महत्‍त्‍वपूर्ण आलेख

Thursday, May 9, 2013

जीवन हो बेलवृक्ष की तरह



रात के अन्‍धेरे में जब तीसरी बार पेट की खराबी ने विचलित किया तो शरीर की शक्ति चींटी के बराबर भी न रही। मेरी भावनाएं आशंका में स्थिर हो गईं। उदर रोग से पीड़ित मुझे गर्मी का भी अधिक आभास हो रहा था। लगता जैसे मेरे चारों ओर आग की भट्टी जल रही है। विचार कौंधा कि कहां यहां रेगिस्‍तान में राजधानी बना दी गई भारत की! अंग्रेज कितने समझदार थे। गर्मियों में शिमला और सर्दियों में दिल्‍ली को राजधानी बनाते थे। एकाध घंटे तक बिजली गुल रही। सोचा गर्मी से आए पसीने पर बाहर चलती हवा लगेगी और शीतलता, शांतत्‍व का अहसास होगा। लेकिन मुझे तो अब पसीना भी नहीं आता। केवल गर्मी लगती है बस। असहनीय, बेदम करनेवाली तपन महसूस होती है। इतनी रात हो गई थी। ज्‍यादा खटर-पटर करुंगा तो पत्‍नी और बच्‍ची की नींद खराब होगी, ये सोच कर बिस्‍तर पर पड़ा रहा। नींद की प्रतीक्षा में स्‍वाभाविक है विचार ब्रह्माण्‍ड का चक्‍कर लगना था।
कुछ दिन पूर्व कार्यालय के साथी के हाथ में दवाइयों का पैकेट देखा था। अपनी ओर स्थिर देख कर उसने मेरे पूछे बिना ही बताया कि पिता जी के लिए घर भिजवानी हैं। इस भेंट के बाद हमारा पुन: मिलना एकाध दिन पहले ही हुआ। उसने बताया कि दवाइयां भिजवाने के दो दिन बाद वह भी घर चला गया था। उसके गंजे सिर को देख पूछा कि ये क्‍या। उसने बताया कि पिता जी नहीं रहे। या‍द आया कि विरेन्‍द्र कुमार शर्मा जी राम-राम भाई ब्‍लॉग वाले आजकल योगाधारित आलेखों की श्रृंखला प्रस्‍तुत कर रहे हैं। आलेखों में व्‍यक्‍त उनके वाक्‍य बरबस दिमाग में उछल-कूद मचाने लगे। अरे दो चैक आए हुए हैं दो महीने पहले से अभी तक उनको नकदीकरण के लिए बैंक में नहीं डाला। क्‍या भाग्‍य है सारे काम खुद ही करो। पैदल, रिक्‍शे, बस या मेट्रो में सफर करने के नाम पर विचित्र आलस्‍य का बोध होता है। क्‍यों नहीं कोई एक आदमी मेरे ये सारे काम कर देता। एक तरह से मेरे लिए ये कार्य व्‍यर्थ हैं। पैसे का हिसाब-किताब रखो। बैंक से लेनदेन करो। किसी संस्‍था से जुड़े रह कर वहां की विसंगतियों को ढोते-ढोते नौकरी करो। क्‍या मजबूरी है यार। बस मन होता है कि आंख बन्‍द कर पड़े रहो। योगलीन रहो। बिना आलती-पालती मारे कैसे भी बैठे या लेटे-लेटे आंख बंद कर भाव-विचारों को स्थिर करने का मन होता है। पर इस बेढंगी दुनिया और इसके व्‍यवहार में कहां इन सब की अनुमति है। पिता जी की राजकीय सेवानिवृत्ति में गांव गया था। आधुनिकता के प्रशंसक मेरे पिता की अनावश्‍यक खर्च की प्रवृत्ति से मुझे चिढ़ है। इस बात पर हमारे बीच वाद-विवाद होते रहे हैं। एक तरह से वे नेहरु का और मैं गांधी का प्रतिनिधित्‍व करता हूँ। गांधी का प्रतिनिधित्‍व मैं ग्राम स्‍वराज की अवधारणा पर करता हूँ बस। इसके अलावा मैं गांधी के अन्‍य किसी सिद्धांत के पक्ष में नहीं हूँ। गांव में जैसे-तैसे डेढ़ दिन काटा। घर की बैठक मदिरालय बनी हुई थी। खण्‍ड शिक्षा अधिकारी से लेकर गांव के अधिकांश पुरुष मदिरा में मग्‍न थे। मुझे दुख हुआ कि मैं मदिरा क्‍यों नहीं पीता। मैं धूम्रपान क्‍यों नहीं करता। घर में एकत्रित तुच्‍छता के भोगी बने लोगों की भीड़भाड़ से दूर चीड़ के जंगल में पहुंच गया। चीड़ की हवा ने परिस्थिति से उपजे सिरदर्द को समाप्‍त कर दिया। मैं नासिका से लंबी-गहरी सांसें ले कर तन मन को उन्‍मुक्‍त करने लगा। मुझ जैसे लोगों का शहर से लेकर गांव तक अब केवल एक ही विश्‍वसनीय और समुचित सान्निध्‍य बचा है और यह है प्रकृति। मैं इसी के आंचल में पसर कर जीवन जी रहा हूँ।
यह सब सोचते-विचारते नींद आ गई। कमरे की पश्चिम छोरवाली खिड़की से आती ठंडी हवा पैरों के तलवों को लगी तो आंखें खुलीं। बैसाख का तप्‍त सूर्य सुबह-सुबह ही अग्नि बरसा रहा है। धन्‍य है यह बेल का पेड़ जो मेरे घर के सामने लगा हुआ है। लगता है यदि यह यहां नहीं होता तो शायद मैं चार वर्ष का समय इस कमरे में नहीं काट सकता था। इसके पुराने पत्‍तों के गिरने का क्रम अभी बन्‍द भी नहीं हुआ कि खाली टहनियों में सुकोमल हरे पत्‍ते आने लगे हैं। श्‍वेत तितलियां इसके मृदुल पत्‍तों से पराग कण ग्रहण कर रही हैं। नवपातों की हरीतिमा और तितलियों का स्‍थान परिवर्तन करता श्‍वेतास्तित्‍व.....बारम्‍बार ध्‍यान अपनी ओर आकृष्‍ट करता है। अभी पके हुए बेल पेड़ पर ही लटके हुए हैं और अधिक गर्मी पड़ने से अच्छे से पक रहे हैं। पेड़ के जड़भाग में अभी भी इसके पुराने पत्‍ते विद्यमान हैं। काश अपना जीवन, शरीर भी ऐसा ही होता! कि यह रोग व्‍याधि से पस्‍त, समाप्‍त होते-होते पुन: नया रुप ग्रहण कर लेता! ठीक बेलवृक्ष की तरह। 

