Saturday, March 9, 2013

महाशिवरात्रि

ॐ नम: शिवाय
इस समय रा‍त के साढ़े ग्‍यारह बजे हैं। बाहर मन्‍द हवा चल रही है। हरे वृक्षों का धीमे-धीमे हिलना अद्भुत दृश्‍य प्रतीत हो रहा है। भागदौड़, प्रतियोगिता और घोर असंवेदना के इस युग में यह रात्रि का स्थिर समय कितना स्‍वप्निल लग रहा है। पवन के धीरे-धीरे आते झोंके, कोई इन्‍हें न रोके…..। दिनभर की व्‍यावसायिक व्‍यस्‍तता से पस्‍त शरीर और दिमाग इस शांत, शीतल हवा से जैसे नया जीवन पा रहे हैं।
      रात के बढ़ते रहने से दूर सड़कों पर कम होती वाहनों की संख्‍या इस बात को प्रगाढ़ बनाती है कि रात के पंजे शक्तिशाली हैं। सभी लोग इसके नियन्‍त्रण में आ कर आराम करते हैं। यह रात ही है जो मनुष्‍य और अन्‍य प्राणियों को अगले दिन की ऊर्जा प्रदान करने के लिए अपने पास ला कर सुलाती है, ताकि सभी प्राण एक दूसरा संघर्षभरा दिन व्‍यतीत करने के लिए आवश्‍यक शक्तियां प्राप्‍त कर लें।
      रात्रि की इस त‍टस्‍थता में सब कुछ थम जाता है। सारी संवेदनाएं इसी समय पुष्पित और पल्‍लवित होती हैं। सभी स्‍नेह प्रसंग इसी रजनी प्रहर में घटित होते हैं। कठोर से कठोर हृदय  भी अपने को कहीं न कहीं किसी अहसास में डूबा हुआ पाता है। सपनों का संसार मनुष्‍य को रोज एक नए भाव-संसार की सैर कराता है। स्‍वप्‍न दशा की गति मनुष्‍य की प्‍यार-भरी भावनाओं की सबसे बड़ी प्रतीक हैं।
सोने से पहले, नींद में समाने से पूर्व मैं घर की बॉलकनी में खड़ा यह सब कुछ सोच ही रहा था कि अचानक याद आया कि आज तो महाशिवरात्रि थी। कई लोगों ने आज शिव भगवान के लिए व्रत रखा हुआ था। लेकिन वे सब शीघ्र ही खा-पीकर सो गए। दूर कहीं किसी मन्दिर से भजन गाने की ध्‍वनियां आ रही हैं। मैं उनमें त्‍यौहार का सारांश ढूंढ रहा हूँ पर अचानक और कई प्रकार की ध्‍वनियों के मिश्रण से गाया जानेवाला भजन अस्‍पष्‍ट सुनाई दे रहा है।
मेरा अनुभव है कि कुछ त्‍यौहारों का स्‍वागत वर्षा भी करती है। महाशिवरात्रि, रक्षा बन्‍धन जैसे त्‍यौहारों के दिन बूंदाबांदी जरुर होती है। अपवादस्‍वरुप किसी वर्ष बारिश न होती हो तो वो अलग बात है। लेकिन अधिक अवसरों पर आसमानी जलधाराएं पृथ्‍वी को तर कर ही देती हैं। सुबह हुई बारिश और धूप-छांव के साथ व्‍यतीत हुआ पूरा दिन मनोहारी बना हुआ था और अब रात को मौसम थोड़ा ठंडा हो गया है।
      स्‍ट्रीट लाइट के प्रतिबिम्‍ब में धरती पर पड़तीं पेड़ों की छायाएं अपनी काली परत में कई विचित्र आकृतियों से सुसज्जित हैं और उनके धीरे-धीरे हिलने से उनकी काली आकृतियां भी हिल रही हैं। धरती पर, मिट्टी पर उन आकृतियों के हिलने से मेरा मस्तिष्‍क ठंडक प्राप्‍त कर रहा है। ऐसा वातावरण अत्‍यन्‍त भोला, सुन्‍दर और संवेदनामयी लग रहा है। इस समय आकाश साफ, निर्मल और तारों से युक्‍त है। एकाध व्‍यक्ति इतनी रात बीत जाने पर यदि दिख रहा है तो वह अचम्भित कर रहा है।
      इतने आलोकित बाह्य परिदृश्‍य से अनभिज्ञ लोग घरों में, नींद में हैं। उनके लिए शाम होते ही अपने घर का द्वार बन्‍द करना कितना सरल होता है, जबकि मेरे लिए घर के अन्‍दर जाना कितना कठिन! महाशिवरात्रि की यह रात मेरी दैनंदिन की समस्‍याओं को कहीं दूर फेंक चुकी है। मैं ईर्ष्‍या और द्वेष भूल चुका हूँ। इस समय मैं पवित्र मानव हूँ, मैं धार्मिक त्‍यौहार का सच्‍चा व्रती प्रतीत हो रहा हूँ। लेकिन फिर  भी एक कमी मुझमें उपस्थित हो रही है, जो ऐसी रातों के लिए सबसे अधिक अनुपयुक्‍त है कि मुझे भी नींद आ रही है और मैं भी साधारण मानव में परिवर्तित हो रहा हूँ। सुबह अपने पर झुंझलाने के लिए कि मूल्‍यवान जीवन का एक और दिन बेकाम गया। फाल्‍गुन मास की कृष्‍ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है।
(14 फरवरी, 1999 का महाशिवरात्रि का संस्‍मरण। 14 वर्ष पूर्व के वार-त्‍यौहारों से प्रभावित होता था इसलिए संस्‍मरण लिख दिया करता था। आधुनिकता के आक्रमण ने मेरा सब कुछ चूस और निचोड़ दिया है, इसलिए अब वार-त्‍यौहारों से प्रभावित हो कुछ लिखने की योग्‍यता ही नहीं रही)

