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Sunday, March 24, 2013

महान महाप्रयाण की बुद्ध पूर्णिमा




ध्‍यानस्‍थ सिद्धार्थ
बुद्ध पूर्णिमा से तात्‍पर्य ज्ञान की ऐसी आत्‍म-चेतना से है, जिसमें निराकार अभिबोध परमानन्‍द में मन्‍द-मन्‍द लहराता है। बु‍द्ध अर्थात् ज्ञान के ब्रह्माण्‍ड का परमाणु बनना। पूर्णिमा अर्थात् परमगति को प्राप्‍त होना। इसके अतिरिक्‍त महात्‍मा बु‍द्ध का आत्‍म-बोध, बोद्धिसत्‍यत्‍व और महाप्रयाण बु‍द्ध पूर्णिमा की सर्वोच्‍च अभिव्‍यक्ति है। राज्‍य, धन, ऐश्‍वर्य, आत्‍मज-स्‍वजन, सब को छोड़ के परम जीवन सत्‍य के शोध एवं खोज में निकले और अंन्‍तत: जीवोचित बोधत्‍व को प्राप्‍त करनेवाले बुद्ध अभिज्ञान तथा आत्‍मबोध के महाप्रयाण सिद्ध हुए। वैर, ईर्ष्‍या, धर्माडम्‍बर, द्वि-चरित्रता, विश्‍वासघात, अनावश्‍यक मनुष्‍याभिनय, आग्रह-पूर्वाग्रह, भाग्‍यदुर्भाग्‍य, सम्‍बन्‍धनिबन्‍ध, आसक्ति-विरक्ति, स्‍वीकार-अस्‍वीकार, लगाव-अभाव जैसे अभिमानित मानुषिक दुर्गुणों से सुदूर आत्‍माकाश के टिमटिमाते सितारे महात्‍मा बुद्ध का जन्‍म लुम्बिनी नामक स्‍थान में हुआ था।
सिद्धार्थ भारतीय उपमहाद्वीप के उत्‍तरी क्षेत्र में एक आध्‍यात्मिक अध्‍यापक थे। उन्‍होंने बुद्धवाद की खोज की थी। सामान्‍य रुप से बुद्धों के समुदायों द्वारा उन्‍हें हमारे युग के प्रमुख बुद्धा के रुप में देखा गया। उनके जन्‍म और मृत्‍यु का समय अनिश्चित है। बीसवीं शताब्‍दी के इतिहासकार उनके जीवन समय को संभवत: 563 ईसवी से 483 ईसवी के मध्‍य मानते हैं। बुद्ध शाक्‍यमुनि के नाम से भी जाने जाते हैं। बुद्धवाद के अनेक अनुयायी मानते हैं कि उनका जीवन और उनके प्रवचन जीवन की सर्वोच्‍च सारांशित व्‍याख्‍या थे। सिद्धार्थ का जन्‍म लुम्बिनी में हुआ था। लेकिन उनका लालन-पालन एक छोटे साम्राज्‍य कपिलवस्‍तु में हुआ। ये दोनों क्षेत्र आज की तिथि में नेपाल में हैं। बुद्ध के जन्‍म के समय ये क्षेत्र या तो वैदिक सभ्‍यता की सीमा में थे या उसके बाहर, यह सुनिश्चित नहीं है। यह संभव है कि उनकी मातृभाषा एक इंडो-आर्यन भाषा नहीं थी। उनके समुदाय में जाति-प्रथा नहीं थी। उनकी सामाजिक संरचना ब्राह्मणवादी सिद्धान्‍त के अनुसार नहीं थी। उनका राज्‍य कोई राज्‍यतन्‍त्र नहीं था। वह या तो एक अल्‍पतन्‍त्र (गुटतन्‍त्र, कुलीनतन्‍त्र) के रुप में रहा होगा अथवा एक गणतन्‍त्र के रुप में निरुपित रहा होगा। परम्‍परागत जीवनी के अनुसार उनके पिता राजा सुद्धोधन शाक्‍य राष्‍ट्र के प्रमुख थे। शाक्‍य जनजाति कोसला के बढ़ते राज्‍य में कई पुरातन जनजातियों में से एक थी। महात्‍मा बुद्ध का पारिवारिक नाम गौतम था। उनकी माता रानी महामाया एक कोलियान राजकुमारी थी।
