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सोमवार, 23 जुलाई 2018

कुसुम दीदी

मेरी दृष्टि में जीवन विडंबनाओं के अतिरिक्‍त कुछ नहीं। पहले जीवन और फि‍र मौत। इससे बड़ी विडंबना किसी के भी जीवन में और क्‍या हो सकती है! मरनेवाले के लिए तो मरने से पहले तक यह विडंबना होती है। लेकिन मरनेवाले को 'एक-पूरे-जीवन-की-तरह' याद करनेवाले उसके जीवित संबंधी के लिए यह विडंबना असीमित होती है। मैं जीवनभर अपने किसी संबंधी, प्रिय व्‍यक्ति की खोज-खबर करूं या न करूं, मेरे लिए यह चिंता की बात नहीं, लेकिन किसी अपने के मरने के बाद मैं विचित्र मन:स्थिति में अवश्‍य पहुंच जाता हूं। और इस मन:स्थिति में मरनेवाले अपने प्रिय मानव के साथ व्‍यतीत जीवन के क्षण, दिन और अनुभव स्‍मृति-पटल पर चलचित्रित होने लगते हैं।  
          मेरे पिता के एक भाई और तीन बहिनें हैं। पांच भाई-बहनों के कुल बीस बच्‍चे हैं। बीस बच्‍चों में से अट्ठारह के विवाह हो चुके हैं। सबसे बड़ी बुआ की बेटी कुसुम दीदी इन बीस बच्‍चों में से एक थी। वह अनिल भाई से छोटी थीं। अनिल भाई बीस बच्‍चों में से सबसे बड़े हैं। कुसुम दीदी उनसे छोटी लेकिन सबसे बड़ी दीदी थीं। उन्‍नीस बच्‍चे और उनके माता-पिता सकुशल जीवनयापन कर रहे हैं। अधिसंख्‍य माताओं-पिताओं के नाती-पोते और नातिन-पोतियां भी हो चुके हैं। कुसुम दीदी के भी दो बालक हैं। दोनों युवा, योग्‍य और संवेदनशील हैं। ऐसे में कुसुम दीदी का सभी को छोड़ जाना परिवार को हतप्रभ कर गया।
          मुझे भी दीदी की मृत्‍यु के दो दिन बाद पता चला कि वह नहीं रहीं। 18 जुलाई को उन्‍होंने अपनी अंतिम श्‍वास ली और शरीर को निष्‍प्राण छोड़ शिवलीन हो गईं। 12 जुलाई 2013 को मेरी दादी और कुसुम दीदी की नानी की मृत्‍यु हुई थी। तब के बाद हमारे परिवार में यह दूसरी दुखद घटना हुई है। कुसुम दीदी के जीवन का कुछ समय ननिहाल में भी व्‍यतीत हुआ था। तब ही उनके सार्थक, सकारात्‍मक और परिश्रमी व्‍यक्तित्‍व को निकटता से देखने का अनुभव हुआ। जीवन का अधिक समय संघर्ष में गुजारनेवाली दीदी ने कभी भी अपने जीवन से जुड़ी समस्‍याओं की आड़ लेकर किसी को दुखानेवाली कोई बात नहीं की। और अगर किसी को कभी लगा भी होगा कि वे अपने जीवन की परिस्थितियों की आड़ लेकर दूसरे को परेशान करनेवाली बात कर रही हैं, तो दीदी ने खुद ही इस स्थिति की अनदेखी करने या ऐसी स्थिति से दूर रहने की सोची। मैंने कभी भी उन्‍हें तनाव, कुंठा और क्रोध में नहीं देखा। जीवन में गृहस्‍थ का तन-मन तोड़नेवाला संघर्ष करते हुए भी वे विचलित नहीं हुईं। वे हमेशा भविष्‍य के प्रति आशान्वित रहती थीं। वर्तमान की समस्‍याओं में उलझे रहनेवाला व्‍यक्तित्‍व उनका नहीं था। उनका व्‍यक्तित्‍व अधिकार का भूखा नहीं था, अपितु वह दायित्‍व निर्वहन में ही संतुष्‍ट रहता।
          हमारे परिवार को छोड़ शेष दुनिया और इसके लोगों के लिए कुसुम दीदी की मृत्‍यु बड़ी बात या घटना नहीं है और हो भी नहीं सकती, क्‍योंकि संसार के अनुसार वे अत्‍यंत सामान्‍य मनुष्‍य थीं। लेकिन इसी संसार के भूत, वर्तमान और भविष्‍य काल का दार्शनिक विश्‍लेषण करते रहनेवाले मेरे जैसे व्‍यक्ति के लिए कुसुम दीदी का अवसान 'एक-पूरी-दुनिया-के-जीवन-ढहने' के बराबर है। न सही दुनिया के लिए हरेक मरनेवाला विशेष हो, परंतु मरनेवाले को ह्रदय से याद करनेवाले उसके संबंधियों के लिए वह अत्‍यंत विशिष्‍ट होता है।
          कुसुम दीदी और उन जैसे लोगों ने मरने से पूर्व जिस सूर्य किरण को अंतिम बार देखा होगा, जिस रात को कीट-पतंगों की सन्‍यासी आवाज के साथ आखिरी बार महसूस किया होगा, वर्षा की जिन बूंदों को गिरते देखा होगा, जिन पेड़-पौधों को उनकी हरियाली और पक्षियों की चहचहाहट के साथ इच्‍छाभर निहारा होगा, जिस चन्‍द्रमा के उजाले से अपने कक्ष को उज्‍ज्‍वल पाया होगा, जिस संबंधी की आंखों व हाव-भाव में अपने लिए अथाह प्रेम पाया होगा, उन सभी से मिलने और उनको देखने की बहुत इच्‍छा हो रही है। 
        दुनिया विचित्र है। मरनेवालों के बारे में यहां एक महान अनुभव है। कहा गया है कि मरनेवाला तब तक नहीं मरता, जब तक उसको प्रेमपूर्वक याद करनेवाले जीवित हैं। मरनेवाले के जीवनकाल के विभिन्‍न अनुभव जब तक उसे प्रेम करनेवालों, उसके संबंधियों में रहते हैं, वह तब तक मरता नहीं। जीने वालों की संस्‍मृतियों में डोलते रहने तक मरनेवाला कहां मरता है! इसी आशा और विश्‍वास के साथ गहराई तक अनुभव होता है कि कुसुम दीदी कहीं नहीं गईं, बल्कि यहीं हमारे बीच हैं।

1 टिप्पणी:

  1. मर्मस्पर्शी प्रस्तुति
    कुसुम दीदी जैसे लोग कभी मरते नहीं, उन्हें वे लोग हमेशा जिन्दा रखते हैं, जो भी उन्हें जानते हैं.
    कुसुम दीदी को हार्दिक श्रद्धांजलि !

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