर मौत से संघर्ष रुक जाता है। सुबह की धूप में नई जिन्‍दगी फिर  से अच्‍छी लगने लगती है। मौनवश होकर प्रकृति को देखता हूँ। पेड़-पौधों, सूर्य किरणों, फूलों, नई सुबह के नए अनुभवों से पिछला सभी कुछ किसी गहरी परत के नीचे दब जाता है। रोजाना के कार्यों, संवादों को नवीनता प्रदान करने की कोशिश करता हूँ। हरेक जीवन गतिविधि के प्रति अपने पुराने विचारदर्शन को ये सोच कर नया करता हूँ कि आनेवाले गिरे हुए समय में खुद को गिरने से बचा सकूं। दिनभर की मेरी अच्‍छी जिन्‍दगी में जो बाहरी दुनिया की गन्‍दगी प्रवेश करती है उस से मजबूती से भिड़ने के लिए अपने अन्‍दर खाने को अपनी ही संवेदनाओं की खुराक देता हूँ। लेकिन दिन बीतने और रात के शिकंजे में खुद को एक बार फिर  से पड़ा देख मैं डर जाता हूँ और देर रात तक डर के वशीभूत हो कभी अपनी मौत तो कभी दुनियावी छिछलाहट के अनुभवों के संग युद्ध करते-करते आखिर में नींद में होता हूँ। नींद में भी सपनों की ऐसी श्रृंखला बनती है जो जीवन, मृत्‍यु और मृत्‍यु के बाद भी देखे जा सकनेवाले ऐसे दृश्‍यों को मानस-पटल पर अंकित कर देती, जिनसे सुबह उठने से लेकर कई दिनों तक छुटकारा नहीं मिलता। कभी अपने हाथ की लकीरों में अपना व्‍यक्तित्‍व पढ़ता हूँ तो कभी हाथों से किए जानेवाले श्रम के बलबूते अपने भाग्‍य को गढ़ने, सुधारने के प्रयत्‍न करता हूँ। कमबख्‍त नींद भी तो काम के वक्‍त पर आती है। सुबह नहाने के बाद सोने का मन होता है। लेकिन इस वक्‍त सो नहीं सकता। सुबह ने जागने का दायित्‍व जो सौंप रखा है। परिवार के साथ जो रह रहा हूँ। साधु-सन्‍त तो हूँ नहीं कि योग करते-करते ही नींद की झपकी ले ली या नींद खुलते ही योग-ध्‍यान में लीन हो जाऊं। पड़ोसी जब दुखों, समस्‍याओं से थोड़ा-बहुत उबर कर बहुत दिनों के बाद नजर आता है तो मुझे पता चलता है कि कुछ दिनों पूर्व से वो कितने कष्‍टों में है। खुद से घृणा होने लगती कि पड़ोसी की मुसीबत की कोई खबर ही नहीं तुझे। अपने लिए अपनी नजर की घृणा में तब कमी होती है जब पड़ोसी को कहते हुए सुनता हूँ कि भाई साहब आप खुद ही परेशान और दुखी हैं, ऐसे में आपको बताना, तंग करना ठीक नहीं समझा। अपनी हालत ये हो गई कि किसी की मदद करने की दिली इच्‍छा को भी दबा देना पड़ता है। भिखारी को भीख देने के लिए जेब में हाथ डालता हूँ तो मुंह से व्‍यवस्‍था और व्‍यवस्‍थापकों के लिए अपशब्‍द निकल पड़ते हैं। वो हाथ फैलाए बैठा रहता है और मैं विडंबना से ग्रसित होकर दूर निकल जाता हूँ। परिवार सहित आत्‍महत्‍या करनेवालों के प्रति प्रगाढ़ सहानुभू‍ति होती है। बिना किसी रोग, दुर्घटना के केवल समाज-सरकार की तीव्र उपेक्षा से एक परिवार इकाई जब मौत को गले लगा ले और शासनाधीश इस ओर निश्चिंत हों तब उसके लिए जीवित होना न होना एकसमान होता है। ऐसे में उनके लिए एकमात्र रास्‍ता आत्‍महत्‍या ही होता है। फिर  भी मौत की नींद में समाने के बाद भी जो सपने वे देखते हैं वहां भी पास-पड़ोसवाले, नाते-रिश्‍तेदार उन्‍हें कोसते हुए ही नजर आते हैं। लोगों की छीछालेदर वे मौत के बाद भी झेल रहे होते हैं। अकेले रह रहे बूढ़े दम्‍पत्तियों और लावारिश बच्‍चों को देख कर कैसे लग सकता है कि भारत निर्माण हो रहा है। सरकार भ्रूण हत्‍या खासकर कन्‍या भ्रूण हत्‍या को अपराध मानती है। भ्रूण की मौत पे शायद इतना दुख न हो जितना भ्रूण के पांच-छह फुट के मानव में बदलने के बाद जीते जी हो रही उसकी सामाजिक हत्‍या से होता है। समाज की देखरेख जब सरकार करती है तो समाज सुधार भी करे। भ्रूण के मानव के रुप में पलने-बढ़ने के लिए अनुकूल सामाजिक वातवारण भी तो निर्मित करे। जो आया ही नहीं उसकी चिन्‍ता काहे की। जो हैं चिन्‍ता के केन्‍द्र में वे होने चाहिए। स्‍वाभाविक, स्‍वच्‍छन्‍द जीवनयापन पर आधुनिकता की मोटी जंग जम गई है। एक-दूसरे को लाख दिलाशाएं देते हुए हम सब जीवन में आशावादी बने रहने की कितनी भी कोशिश क्‍यों न करें लेकिन सच ये है कि सभी आम लोग घोर निराशा में जी रहे हैं। लोग आस्‍था-अनास्‍था को लेकर झगड़ रहे हैं। कोई विज्ञान तो कोई धर्म-ईश्‍वर के पक्ष में खड़ा दीखता है। पर मनुष्‍य जीवन की क्षणभन्‍गुरता और क्षणभन्‍गुर जीवन की समस्‍याएं पूर्व युगों की तरह इस युग में भी जस की तस हैं। इन्‍हें न तो विज्ञान-वैज्ञानिक समाप्‍त कर पाए हैं और ना ही धार्मिक-ईश्‍वरीय शक्तियां खत्‍म कर पाईं हैं। तो फिर  कौन  है  जिसका सहारा लेकर मानव जीवन का आत्‍मविश्‍वास बढ़े। यदि मानव जीवन धर्म-प्रणालियों से परे केवल नवजात बच्‍चे जैसी भाव-विह्वलता लेकर गुजरे तो कितना अच्‍छा हो। इस दिशा में यदि सामाजिक प्रयास, प्रयोग होते हैं तो इसके लिए अनेक शुभकामनाएं हैं।

