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शनिवार, 21 जुलाई 2018

भीड़तंत्र की विरोधाभासी व्याख्या


लोग सुप्रीम कोर्ट को भगवान समझते हैं। तभी तो वे कहते हैं कि कोर्ट ने ऐसा कहा, वैसा कहा। लोग ये क्‍यों नहीं सोचते कि सुप्रीम कोर्ट में बैठे न्‍यायाधीश भी उसी भारतीय व्‍यवस्‍था में रह रहे हैं, जहां तमाम समस्‍याएं मौजूद थीं और हैं। तब वे कैसे भगवान जैसे हो सकते हैं।
जब भारत के कोर्ट बंद रहते हैं तो अखबारों के प्रमुख पन्‍नों पर ज्‍यादा बवाल वाली खबरें नहीं होतीं, लेकिन जैसे ही कोर्ट खुलता है, तो बवाल वाली खबरों का अंबार लग जाता है। अखबार वाले बड़े उत्‍साह से कोर्ट के हवाले से छापते हैं कि कोर्ट ने सरकार से यह कहा, वह पूछा, सरकार को हड़काया, सरकार से सवाल पूछा। यह लेखक कोर्ट और अखबार वालों दोनों से पूछता है कि क्‍या इनका अपना शासन-प्रशासन और बाकी व्‍यवस्‍थाएं उस स्‍तर की हैं, जैसा ये देश में सभी व्‍यवस्‍थाएं चाहते हैं।
अखबार, मोदी सरकार से पहले, ज्‍यादातर पैसे वाले कांग्रेसियों या कांग्रेसियों के संबंधियों और उनके हितैषी लोगों के थे। मोदी सरकार आने से पहले देश में कितनी समस्‍याएं थीं, यह सोचकर सामान्‍य आदमी कुंठित और बीमार हो जाता था। सोशल मीडिया एक बिजनेस प्‍लान और आर्थिक फायदे के लिए देश में आ तो गया था, पर कांग्रेस और राजनीति से लेकर दूसरे अनेक क्षेत्रों में फैले उसके लुटेरों को आभास न था कि यही सोशल मीडिया एक दिन उनकी जड़ खोदेगा। जब तक कांग्रेस सोशल मीडिया से खुद को हुए नुकसान का आकलन करती या सोशल मीडिया पर पाबंदी लगाती, तब तक लोग उसके विरुद्ध सचेत और जागरूक हो गए और परिणामस्‍वरूप 2014 में उसे सत्‍ता से हटा दिया।
          लेकिन अब जब सोशल मीडिया कांग्रेस को जड़मूल खत्‍म करने के लिए लोगों के बीच एक सशक्‍त सूचना माध्‍यम बना हुआ है, तो विपक्ष के रूप में कांग्रेस और उसके सहयोगी राजनीतिक दल और लोग सोशल मीडिया पर नियंत्रण करने की बात करने लगे हैं, उसकी सूचनाओं को भ्रामक और समाज विरोधी बताने लगें हैं। अखबार वाले और सुप्रीम कोर्ट में बैठे जज और याचिका दायर करनेवाले कांग्रेस समर्थक आजकल देश को भीड़तंत्र से होनेवाले खतरे गिना रहे हैं।
लेकिन अचरज ये सोचकर होता है कि सुप्रीम कोर्ट के ये जज जम्‍मू-कश्‍मीर के पत्‍थरबाजों, स्‍थानीय नागरिकों और इनके साथ मिल आतंकी गतिविधियां करनेवाले उग्रवादियों पर विचार करते समय यह वक्‍तव्‍य क्‍यों नहीं देते कि देश में भीड़तंत्र नहीं चल सकता। पश्चिम बंगाल में मुसलमानों के वोट हथियाने के लिए लोकतंत्र को खूंटी पर टांगनेवाली ममता बनर्जी सरकार और उसके गुंडातत्‍वों द्वारा फैलाई गई और फैलाई जा रही हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट के जज ऐसी ही‍ टिप्‍पणियां क्‍यों नहीं करते। केरल के बारे में भी सुप्रीम कोर्ट को भीड़तंत्र और उसकी अराजकता दिखाई नहीं देती। 
कुल मिलाकर एक सामान्‍य व्‍यक्ति सीधे-सीधे समझ सकता है कि जो लोग मोदी समर्थक हैं और मोदी या देश का विरोध करनेवालों की पिटाई कर उन्‍हें सबक सिखाते हैं, तो कोर्ट को ये लोग अराजक भीड़तंत्र दिखने लगते हैं, और जो लोग कांग्रेस के पाले में हैं और यदि वे वास्‍तव में अराजकता फैलाते हैं या भीड़तंत्र का नंगा नाच करते हैं तो कोर्ट उनकी तरफ आंखें मूंद लेता है।