20 comments:

  1. बहुत ही बेहतरीन और सार्थक प्रस्तुतीकरण.

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  2. काश अपना जीवन, शरीर भी ऐसा ही होता! कि यह रोग व्‍याधि से पस्‍त, समाप्‍त होते-होते पुन: नया रुप ग्रहण कर लेता! ठीक बेलवृक्ष की तरह।

    ...काश ऐसा होता..बहुत गहन प्रस्तुति...

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शुक्रवार (10-05-2013) के "मेरी विवशता" (चर्चा मंच-1240) पर भी होगी!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. धन्‍यवाद शास्‍त्री जी।

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  5. काश ऐसा होता हम मजबूर है बेल वृक्ष की तरह नया रूप ग्रहण नहीं कर सकते सार्थक प्रस्तुति!!मेरे ब्लॉग में साझा करें.

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  6. काश ऐसा होता हम मजबूर है बेल वृक्ष की तरह नया रूप ग्रहण नहीं कर सकते सार्थक प्रस्तुति!!मेरे ब्लॉग में साझा करें.

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  7. सुन्दर भावों की अभिव्यक्ति | काश! यह सच हो पता तो जीवन कुछ अलग ही होता |

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  8. सपना यह संसार ... यहाँ दर्द बेहिसाब है पर हम बेहिसाब सुख भी बोते हैं , जो कि उगता नहीं..

