महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Sunday, August 11, 2013

इक्‍कीस वर्ष पुरानी डॉयरी



डेढ़ दिन से घर में अव्‍यवस्‍था फैली हुई है। आवश्‍यक-अनावश्‍यक वस्‍तुओं को अलग-अलग किया जा रहा है। इसी क्रम में अपनी पुरानी पुस्‍तकों, डायरियों, कागजों, प्रपत्रों के सम्‍पर्क में आया। जब से लिखना शुरु किया था तब ही से अनेक डायरियां, पुस्‍तकें, सन्‍दर्भ प्रलेख और प्रपत्रादि मेरे पास हमेशा उपलब्‍ध रहे। पढ़ाई, नौकरी के लिए स्‍थानांतरण होने पर कुछ विशेष डॉयरियां, पुस्‍तकें इत्‍यादि भी मैं हमेशा अपने साथ ही ले जाया करता। विवाहोपरान्‍त और मूल्‍यहीन समय के थपेड़ों ने अब इतना स्‍मृतिवान नहीं छोड़ा कि पहले का समस्‍त लेखन-कर्म और इसका संग्रहण एक अनुक्रमणिका के रुप में मेरे मस्तिष्‍क में सदा विद्यमान रहे।
     घर की नई-पुरानी वस्‍तुओं को रखने-हटाने के लिए जहां पर पालती मार कर बैठा हुआ था, पुरानी डॉयरियों को पढ़ते हुए वही स्‍थान मेरे लिए विगत के सुनहरे दिनों में झांकने की खिड़की बन गया। इन्‍हें पलटते-पढ़ते सन् 1991 में मुद्रित आठ इंच लम्‍बी और चार इंच चौड़ी एक महरुन रंग की डॉयरी हाथ आई। यह मेरी सबसे प्रिय डॉयरियों में से एक है। बाईस वर्ष पुरानी यह डॉयरी अब तक मेरे साथ है। स्‍नातक की पढ़ाई के दौरान यह डॉयरी बड़ी बुआ के पुत्र के पास हुआ करती थी। वे इसमें अंग्रेजी शब्‍दों के हिन्‍दी अर्थ लिखा करते थे। उन्‍होंने न जाने क्‍या सोच कर इसे मुझे दे दिया। उन्‍होंने पृष्‍ठ संख्‍या 3 पर यदि कुछ लिखा होता था तो इससे आगे के पांच-दस पृष्‍ठ खाली होते और उनके बाद फिर आगे के पृष्‍ठों पर कुछ लिखा होता था। मुझे मिलने से पूर्व साढ़े तीन सौ पृष्‍ठ की इस डॉयरी के मात्र आठ दस पृष्‍ठों में ही कुछ लिखा गया था। बाकी खाली थे। मेरे द्वारा इसमें लिखे गए कुछ संस्‍मरणों, कविताओं, चिपकाए गए कुछ मुद्रित लेखों और लिखने के बाद विचित्र मन:स्थिति में फाड़े गए कुछ पृष्‍ठों के उपरान्‍त आज भी इसके डेढ़-दो सौ पृष्‍ठ रिक्‍त हैं।
     मंगलवार 27.8.1996 को मैंने इस डॉयरी में अपना प्रथम संस्‍मरण लिखा। ये सत्रह वर्ष पुरानी बात है। शुक्रवार 30.8.1996 के संस्‍मरण में मैं लिखता हूँप्रकृति की शक्तियों एवं अनुभवों से सम्‍पन्‍न यादों और दूरियों की संरचना को ही मैं अपना संसार समझता हूँ। विशेषत: जिस युग प्रवाह में हम सम्मिलित हैं वहां तो इन दो अनुभवों को हर स्थिति-परिस्थिति में घटित होते हुए देखा जा सकता है। यह कभी भी सफल नहीं हुआ कि जिस व्‍यक्ति से हम सहानुभूति करते हैं वह सदैव हमारे सम्‍मुख रहे। बल्कि विपरीत ही होता रहा है। कि हमारा सबसे अधिक प्रिय हमसे दूर-सुदूर रहता है। भावात्‍मक मानसिकता के मनुष्‍य का संसार और उसके जीवित होने का कोमल आधार यही सब तो है। प्रिय बन्‍धु का संस्‍मरण करते हुए जो अनुभव जन्‍म