12 comments:

  1. सही कहा है आपने जीवन की आपाधापी, बढ़ती महंगाई और आधुनिकता की होड़ में त्योहारों का वह पहले वाला उत्साह कहीं खो सा गया है...
    महाशिवरात्रि की शुभकामनायें...

    ReplyDelete
  2. बहुत ही सार्थक आलेख,आभार.

    ReplyDelete
  3. बहुत ही सुन्दर संस्मरण चित्रण भाई | सही कहा आपने आज त्यौहार कब आते हैं और कब चले जाते हैं मालूम ही नहीं पड़ता | आधुनिकता और कुरीतियों की दौड़ में भागते भागते लोग अब असल त्यौहार मानना ही भूल चुके हैं | बहुत प्रभावित किया आपके संस्मरण ने |

    ReplyDelete
  4. रात्रि काल में मन निश्चय ही निशा के मोहपाश में होता है
    महाशिवरात्रि की शुभकामनाएँ !

    ReplyDelete
  5. पहले पढ़कर तो यह लगा कि अभी तो महाशिवरात्रि आयी नहीं।

    ReplyDelete
  6. वर्तमान का सच है कि अब कहाँ रह गये हैं त्यौहार,पहले मौसम,हवायें,वातावरण
    से ही त्योहारों की महक आने लगती थी,अब तो पता ही नहीं चलता
    बहुत बढ़िया लिखा आपने------

    ReplyDelete
  7. महाशिवरात्रि की शुभकामनाएँ

    ReplyDelete
  8. अब तो बस संस्मरणों का ही तो सहारा है..

    ReplyDelete
  9. सुन्दर संस्मरण ... ओर जो चित्र कागा है शव का वो भी लाजवाब है ...
    महाशिवरात्रि की शुभकामनायें ...

    ReplyDelete
  10. बहुत सुन्दर...ॐ नमः शिवाय..

    ReplyDelete
  11. वर्तमान हालातों पर संस्मरण के रूप में बहुत ही अच्छा जीवन दर्शन प्रस्तुत किया है आपने प्रभावी आलेख।

    ReplyDelete

Your comments are valuable. So after reading the blog materials please put your views as comments.
Thanks and Regards