जिस रात सिद्धार्थ ने अपनी मां के गर्भ को धारण किया, रानी माया ने स्‍वप्‍न देखा कि छ: सफेद दांतोंवाला एक सफेद हाथी उसके पेट के दाईं ओर प्रवेश कर गया है। शाक्‍या प्रथानुसार रानी माया गर्भावस्‍था में कपिलवस्‍तु को छोड़कर अपने पिता के देश चली गई थी। लेकिन यात्रा के दौरान रास्‍ते में ही लुम्बिनी नाम के स्‍थान पर एक बाग में साल के वृक्ष के नीचे उसने एक शिशु जना। इस प्रकार दस चन्‍द्र माह के बाद अर्थात् पूर्णमासी को जब चन्‍द्रमा नभ में दैदीप्‍यमान था महात्‍मा बुद्ध ने जन्‍म लिया।
बुद्ध के जन्‍म दिवस को थेरेवाडा राज्‍यों में बैसाक के रुप में धूमधाम से मनाया जाता है। बहुत सी ऐतिहासिक जानकारियों के अनुसार बुद्ध के जन्‍म के सप्‍ताहभर बाद उनकी माता का देहावसान हो गया था। बालक का नामकरण संस्‍कार किया गया और उन्‍हें सिद्धार्थ नाम दिया गया, जिसका अर्थ अपने लक्ष्‍य प्राप्‍त करनेवाले से है। एकान्‍तवासी भविष्‍यद्रष्‍टा असिता अपने पर्वतों के खण्‍डहरों से बुद्ध के जन्‍मोत्‍सव में आए। संत असिता के सिर के लम्‍बे केशों में बालक सिद्धार्थ ने पैरों को फंसा लिया। इस घटना और सिद्धार्थ के अन्‍य जन्‍म चिन्‍हों का संज्ञान लेकर उन्‍होंने बड़ी विचित्र मनोस्थिति में घोषित किया कि यह बालक या तो एक महान चक्रवर्ती राजा बनेगा या एक महान सन्‍त योगी। अन्‍य मनीषियों ने भी उनके बारे में अपनी दो-दो भविष्‍यवाणियां कीं। केवल कौंडिन्‍या नामक नौजवान सन्‍त ही एक ऐसा अरहंत था, जिसने बिना किसी लाग-लपेट के स्‍पष्‍ट किया कि सिद्धार्थ एक बुद्धा बनेगा।
एक राजकुमार के रुप में सिद्धार्थ को नियति ने ऐश्‍वर्ययुक्‍त जीवन दिया था। उनके प्रतिदिन के कार्यों एवं मौसमीय भ्रमण को देखते हुए पिता राजा सुद्धोधन ने उनके लिए विशेष प्रकार के तीन राजभवन बनाए थे। पिता की इच्‍छा थी कि सिद्धार्थ एक महान राजा बने। उन्‍होंने अपने सुपुत्र को धार्मिक अध्‍ययनों और मानवीय कष्‍टों की गहन शिक्षा से अभिसिंचित किया था। सिद्धार्थ का पालन-पोषण उनकी माता की छोटी बहन महा पजापति द्वारा किया गया।
16 वर्ष की आयु में उनके पिता ने उनका विवाह यशोधरा नामक कन्‍या से व्‍यवस्थित किया। यह कन्‍या उनके समकक्ष आयु की उन्‍हीं की कोई सम्‍बन्‍धी थी। यद्यपि यह एक परम्‍परागत अनुमान है, इससे पूर्व के तथ्‍य उनके वैवाहिक जीवन के लिए ऐतिहासिक सन्‍देह उत्‍पन्‍न करते हैं। पारम्‍परिक आख्‍यानुसार यशोधरा ने राहुल नामक एक बालक को जन्‍म दिया। सिद्धार्थ ने राजकुमार के रुप में कपिलवस्‍तु में 29 वर्ष व्‍यतीत किए। यद्यपि उनके पिता पूर्णत: आश्‍वस्‍त थे कि सिद्धार्थ को उनकी इच्‍छा एवं आवश्‍यकतानुसार प्रत्‍येक सुविधा तथा वस्‍तु उपलब्‍ध कराई गई थी, तथापि सिद्धार्थ ने अनुभव किया कि उसके जीवन का परम एवं अन्तिम लक्ष्‍य सामग्री की समृद्धि नहीं है।