प्राप्‍त करता वह गहराइयों तक निस्‍वार्थ व निष्‍कलंक बन जाए तो इससे बड़ा आश्‍चर्य संवेदनायी वसुन्‍धरा पर और क्‍या हो सकता है। यह तो मुझे ज्ञात नहीं किन्‍तु इस आश्‍चर्य को सर्वोत्‍तम कहने के लिए किसी जटिलता से समझौता नहीं करना पड़ेगा इतना अवश्‍य ज्ञातव्‍य है। नित कठोर परिश्रम सम्‍पूर्ण करते रहने से व्‍यक्ति यदि किसी की याद में विशेष रुप से रमता है, किसी को उसकी कठिनाइयों से उबारने का प्रयास बनाता है, किसी की छवि की कलात्‍मक एवं रचनात्‍मक अभिव्‍यक्ति करता है तो निसन्‍देह उसको मन्दिर में बिठा दिया जाए। वह परमात्‍मा है। रविवार 9.9.1996 का संस्‍मरणज्‍यों-ज्‍यों मैंने किए गए प्रयासों के प्रतिफल स्‍वरुप सफलता का भ्रम एकत्र किया त्‍यों-त्‍यों मुझे असफलता मिलती रही और मेरा अत:स्‍थल सघन होते हुए भी नैराश्‍य भाव से दरकता रहा। नकारात्‍मक भावनाएं मुझे अपने में खींची ले गईं। मैं नहीं चाहते हुए भी निन्‍दा और चुगली से अछूता न रहा। जिससे मेरी रचनाएं प्रभावित हुईं। बल्कि यूं कहना चाहिए कि मेरा दृष्टिकोण ही हर ओर से निष्क्रिय बन गया। जिससे मुझे मेरी अपनी रचनाएं अच्‍छी होते हुए भी नीरस लगने लगीं। किसी मित्र को उसकी खुशी में उस खुशी को दुगुना करने के बाबत मैंने स्‍वयंरचित चार पंक्तियों की शायरी कर डाली तो उसने शायरी को यह कह कर सराहा कि वह किसी बड़े लेखक की है। मैंने उसे समझाया, कवि का अर्थ जानते हो, सत्‍य और नैतिकता पर चलनेवाला ही कवि कहलाएगा। क्‍या तुम्‍हें मेरी मुखाकृति से असत्‍य-अनैतिकता का ऐसा कोई क्रूर भाव आता दिख रहा है, जिसके आधार पर तुमने मेरी शायरी को मुझसे छीन लिया?यह कह कर मैंने गर्व और कुछ खोकर पिघल जाने के भाव से दोबारा वही चार पंक्तियां दोहराईं-
                                         झूठा बयान करना तेरे बाबत लोगों में
                                        देगा न मुझे तनहाई में पल का भी चैन
                                            राह में झुके हुए थे जो अजनबीवश
                         सपनों में ढूंढेंगे तुझे फिर वही नैन
उन दिनों नई दिल्‍ली से प्रकाशित होनेवाले दैनिक नवभारत टाइम्‍स के रविवारीय परिशिष्‍ट में खुला मन्‍च नाम का एक कॉलम आता था। उसमें समाचार-पत्र की ओर से पाठकों के लिए एक प्रश्‍नोत्‍तरी संचालित होती थी। प्रश्‍न भी पाठकों के होते और उत्‍तर भी पाठक ही देते। पूछे गए प्रश्‍नों के उत्‍तर देने में मैं भी बढ़चढ़ कर प्रतिभागिता करता। सितम्‍बर-अक्‍टूबर 1996 के दौरान मैं और मेरा एक दोस्‍त खुला मन्‍च में पूछे गए प्रश्‍नों के उत्‍तर देनेवालों के रुप में प्राणपण से सक्रिय थे। प्रश्‍नों के मेरे द्वारा दिए गए कुछ उत्‍तर देखिएप्रश्‍न : प्रेम और आकर्षण में फर्क क्‍या? उत्‍तर: प्रेम से आशय व्‍यक्ति विशेष से स्‍थायी लगाव होना है। प्रेम परिवार के सांस्‍कृतिक जुड़ाव