Wednesday, July 17, 2013

समस्‍याओं की समिति



रेन्‍द्र मोदी द्वारा कांग्रेस की नीतियों पर किए गए कटाक्ष के उत्‍तर में दो दिन पहले ही अजय माकन ने कहा था कि देशभर में घूम-घूम कर युवाओं को व्‍याख्‍यान देनेवाले मोदी ने पिछले ग्‍यारह सालों से गुजरात के मुख्‍यमंत्री रहते हुए अपने लोगों के लिए किया ही क्‍या है। माकन का आरोप है कि गुजरात मिड डे मील योजना का क्रियान्‍वयन करने में राज्‍यों की सूची में नीचे से तीसरी श्रेणी में है। क्‍या माकन का आशय यह है कि मिड डे मील के नाम पर बच्‍चों को जहर खिलाकर मारा जाए। और तब इसके क्रियान्‍वयन में बिहार की तरह सूची में ऊपर बने रहने की कोशिश की जाए। मिड डे मील के नाम पर दी जा रही ऐसी सेवा का क्‍या करना जो बच्‍चों को खाने के नाम पर मौत दे रही हो। फिर गुजरात में संभ्रान्‍त परिवार इकाइयां ज्‍यादा हैं इसलिए वहां ऐसी किसी योजना की उतनी आवश्‍यकता नहीं है, जितनी कि अन्‍य राज्‍यों खासकर कांग्रेस शासित राज्‍यों में है। मिड डे मील, मनरेगा, खाद्य सुरक्षा जैसी योजनाएं किसी लोकतन्‍त्र में लोगों की सेवा उद्देश्‍य से कम और आयातित जनसंख्‍या, अनियन्त्रित अविवेकी जनसंख्‍या को भीख स्‍वरुप दान देने की तुच्‍छ इच्‍छा से ज्‍यादा पोषित हैं। इन योजनाओं का एकमात्र लक्ष्‍य मत विस्‍तार करना ही है।
     लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था के नाम पर व्‍याप्‍त मकड़जाल से दुखी होकर किसी महाशय ने कभी एक चुटुकुला लिखा था। इसमें एक व्‍यक्ति दूसरे से पूछता है कि भारत में अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने और इनका नियंत्रण व नियोजन करने के लिए कुल कितनी समितियां हैं। दूसरे व्‍यक्ति ने तपाक से कहा कि इसकी जांच के लिए भी एक समिति गठित कर ली जाए। आशय कहना का ये है कि देश में खरपतवार की तरह फैली समस्‍याओं का हल उतनी तेजी से नहीं हो पाता या कहें कि होता ही नहीं है, जितनी तीव्रता से इनकी छानबीन के लिए समितियां बना ली जाती हैं। जनहित याचिकाओं पर संज्ञान लेकर उच्‍च या सर्वोच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायाधीश समस्‍याएं सुनकर सम्‍बन्धित उत्‍तरदायी मंत्रालयों, संस्‍थानों और विभागों को आदेश तो दे देते हैं कि वे इनका हल करें। परन्‍तु सन्‍दर्भित समस्‍या का समाधान हमेशा भविष्‍य की ओट में सिमट जाता है।
