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Tuesday, May 28, 2013

जनहित विधेयकों का सृजन करे सरकार




हाल ही में केन्‍द्र सरकार द्वारा किराए की एक निश्चित राशि से अधिक पर किराया समझौता (रेंट एग्रीमेंट) का पंजीकरण अनि‍वार्य करने की तैयारी का समाचार पढ़ा। प्रस्‍तावित पंजीकरण (संशोधन) विधेयक 2013 के अनुसार एक वर्ष से कम अवधि के लिए होनेवाले किराया समझौते का भी पंजीकरण कराना होगा। ग्रामीण विकास मंत्रालय के प्रस्‍तावित पंजीकरण अधिनियम के अनुसार एक निश्चित किराया के बाद किराया समझौते का पंजीकरण अवश्‍य करना होगा। किराया प्रति माह तय किया जाएगा। पंजीकरण (संशोधन) विधेयक में अनिवार्य पंजीकरण के लिए न्‍यूनतम किराया निर्धारित करने का उत्‍तरदायित्‍व राज्‍यों पर छोड़ दिया गया है। अर्थात् अलग-अलग शहरों में यह न्‍यूनतम किराया राशि विभिन्‍न हो सकती है।
     सेवा कर के लिए भी केन्‍द्र सरकार के नए प्रावधान के अन्‍तर्गत यदि कोई व्‍यक्ति निर्धारित सेवा कर का समय-सीमा में भुगतान नहीं करता है तो उसे दस वर्ष तक का कारावास हो सकता है। परिश्रमी मध्‍यम उद्योगों, वेतनभोगियों, घरेलू इकाइयों के लिए इस सरकार ने बहुत ही कठिन स्थितियां उत्‍पन्‍न कर दी हैं।
सर्वप्रथम किराया पंजीकरण की बात करते हैं। इसमें कोई राज्‍य सरकार अनिवार्य पंजीकरण के लिए यदि न्‍यूनतम किराया दस हजार रुपए प्रति माह निर्धारित करती है तो किराएदार को 2400 रुपए स्‍टांप ड्यूटी व 1100 रुपए न्‍यायालय शुल्‍क का देना होगा। अर्थात् स्‍टांप ड्यूटी के रुप में वार्षिक किराए का दो प्रतिशत देना होगा। इस तरह के विधेयक की अनुशंसा करने से पूर्व सरकार को यह विचार भी करना चाहिए कि निजी क्षेत्र के वेतनभोगियों को कंपनियों की ओर से मिलनेवाला एचआरए भत्‍ता उनके द्वारा वास्‍तविक रुप से दिए जानेवाले किराए का एक चौथाई भी नहीं होता। क्‍या इस बात को किराया समझौता पंजीकरण विधेयक की रुपरेखा बनाते समय ध्‍यान में नहीं रखा जाना चाहिए था? क्‍या कंपनी कार्य मंत्रालय के साथ मिल कर कंपनी अधिनियम के प्रावधानों को कर्मचारियों के पक्ष में लचीला नहीं किया जाना चाहिए था? क्‍या राज्‍यों द्वारा पंजीकरण के लिए निर्धारित किए जानेवाले न्‍यूनतम किराया के अनुसार कंपनियों द्वारा कर्मचारियों को दिया जानेवाला एचआरए भत्‍ता उसी अनुपात में नहीं बढ़ाया जाना चाहिए? क्‍या अब सारे कायदे कानूनों का सृजन चंद बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों, उनके खुशहाल कर्मचारियों की स्थितियों को ध्‍यान में रख कर किया जाना चाहिए? या इन्‍हें बनाते समय उन अधिकांश भारतीय कंपनियों पर भी विचार करना होगा, जो या तो कर, पूंजी इत्‍यादि क्षेत्रों में पूर्ण सरकारी अनदेखी झेल रही हैं अथवा अपने प्रति राजकीय उदासीनता के कारण कर्मचारियों के वेतन और निरन्‍तर बढ़ती महंगाई में साम्‍य स्‍थापित करने में भी स्‍वयं को असमर्थ पाती हैं।
अब बात आती है सेवा कर समय-सीमा के अन्‍दर जमा नहीं करने पर दोषियों को दस वर्षों के कारावास के विधेयक की। छोटे व्‍यापारियों, मझौले उद्यमियों की व्‍यावसायिक जरुरतों के अनुरुप सरकार आज तक उन्‍हें कोई कारगर सुविधा तो उपलब्‍ध नहीं करा पाई है। हां परन्‍तु इतना जरुर है कि वे जैसे-तैसे जो कुछ भी कमाते हैं, उस पर भी सरकार की लोलुप दृष्टि बराबर लगी हुई है। शायद यही कारण है कि सेवा कर के नाम पर छोटे व्‍यापारियों, मध्‍यम उद्योगों के स्‍वामियों से सेवा कर की तत्‍काल वसूली के लिए सरकार ने अपने मन मुताबिक निर्धारित समय में कर जमा नहीं करने के लिए फटाफट सजा का विधेयक पारित करवा दिया।

