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मंगलवार, 13 नवंबर 2018

मध्यावधि चुनाव के बाद अमेरिका

मेरिका के मध्यावधि चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी वहां के निचले सदन प्रतिनिधि सभा यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में अल्पमत में आ चुकी है। चार साला राष्ट्रपति कार्यकाल के बीच में होनेवाले इन चुनावों को मिड टर्म इलेक्शन कहा जाता है। ट्रंप ने नवंबर 2016 में राष्ट्रपति पद का चुनाव जीता था। अमेरिकी राष्ट्रपति का अगला चुनाव 2020 में होगा। अमेरिकी संसद की 435 सदस्य निचली सभा यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में होते हैं। चुनाव से पूर्व इसमें रिपब्लिकन के 235 तो डेमोक्रेटिक के 193 सदस्य थे और अब विपक्षी डेमोक्रेटिक की कुल सीटें बढ़कर 220 हो गईं और सत्तारूढ़ रिपब्लिकन पार्टी को 208 सीटों पर विजय मिली। यानी विपक्ष को 27 सीटों का लाभ मिला। हालांकि संसद के उच्च सदन सीनेट में अब भी ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी ही बहुमत में है। कुल 100 सदस्यों वाले इस सदन में सत्तारूढ़ रिपब्लिकन की 51 तो डेमोक्रेटिक पार्टी की 49 सीटें हैं। यह अमेरिकी इतिहास का रोचक तथ्य है कि विपक्षी डेमोक्रेट्स को आठ साल बाद प्रतिनिधि सभा में बहुमत मिला है। हालांकि ट्रंप ने मध्यावधि चुनाव में अपने दल के प्रदर्शन को यह कहकर सराहा है कि पूर्व में सत्तारूढ़ दलों के प्रदर्शनों की तुलना में उनके दल का प्रदर्शन बेहतर है। निचले सदन यानी प्रतिनिधि सभा में बहुमत खोने का अर्थ यह है कि ट्रंप प्रशासन द्वारा जो भी नवनीतियां अमेरिकी हित में बनाई गईं हैं और विपक्ष जिनका विरोध करता रहा है, अब वे विपक्ष के सहमति के बिना पारित और क्रियान्वित नहीं हो सकेंगी। ऐसी नीतियों को पारित करने के लिए प्रतिनिधि सभा के उन सदस्यों का भी समर्थन ट्रंप प्रशासन को चाहिए होगा, जो कि विपक्षी डेमोक्रेट्स के नवनिर्वाचित सदस्य होंगे। हां, न्यायिक और कुछ अन्य मुद्दों पर ट्रंप सीनेट में बहुमत के कारण तत्काल निर्णय ले सकेंगे परंतु अधिसंख्य मुद्दों पर उन्हें प्रतिनिधि सभा में बहुमत में उपस्थित विपक्षी सदस्यों का बहुमत भी चाहिए होगा।
अमेरिकी सदन में विपक्ष की भूमिका में मौजूद डेमोक्रेटिक राजनीतिक दल उसी राजनीतिक अतिक्रमण से ग्रस्त है जैसे भारत में कांग्रेस। इसका कारण है दोनों देशों में इन दलों द्वारा विगत में लंबे समय तक शासन किया जाना। जिस तरह कांग्रेस लोकतंत्र के नाम पर भारतीय राजनीति पर एकाधिकारवाद चाहती रही है, उसी तरह अमेरिकी डेमोक्रेटिक दल भी अमेरिका की राजनीतिक धुरी के केंद्र में केवल अपना ही कब्जा चाहती रही।
डेमोक्रेटिक पार्टी ने मध्यावधि चुनाव में जानबूझकर क्षेत्र, जाति और धर्म वाद का सहारा लिया। उसने अप्रवासियों और शरणार्थियों से भरे क्षेत्रों से अप्रवासी मुसलिम उम्मीदवारों को उठाया। ताकि उन्हें उनका राजनीतिक समर्थन मिल सके। यहां तक कि इस बार डेमोक्रेट्स की तरफ से दो फिलीस्तीनी महिलाएं भी चुनाव जीती हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि ट्रंप को हराने के लिए डेमोक्रेट्स ने किसी सीमा तक जाकर राजनीतिक गोटियां बिछाई हैं। जिन अप्रवासी अवैध लोगों और शरणार्थियों को देश से बाहर करने की नीति पर ट्रंप प्रशासन काम कर रहा है, उन्हीं लोगों को राजनीतिक मताधिकार और जनप्रतिनिधित्व देकर डेमोक्रेट्स ने अमेरिकी राजनीति को पतित कर दिया है। यदि दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश में राजनीतिक पकड़ बनाने के लिए ऐसी राष्ट्र विरोधी और आत्मघाती नीतियां बनेंगी, जिससे अमेरिकी मूल निवासियों के नागरिक अधिकारों पर डाका डालनेवाले अवैध प्रवासियों को मताधिकार मिलें, अमेरिकी राजनीति को अपने पक्ष में बदलने का मौका मिले, तो ऐसे में किसी देश (अमेरिका) और उसके मूल लोकतंत्र का औचित्य ही क्या रह जाता है। फिर अमेरिका सहित विभिन्न लोकतांत्रिक और अलोकतांत्रिक देशों ने देश व राष्ट्र की सीमाएं बनाई ही क्यों।