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  9. भाई ये पीना-पिलाना शुरू कर दो...फिर यही व्यवस्था एकदम स्वस्थ लगेगी...हम लोगों के लिए ब्लॉग पर भड़ास निकलना इस लिए भी ज़रूरी है की रात को नींद खुल जाती है...और दिमाग ब्रम्हांड के चक्कर लगता है...जबकि बाकि सब खा-पी के मस्त सो रहे होते हैं...

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  10. काश ऐसा होता..बहुत सार्थक प्रस्तुति.

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  11. भावपूर्ण परंतु सुंदर चित्रण। कभी फुर्सत हो तो गांधी, नेहरू और अर्थशास्त्र पर कुछ बातचीत की जा सकती है। जीवन जटिल है लेकिन जब मैं कहानी का नायक था तो छोटे-छोटे परिवर्तन कर के अपने जीवन को सरल बना सका, जैसे -
    - प्रकृति, चीड़ के जंगल या झरने के चित्र अपनी दीवार पर लगाना (जितने अधिक बड़े संभव हों)
    - बेल के पेड़ के नीचे की छोटी सी जगह में सुगंधित फूलों के वृक्ष लगाना
    - संभव हो तो घर में या/और छट पर गमलों में फल-फूल, सब्जी के पौधे लगाना
    - यदि जगह और भी कम हो तो बोन्साई लगाना


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  12. बहुत बढ़िया आलेख .दीगर है मनुष्य वृक्ष की मानिंद अपनी खाद खुद नहीं बन सकता .जीवन से भागना नहीं है भाग कोई न सके सन्यासी खुद को ,

    धोखा देते हैं गृहस्थ को भी बीच मंझदार छोड़ भाग खड़े होते हैं .गृहस्थ में साक्षी भाव रहना ही जीवन मुक्ति है . गृहस्थ में रहते विकर्म से बचो .अच्छे कर्म करो तो पूर्व जन्मों का खोट उतरे ,विकर्म विनाश हो .आगे का रास्ता साफ़ हो .

    उदर पीड़ा का शमन हो .

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  13. बहुत बढ़िया आलेख .दीगर है मनुष्य वृक्ष की मानिंद अपनी खाद खुद नहीं बन सकता .जीवन से भागना नहीं है भाग कोई न सके सन्यासी खुद को ,

    धोखा देते हैं गृहस्थ को भी बीच मंझदार छोड़ भाग खड़े होते हैं .गृहस्थ में साक्षी भाव रहना ही जीवन मुक्ति है . गृहस्थ में रहते विकर्म से बचो .अच्छे कर्म करो तो पूर्व जन्मों का खोट उतरे ,विकर्म विनाश हो .आगे का रास्ता साफ़ हो .

    उदर पीड़ा का शमन हो .
    ट्रस्टी बन रहो परिवार में मालिक बनके नहीं .सबकी सेवा करो ममत्व किसी से न हो .दिल रुपी दर्पण में अपनी शक्ल देखो हम क्या थे क्या बन गए .मनुष्य आज बन्दर से भी बदतर हो गए हैं .जो श्री मत पे नहीं चलते हैं माया रावण (विकार रुपी माया )उन्हें कोयला बना देता है .बाप (बशर्ते हम जाने बाप है कौन एक शिव बाबा ,ये लौकिक बाप तो परिवार में हमारी देह का बाप है )हमें श्री मत पे चला डायमंड बना देता है हालाकि कोयला और डायमंड हैं दोनों कारबन के ही अपरूप .Allotrophs.

    श्री मत क्या है ?हमारी सेफ्टी है जेड सिक्युरिटी है कवच है जो माया से बचाता है .माया से डरो मत

    श्री मत का कवच पहन लो .

    जो लोग न घर (परम धाम आत्मा का मूल निवास स्थान )को जानते हैं न बाप (शिव बाबा को निराकार शिव को जो नाम रूप से न्यारा है ,कण कण में नहीं है ,परम धाम वासी है ,आत्मा की तरह )को ,न रचना को न रचता को उन्हें लोग पुलिस स्टेशन छोड़ आते हैं यहाँ (लौकिक संसार में ,स्थूल मनुष्य लोक में )माया(बोले तो विकार ) ऐसे बच्चों को खा जाती है .