इस प्रकार अपने वास्‍तविक जीवन लक्ष्‍यों की खोज में 29 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ ने घर, परिवार और भव्‍य राजभवन त्‍याग दिया। वह एक अनिश्चित मार्ग पर बढ़ चले। यात्रा के दौरान सिद्धार्थ को रोग, बुढ़ापे और सार्वजनिक जीवन की कठिनाईयों से बचाने के लिए उनके पिता के अनेक प्रयासों के उपरान्‍त भी वे एक बूढ़े व्‍यक्ति के सदृश लगने लगे। जब उनके सारथी चन्‍ना ने उन्‍हें बताया कि सभी लोग और प्राणी समय के साथ-साथ बूढ़े एवं रोगग्रस्‍त हो अंतत: मृत्‍यु को प्राप्‍त होते हैं तो यह बात सुन राजकुमार सिद्धार्थ ने निर्णय किया कि वे अपनी यात्रा रोकेंगे नहीं और घर नहीं जाएंगे। यात्रा के समय उन्‍होंने अनेक रोगग्रस्‍त व्‍यक्तियों, क्षयमान शवों और अनेक सन्‍यासियों का सामना किया। इन दृश्‍यों को निकट से देख वे जीवन के प्रति गहराई तक हतोत्‍साहित हो गए। फलस्‍वरुप बुढ़ापे, रोग और मृत्‍यु से छुटकारा पाने के लिए उन्‍होंने एक तपस्‍वी का जीवन अंगीकार कर लिया। इस तरह सिद्धार्थ ने हमेशा के लिए अपने राजभवन का परित्‍याग कर दिया और अपने सारथी चन्‍ना के साथ अपने घोड़े कंथका पर सवार होकर भव्‍यतम् जीवन को पीछे छोड़ते हुए एक भिक्षु बनने के लिए महाप्रयाण किया। यह घटना परम्‍परागतात्‍मक रुप से (महान प्रयाण) के नाम से अभिवाचित की गई।
सिद्धार्थ ने भिक्षुक गृह के लिए राजागाह की गली-गली में भिक्षा मांगकर अपने तपस्‍वी जीवन का आरम्‍भ किया। राजा बिंबिसार ने सिद्धार्थ की खोज का औचित्‍य सुनने के उपरान्‍त और इससे प्रभावित होकर उन्‍हें अपना सिंहासन सौंपने का प्रस्‍ताव रखा। सिद्धार्थ ने प्रस्‍ताव अस्‍वीकार कर दिया। लेकिन उन्‍हें वचन दिया कि वे उनके राज्‍य मगध में सबसे पहले यात्रा करेंगे और वहां के लोगों को जीवन की सच्‍चाई से अवगत कराएंगे। बाद में सिद्धार्थ ने राजागाह भी त्‍याग दी और दो एकान्‍तवासी अध्‍यापकों के अधीन रहकर साधनाभ्‍यास किया। इनमें से एक अलारा कलामा द्वारा दी गई योग शिक्षा में विशेषज्ञता प्राप्ति के उपरान्‍त सिद्धार्थ को उन पर विजय पाने को कहा गया। लेकिन बुद्ध उनके अभ्‍यासों और ज्ञान से असन्‍तुष्‍ट होकर वहां से चले गए। इसके बाद वे उडाका रामापुत्‍ता के शिष्‍य बने। बुद्ध ने यद्यपि यहां पर उच्‍च स्‍तर की योगिक चेतना प्राप्‍त कर ली थी, लेकिन योगाभ्‍यास में रामापुत्‍ता की स्‍वयं को हराने की शर्त से क्षुब्‍ध हो वे यहां भी न टिक सके।