ट्रंप अपने सीधे-सपाट और देश हितैषी निर्णयों के लिए अपने ही उन नागरिकों का विरोध झेल रहे हैं, जो विश्व समाज की कटु और घृणास्पद जानकारियों के मामले में विचारशून्य हैं। ऐसे लोग बाद में पछताते हैं। इस समय अमेरिका के लिए ट्रंप से बेहतर नेता कोई नहीं। लेकिन उन्हें केवल दक्षिणपंथी विचारधारा वाले लोग ही पसंद करेंगे। वामपंथियों के लिए तो वे राष्ट्रपति के रूप में रिपब्लिकन की ओर से नामांकन कराते ही नकारात्मक बन चुके थे। अतः यदि ट्रंप देश हित में अच्छे काम करते भी हैं या उन्होंने कुछ किया भी होगा तो अमेरिकी नेतृत्व में विश्व का मीडिया, जो कि वामपंथी सोचवाले पत्रकारों से भरा पड़ा है, उन्हें गलत ही ठहराएगा। 
भारत की दक्षिणपंथी मोदी सरकार के साथ अमेरिकी दक्षिणपंथी ट्रंप सरकार का अच्छा दोस्ताना रहा। दोनों देश राजनीतिक, कूटनीतिक, सामरिक और ऊर्जा नीति में एक साथ आगे बढ़ने के अलावा परस्पर धार्मिक-सामाजिक संबंध जोड़ने के भी पक्षधर रहे हैं। लेकिन भारत ने वैश्विक विदेश व कूटनीति के चलते इस पर ज्यादा दूर तक चलने की इच्छा नहीं दिखाई। ट्रंप के सत्तारूढ़ होने के बाद अमेरिका ने विकास और अन्य मुद्दों पर भारत के पक्ष को समझा। उस पर एक वैश्विक वातावरण निर्मित किया ताकि दूसरे विकसित और विकासशील देश भारत पर विश्वास कर सकें। यह हमारी विदेश नीति, राजनीति और कूटनीति की जीत नहीं, बल्कि दक्षिपंथी सरकारों की समान सोच का परिणाम अधिक था। धर्मान्ध आतंकवाद के प्रति जितना कठोर रवैया मोदी ने भारत और एशिया में अपनाया, उतना ही ट्रंप ने इस पर यूरोप और अमेरिका में काम किया। इस वर्ष के आरंभ में पाक पर आर्थिक प्रतिबंध और पाक प्रायोजित आतंक पर नियंत्रण का एक कारण यह भी था। लेकिन भारत ने विश्व के उन विचारकों, प्रगतिशील और समावेशी विकास के अंधसमर्थक देशों और उनके विचारकों के कहे व सोचे अनुसार, अमेरिका से उसकी उन नीतियों के चलते राजनीतिक वैर पाल लिया, जो वह एक स्वतंत्र राष्ट्र होने के अधिकार के साथ स्वहित के लिए लागू कर सकता है। यदि भारत ट्रंप का पक्षसमर्थन दक्षिणपंथ की विचारधारा के बूते कर लेता, तो भी आज अमेरिका में ट्रंप के विरोध में वैसी हवा नहीं बनती जैसी मध्यावधि चुनाव के दौरान बनी है।
इतना होने के बाद, भारत से अपेक्षित साथ और कूटनीतिक समर्थन न मिलने पर भी उसने ईरान से भारत के तेल खरीदने पर लचीला रुख अपनाया है। यह भारत ही नहीं अपितु भारत में दक्षिणपंथी मोदी सरकार के कारण है। इसके पीछे दक्षिणपंथियों की समान धार्मिक, सामाजिक सोच काम कर रही है। यदि इस समय अमेरिका में डेमोक्रेटिक सरकार होती और वह ईरान पर प्रतिबंधों को लेकर गंभीर होती तो निश्चित था भारत को अमेरिका के कई आर्थिक, सामरिक और कूटनीतिक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता। लेकिन ट्रंप सरकार ने ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद भी, भारत की ईंधन और तेल की चिंताओं को समझते हुए ईरान पर प्रतिबंध की अपनी नीतियों से समझौता किया तथा भारत को उससे तेल खरीदने की छूट दी है। इतना ही नहीं। अमेरिका ने चाबहार बंदरगाह पर भारत की नीतियों और योजनाओं के लिए भी आपत्तियां नहीं उठाईं। यह बड़ी बात है। लेकिन हम कृतघ्न हैं। हमारे आदतें खराब हैं। दुनिया में जीवनोपयोगी भौतिक वस्तुओं के निर्माण में शून्य स्तर के योगदानकर्ता होने के बाद भी हम आरंभ से ही अमेरिका जैसे देश की सरकारी नीतियों को बुरा कहते रहे हैं।
