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रविवार, 18 अगस्त 2013

आवश्‍यकता युवा वेदान्तियों की


हाथों से आंखें मसल रहा हूँ। बन्‍द आंखों के अन्‍दर अन्‍धकार व्‍याप्‍त है। तारे टिमटिमाते लग रहे हैं। वहां पर शीघ्रातिशीघ्र बनती-बिगड़ती समस्‍त श्‍यामाकृतियां उद्देश्‍यहीन हैं परन्‍तु तब भी उनमें एक अनोखा आकर्षण है। मैं इस आकर्षण से बचने की सोचता हूँ। आंखें खोल वापस वास्‍तविकता को देखने का प्रयास करता हूँ। लेकिन ठोस जगत, प्रत्‍यक्ष भौतिकीय चराचरों को देख कर उपजनेवाले दु:ख की याद आते ही आंखों को बन्‍द ही रखने का निर्णय किया।
     बन्‍द नयनों में सर्वप्रथम स्‍वयं का साक्षात्‍कार हुआ। अपने होने न होने का मूल्‍य तय हुआ। अपनी उपयोगिता, दायित्‍व के विचार कौंधे। जीवन-यात्रा के लक्ष्‍य, उनकी प्राप्ति-अप्राप्ति, समाज पर उनके सद्प्रभाव और मृत्‍यु के बाद मेरे भौतिकीय अस्तित्‍व के शून्‍यानुभव इत्‍यादि का मन्‍थन चलता रहा। विचारों की झुलसा देनेवाली ऐसी लपटें जब भी उपस्थिति होती हैं तो लगता है मैंने कुछ भी नहीं किया। संसार की सुन्‍दरिमा को बढ़ाने के लिए कितना कुछ किया जा सकता है। जीवन को जगाने और ऊपर उठाने के लिए कितने काम ऐसे हैं, जो स्‍वयं को स्‍वयं की अनुमति मिलते ही हो सकते हैं। लेकिन अज्ञात आत्‍म-संकीर्णता ने जीवन के प्रारम्‍भ से ही व्‍यवधान उत्‍पन्‍न किए हुए हैं। पहले इन व्‍यवधानों से संघर्ष करो। अबोध रहते-रहते इनके वश में आए स्‍वयं का स्‍वतन्‍त्र विश्‍लेषण करो। विश्‍लेषण करते-करते यदि जीवन-सन्‍ध्‍या में जीवन अभिबोध जागृत हो भी जाता है तो जीवन शरीर का इतना क्षरण हो चुका होता है कि वह व्‍यावहारिक रुप से कुछ भी अच्‍छा करने की स्थिति में नहीं रहता। तब एकमात्र पथ दृष्टिगत होता है। कि वेदान्‍त बन जाओ, सुविचार प्रवाहित करो। नवजातों के लिए सुसंस्‍कारित समाज की स्‍थापना करो।
     यह प्रक्रिया अनादिकाल से चल रही है। परन्‍तु वृद्ध वेदान्‍ती, संस्‍कारी, धर्म-प्रचारक युवाओं को युवा रहते-रहते ऐसे ज्ञान सूत्र नहीं समझा पाते। और यदि ऐसे ज्ञान सूत्र केवल वृद्ध मनुष्‍यों के मध्‍य ही प्रसारित-प्रतिष्‍ठापित होंगे तो इनको व्‍यवहार में बदलने का स्‍वप्‍न क्‍या कभी पूर्ण हो पाएगा? क्‍योंकि संसार में संज्ञान, संस्‍कार, सदकर्मों को व्यवहृत स्‍वरुप देनेवाला एक ही है, और वह है युवा। यदि मनुष्‍य युवा रहते हुए धर्ममार्गी, सुविचारी, संस्‍कारी बन जाए तो सामाजिक विसंगतियां एक निश्चित समयावधि में समाप्‍त हो जाएं। इसके लिए शासकीय सरोकार भी निरन्‍तर बना रहना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्‍य से विसंगतियों की नींव पर खड़ा शासन ऐसे किसी नवप्रवर्त्‍तन की स्थिति में नहीं है।
     बन्‍द नयनों के भीतर फैले हुए अन्‍धेरे का आकर्षण अब अव्‍यावहारिक लगने लगा। इच्‍छा हुई कि इस आकर्षण के आधार पर जो नवसंकल्‍प मैंने लिए वे खुली आंखों के सामने बाहर तैयार हों। वे भौतिक संसार को सद्सिंचित करें। जितने भी युवक-युवतियां हैं वे सब वेदान्‍ती, धर्माधिकारी, सुविचारी, संस्‍कारी हों और वृद्धों की सेवा-सुश्रूषा करें। संसार को स्‍वर्ग बनाने के लिए क्‍या दुनिया को युवा वेदान्तियों की आवश्‍यकता नहीं है? नहीं है तो अवश्‍य होनी चाहिए।

