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शनिवार, 11 अगस्त 2018

सूचनाओं पर नियंत्रण और निगरानी की अनुचित नीति

वैसे तो काल्‍पनिक और आध्‍यात्मिक रूप में हम सभी इस दुनिया से बहुत दूर रहते हैं। इस दुनिया से मतलब देशी-विदेशी शासन-तंत्र के अधीन चलने वाली दुनिया से है। इसमें वह दुनिया सम्मिलित नहीं, जो हमारे चारों ओर प्राकृतिक रूप में विद्यमान है। जब हम कल्‍पना, स्‍वप्‍न और अध्‍यात्‍म के वशीभूत होकर शासन तंत्र की गंदगी से सनी इस दुनिया से ईर्ष्‍या करते हैं और इसके शासकों और शासकों को चुननेवाले मूर्ख लोगों से अलगाव रखते हैं, तो हमें किसी बात का डर क्‍यों होना चाहिए।
कालांतर से शासन-तंत्र का यह डर जनता में अलग-अलग तरह से भरा गया। कभी धर्मांतरण (हिन्‍दू से मुसलमान बनने) के रूप में, कभी प्रतिकूल शासकीय नियम-कानूनों के रूप में, कभी आपातकाल के रूप में, कभी नसबंदी के रूप में, कभी मौलिक अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता नहीं मिलने के रूप में, कभी कृत्रिम बौद्धिकता को विद्यालयी और विश्‍वविद्यालयी पाठ्यक्रम के रूप में पढ़ने के रूप में, कभी सोशल मीडिया पर प्रतिबंध या नियंत्रण के रूप में और अब वर्तमान में हमारे इंटरनेट मंचों के संपूर्ण आंकड़ों-प्रविष्टियों-लिखे-पढ़े हुए की निगरानी के रूप में। इस संदर्भ में गहन विचारणीय बात यह है कि क्‍या इससे जनता के मनोभावों को पूरी तरह परि‍वर्तित करने में सफलता मिल जाएगी? मनोभावों पर स्‍वयं व्‍यक्ति के अतिरिक्‍त किस का वश हो सकता है। मूल रूप में कोई भी व्‍यक्ति या राष्‍ट्र का नागरिक उन भावनाओं से परिचालित नहीं होता, जैसी भावनाएं आजकल सोशल मीडिया पर प्रदर्शित हो रही हैं। ऐसी भावनाएं उस सरकार, समाज और परिवेश की क्रियाओं का ही परिणाम है जो व्‍यक्ति का अपने-अपने हित के लिए इस्‍तेमाल कर रहे हैं। तो क्‍या इस स्थिति में व्‍यक्ति को छोड़कर सरकार, समाज और परिवेश की गतिविधियों पर नियंत्रण की बात नहीं होनी चाहिए? और सर्वाधिक नियंत्रण तो उस सरकार और अग्रगामी राष्‍ट्रीय नीतियों का नेतृत्‍व करनेवाले उसके नेताओं पर होना चाहिए जो सरकार, समाज और व्‍यक्ति के पालक बनकर बैठे हैं। क्‍या उन पर किसी का या स्‍वयं उनका नियंत्रण है?
शासन-तंत्र में सम्मिलित और शासन-तंत्र में आने के लिए बेचैन राजनीतिक रूप से गंदे और भ्रष्‍ट लोगों की मांग पर यदि हिन्‍दुस्‍थान की मूल जनता के सोशल मीडिया मंचों पर निगरानी रखी जा रही है तो इसमें जनता को घबराने और डरने की क्‍या आवश्‍यकता। रखे कोई भी निगरानी। सोशल मीडिया मंचों पर जो कुछ लिखा, बोला या प्रकट किया जा रहा है, क्‍या वह निगरानी के बाद लोगों के भीतर से मर जाएगा? जब ऐसा नहीं होगा, तो ऐसी निगरानी का क्‍या लाभ? एक मानव के रूप में सर्वाधिक (सभी नहीं) भ्रष्‍ट यदि देश और समाज में कोई रहा है या है तो वह नेता, बड़े अधिकारी और अमीर लोग ही रहे। ऐसे लोगों की हर प्रकार की गंदगी को सोशल मीडिया के माध्‍यम से अभिव्‍यक्‍त कर रहे लोगों को गंदा कैसे माना जाएगा? और अगर माना भी जाता है, तो माना जाता रहे। लोगों को इसकी चिंता कदापि नहीं होनी चाहिए। नेता, अधिकारी हो या कोई कितना ही धनी क्‍यों न हो, सभी नश्‍वर हैं। ऐसे नश्‍वर लोगों द्वारा अपने हित साधने के लिए बनाए जा रहे कानून के अनुसार यदि जनता गलत है, तो जनता को हंसते-हंसते यह गलती स्‍वीकार करनी चाहिए। इसके लिए उसे चिंता या आत्‍मग्‍लानि नहीं होनी चाहिए। वास्‍तव में मूर्ख शासकों के बनाए व्‍यर्थ-निरर्थ नियम-कानूनों को मानने से बड़ा अपराध कुछ नहीं।