सिद्धार्थ एवं कोन्‍डाना के नेतृत्‍व में पांच संगठनों के एक समूह ने अपने तपस्‍या साधनों में उत्‍तरोत्‍तर वृद्धि करने के उद्देश्‍य से एक साथ तपस्‍या अभिक्रियाएं प्रारम्‍भ कीं। उन्‍होंने भोजन सहित लगभग समस्‍त सांसारिक वस्‍तुओं को आत्‍म-तप के माध्‍यम से त्‍याग दिया तथा अन्‍तर्ज्ञान की शोध साधना में लीन हो गए। अधिकांशत: भूखा रह कर अपने भोजन को प्रतिदिन केवल एक दाने या पत्‍ती तक सीमित कर बुद्ध अत्‍यन्‍त दुर्बल हो गए। ऐसी दुर्बलावस्‍था में एक दिन नदी में स्‍नान करते समय वे मूर्छित हो गिर पड़े। किसी तरह से वे नदी में डूबने से बच गए। सिद्धार्थ ने अपने मार्ग को साधना के विभिन्‍न संकेन्द्रित समरुपों के माध्‍यम से पुनर्प्रशस्‍त किया और आगे ही आगे बढ़ते गए।
महाप्रयाण की मुद्रा 
साधना अध्‍ययन के दौरान एकदा सहसा बुद्ध को उनके बालपन का एक क्षण याद आया, जिसमें वे अपने पिता की पर्यावरणीय व्‍याख्‍या की प्रारम्भिक अवस्‍था को देख रहे थे। इसे सुनकर सहसा वे एक ऐसी प्राकृतिक संकेन्‍द्रणा में स्थिर हो गए थे, जो आनन्‍दपूर्ण, ऊर्जायुक्‍त और ताजगीभरी थी।
तपस्‍या और योग साधना के पश्‍चात् प्राप्‍त अभिबोध तथा अनापान-सती (अन्‍दर-बाहर सांस लेने की जागृति) के बाद माना गया कि बुद्धवाद द्वारा पुकारा जानेवाला मध्‍यम पथ सिद्धार्थ ने ढूंढ निकाला। यह आत्‍मसंयम का ऐसा पथ था, जिसमें आत्‍ममुग्‍धता एवं आत्‍मवंचना के चरमोत्‍कर्ष से सुदूर होना सम्‍भव हो सका। उन्‍होंने सुजाता नामक किसी गांव की एक युवती की खीर स्‍वीकार की, जो उन पर अन्‍धविश्‍वास रखती थी कि उन्‍होंने उसकी एक इच्‍छा को पूर्ण किया है। इस प्रकार उनके दर्शन, साधना प्रकारों और परिणामस्‍वरुप दिखाई देनेवाली उनकी तेजोमय मुखाकृति से प्रत्‍येक प्राणी प्रभावित होता था।
बिहार, भारत में एक पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर उन्‍होंने कई-कई दिनों तक तपस्‍या की। यह वृक्ष बोधिवृक्ष के नाम से जाना जाता है। साधना प्रक्रिया के समय वे तब तक चक्षु नहीं खोलते थे जब तक सत्‍याध्‍ययन नहीं कर लेते थे। कौंडिन्‍या एवं चार संगठनों का विश्‍वास था कि बुद्ध ने अपने शोध का परित्‍याग कर दिया है और वे अनुशासनहीन बन गए हैं। पर उनका यह विश्‍वास शीघ्र ही असत्‍य बन गया। क्‍योंकि उनकी नकारात्‍मक धारणा के विपरीत बुद्ध ने 35 वर्ष की आयु में 49 दिनों के योग द्वारा अभिबोध प्राप्‍त किया। कुछ जीवन पद्वतियों और धर्म ग्रन्‍थों के अनुसार यह परिघटना पांचवें चन्‍द्रमास में तथा जीवन व धर्म की दूसरी आख्‍याओं के अनुसार यह लगभग बारहवें चन्‍द्रमास में हुई मानी जाती है। तब से गौतम को बुद्ध और (जागृत मनुष्‍य) के नाम से जाना गया। बुद्ध को (अभिबोधत्‍व व्‍यक्ति) के रुप में भी जाना जाता है। बुद्धवाद में प्राय: उनको शाक्‍यमुनि बुद्ध या (शाक्‍य क्‍लेन का जागृत व्‍यक्ति) भी कहा गया। इस स्‍तर पर यह विश्‍वास किया जाता है कि उन्‍होंने अभाव वंचना से