13 comments:

  1. बहुत बढ़िया -
    आभार आदरणीय-

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  2. समय के साथ समाज देश कानून में बदलाव होने चाहिए......
    सकारात्मक आलेख !!

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  3. बहुत बढ़िया एंव सकारात्मक आलेख विकेश जी आभार।

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  4. मुझे तो इन सब समस्याओं का कोई हल ही नज़र नहीं आता बदलाव होने चाहिए यह सभी चाहते हैं मगर बदलाव लाने वाले उस बदलाव के विषय में सोचना तक नहीं चाहते तो ऐसे में आम आदमी करे भी तो क्या...

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  5. दुनिया में जितनी सारी समस्याएं हैं, निश्चित तौर पर सबका निदान सम्भव है...निजी तौर पर मेरा मानना है कि बहुत सी चीजों के लिए हम जिम्मेवार हैं ...बुनियादी दिक्कत है कि हम अपनी प्रकृति भूलते जा रहे हैं ...यह भी तय है कि जो कुछ भी होगा, आम आदमी की तरफ से होगा....

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  6. दुःख ऐसी चीज है जिसका अनुभव हर मनुष्य को होता है. आज के खोखले होते जा रहे समाज में ज़ाहिर है दुःख के कई कारण है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं की दुःख स्थायी होता है. जीवन एक सुन्दर भेंट है ईश्वर के द्वारा दिया हुआ. सबसे ज्यादा सुख उसी में है कि स्वयं का कर्म, व्यवहार सच्चा और इमानदार रख सकें. मेरा तो यही मानना है की जो यह पालन करता है उसका घर बहुत टिकाऊ और मज़बूत होता है चाहे तात्कालिक कितनी भी परेशानियां क्यों न उठानी पड़ें.

    सामूहिक आत्महत्या करने वालों से सहानुभूति का विचार अच्छा नहीं लगा. एक आदमी के गलत निर्णय से कई जीवन अकाल-कवलित होते हैं. चाहे परिस्थितियां कितनी भी विपरीत क्यों ना हों, आत्महत्या गलत है. जीवन की असीम संभावनाओं का पता तभी तो चले जब जीवन हो.

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  7. गंभीर आलेख ... समाज में बदलाव आए .. मगर कैसे ... कोई भी समाज अपने आपसे नहीं बदलता, बदलते हैं लोग .. नेतृत्व होता है तो बदलाव ही होता है ... वर्ना ऐसे सामूहिक आत्महत्या के ख्याल भी आते हैं ओर चले जाते हैं साहस नहीं आता ...

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  8. जब हर तरफ आधा खाली ग्लास ही दिखाई पड़े तो क्या कहा जाए ?

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  9. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - शुक्रवार - 13/09/2013 को
    आज मुझसे मिल गले इंसानियत रोने लगी - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः17 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra





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  10. रात से घबराता हूँ, दिन निकलते ही निश्चिन्त हो जाता हूँ।

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  11. मानव जीवन धर्म-प्रणालियों से परे केवल नवजात बच्‍चे जैसी भाव-विह्वलता लेकर गुजरे तो कितना अच्‍छा हो।

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  12. viyvastha se nirash vykti ki mnodash ka aapne achha varnan kiya hai

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