15 टिप्‍पणियां:

  1. समय की मांग के अनुरूप सही विषय उठाया है , संस्कारों को बंद आँखों से देखने का नतीजा आज पाश्चात्य देश भुगत रहे है अब कल ही जो फेस बुक पर वीडियों सामने आया है जिसमे एक अंग्रेज युवती एक अस्सी के मुह पर थूक रही है, उसे लात मार रही है, ये तो तथाकथित सभ्य लोगो की वर्तमान पीढी के संस्कार है !

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  2. होना तो यही चाहिए मगर युवाओं में यह गुण आए कहाँ से ???

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  3. बिल्कुल ऐसा होना चाहिए.....
    लेकिन आज के युवा को एन चीजों में इंटरेस्ट ही नहीं...

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  4. बहुत ही सुंदर और सार्थक प्रस्तुती, आभार।

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  5. संसार में संज्ञान, संस्‍कार, सदकर्मों को व्यवहृत स्‍वरुप देनेवाला एक ही है, और वह है युवा। यदि मनुष्‍य युवा रहते हुए धर्ममार्गी, सुविचारी, संस्‍कारी बन जाए तो सामाजिक विसंगतियां एक निश्चित समयावधि में समाप्‍त हो जाएं....
    सौ फीसदी सही..पर आज के तथाकथित आधुनिक युवा का इस मार्ग में आ पाना बड़ा दुर्लभ जान पड़ता है...

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  6. बात तो सच कह रहे हैं आप .....ऐसा होना भी चाहिए...हमें ही करना होगा..

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  7. बहुत ही सुंदर और सार्थक प्रस्तुती, विकेश जी आभार।

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  8. हमारी शिक्षा व्यवस्था भी अब नैतिकता व संस्कारों को पीछे छोडती जा रही है । उसके दुष्परिणाम अभी ते दिख ही रहे हैं भविष्य में बहुत कुछ भयावह होने की आसंका है । यही कारण है कि अब इस तथ्य की ओर ध्यान अधिकाधिक जा रहा है । आपका आलेख प्रासंगिक है । लेकिन ऐसे विचारों वाले लोग अब कम ही हैं । पर हैं यह भी अशाजनक है । विचार होंगे तो व्यवहार में आएंगे । आने चाहिये ।

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  9. बहुत अच्छा लगा आपका पोस्ट पढकर.लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि इस पर चिंतन मनन बस उतने ही युवा कर पाते हैं जिनकी संख्या नगण्य है. दरअसल 'आत्म-उत्थान' के चक्कर में आज ज्यादातर लोग किसी भी हद तक गिरने को तैयार हैं. उम्मीद है वो लोग कभी उस भौतिक रौशनी से हटकर सच्ची रौशनी देख पाएं.

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  10. बहुत अच्छी सोच
    ऐसा हो सके तो बहुत बढ़िया

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  11. होना तो ऐसा ही चाहिए, पर भौतिकता की दौड़ में हम कहाँ देना चाहते हैं ये संस्कार अपने बच्चों में. हमारा सिर्फ एक उद्देश्य होता है कि पढ़ लिख कर वे अधिक से अधिक पैसा कमायें. आवश्यकता है बचपन से ही व्यवहारिक शिक्षा और वेदान्त ज्ञान का सामंजस्य स्थापित करने की बच्चों में, जिससे वे एक सार्थक इन्सान बन पायें.

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  12. "यदि मनुष्‍य युवा रहते हुए धर्ममार्गी, सुविचारी, संस्‍कारी बन जाए तो सामाजिक विसंगतियां एक निश्चित समयावधि में समाप्‍त हो जाएं"

    सहमत हूं आपकी बात से पर जिस दिशा में आज का युवा चल रहा है उसको कैसे बदला जाए ... अर्थ के महत्त्व को कैसे योग के महत्त्व में बदला जाए ... आकर्षण कसे लाया जाए जो युवाओं को आकर्षित करे ...

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  13. आप के विचारों से सहमत परंतु आज के समय में जहाँ पश्चिमी सभ्यता का अंधानुकरण युवाओं के बड़े वर्ग को जीने का आसान रास्ता लगता है.
    वहाँ कैसे पैदा होंगी उनके भीतर ये भावनाएँ ?

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  14. बन्द आँखों के अन्दर आत्मा का उजाला है, थोड़ा और ध्यानस्थ होने पर दिखने भी लगेगा।

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