    नाम रूप की बीमारी में नहीं फंसना है .जो जान जाता है वह निश्चिन्त हो जाता है कहीं फंसता नहीं है .मैं आत्मा हूँ यह आत्मा कहाँ से आई है (परम धाम से )सबको याद दिलाओ खुद याद रखो .

    गॉड फादर है वह सर्वव्यापी नहीं हो सकता वैसे ही जैसे आपका लौकिक पिता सर्वव्यापी नहीं हो सकता बाप (परम पुरूष )भी नहीं हो सकता .

    शिव तो परम धाम में रहते हैं शंकर पार्वती सूक्ष्म लोक में तुम उन्हें कहाँ ढूंढ रहे हो .मंदिर मस्जिद गुरद्वारे वह तो तुम्हारा ही यादगार है तुम देवता थे .सोऽहं फिर हम सो .फिर से तुम ही देवता बनोगे बस स्वयं को आत्मा समझ देही अभिमानी बनो .श्री मत पे चलो .मनमत पर नहीं (जो मन कहे वह मत करो जो बाप कहे वह करो ).

    आत्मा की जोत फिलवक्त बुझ रही है बाप ज्ञान घृत डालते हैं हाथ मेंज्ञान घी का डिब्बा भी दे दिया है चमची चमची डालते रहो .ज्ञान से ही विकार नष्ट होंगें .

    हम हैं कौन कहाँ से आये ,अपने आपको जानो

    राज योग के द्वारा अपना परम पिता पहचानों ,

    इसी राजपथ पे चलके तुम पा लो अपना बसेरा ,

    होगा दूर अन्धेरा ,

    अंतर मन की जोत जगा लो ,होगा दूर अन्धेरा ,

    शिव का कर लो ध्यान आ रहा ,पवन पुण्य सवेरा

    ॐ शान्ति .

    योग से आत्मा की जोत जगाई (जलाई )जाती है .हम निवृत्ति मार्ग वाले हैं हट योगी नहीं है प्रवृत्ति मार्ग वाले कर्म योगी हैं गृहस्थ में रहकर जीवन मुक्ति पाते हैं .

    ॐ शान्ति .


    ॐ शान्ति

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  14. एक आकार तो मिल गया है, गति मिली है अतः आकार बदलना मना है। बस इस गति को ऊर्जा मिली रहे और तन्त्र समुचित चलते रहें। सुन्दर आलेख..

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  15. बढ़िया प्रस्तुति |सुन्दर शब्द चयन |
    आशा

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  16. बहुत खूब | बढ़िया लेखन | सुन्दर अभिव्यक्ति विचारों की | सादर

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    Tamasha-E-Zindagi
    Tamashaezindagi FB Page

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  17. गर्मियों में बेल की घनी पत्तियां गर्मी से बहुत राहत पहुचती हैं ...और बेल के फल खाने का मजा भी आजकल ही है ....मुझे बहुत पसंद हैं ....
    बहुत बढ़िया प्रस्तुति

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  18. बहुत सुन्‍दर और सार्थक रचना आभार
    हिन्‍दी तकनीकी क्षेत्र की जादूई जानकारियॉ प्राप्‍त करने के लिये एक बार अवश्‍य पधारें और टिप्‍पणी के रूप में मार्गदर्शन प्रदान करने के साथ साथ पर अनुसरण कर अनुग्रहित करें MY BIG GUIDE

    नई पोस्‍ट अपनी इन्‍टरनेट स्‍पीड को कीजिये 100 गुना गूगल फाइबर से

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  19. वाकई अपना शरीर भी बेलवृक्ष की तरह होता तो क्या बात होती
    हरदम उछलते कूदते रहते
    स्वस्थ और सुंदर रहते
    सार्थक आलेख
    बधाई

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  20. Ek taza hawakee jhonk kee tarah laga aapka aalekh!

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