की आधारशिला होता है। प्रेम से ही दो प्रेमियों को एक साथ मरने-जीने की शपथ लेते हुए सुना जा सकता है। प्रेम के बल पर ही मैत्रीपूर्ण सम्‍बन्‍धों की स्‍थापना होती है। आकर्षण किसी की विशेष प्रभावी आदत, अंग परिचालन, व्‍यवहार करने का तरीका, मिलनसार प्रवृत्ति और सुन्‍दर रुप-शरीर को देखने से उत्‍पन्‍न होता है। इसको प्रेम का अस्‍थायी रुप भी कह सकते हैं क्‍योंकि प्रेम भी दो व्‍यक्तियों की समान वैचारिक आदत, सुन्‍दर रुप और छटा पर ही शुरु होता है।
प्रश्‍न : क्रिकेट में एक ओवर में छह गेंदें ही क्‍यों फेंकी जाती हैं? उत्‍तर: प्रारम्‍भ में जब इंगलैण्‍ड और आस्ट्रेलिया के मध्‍य क्रिकेट की श्रृंखलाएं खेली जाती थीं तो एक ओवर में आठ गेंदें फेंकने का चलन था। किन्‍तु इन दोनों देशों में सभी गेंदबाज तेज थे इसलिए उनकी क्षमता के अनुसार आठ गेंदों के स्‍थान पर छह-छह गेंदें फेंकी जाने लगीं। वैसे भी स्पिन गेंदबाजी की तकनीक मूलरुप से भारत में विकसित हुई थी। अगर इंगलैण्‍ड में हुई होती तो निसन्देह वे एक ओवर में आठ गेंदें ही रखते क्‍योंकि स्पिन गेंदबाज गेंद को एक-दो कदम से भाग कर ही फेंकता है और इस कारण वह थकता भी नहीं और एक ओवर आठ गेंदों का हो सकता था।
सत्रह-बीस वर्ष पूर्व की पत्रकारिता अपने दायित्‍व के प्रति पूर्णत: सचेत थी। तब मीडिया की विश्‍वसनीयता अधिक थी। इसीलिए राष्‍ट्रीय स्‍तर के समाचार-पत्र में कुछ छपना बड़ी बात होती थी। 
     बुधवार को अपना अस्तित्‍व नामक संस्‍मरण ब्‍लॉग पर प्रसारित किया था। इस पर श्रीमान पी.सी. गोदियाल द्वारा की गई टिप्‍पणी आज याद आ गई। उन्‍होंने लिखा था कि यह संस्‍मरण डॉयरी लेखन की याद दिलाता है और एक अरसे बाद डॉयरी में लिखे गए को पढ़ने में मजा आता है। बाईस वर्ष पुरानी अपनी इस महरुनी रंग की डॉयरी को पढ़ कर बिलकुल वैसा ही लग रहा है जैसा गोदियाल जी ने कहा था। वैसे तो डॉयरी में बहुत कुछ था। परन्‍तु उसे यूं एक ब्‍लॉग पोस्‍ट में समेटना उचित नहीं लगता। वैसे मैं शायरी पसंद नहीं करता पर फिर भी अन्‍त में एक दूसरी डॉयरी में मेरे द्वारा लिखी गई शायरी की कुछ पंक्तियां यहां प्रस्‍तुत हैं---
                         आसमां से भी ऊपर उड़ने की हसरतें थीं खत्‍म हो गईं
                        जिंदगीभर की प्‍यास बुझाने की आरजुएं बह गईं
                       सीने में उफनती थी जो हसरत सबसे अलग होने की
                      दुनिया के संग रहकर सीने से बाहर आकर सब जैसी हो गई
                    खुदा का ख्‍वाब एक दुरुस्‍त आदमी बनाने का पूरा न हो पाया है
                     खुदा के बनाए हुए आदमी ने खुदा को ही नचाया है
                     अब तो सब के साथ मैं भी खुदा की नजर में खटकता हूँ
 अब तो मेरी भी रुह बदनाम हो गई
आसमां से भी ऊपर उड़ने की हसरतें थीं खत्‍म हो गईं, तमाम हो गईं

