Wednesday, March 13, 2013

सोने जागने का संघर्ष



सोने से पहले
जब तक निश्चिंत रहा, खेलता-दौड़ता भागता फिरता रहा तब तक ही आठ और उससे ज्‍यादा घंटों की नींद सो सका था। इसके बाद नींद मुझसे रुठ गई और अभी तक रुठी हुई है। शुरु में तो मैं इस अनिद्रा रोग से खुश था। इस दौरान जो जागत है वो पावत है, जो सोवत है वो खोवत है वाक्‍य मुझे नींद पूरी नहीं होने जैसी बीमारी से लड़ने की शक्ति देता रहा। अपनी अधिकाधिक जागृत अवस्‍था से मैं अपने लिए दिव्‍य अनुभव बटोरता रहा। अनुभवों को लिखता रहा। तरह-बेतरह की परिस्थितियों के लिखे गए वर्णन पढ़ कर अच्‍छा लगता। दोस्‍तों को पढ़ाता। वे भी प्रभावित होते और निरंतर लिखने के लिए कहते। लेकिन उनको ये आभास नहीं था कि लिखने, पढ़ने और इससे प्रभावित होने का आनन्‍द स्रोत मेरी अनिद्रा थी। जवान शरीर और दिमाग के रहते तो नींद नहीं आने के दुष्‍परिणामों से बचा रहा, पर अब देर रात तक जागना यानि की नींद नहीं आना कष्‍ट देता है। आंखों में जैसे सारे शरीर का भारीपन आ कर स्थिर हो गया है। लेकिन इतना भार ढोते-ढोते भी थकावट से चूर आंखों में नींद का नाम नहीं है।

      कल रात भी पिछली रातों की तरह काली ही रही। सुबह सोचा कि आज रात दिमाग को सोचने पर नहीं लगाऊंगा। केवल सोऊंगा। लेकिन नींद आ भी जाए पर परिवेश के शोर को कैसे कम करुं, इससे छुटकारा कैसे पाऊं! किराए का दो कमरे का घर। सभी घर आपस में सिंगल ईंट से खड़ी दीवारों से जुड़े हुए। पास-पड़ोस में कोई अपना बाथरुम का दरवाजा भी जरा जोर से बंद करता है तो आस-पास के दो-तीन घर हिल जाते हैं। कोई अपने किचेन में खाना बना रहा है या बर्तन धो रहा है तो उसकी आवाज भी ऐसे सुनाई दे जैसे अपने ही घर में यह सब हो रहा है। जिस आदमी की नींद दीवार घड़ी की सेकेंडवाली सुई की टक-टक से भी उचट जाती हो, उसके लिए पास-पड़ोस के ऐसे हो-हल्‍ले किसी विस्‍फोट से कम नहीं हैं।

कल भी कुछ न सोचने के प्रण के साथ जैसे ही सोने की कोशिश की तो घर के पीछे की तरफ के घर से पति-पत्‍नी के लड़ने, चीखने, आपस में गाली-गलौज करने की कर्कश आवाजें आने लगीं। पति की आवाज तो बहुत कम सुनाई दी पर पत्‍नी तो ऐसे सुनाई दी जैसे उसके मुंह में हजारों कैंचियां लगी हुई हैं। बिना रुके और तुतलाए, स्‍पष्‍ट साफ शब्‍दों में उसने जितनी भी बातें कहीं उनसे उस घर की पूरी कहानी समझ आ गई। समय देखा तो रात के सवा एक बज रहे थे। भगवान शिव को याद करने लगा। प्रार्थना की कि हे प्रभु इन को सद्बुद्धि प्रदान कर। मेरी प्रार्थना का असर रहा हो या वे आपस में लड़ते-झगड़ते थक गए हों, आधे घण्‍टे बाद शांति छा गई। सोचा अब नींद का ध्‍यान करुं। इतने में गली के कुत्‍ते मिल कर जोर-जोर से भौंकने लगे। रात की शांति भंग करते हुए इतने कुत्‍तों का एक साथ भूंकना, लगा जैसे शोर का तूफान गलियों से उठकर आसमान की तरफ और तीसरे मंजिल के मेरे रहने के दो कमरों की तरफ ही बढ़ रहा है। अब तक तो सिर भन्‍ना रहा था और अब वह भारीपन से बुरी तरह दब गया था।

