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Wednesday, July 4, 2018

कश्मीर के संदर्भ में हों कठोर राजनीतिक निर्णय

विगत 20 जून को भाजपा द्वारा पीडीपी से समर्थन वापस लेकर जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन लगाने का निर्णय अत्यंत विचारणीय है। यदि इस निर्णय के लिए भाजपा की केंद्र सरकार प्रशंसा की पात्र है, तो भी यह प्रश्न कंटक बनकर चुभ ही रहा है कि भाजपा ने यह निर्णय लेने में इतनी देर क्यों की। साथ ही यह बात भी भाजपा के निर्णायक मंडल के बारे में सोचकर अच्छी नहीं लगती कि उसने रोजा में सीज फायर क्यों की।
राज्यपाल शासन लगने के बाद कश्मीर में जन-जीवन कितना बदल गया है, इसके लिए किसी साक्ष्य की आवश्यकता नहीं। पत्थरबाजी, आतंकी घटनाओं में कमी गई। हलके आतंकी संगठन सहयोग की भाषा बोलने लगे हैं। स्थानीय लोग पत्थरबाजी और आतंकवादियों के समर्थन में होनेवाले किसी घटना में लिप्त नहीं दिखाई दे रहे। बेशक छुपकर देशद्रोही, आतंकी और सैन्य विरोधी घटनाएं हो रही होंगी, लेकिन प्रत्यक्ष रूप में सब कुछ शांत हो गया है। रमजान के दौरान एक महीने तक सीज फायर के कारण पत्थरबाजों ने देशद्रोही घटनाओं को जिस तादाद में अंजाम दिया, उसने मोदी सरकार को यह सोचने पर विवश कर दिया कि सहिष्णुता और शांतिपूर्वक कश्मीर मसला सुलझाने की बातें केवल भाषणों और राजनीतिक गलियारों के संवादों तक ही अच्छी लगती हैं, जबकि वास्तव में कश्मीर में सैन्य बल प्रयोग को खुली छूट दिए जाने की जरूरत थी।
आखिरकार जब रमजान के दौरान भी आतंकवादियों, पत्थरबाजों और स्थानीय लोगों ने भारतीय गणतंत्र द्वारा तैनात सैना के खिलाफ असहनशील हरकतें कीं और इस तरह सैनिकों का आतंक निरोधी अभियान भी बुरी तरह प्रभावित होने लगा, तो केंद्र सरकार के होश ठिकाने आए। और अंततः सन् 2015 में गाजे-बाजे के साथ परवान चढ़ी भाजपा-पीडीपी गठबंधनवाली राज्य सरकार गिरानी पड़ी और राज्यपाल शासन लागू करना पड़ा।
यहां उल्लेखनीय यह है कि खुद भाजपा के कई नेता और उसके देशव्यापी समर्थक नहीं चाहते थे कि पीडीपी से भाजपा का गठबंधन आगे बढ़े। लेकिन प्रयोग के लिए भाजपा ने पीडीपी को अवसर दिया कि वह कश्मीर में कुछ नया करेगी। लेकिन पीडीपी के सभी राज्य मंत्री और मंत्रियों से लेकर धरातल तक जनप्रतिनिधियों की पूरी की पूरी फौज किसी किसी कारण आतंकवादियों, पत्थरबाजों, देशद्रोहियों और कश्मीर को पाकिस्तान का हिस्सा बतानेवालों के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष समर्थन में खड़ी थी। यहां तक कि भाजपा-पीडीपी गठबंधन में कश्मीर के पूरे इलाके में पीडीपी नेताओं का ही दबदबा था। ये नेता शासकीय शक्तियों का दुरुपयोग कर रहे थे। राज्य सरकार की शक्तियां राज्य के विकास के लिए इस्तेमाल नहीं हो रही थीं। केंद्र द्वारा राज्य के विकास के लिए कई तरह की योजनाएं और नीतियां बनाई गईं। स्थानीय लोगों को उदारतापूर्वक तथा अधिमानिता के साथ सुविधाएं, सेवाएं प्रदान की गईं। कई तरह की सार्वजनिक अवसंरचनाओं का निर्माण किया गया, ताकि स्थानीय लोगों को सुविधाएं और रोजगार मिल सकें। लेकिन स्थानीय लोगों का किसी किसी बहाने पाकिस्तान से जुड़ाव होने के कारण सीमा पार आतंकवादियों तथा आंतकवादियों के कश्मीर तथा दिल्ली में बैठे समर्थकों का आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक संरक्षण स्थानीय उग्रवादियों को मिलता ही रहा।
