Wednesday, June 5, 2013

सत्‍तू दादाजी

न्‍नीस मई दो हजार तेरह को रात्रि साढ़े नौ बजे पिताजी ने फोन पर सूचित किया कि सत्‍तू दादाजी अचानक चिरनिद्रा में लीन हो गए। सुन कर ऐसे लगा जैसे किसी ने आगे-पीछे से जोर का धक्‍का दिया हो। धड़कन बढ़ गई, हाथ-पैर कांपने लगे। कुछ क्षणों पूर्व का मेरा परिवेश जैसे मेरे लिए नितान्‍त अपरिचित हो गया। जेठ का थका हुआ अर्द्धचन्‍द्र चमकने के प्रयास में अभी लगा ही था कि मद्धिम हो कर धुंधला गया। कुछ देर बाद मां ने फोन किया। कह रही थी-चिन्‍ता मत करना, खाना खा लेना, गर्मी है परेशान न होना, गांव के हम सब लोग कल से सरसों तेल का त्‍याग करेंगे, मैंने तेरे पिता को कहा कि उसे कल बताना पर इन्‍हें तो जल्‍दी रहती है। ठीक है कहते-कहते मैंने फोन बन्‍द कर दिया। कार्यालय से घर पहुंचने तक होनेवाले नोएडा शहर के उपक्रमों को देखता रहा। साथ चल रहा साथी रोज की तरह निश्चिंत, शाब्दिक आक्रामकता से वातावरण को बिगाड़ता हुआ चलता रहा। उत्‍तराखण्‍ड के मेरे गांव, आसपास के गांवों और जिले तक सत्‍तू दादाजी की ज्‍योतिषीय ज्‍योति का प्रभाव तो था ही। प्रभावित क्षेत्र के लोगों के उत्‍तराखण्‍ड से बाहर देश-विदेश में रह रहे सम्‍बन्धियों के माध्‍यम से दादाजी का नाम, सम्‍मान, आदर एक प्रकार से अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर का भी था। लेकिन यह किसी व्‍यक्ति की सस्‍ती लोकप्रियता नहीं थी, जिसे हरेक भारतीय जाने। यह एक प्रकार की विशेष लोकप्रियता थी, जो चयनित लोगों के मध्‍य ही प्रसारित थी। इसलिए यह शहर, इसका आसमान, धरती, लोग, वाहन, अच्‍छाइयां, बुराइयां सब जैसे मेरे गांव के दादा जी को उनकी मृत्‍यु पर चिढ़ा रहे थे। क्‍योंकि मेरे अतिरिक्ति कोई उनके निधन दुख में नहीं था यहां। आज दादाजी का ज्‍योतिषीय ज्ञान, ब्रह्म विवेक, ज्‍योतिष अंक विद्या और इनके बल पर अर्जित उनका स्‍वाभिमान, दम्‍भ सब तिरोहित हो गए थे। मैं सोचता रहा वे मर गए और शहर चल रहा है पूर्व की भांति, विचित्र स्थिति है ये। घर के निकट आ कर मुझे अनमना देख साथी ने कहा क्‍या बात है, चुप क्‍यों है। उसे ज्ञात हुआ पर उसने औपचारिकतावश अच्‍छा कहा और अपने घर की ओर चल दिया। चन्‍द्रमा पुन: चमकने लगा था। घर पहुंचा तो बिजली नहीं थी। पत्‍नी को कुछ नहीं बताया। सोचा खाने से पहले बता दिया तो ये खाना नहीं खाएगी। बाद में उसे पता चला तो वह भी विडंबनात्‍मक भाव में स्थिर हो गई। पश्चिम छोर की खिड़की के निकट टेबल पर रखे प्‍लास्टिक बॉडी रुम कूलर के किनारों पर चन्‍द्रप्रकाश के तन्‍तु बिखरे हुए थे। दोपहर में अंगार बरसानेवाली हवा इस समय रिमकते हुए हलकी ठण्‍डक दे रही थी। बिजली नहीं होने के कारण शांत वातावरण में झींगुरों की तीव्र झींगुराहट, कुरकुराहट कर्णद्वारों में प्रवेश करती रही। मैं सत्‍तू दादाजी के सदैव के लिए स्थिर शरीर के निकट पहुंच गया। उनके बारे में सोचने लगा। इस अविवाहित पैंसठ वर्षीय ब्राह्मण ने कितने लोगों का अच्‍छा मार्गदर्शन किया। कितने जनकल्‍याणकारी कार्य किए। गांव में रहने पर मैं उनके पास अवश्‍य जाता था। घंटों हमारे बीच संसार, जीव-जगत के अस्तित्‍वअ‍नस्तित्‍व पर विमर्श होते। ये उनकी वाणी और ज्ञान का ही प्रभाव था कि उनकी अधिकांश व्‍यक्तित्‍व-वृद्धि की बातें मेरे कंठस्‍थ थीं। मैं उन बातों का वर्षों से अनुसरण करता हुआ आ रहा था। पारिवारिक उलझनों से घिरे रहने पर वे मेरे बताए बिना ही समझ जाते थे कि मैं किसलिए तटस्‍थ नहीं हूँ। कहते थे पूजा-पाठ करते हो। मेरे हां कहने पर पूछते कि कभी भगवान शिव को ध्‍यान से देखा है। हां कहता तो पुन: पूछते कि उनके चित्र में ऐसा क्‍या देखा है, जिसे तुमने अपने जीवन-संबल के लिए प्राप्‍त किया है। जब उन्‍हें लगता कि मेरे पास उनके प्रश्‍न का उत्‍तर नहीं है तो स्‍वयं बताने लगतेसर्प, गऊ, बैल, अनेक जीवों को कभी एक साथ बिना युद्ध के, बगैर परस्‍पर उलझन के शांत देखा है कहीं। नहीं ना। शिव के सान्निध्‍य के अतिरिक्‍त ये एक साथ कहीं और शांतमय हो ही नहीं सकते। इतनी शक्ति है शिव में। उनकी इस उक्ति के वर्णन का ध्‍येय मैं तुरन्‍त समझ गया था। तब से आज तक मैं जीवन-जंजालों से उबरने के लिए इसी शिव-ध्‍यान उक्ति का पालन करता आया हूँ। पंडितों, ब्राह्मणों में विद्यमान विसंगतियों के उन्‍मूलन के लिए उन्‍होंने इसके निमित्‍त सर्वप्रथम स्‍वयं को प्रस्‍तुत किया। देवी-देवताओं को प्रसन्‍न करने के लिए जीव हत्‍या कर्म का उन्‍होंने खुल कर विरोध किया। जीवन की गुणवत्‍ता के बाबत भी उन्‍होंने अनेक बातें बताईं थीं, जिनके परिणाम सुननेवालों के अच्‍छे व्‍यक्तित्‍व परिवर्तन के रुप में सामने आए। वे आधी रात के बाद अध्‍ययनलीन, बी.बी.सी. रेडियो पर राष्‍ट्रीय-अन्‍तर्राष्‍ट्रीय समाचारों को सुनते हुए पाए जा सकते थे। सुबह भी जल्‍दी उठ कर वे अपनी ज्‍योतिषीय गणनाओं, नवानुसन्‍धान में रमे हुए नजर आते थे। रात्रि के डेढ़ बजे बिजली आई तो उनके बारे में ये संस्‍मरण लिखने बैठा। रात के तीन बज कर दस मिनट का ये समय। बाहर व्‍याप्‍त अंधकार में चन्‍द्रमा ढूंढता हूँ। वह भी पं. सतीश चन्‍द्र बडोला, सत्‍तू दादाजी की तरह विलीन हो गया है। वैसे देखा जाए तो ऐसे लोग शरीर ही तो त्‍यागते हैं, इनके जीवन-संबल, सशक्‍त विचारों का प्रभाव तो मुझ जैसों पर आयुभर रहता है। निसन्‍देह मेरे बाद भी रहेगा।