    बोफोर्स तोप लेनदेन में हुई हेराफेरी की समस्‍या सालों से टालमटोल में ही रही। इसके दोषी की मौत हो जाने के बाद शायद यह अध्‍याय अब हमेशा के लिए बन्‍द हो जाएगा। भोपाल गैस कांड के आरोपियों को भी सत्‍ताधारियों ने मिलकर सुरक्षित बचा लिया था। इस समस्‍या का समाधान भी न हो सका। चारा घोटाले के आरोपी को न्‍यायालयों से एक प्रकार का समर्थन ही मिल रहा है। दिल्‍ली वसंत विहार बलात्‍कार पीड़िता की हत्‍या के बाद बनाई गई सुझाव समिति के कार्यवाहक अध्‍यक्ष न्‍यायाधीश वर्मा का निधन हो गया पर दोषियों को अभी तक दण्‍ड नहीं मिला। न जाने कितने कलंक हैं जिनके काले धब्‍बे मिटे बिना ही वे इतिहास बन जाएंगे। और अब वैज्ञानिक कुडनकुलम परमाणु संयंत्र के परिचालन पर खुशी बांट रहे हैं। इसके विरोध में हुए अनेक प्रदर्शनों और प्रदर्शनकारियों की इसे न लगाने की इच्‍छा के बावजूद सरकारी मंशा किसी भी कीमत पर या कहें अमेरिकी इच्‍छानुसार इसे स्‍थापित करने की ही थी। अपना लाभार्जन करने के बाद सरकार और उसका मार्गदर्शक अमेरिका कुछ समय तक ही इसका परिरक्षण कर पाएगा। और बाद में इसके नुकसान, नकारात्‍मक परिणाम तो स्‍थानीय जनता को ही झेलने पड़ेंगे।
     बड़े विनाश, केदारनाथ में हुई अनहोनी में हजारों मर गए। लाखों का भविष्‍य अन्‍धेरे में पड़ गया है। लेकिन विनाश के क्षेत्र से केवल 400 किलोमीटर दूर स्थित देश की राजधानी, केन्‍द्र सरकार पर इसका कोई असर नहीं है। दुख है कि असमय मौत के मुंह में समाए हजारों लोगों, लाखों पीड़ितों के लिए ना तो देशवासियों में और ना ही केन्‍द्रीय नेतृत्‍वकर्ताओं में कोई ऐसी वेदना व्‍याप्‍त हुई, जिससे अनहोनी के बाद सच्‍चे राष्‍ट्रीय ढांढस का अनुभव होता। एक महीना भी नहीं बीता कि आपदा से कार्यपालिका, विधायिका, न्‍यायपालिका, प्रेस सब का मोहभंग हो गया है। इसके विपरीत सब का ध्‍यान केवल एक महिला और उसे क्‍यों मारा गया जैसे विषय पर आकर टिक गया। नेतामंडलियां तो किसी भी समस्‍या के लिए कोई स्‍थायी और त्‍वरित हल ढूंढने के बनिस्‍पत आरोप-प्रत्‍यारोप में समय व्‍यर्थ कर रही हैं।
     ऐसे में लोगों की सहायता करने के लिए उनकी दृष्टि में सम्‍मानपूर्वक बस चुकी भारतीय सेना में यानि कि रक्षा क्षेत्र में 26 प्रतिशत प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश सीमा में कोई परिवर्तन नहीं करने का रक्षा मंत्री एंटनी का निर्णय सराहनीय है। रक्षा उत्‍पादन क्षेत्र में छब्‍बीस प्रतिशत से अधिक सीमा की एफडीआई पर मंत्रिमंडल की रक्षा समिति के पास विचार करने का अधिकार रखना एक प्रकार से देशहित में है। अन्‍य क्षेत्रों में भी एफडीआई की सीमा को तिहाई से अधिक नहीं रखा जाना चाहिए।   
         