          इस काल में हमारी सरकारों के सम्मुख सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे किसी भी समस्या को वोट बैंक खराब होने या होने के संदर्भ में देखते हैं। इस तरह समस्या के मूल कारणों की अनदेखी हो जाती है। कांग्रेस का राजनीतिक चरित्र तो पिछले 70 वर्षों के भारतीय गणतंत्र में इसी तरह का रहा है। इसीलिए उसके शासनकाल के दौरान उत्पन्न कई राजनीतिक समस्याएं देश में अभी तक ज्यों की त्यों हैं। इतना ही नहीं इस युग में मशीनों और ऊर्जा के साधनों के विकास के बाद, इस तरह की समस्याएं अत्यधिक विकराल हो चुकी हैं। भाजपा के पास मौका है कि वह कांग्रेसजनित समस्याओं, जिनमें से कश्मीर समस्या प्रमुख है, का समाधान नई राजनीतिक सोच तथा संकल्प के साथ करे।
लेकिन रमजान पर सीज फायर करने का जो फैसला कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के उलाहने पर भाजपा की केंद्र सरकार ने लिया, वह उसके लिए गले का कांटा बन गया। गठबंधन सरकार का धर्म निबाहने के लिए एक महीने का सीज फायर करने का वादा अंत में इतना आत्मघाती हो गया कि भाजपा को पीडीपी से समर्थन वापस लेकर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा । हालांकि विरोधियों की दृष्टि में यह निर्णय 2019 के आम चुनाव में हिन्दू मतदाताओं को रिझाने के लिए किया गया है, लेकिन जो भी हो कश्मीर में स्थानीय दल की सरकार से बेहतर तो राज्यपाल या राष्ट्रपति शासन ही है। कम से कम इस दौरान सेना को खुलकर अपने अभियान चलाने तथा बिना किसी रोकटोक के अपनी सैन्य नीतियों को लागू करने का मौका होता है। भाजपा द्वारा राज्य में एनएसजी कमांडो की तैनाती भी अभूतपूर्व निर्णय है। आज से पहले किसी सरकार ने ऐसा निर्णय नहीं लिया। अमरनाथ धार्मिक यात्रा को देखते हुए भी राष्ट्रीय सुरक्षा गार्डों की तैनाती अत्यंत प्रशंसनीय निर्णय है।
इस तरह भाजपा की समझ में कश्मीर का राजनीतिक उपयोग करने का अपेक्षित सूत्र स्थिर हो ही गया। कश्मीर के संदर्भ में जो शासकीय निर्णय और सैन्य सक्रियता वर्तमान में निर्धारित है, वह तब तक वहां पर होनी चाहिए, जब तक कि कश्मीर पूरी तरह भारतीय गणतंत्र के अनुसार चलने नहीं लगता। हालांकि दिल से भारतीय गणतंत्र के विरोध में दिल्ली में भी लोग बैठे हुए हैं, लेकिन उनका इतना दुस्साहस नहीं कि वे भारत विरोधी अपने विरोध को कश्मीरियों की तरह प्रकट कर पाएं। 
वास्तव में देशद्रोहियों के मन से भारत के प्रति भरी घृणा निकालने के लिए एक सामाजिक समाधान निकाले जाने की आवश्यकता है। राजनीति इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। कांग्रेस तो इस मामले में भी कभी कुछ नहीं करेगी। लेकिन हां, भाजपा से लोगों को उम्मीदें हैं। इसलिए एक-एक भारतवासी के मन में भारत देश के प्रति सम्मान और आदर भरने के लिए कश्मीर में राज्यपाल शासन लागू करने, सेना को आतंकियों-पत्थरबाजों के विरुद्ध खुलकर कार्रवाई करने, एनएसजी कमांडो तैनात करने तथा सीमा पर आतंकियों को मारने के अलावा मोदी सरकार को देश के भीतर मुसलिम कट्टरता और पाकिस्तान समर्थित भावना का वैचारिक तथा भावनात्मक पालन करने वालों के खिलाफ भी सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। साथ ही मोदी सरकार को धारा 370 के अलावा उन अन्य सांविधानिक धाराओं को भी निरस्त कर देना चाहिए, जिनकी आड़ में कश्मीर आज सार्वजनिक रूप में पाकिस्तान जैसा दिखाई देता है। यदि मोदी सरकार ऐसा करती है, तो ही वह राजनीतिक रूप में अधिसंख्य भारतीयों की दृष्टि में प्रासंगिक हो सकेगी। केंद्र सरकार को कश्मीर के संदर्भ में ज्यादा कठोर निर्णय लेने की जरूरत है। तब ही कश्मीर के साथ-साथ देश में देशद्रोही और अराजक माहौल में कमी हो पाएगी।

1 comment:

  1. धारा ३७० के गले की फ़ांस जैसी हैं, बातें हटाने की होती हैं लेकिन राजनीति हावी हो जाती है इसके ऊपर और वह वहीँ धरा का धरा रह जाता है
    चिंतनीय प्रस्तुति

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