19 comments:

  1. १७ वर्ष पूर्व का लिखा हुआ संस्मरण और शायरी सभी कुछ बहुत ही अच्छा है.भाषा पर आप का अधिकार तब भी बहुत अच्छा रहा,ऐसा प्रतीत होता है.
    'नभाटा'जैसे राष्ट्रीय स्तर के अख़बारों में छपना उन दिनों बड़ी बात हुआ करती थी.
    २१ साल पुराने पन्नों में खुद को पाना कितना आनंद दे गया होगा..इसका अनुमान लगाया जा सकता है.

    ''झूठा बयान करना तेरे बाबत लोगों में देगा न मुझे तनहाई में पल का भी चैन राह में झुके हुए थे जो अजनबीवश सपनों में ढूंढेंगे तुझे फिर वही नैन''
    बहुत खूब!

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  2. डायरी लिखना भी बेहद अच्छी बात है, आपने सही लिखा समय के साथ बहुत कुछ बदला है। और समय भी इक्कीस साल। पूरी एक पीढ़ी गुजर गयी है विकेश जी, पुरानी यादों से जुड़ना अच्छा लगता है।

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  3. आपका कहना सही है १८-२० बरस पहले अखबारों पे कुछ विश्वास होता था .. पर आज तो जैसे ध्रुवीकरण का ज़माना है ... समय और भौतिक वाद ने हर किसी को साथा के करीब या विपरीत कर दिया है ...
    आपकी इस डायरी को पढ़ना अच्छा लगा ... समय के बदलाव को भोगना और फिर उसपे दृष्टि डालना हमेशा सुखद रहता है ...

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  4. बहुत अच्छा लगा आपका इतना पुराना संस्मरण पढकर.प्रेम और आकर्षण की परिभाषा बहुत अच्छी लगी. ये पोस्ट इसलिए और अच्छा लगा क्योंकि मेरे भी अनुभव वैसे ही हैं. जैसे कि कुछ लिखे पन्नों की डायरी मुझे भी गाँव छोड़ने से पहले मिली थी और मैं उसे सहेज कर दिल्ली ले आया था. उसमे मैंने भी बी. एस. सी की पढाई के दौरान लगभग तीन साल तक नियमित कुछ ना कुछ लिखा. मुझे डायरी लिखना बहुत अच्छा लगता था.

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  5. पुरानी यादों से जुड़ना अच्छा लगता है। बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुती।

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  6. आज क्या कहूँ समझ नहीं आरहा है :) मैंने कभी अपने जीवन में अब तक कोई डायरी नहीं लिखी है। मगर सुना सभी ऐसा ही कुछ है। जैसा आपने अपने अनुभव लिखे, तो शायद यही सच होगा। अपने ही लिखे को कई साल बाद पढ़ने का अनुभव वाकई बहुत सुखद अनुभूति प्रदान करने वाला होगा। खासकर डायरी में लिखी रचनाएँ। क्यूंकि ब्लॉग पर लिखी रचनाएँ चाहे जितनी बार पढलो मगर वो एक एक पन्ना पलटकर पढ़ना और उस में लिखी बातों की यादों में खोने का मज़ा ही कुछ और होता होगा है ना :)

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  7. जब पुरानी यादें अचानक से सामने आती हैं तो उनके दृश्य चल चित्र बन आँखों के सामने विचरण करने लगते हैं | बहुत ही सुन्दर लेख लिखा विकेश भाई | लाजवाब प्रस्तुति सुन्दर शब्दावली से सुसज्जित | बधाई

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  8. सचमुच बरसों पुराने संस्मरण को पढ़ते हुए हम बीते समय को फिर से जी लेते हैं …आपकी लेखन शैली तब भी शानदार थी आज तो है ही ...

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  9. इसका अर्थ हुआ कि तुम हमेशा ही अच्छा लिखते रहे..
    शायरी नहीं पसंद है तुम्हें फिर भी शायर नज़र आ रहा है तुम में :)

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  10. विकेश आपके संस्मरण आपकी रचनाशीलता के परिचायक हैं ।मेरे विचार से तो लेखक जन्म से ही होते हैं । परिस्थितियाँ उसे जगातीं हैं और ज्ञान व परिश्रम उसे तराशने का काम करते हैं ।

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  11. यादों की खुशबू से भरी डायरी !!

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  12. वाह, डायरी का रोचक संसार।

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  13. मैंने आपका ब्लॉग पढ़ा ,बहुत ही रोचक जानकारियां |इतनी पुरानी डायरी ,की मुझसे सिर्फ कुछ ही वर्ष छोटी हैं ,

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  14. पुरानी डायरी सच में पुरानी यादों को जीवंत कर देती है...

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  15. इस तरह पुरानी चीजें मिल जाए तो गुजरा वक्त फिर से याद आ जाता है...आपकी इस पोस्ट से एक बात और जाहिर होती है कि आप पहले भी बेहतरीन लिखा करते थे।।।

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  16. तब भी बहुत अच्छा लिखते थे आप
    पुरानी डायरी अक्सर कितनी ही भूली बिसरी बातें याद दिला जाती हैं

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  17. जो सम्मुख उपस्थित हो जाए वही वर्तमान हो जाता है और उसे पुन: जी लिया जाता है..

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  18. diary writing ek ajeeb hi aadat hai aur main bhi shayad aaj se kai saal baad apni puraani diaries ko fir s epadh kar shayad aisa hi kuchh mahsoos karungi.

    post k akhir mein likhi kavita bahut achhi lagi.

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