ग्रसित मानव की प्रवृत्ति एवं कारण जैसी समस्‍याओं से उभरने के लिए सम्‍पूर्ण जागृति एवं आत्‍मोत्‍पत्ति को वास्‍तविकता से अनुभव किया। बुद्ध निर्णय नहीं ले पा रहे थे कि वे मनुष्‍यों को धर्म के बाबत बताएं या नहीं। उन्‍हें चिन्‍ता थी कि मानव लालच, ईर्ष्‍या और भ्रम की अतिशक्तियों के कारण धर्म की सर्वोचित सच्‍चाई समझने में असमर्थ होगा। क्‍योंकि धर्म को समझने के लिए इसकी गूढ़ता, सूक्ष्‍मता और कठिनता आड़े आएगी। किसी तरह ब्रह्मा सहमपति ने उन्‍हें आत्‍मजागृत किया और कहा कि वे धर्म के बारे में संसार को यह सोच कर बताएं कि यहां कुछ मानव ऐसे हैं जो धर्म को समझेंगे। ब्रह्माण्‍ड के समस्‍त प्राणियों से अपनी गहन लगन के कारण बुद्ध इस विषय पर उपदेश देने को सहमत हो गए।
अभिबोध अर्थात् ज्ञान प्राप्ति के बाद दो व्‍यापारी तपुसा एवं भालिका उनके प्रथम शिष्‍य बने। बुद्ध ने उनको शिक्षित करने के उपरान्‍त उन्‍हें अपने सिर के कुछ केश दिए। कहा जाता है कि आज भी वे बाल रंगून, बर्मा के श्‍वे डेगन मन्दिर में विद्यमान हैं। असिता (जिन्‍होंने बुद्ध के नामकरण पर उनके लिए भविष्‍यवाणी की थी) और अपने पूर्व गुरुओं अलारा कलामा एवं उडाका रामापुत्‍ता को अपने नवीन आत्‍मानुसन्‍धानों से अवगत कराने के लिए बुद्ध उनसे मिलने को उत्‍सुक थे। लेकिन उन्‍हें ज्ञात हुआ कि इन सभी की मृत्‍यु हो चुकी है।
अंगुलिमाल बुद्ध की शरण में
बुद्ध ने अपने शेष 45 वर्षों के जीवन में गंगा के मैदानी भागों की यात्राएं कीं। ये भाग आज उत्‍तर प्रदेश, बिहार एवं दक्षिण नेपाल में स्थित हैं। अपनी इस यात्रा में उन्‍होंने अनेक प्रकार के लोगों, जिनमें सम्‍मानित-अपमानित व्‍यक्ति, गलियों के सफाईकर्मी, अंगुलिमाल जैसे जनसंहारक भी थे, को अपने सिद्धातों एवं अनुशासन की शिक्षा प्रदान की। अंगुलिमाल उनसे इतना प्रभावित हुआ कि वह जनसंहार के कुकार्य छोड़कर उनके साथ चल पड़ा। बुद्ध के सिद्धांतों का प्रतिस्‍पर्द्धी दर्शनों एवं धर्मों की विभिन्‍न किंवदंतियों तक प्रसार हुआ।
बुद्ध धर्म समस्‍त जातियों एवं वर्गों के लिए खुला था। यहां कोई जातिगत व्‍यवस्‍था नहीं थी। कहा जाता है कि विपक्षी धार्मिक समूहों द्वारा उनकी हत्‍या का प्रयास किया गया तथा उन्‍हें कारावास में डालने का प्रयत्‍न भी किया गया। अपने धर्म के प्रचार के लिए बुद्ध के संघ ने भारत में एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान तक भ्रमण किया।