15 comments:

  1. आपकी यह पोस्ट आज के (०५ जून, २०१३) ब्लॉग बुलेटिन - विश्व पर्यावरण दिवस पर प्रस्तुत की जा रही है | बधाई

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  2. सत्तू दादाजी के प्रति आपका प्रेम,स्नेह और श्रद्धा आदर की पात्र है। आपके साथ हमारी संवेदनाएं बनी है। दुनिया के भीतर अद्भुत ताकत के लोग है और रहेंगे भी।

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  3. दुखद खबर है.
    परन्तु आपके संस्मरण लिखने की शैली ने बांधे रखा.
    सच है सिर्फ देह छूटती है. वे हमेशा आपका मार्गदर्शन करते रहेंगे, जब भी आपको उसकी आवश्यकता होगी.

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  4. यदि आप उनके विचारों और आदर्शों को ह्रदय से मान देते हैं तो आगे तक ले जाने कि जिम्मेवारी अब आपकी भी हुई. तब वो भी प्रसन्न होंगे .

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  5. विकेश जी ,अच्छे लोगों का साथ भाग्य से ही मिलता है । सत्तू दादाजी चले गए हैं निश्चित ही दुखद है लेकिन विचारों में उन्हें हमेशा बनाए रखें । यही सच्ची श्रद्धा है उनके प्रति ।

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  6. हृदय से श्रद्धांजलि..

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  7. सच कहा आपने ऐसे लोग केवल शरीर ही त्यागते हैं ....
    उन्हें ह्रदय से विनम्र श्रद्धांजलि !

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  8. कुछ लोग अपने व्यक्तित्व की ऐसी छाप छोड़ जाते हैं जो जीवन भर साथ रहती है...आदरणीय दादा जी को विनम्र श्रद्धांजलि...

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  9. दादाजी को मेरी विनम्र श्रद्धांजलि |

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  10. दादा जी को नमन
    आपकी लेखनी दिल और दिमाग को बांधकर रख देती है कि पूरा पढ़ना
    ही है
    मार्मिक और भावुक प्रस्तुति
    सादर

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  11. जीवन में ऐसे लोग बहुत कम मिलते हैं जिनसे इस तरह की आसक्ति हो जाए. दादाजी को विनम्र नमन.

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  12. भगवान दिवंगत आत्मा को शान्ति प्रदान करे ! अच्छे और बुरे कर्म यही तो है जो इंसान के जाने के बाद निष्पक्ष होकर याद किये जाते है !

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  13. ...तो स्‍वयं बताने लगते—सर्प, गऊ, बैल, अनेक जीवों को कभी एक साथ बिना युद्ध के, बगैर परस्‍पर उलझन के शांत देखा है कहीं। नहीं ना। शिव के सान्निध्‍य के अतिरिक्‍त ये एक साथ कहीं और शांतमय हो ही नहीं सकते। इतनी शक्ति है शिव में।
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    ऐसा बताने वाले लोग हमेशा हमारा मार्गदर्शन दर्शन करते रहते हैं ....विनम्र श्रद्धांजलि...

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  14. जिन्हें हम दिल से चाहते है और और उनकी कही हुई या सिखायी हुई बातों को अमल कर अपने जीवन में अपनाते है वह लोग हमें कभी छोड़कर नहीं जाते मरता तो केवल शरीर है आत्मा कभी नहीं मरती... विनम्र श्रीद्धांजलि...

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  15. ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें।

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