भ्रष्‍ट शासन-तंत्र के लिए काम कर रहे मीडियावाले देश में हो रही गतिविधियों पर जैसे समाचार, बातें और विश्‍लेषण प्रसारित करते हैं, क्‍या जनता को उसे सच मानने के लिए विवश किया जा सकता है? यदि नहीं किया जा सकता, तो सोशल मीडिया पर प्रतिबंध की बातें क्‍यों हो रही हैं? जो हिन्‍दुस्‍थानी जनता विवेकवान है, वह वास्‍तव में कालांतर से वैसी ही है, जैसे सोशल मीडिया के विभिन्‍न मंचों के माध्‍यम से वह स्‍वयं को अभिव्‍यक्‍त कर रही है। भला विसंगतियों से पूर्ण संविधान के अंतर्गत शासन करने की चाह रखनेवाले मूर्ख, असंवेदनशील और अमानवीय नेताओं का विवशतापूर्ण गुणगान कब तक किया जा सकता है। समय ने इसकी सीमा बांधी थी, जो 2014 में समाप्‍त हो चुकी है।
एक बात तो है कि समय सच्‍चा न्‍याय करता है और क्‍या सच था, क्‍या झूठ था या क्‍या सच है, क्‍या झूठ है, इसे प्रस्‍तुत कर ही देता है। 2014 के बाद भारतीय राजनीति बहुत गंभीर संक्रमण से गुजर रही है। इस संक्रमण की चपेट में आए कुछ राजनीतिक दल शासन करने के लिए छटपटा रहे हैं। सोशल मीडिया पर प्रतिबंध या नियंत्रण का कुविचार इसी छटपटाहट के कारण उपजा है।
जो कुछ इस राष्‍ट्र में राजनीतिक रूप में घट रहा है, वह पहली बार नहीं हो रहा। वह सब कुछ पहले भी हो चुका है। आज उसकी पुनरावृत्ति हो रही है। जिन्‍होंने सत्‍ता और शासन के लिए पिछले डेढ़-सौ वर्ष से इस देश को इसके मूल जीवन, संस्‍कृति, धर्म, भाषा, जीवनचर्या और दिनचर्या से बलात अलग कर दिया वे आज अपनी सत्‍ता को पूरी तरह खोने के भय से जनता पर नियंत्रण की नई-नई बातें सोच रहे हैं। सोशल मीडिया पर प्रतिबंध और नियंत्रण की नीति इसी का दुष्‍परिणाम है।
जो कुछ राष्‍ट्र के नेताओं को अनुकूल विकास के लिए करना चाहिए, उस दिशा में तो कोई अभी तक ध्‍यानपूर्वक सोच भी नहीं रहा। जनसंख्‍या वृद्धि के संबंध में कोई बात ही नहीं कर रहा। चाहे किसी भी तरह का संकट हो, भीड़ के रूप में सोशल मीडिया में फैली अराजकता ही क्‍यों न हो, उसके समुचित समाधान का उपाय है जनसंख्‍या नियंत्रण नीति। अभी से यह नी‍ति बनेगी, तो आनेवाले दस वर्षों बाद भीड़जनित समस्‍याओं से मुक्ति मिल सकेगी। आखिर इतनी बड़ी जनसंख्‍या, जिसमें अवैध मुसलिमों की जनसंख्‍या भी करोड़ों में है, को किसी भी रूप में (शुद्ध लोकतांत्रिक रूप में भी) नियंत्रित कैसे किया जा सकता है! नेतागण सोशल मीडिया पर नियंत्रण की बात छोड़ें और एक सुनियोजित जनसंख्‍या नीति बनाएं। चाहे देश को सत्‍यनिष्‍ठा से संचालित करने का विचार है या अभी तक वास्‍तविकता में देश भ्रष्‍टाचार से चलता आया है, दोनों ही स्थितियों में जनसंख्‍या पर विशेषकर अवैध मुसलिम जनसंख्‍या पर नियंत्रण अत्‍यंत आवश्‍यक है। अन्‍यथा भ्रष्‍टाचार को गुप्‍त रूप में शासन-तंत्र से जोड़े रखकर चलनेवाली सरकारें भी भीड़ की अधिकता से ध्‍वस्‍त हो जाया करती हैं। और फि‍र भीड़तंत्र ही चला करता है तथा लोकतंत्र पुस्‍तकों की परिभाषाओं में ही सिमट कर रह जाता है।

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