बुद्ध ने 80 वर्ष की आयु में घोषित किया कि वे शीघ्र पारिनिर्वाण स्थिति में पहुंचेंगे या एक ऐसी अवस्‍था में चिरस्थिर होंगे, जहां व्‍यावहारिक शरीर को त्‍याग कर वे अन्तिम मृत्‍युहीन दशा को प्राप्‍त होंगे। इसके उपरान्‍त बुद्ध ने अपना अन्तिम भोजन किया, जो उन्‍हें कुन्‍डा नामक लोहार ने भेंटस्‍वरुप दिया था। इसे ग्रहण करने के पश्‍चात् बुद्ध गम्‍भीर रोग से पीड़ित हो गए। रोगावस्‍था में उन्‍होंने अपने सहवर्त्‍ती को आदेश दिया कि कुन्‍डा के पास जा कर उससे कहो कि उसके द्वारा दिए गए भोजन में बुद्ध की सम्‍भावित मृत्‍यु का कोई कारण नहीं है, बल्कि उसके भोजन में तो गुण का वह परम तत्‍व छिपा था जिसने बुद्ध को अन्तिम भोजन उपलब्‍ध कराया।
महायाना विमलाकीर्ति सूत्र के अध्‍याय 3 में दावा किया गया है कि बुद्ध वास्‍तव में रोगी या वृद्ध नहीं हुए थे। उन्‍होंने समझबूझ कर सांसारिक लोगों के लिए ऐसी दशा बनाई थी ताकि वे समझ सकें कि क्षणभन्‍गुर संसार में कितने अन्‍तर्दुख और पीड़ाएं हैं तथा निर्वाण में कितनी आत्‍मशान्ति है। बुद्ध ने कहा कि तथागतों अर्थात् बौद्धों के पास धर्म का शरीर है। उनके पास पदार्थात्‍मक भोजन से चलनेवाला शरीर नहीं है। बुद्ध ने माला साम्राज्‍य कुशीनारा (वर्तमान में कुशीनगर, भारत) के परित्‍यक्‍त वनों में पारिनिर्वाण हेतु प्रवेश किया। बुद्ध के अन्तिम प्रवचन थे (कि सभी मिश्रित वस्‍तुएं समाप्‍त हो जाती हैं। अध्‍यवसाय के साथ हमेशा अपनी मुक्ति के लिए श्रम करो)। अन्‍त में वे मृत्‍यु को प्राप्‍त हुए अर्थात् महापरिनिर्वाण में विलीन हो गए। इसके उपरान्‍त उनके शरीर का दाह-संस्‍कार किया गया तथा उनके स्‍मृतिशेष स्‍मारकों और स्‍तूपों में रखे गए। इनमें से आज भी कुछ स्‍मृतिचिन्‍ह विद्यमान हैं। उदाहरण के लिए श्रीलंका का दांत का मन्दिर या (दलादा मालीगावा) नामक स्‍थान ऐसा ही एक स्‍थान है, जहां बुद्ध के दाईं ओर के दांत के अवशेष आज भी उपलब्‍ध हैं।
बुद्ध की मृत्‍यु की वास्‍तविक तिथि सदा सन्‍देह में रही। श्रीलंका के ऐतिहासिक शास्‍त्रों के अनुसार सम्राट अशोक का राज्‍याभिषेक बुद्ध की मृत्‍यु के 218 वर्ष पश्‍चात् हुआ। चीन के एक महायाना प्रलेख के अनुसार अशोक का अभिषेक बुद्ध की मृत्‍यु के 116 वर्ष पश्‍चात् हुआ था। इसलिए थरावाडा प्रलेखानुसार बुद्ध की मृत्‍यु का समय या तो 486 ईसवी अथवा महायाना प्रलेखानुसार 383 ईसवी है। तथापि पारम्‍परिक रुप से बुद्ध की मृत्‍यु की जो वास्‍तविक तिथि स्‍वीकार की गई थी, थरावाडा देशों में वह 544 या 543 ईसवी थी।
बुद्ध के अनुसार जीवन के चार महान सत्‍य हैं (1) कि दु:ख अस्तित्‍व का अन्‍तर्निहित भाग है (2) दुख की उत्पत्ति अज्ञान से होती है (3) अज्ञान का मुख्‍य लक्षण लालसा या लगाव है (4) लगाव या लालसा पर प्रतिबन्‍ध आवश्‍यक है। बुद्ध ने इनसे मुक्ति प्राप्ति हेतु महान अष्‍टगुण रास्‍तों का अनुसन्‍धान किया। महान अष्‍टगुण उपायों में समुचित समझ, भाषण, कार्यवाही, जीवनचर्या, प्रयास, मस्तिष्‍क दशा एवं संकेन्द्रण सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्‍त निर्भरता प्रवर्तन उपाय के अन्‍तर्गत कहीं भी कोई आभाष केवल तभी प्रकट होता है जब भूत, वर्तमान एवं भविष्‍य को समाविष्‍ट करते हुए कारण तथा प्रभाव के जटिल जाल में दूसरे अस्तित्‍व उभरते हैं। क्‍योंकि सभी वस्‍तुएं पारिस्थितिक एवं नश्‍वर हैं। वस्‍तुओं की कोई वास्‍तविक छवि नहीं है। स्‍वीकृत ग्रन्‍थों के भ्रमातीतत्‍व के अन्‍तर्गत शिक्षण को तब तक स्‍वीकार नहीं किया जाना चाहिए जब तक वे अनुभव से न जन्‍मे हों और बुद्धिमान द्वारा सराहे न गए हों। इसके अतिरिक्‍त (1) सभी वस्‍तुएं नश्‍वर हैं (2) कि (स्‍वयं) का निरन्‍तर बोध होना एक भ्रम है (3) कि सभी प्राणी समस्‍त परिस्थितियों से अस्‍पष्‍ट मानसिक दशा से पीड़ित होते हैं जैसे गुण भी उनके महान अष्‍टगुणों में सम्मिलित हैं। तब भी कुछ महायाना विद्यालयों में बुद्ध के इन विचारों को या तो अधिक अथवा कम सम्‍पूरक के रुप में सम्‍मानित किया गया।
बुद्ध के अध्‍यापन के अधिक गूढ़ पहलुओं त‍था मठवासियों हेतु कुछेक अनुशासनात्‍मक नियमों पर बुद्धवाद के विभिन्‍न विद्यालयों के मध्‍य कुछ मतभेद हैं। परम्‍परा के अनुसार बुद्ध ने नीतिशास्‍त्रों को सशक्‍त किया और मान्‍यताओं में सुधार किया। उन्‍होंने औसत स्‍तर के व्‍यक्तियों की ईश्‍वरत्‍व और मुक्ति की धारणाओं को चुनौती दी। उन्‍होंने व्‍यक्‍त किया कि मानवमात्र और देवत्‍व के मध्‍य कोई माध्‍यम नहीं है। हिंदुवाद में कई बार बुद्ध को विष्‍णु भगवान का अवतार माना गया। पुरातन ग्रन्‍थ भगवत पुराण में वे 25 अवतारों में 24वां अवतार हैं। कई हिन्‍दु मान्‍यताओं के अनुसार दशावतार में बुद्ध सबसे प्रमुख और नवीन अवतार हैं। अनेक हिन्‍दु मान्‍यताओं में बुद्ध को दशावतार (ईश्‍वर के दस अवतार) के प्रसिद्ध दस प्रमुख अवतारों में से एक के रुप में वर्णित किया गया। बुद्धों के दशारथा जटाका (जटाका अथाकथा 461) ने बोद्धिसत्‍व एवं समुचित विवेक के सर्वोच्‍च धार्मिक राजा के रुप में भगवान राम को बुद्ध के पूर्व के अवतार के रुप में निरुपित किया है।
गौतम बुद्ध ने मानव जाति की दूषित मनोवृत्ति को परिशुद्ध करने की जो आध्‍यात्मिक योग क्रियाएं निर्मित कीं, उनका महिमामण्‍डन हिन्‍दुओं के कई प्रमुख धर्म पुराणों में भी किया गया है। स्‍वामी विवेकानन्‍द ने भी उनकी व्‍यापक अभिप्रयाण प्रणालियों का सम्‍मानपूर्वक उल्‍लेख किया है। आज के भौतिकीय युग को बुद्ध के आत्‍मविकास के रास्‍तों पर चलने की अत्‍यन्‍त आवश्‍यकता है। तब ही धरती के मनुष्‍यों की सामग्री पिपासा और इससे उत्‍पन्‍न होनेवाली बुराईयों एवं विसंगतियों का अन्‍त हो सकेगा।
25.05.2013 बुद्ध पूर्णिमा के दिन राष्‍ट्रीय सहारा के सम्‍पादकीय पृष्‍ठ पर 