मध्यावधि चुनाव अमेरिकी दक्षिपंथी सरकार के लिए बहुत बड़ा झटका है। सन् 2016 में जिस विशाल बहुमत और उत्साह-उमंग के साथ ट्रंप सत्तारूढ़ हुए और अमेरिका में दशकों के बाद रिपब्लिकन पार्टी सत्ता में आई, उससे अमेरिकी लोक-समाज के मानस में अमेरिका में होनेवाले अपेक्षित परिवर्तनों की इच्छा कुलाचें मार रही थीं। इन अपेक्षित परिवर्तनों को व्यवहार में बदलने के लिए ट्रंप ने भी बहुत मेहनत की। परंतु जिन नीतियों के आधार पर ऐसे परिवर्तन सच में साकार हो सकते थे, उनके क्रियान्वयन के बाद अमेरिका में स्वयं ट्रंप के समर्थक, उनकी पार्टी के दूसरे नेता, विपक्षी नेतागण और अमेरिकी मीडिया ट्रंप प्रशासन के विरोध में खड़े हो गए। ट्रंप प्रशासन ने अमेरिका को सुख, शांति और समृद्धि के नए शिखर पर पहुंचाने के लिए अनेक नवनीतियां बनाईं और उनका क्रियान्वयन भी किया, परंतु उनके देशी-विदेशी शत्रुओं ने उनके ऐसे राष्ट्रीय संकल्पों पर पानी फेर दिया। राष्ट्रपति के रूप में ट्रंप ने अमेरिका के हित में जितनी नीतियां, योजनाएं बनाईं और इनके आधार पर जितने शासकीय निर्णय लिए उनका विरोध अमेरिका में विपक्षी राजनीतिक दलों और उनके समर्थकों ने ही नहीं किया, अपितु ट्रंप के समर्थक भी विरोध में शामिल हो गए। चाहे वीजा और आव्रजन नीतियों को कठोर बनाने की बात हो या अवैध प्रवासियों और शरणार्थियों का अमेरिका आने पर प्रतिबंध, देखा जाए तो ये निर्णय वे अमेरिका के मूल निवासियों के आर्थिक, सामाजिक, नागरिक और सर्वोपरि उनके धार्मिक अधिकारों के रक्षार्थ ही ले रहे थे। वैसे तो विपक्ष के राजनीतिक षड्यंत्र से ट्रंप पर कई मुद्दों को लेकर महाभियोग चलाने की बातें भी अमेरिका में हो रही हैं, लेकिन उनके समर्थकों को याद रखना होगा कि यह अभियान उनके क्षमायोग्य अपराधों के लिए नहीं, अपति उनके दक्षिणपंथी रिपब्लिकन होने के नाते अधिक जोर मार रहा है। ट्रंप के राजनीतिक दिग्दर्शन में यदि अमेरिका को लेकर अमेरिकी फर्स्ट नीति उभरी और उन्होंने इसके अनुरूप अपने देश और उसके मूल नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए व्यापार, आयात-निर्यात, वीजा, आव्रजन, प्रवास, शरणार्थी, विदेश आदि विषयों से संबंधित पुरानी शासकीय नीतियों में बदलाव किया, तो इसमें गलत क्या था। यदि अमेरिकियों में सच्चे नागरिकत्व की भावनाएं होतीं तो विपक्षी राजनीतिक दलों के समर्थक भी उनकी ऐसी नीतियों की ओर आकर्षित होते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
          चीन के साथ व्यापार संबंधी मुद्दों पर अमेरिका का टकराव पहले-पहल चीन और दुनिया के देशों के लिए अनुचित था और धीरे-धीरे अमेरिका में भी इसका विरोध होने लगा। किसी देश में सत्तारूढ़ होनेवाले नए राजनीतिक दल ने यदि कुछ नवीन कार्य नहीं करने, नवनीतियां बनाकर उनका क्रियान्वयन नहीं करना तो सत्ता में उसके चुनकर आने का औचित्य क्या रह जाता है। यदि उसने पुरानी सरकारों द्वारा परिचालित राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय नीतियों पर ही अपना राजनीतिक कर्म करना है, तो लोग उसका चुनाव करते ही क्यों हैं। अमेरिका के मध्यावधि चुनाव में रिपब्लिकन का प्रतिनिध सभा में अल्पमत में आना, ऐसे ही प्रश्नों को स्वाभाविक रूप से उठाता है।
-विकेश कुमार बडोला

1 टिप्पणी:

  1. वाजिब प्रश्न हैं ... पर क्या ट्रंप बहुमत के साथ नहीं हैं ...
    हो सकता है शुरुआत में जब अमेरिका बना तब ही गलती हुयी हो अमेरिका के कर्णधारों से ... हाँ वो खुद भी तो ऐसे ही आये थे नेटिव लोगों को मार के ...
    बहुत से प्रश्न हैं जो जिनका उत्तर शायद भाविध्य के गर्भ में है ...

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