     आवश्‍यक वस्‍तुओं के मूल्‍य में प्रत्‍येक तिमाही में होनेवाली वृद्धि, आम जनता से और निजी वेतनभोगी कर्मचारियों से निरन्‍तर किसी न किसी रुप में कोई न कोई प्रभार वसूलने के लिए बननेवाले विधेयकों का संसद में बिना किसी उलझन के पारित होना, विपक्षी राजनीतिक पार्टियों का इस पर चुप्‍पी साधे रहना, ऐसी बातें हैं जिन पर जनता को नए कोण से विचार करना होगा। इसके विपरीत जनता ने जिन विधेयकों को पारित करवाने के लिए संसद पर दबाव बनाया, जिनके लिए आंदोलन-धरने-प्रदर्शन किए, उनके पारित होने के दूर-दूर तक कोई आसार नहीं हैं। देखा जाए तो जरुरत ऐसे विधेयकों को पारित करने की थी, जो आम जनता के जीवन की मूल आवश्‍यकताओं से जुड़े हुए हैं। जैसे केन्‍द्र सरकार के नेतृत्‍व में प्रत्‍येक राज्‍य में खाद्य, स्‍वास्‍थ्‍य, शिक्षा, जल, जीवन-सुरक्षा प्राधिकरणों का गठन किया जाना चाहिए, ताकि ये सम्‍बन्धित राज्‍य की व्‍यवस्‍था को प्रत्‍यक्ष रुप से अपनी निगरानी में संभाल सकें और उसके समुचित क्रियान्‍वयन के लिए बिना किसी शासकीय लम्‍बी प्रक्रियाओं के तत्‍काल निर्णय ले सकें।

12 comments:

  1. इस सरकार को जन हित की कुछ नहीं पड़ी ...
    अपना बचाव कैसे हो सके बस ये यही देखना चाहते हैं ...
    आपकी बात में दम है की जन हित की बात सरकार को करना चाहिए ...

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  2. जन हित के बारे में सोचने की फुर्सत ही कहाँ है सरकार के पास,अपनी अपनी कुर्सी बचाने के ही चक्कर में लगे हुए है,सार्थक आलेख.

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  3. नमस्कार !
    आपकी यह रचना कल बुधवार (29-05-2013) को ब्लॉग प्रसारण: अंक 10 पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

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  4. सबको साधने की बात बहुत कठिन लगती है, अभी तो तन्त्र को साधना है।

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  5. सरकार और जनहित ये तो जोक ऑफ़ थे डे हो गया भाई | सर्कार सिर्फ अपनी जेब भारती है जनता की नहीं | जनता जाये भाड़ में किसी को कोई परवाह नहीं | फिलहाल तो इस बीमारी का कोई उपचार नज़र नहीं आता भाई | आगे शायद कुछ हो जाये आने वाले कल में | तो उम्मीद बांधे रखिये | आभार

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  6. सरकार तो अपने कर्मचरियों से तरह तरह के तरीके से प्रभार वसूलना जानती है जनहित की चिंता उन्हें कहाँ है जो मूलभूत जरुरी चीजों के बिधेयक सृजन कर पारित करवाना चाहिए. सार्थक आलेख...

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  7. सरकार तो अपने कर्मचरियों से तरह तरह के तरीके से प्रभार वसूलना जानती है जनहित की चिंता उन्हें कहाँ है जो मूलभूत जरुरी चीजों के बिधेयक सृजन कर पारित करवाना चाहिए. सार्थक आलेख...

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  8. सरकार बन जाने पर जनहित की बात कौन सोचता है....बढ़िया आलेख...

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  9. लम्बी प्रसाशनिक प्रक्रिया किसी भी योजना की आत्मा को मार डालती है

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  10. कानून कोई भी बने भुगतना तो आखिर आम आदमी को ही पड़ता है. रसूख वाले क़त्ल भी करते हैं तो निर्दोष निकल के आते हैं. कितने उदहारण हैं. सुन्दर आलेख.

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  11. जनता अब किस स्तर पर धरना-प्रदर्शन करे कि उसके हित की अनदेखी किसी सरकार से संभव न हो सके..

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  12. जन हित के बारे में आज कौन सोचता है..सबको अपने हितों की चिंता है...बहुत सार्थक आलेख...

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