      जब सब शोर थम गया, आवाजें रुक गईं तो पानी पी कर  फिर  सो गया। घड़ी साढ़े तीन बता रही थी। अब तो सुबह होने तक करवट गिनने की बारी थी। पांच से छह बजे के बीच अगर थोड़ी नींद आती भी तो वह सुबह के कोलाहल से उचट जाती। अन्‍त में अखबार वालों, दूधिया, स्‍कूली बच्‍चों, मोटरसाइकिल, कार, खाना बनाने, बर्तन धोने की आवाजों के साथ विचित्र-विचित्र सपनों के आने-जाने के बीच सोने और जागने का संघर्ष।

बिटिया को स्‍कूल छोड़ आने के बाद पार्क में बैठ गया। पेड़, पौधे, हरी-हरी घास, रंग-बिरंगी कलियां और फूल, गिलहरी, कबूतर, चिड़िया, गीली मिट्टी को एक-डेढ़ घण्‍टे तक देखता रहा। प्राकृतिक ठण्‍डी हवा का सेवन करता रहा। रात के शोर, अनिद्रा, बेचैनी, थकावट से लड़ने के लिए सुबह मैं इन्‍हीं की सहायता लेता हूँ। रातभर नींद न आने के बावजूद भी दिनभर रोजगार करने के लिए प्रकृति ही मुझे जागृत करती है। पार्क से बाहर आ कर दोबारा वही तेज हार्न बजाते वाहनों का अनावश्‍यक ध्‍वनि-प्रदूषण, कबाड़ीवालों का गला फाड़ कर चिल्‍लाना, रेहड़ी-फेरीवालों का वस्‍तु बिक्री गान सुनाई देता है। रात को मेरे जैसों की नींद हराम करने के बाद कुत्‍ते यहां-वहां पसरे हुए सो रहे हैं। ये हाई टेक सिटी नोएडा की कहानी है। व्‍यक्ति के लिए इतनी दुश्‍वारियां होने के बावजूद कर्ताधर्ताओं के लिए तरक्‍की शब्‍द आकर्षण बना हुआ है। आदमी वाहन चला रहा है या पैदल चल रहा है, वह घर में है या बाहर सब जगह ध्‍वनि-प्रदूषण का आतंक है।

      मनोज कुमार अभिनीत शोर फिल्म याद आती है। उसमें अभिनेता जीवन परिवेश के शोर से इतना दुखी हो जाता है कि एक दुर्घटना में अपनी सुनने की शक्ति गंवाने के बाद उसे दुख नहीं होता। बहरा होना उसे श्रवणशक्ति से पूर्ण होने से ज्‍यादा भाता है। बहरेपन में जब कोई उसे इशारे से आसमान में उड़ता हवाई जहाज दिखाता है, तो वह उसको देखते हुए उसकी गड़गड़ाहट को नहीं सुनते हुए कितनी आत्‍मसं‍तुष्टि का अनुभव करता है। अपनी स्थिति भी शोर से आहत मनोज कुमार जैसी ही है।

       

12 comments:

  1. I understand your problem. take care.
    Good one. each and every person among us passes with this experience somehow.

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  2. बहुत ही सार्थक प्रस्तुति.

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  3. आज के परिवेश में यही सच है ..हम सब इसे झेलते रहते हैं ..

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  4. आज के महानगरों का सत्य..कहाँ पायें शून्यता का अहसास..नींद का इंतजार सच में बहुत कष्टदायी होता है..बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

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  5. महानगरी शोर किसको रास आयी है
    सुन्दर लेखन ....

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  6. ईश्वर ने आँख, कान देकर तो उपकार किया, पर साथ में मायाजाल भी क्यों रच दिया...दुख देने के लिये..

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  7. वाकई में हाई टेक सिटी का भी यही हाल तो अन्य आम शहरों में कितना शोर-गुल रहता होगा..शोर तो हर तरफ ही है ...भिन्न-भिन्न प्रकार के शोर...

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  8. इसीलिए तो मन अपनी मिट्टी पर भागता है जहां अभी भी बहुत कुछ नहीं बदला है.

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  9. वर्तमान का सच सार्थक प्रस्तुति

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  10. आपने महानगर की रात का दर्शन करा दिया
    जो हम सभी रोज झेलते हैं बेजोड़ प्रस्तुति!!

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  11. आपने महानगर की रात का दर्शन करा दिया
    जो हम सभी रोज झेलते हैं बेजोड़ प्रस्तुति!!

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  12. आपने महानगर की रात का दर्शन करा दिया
    जो हम सभी रोज झेलते हैं बेजोड़ प्रस्तुति!!

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