26 comments:

  1. जानकारी भरा सुन्दर आलेख... आभार

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  2. विकेश बडोला जी इस सरकार का सिर्फ मज़ाक ही उड़ाया जा सकता है जहां प्रवक्ता मंत्री बनने पर भी प्रवक्ता बन अपना वक्र मुख हर मुद्दे पे खोलता नजर आता है .

    इंतज़ार कीजिये इटली के दो मरीन (नौ सैनिकों )के मुद्दे पे हुए गुप्त समझौते का सच भी खुद ही सामने आ जाएगा .

    इन राजनीतिक धंधे बाजों को इतना भी सऊर नहीं है -संजय दत्त की वकालत करके ये कौन सा सन्देश जन मानस को देना चाहतें है क्या अवैध हथियार मिलने पर नियम चेहरा और पद प्रतिष्ठा और कुनबे देख के लागू किया जाएगा ?संजय दत्त की गरिमा इसी में है वह सज़ा भुगता कर जन सहानुभूति हासिल करें .

    आखिर जिस शख्श को केंद्र सरकार विपक्ष की सरकार गिराने के लिए बनाए हुए है उस पद पे आसीन व्यक्ति क्या सुप्रीम कोर्ट से ऊपर होता है .तपासे जैसा राज्यपाल अपना मुंह काला करवा चुका है केंद्र के इशारे पे देवी लाल की वैधानिक सरकार को गिराके भजन लाल को गद्दी पे बिठाके .ऐसे व्यक्तियों को सज़ा माफ़ी का अधिकार दिया जा ना चाहिए ?


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  3. बुद्ध के जीवन और दर्शन ,विकास पथ से जुड़ा विस्तृत शोधपरक आलेख .

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  4. आत्म चेतना जगाती बेहद सार्थक प्रस्तुति,आभार.

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  5. सुन्दर विवरण..पढ़कर आनन्द आया।

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  6. बहुत सारगर्भित आलेख...आभार

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  7. आपकी यह प्रवृष्टि आज दिनांक 25-03-2013 को सोमवारीय चर्चामंच-1194 पर लिंक की गयी है। सादर सूचनार्थ

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  8. आपकी यह प्रवृष्टि आज दिनांक 25-03-2013 को सोमवारीय चर्चामंच-1194 पर लिंक की गयी है। सादर सूचनार्थ

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  9. धन्‍यवाद चन्‍द्रभूषण जी।

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  10. उम्दा आलेख , होली पर्व की हार्दिक शुभकामनाए !

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  11. बोधि सत्व की बुनियादी अवधारणों को आत्मसात करने के लिए इस आलेख को बा -रहा पढ़ा जाए .हर बार अभिनव स्वाद आयेगा .

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  12. उम्दा आलेख..
    होली की शुभकामनाएं ...

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  13. अप्प दीपो भव..

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  14. लाजवाब आलेख भाई | बहुत ही उपयोगी और ज्ञानपूर्ण जानकारी | आभार

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  15. मुझे आप को सुचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि
    आप की ये रचना 24-05-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल
    पर लिंक की जा रही है। सूचनार्थ।
    आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाना।

    मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।

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  16. बुद्ध के जीवन से जुड़ा महत्वपूर्ण आलेख.. कई नई जानकारियां मिली...

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  17. महात्मा बुद्ध की बारे में बहुत बढ़िया जानकारी प्रस्तुति के लिए धन्यवाद ..
    बुद्ध पूर्णिमा दिवस की अग्रिम शुभकामनायें ..

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  18. गहन शोधपरक विस्तृत प्रस्तुति बुद्ध के विकास मार्ग को आलोकित करती .ॐ शांति .

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  19. महात्मा बुद्द के बारे में अच्छी जानकारी ...

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  20. बहुत सुन्दर और जानकारी भरा आलेख है। कहीं कहीं भाषा अनूदित प्रतीत होती है। बुद्ध के जीवन से संबंधित कुछ तिथियाँ ईसवीसन्‌ के बजाय ईसापूर्व की लगती हैं। कृपया देख लें।

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  21. बहुत शोध के बाद लिखे जाते हैं ऐसे आलेख ...
    समग्र जीवन की कथा ... बहुतुम्दा ... लाजवाब ...

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  22. सारगर्भित आलेख
    चितन और मनन करने को प्रेरित करता हुआ
    वाकई बुद्ध को समझना सरल नहीं है
    बधाई

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  23. बहुत ही अच्छा लेखा है ..भगवान् बुद्ध के जीवन के विषय में कई नयी जानकारियाँ मिलीं. १९९४ में हम श्रीलंका गए थे तब हमें भगवान बुद्ध के पवित्र दांत के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त किया था .

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  24. शाश्वत प्रश्नों के उत्तरों की खोज भी निरंतर चल रही है। वैज्ञानिकों, ऋषियों, मुनियों, धार्मिक गुरुओं, भक्तों और विचारकों ने अपनी-अपनी सामर्थ्यानुसार सत्य की अपनी दृष्टि साझा की है। हर कोई तो बुद्ध हो नहीं सकता। अफसोस, आम आदमी की नियति फिर भी धम्मम शरनम से गिरकर बुद्धम शरनम या उससे भी पीछे आने की ही है।

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  25. बुद्ध जैसी महान आत्मा का जन्म हजारों सालों में कभी विरले ही होता है, उनका इतना सुंदर विवरण करने के लिए धन्यवाद, पढ़कर आनंद आया
    Hindi Shayari

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