15 comments:

  1. ये लोग हर घटना को सुलझाने के लिए सिर्फ समितियां ही बनायेंगे और कुछ नहीं समितियां बना दिए काम से सरोकार ख़त्म समस्या नहीं सुलझाना इसे... अच्छी आलेख !!

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  2. इन सरकारी लोगों को ही खाली क्यों कसूरवार ठहराएं ... जबकि हर दूसरा इन्सान खुद ही संवेदनशील नहीं रहा देश में ... आज भी सत्ता में ऐसे लोग ही आते हैं ... वो ही हमारे लीडर हैं ...

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  3. व्यवस्थायें स्पष्ट हों पारदर्शी हो और सुगम हों। भारीपन और फैलाव व्यवस्था को थका देता है।

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  4. बहुत दुख हुआ सच उन मासूम बच्चों की मौत के बारे में जानकर,कल ही यह समाचार प्राप्त हो गया था। तब से मन बहुत दुखी है। मगर प्रशासन को कोई फर्क नहीं पड़ता। क्यूंकि इनमें उनका कोई अपना नहीं था न इसलिए, वैसे तो यह कहना गलत होगा और बहुत ही अनुचित भी मगर यदि इन मासूम बच्चों में उनके भी बच्चे होते तो उन्हें पता चलता कि कैसा लगता है ऐसे हादसे के बाद। मगर गरीबों के बच्चे थे इसलिए उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा
    उन्होने तो जैसे नियम बना लिया है है कहीं भी कोई हादसा हो तो समितियां बनाकर चलते फिरते ATM यनी हम आप जैसी जनता को उसके ही पैसों से मुआवज़ा देने की बात कह दो कहने में क्या जाता है ऐसी बातें सिर्फ कही जाती है मिलता शायद ही किसी को हो और इस से होगा क्या क्या उन माँओं की गोद फिर से भर जाएगी जिनके मासूम बच्चे इस खोखली और गंदी राजनीति की बाली चढ़ गए।

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  5. वोट हासिल करने के लिए आजकल फ़ूड सेक्युरिटी, फ़ूड सेक्युरिटी चिल्ला रहे है , पता नहीं उसमे कब जहर मिला डालेंगे ! इन लोगो के तो जमीर होता ही नहीं पर जिनके पास थे उनके भी मर चुके !

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  6. कोई भी दुखद घटना कुछ दिन तक जनता की याद में रहती है और फिर पहले जैसा ही होने लगता है..सरकार जनता की इसी कमजोरी का फायदा उठाती है...

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  7. बेहद दुखद दर्दनाक और भयानक ...।
    शब्द नही हैं इस घटना के लिये । सच तो यह है कि मीडिया वाले भी या तो राजनीति पर नजर रखते हैं या हो चुके हादसों पर । देखा जाए तो भ्रष्टाचार उससे कई गुना अधिक है जो दिख रहा है । चाहे वह मध्य़ाह्न भोजन हो , आंगनबाडी हो या पंचायत ..। ईमान आस्चर्य की बात होगया है । इतने भयानक स्तर की यह पहली घटना है लेकिन अप्रत्याशित नही । खराब भोजन की शिकायतें लगातार आती रही हैं । पर वही ना कि किसी बडे आदमी का बच्चा तो नही होता न इनमें । समझदार लोग तो शुरु से ही इस योजना को गलत बता रहे हैं ।
    स्कूलों को शिक्षा केन्द्र होना चाहिये या भोजन केन्द्र । पोषण के लिये शासन कोई दूसरी राह भी तो खोज सकता है ।

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  8. बहुत सही लिखा है |
    आशा

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  9. समस्याओं के पीछे कहीं ना कहीं हम ही है जो हम दुबारा ऐसो लोगों को सत्ता में लाते हैं. सारे चोर उचक्के संसद पहुच जाते है. दशकों में गिन-चुन के ऐसे लोग संसद में आते हैं जिनका नाम आदर से लिया जा सके.

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  10. व्यवस्थायें स्पष्ट होनी चाहिए सुन्दर एंव विचारणीय आलेख विकेश जी।

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  11. एक समीति उसके ऊपर एक और समीति फिर ऊपर एक और समीति और चढ़ी फिर एक और समीति ऐसे ही समितियों का बैलेंस बना कर मामला चलता रहेगा और समस्या यों ही नीचे दबी खड़ी रहेगी | सटीक लेख और विचार प्रस्तुत किये भाई | जय हो

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  12. हमारे देश का दुर्भाग्य है कि जनता को मूल बातों की जगह अन्य बातों से भरमाया और बहलाया जाता है..उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...

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  13. शानदार पोस्ट...

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  14. किसी को संवेदनशीलता और नैतिकता का पाठ कैसे पढ़ाया जाए ? सोच ही कुंद हो जाती है..

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  15. वस्तुनिष्ठ विश्लेषण। सरकार में बैठे लोग तो दोषी हैं ही,उनके गुनाह में आम जनता भी शामिल है जो उन्हें बार-बार चुनकर भेजती है और निजी कार्यों में उसी भ्रष्टतंत्र से लाभ उठाने का प्रयास करती है।

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