          कोर्ट और प्रेस के हवाले से दिए जानेवाले विरोधाभासी दृष्टिकोणवाले लोकतंत्र के उक्‍त भाषण और कायदे संवेदनशील लोगों को कभी रास नहीं आनेवाले। आज जब एक विवेकशील व्‍यक्ति भलीभांति जानता है कि कांग्रेस ने इस देश को लूटने के सिवा कुछ नहीं किया, तो वह क्‍यों कांग्रेस के हित में गाए जानेवाले न्‍यायालय और प्रेस के राग में लिप्‍त हो।
जब एक सामान्‍य व्‍यक्ति लोकतांत्रिक तरीके से मोदी के समर्थन में खड़ा है, तो उसे विचलित करने के लिए लोकतांत्रिक मूल्‍यों से खिलवाड़ क्‍यों किया जा रहा है। भीड़तंत्र से खतरे की जो नई भ्रामक प्रचार नीति कांग्रेस और उसके समर्थकों द्वारा मोदी सरकार के विरुद्ध 2019 के आम चुनाव से पूर्व बनाई जा रही है, उस पर न्‍यायालय भी संतुलित विवेक से सोच नहीं पा रहा।
भीड़तंत्र के असली खतरे तो वे राज्‍य, लोग और धार्मिक समूह हैं, जो आज तक कांग्रेस के लिए सत्‍ता पाने का माध्‍यम बने हुए हैं। कश्‍मीर के हालात क्‍या भीड़तंत्र का आभास नहीं देते? लेकिन कोर्ट और प्रेस ने वहां के बारे में कभी भीड़तंत्र शब्‍द का इस्‍तेमाल नहीं किया। कश्‍मीर ही नहीं केरल, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक और कम-ज्‍यादा मात्रा में कांग्रेसी प्रभाव में रहे राज्‍यों में भीड़तंत्र दशकों से अराजकता का नंगा नाच करता रहा है। वहां के बारे में कोर्ट ने कोई टिप्‍पणी क्‍यों नहीं की? उलटे कोर्ट के न्‍यायाधीश ऐसे राज्‍यों में हुए या हो रहे अराजकता के नंगे नाच की अनदेखी कर सुरक्षा बलों के विरोध में निर्णय सुनाते रहे हैं कि वे स्‍थानीय लोगों पर अत्‍याचार कर रहे हैं, कि सरकार को सशस्‍त्र सेनाओं को उन स्‍थानों से हटा देना चाहिए, कि ऐसे राज्‍यों को संभालने का सारा दायित्‍व स्‍थानीय प्रशासन का है न कि केंद्र सरकार का। भीड़तंत्र के बारे में विरोधाभासी न‍जरिया वाले कोर्ट को आज अचानक भीड़तंत्र का खतरा इतना क्‍यों डराने लगा है? इस बात के गूढ़ राजनीतिक निहितार्थ हैं। गुजरात, कर्नाटक, उत्‍तर प्रदेश आदि राज्‍यों में विधानसभा चुनाव से पूर्व जिस तरह केंद्र की मोदी सरकार के विरोध में झूठे किसान आंदोलन, बंद और जाम जैसी गतिविधियां की गईं, क्‍या वह भीड़तंत्र की अराजकता नहीं थी? उस पर कोर्ट और मीडिया ने भीड़ को क्‍यों नहीं कोसा? क्‍या इसलिए कि वह भीड़ उस मोदी सरकार के विरोध में थी, जो कोर्ट के कई न्‍यायाधीशों और मीडिया के कई लोगों की नजर में इसलिए खटक रही है क्‍योंकि वह मोदी सरकार इन्‍हें इनकी कांग्रेसी दुर्नीति के हिसाब से नहीं चलने दे रही। ऐसा नहीं चलेगा। अधिसंख्‍य मोदी समर्थकों को कोर्ट के ऐसे प्रतिबंध और सलाह मानने में कोई रुचि नहीं है। कांग्रेस द्वारा अनेक क्षेत्रों में किए गए अत्‍याचार और अन्‍याय से पीड़ित लोगों के पक्ष में न्‍याय करने के स्‍थान पर कोर्ट अनावश्‍यक विषयों पर अपनी टीका-टिप्‍पणी करना बंद करे। वह आम लोगों के हित में न्‍याय को व्‍यावहारिक बनाएगा तब ही उसका सच्‍चा सम्‍मान देश में हो सकेगा।
अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता के नाते कांग्रेस के नेता, कार्यकर्ता, समर्थक जब देश के प्रधानमंत्री को अपशब्‍द बोलने लगें, कांग्रेस के लिए हिन्‍दू बाबा और संत के रूप में परिवर्तित अनेक मुसलिम षड्यंत्रकारी (प्रमोद, अग्निवेश) जब प्रधानमंत्री की हिन्‍दू गतिविधियों को पाखंड कहने लगें और साथ ही कहने लगें कि संविधान इसकी अनुमति नहीं देता, तो क्‍या यह देश के प्रधानमंत्री और उनको चुननेवाले बहुसंख्‍यक लोगों का अपमान नहीं? इस पर सोचने और प्रधानमंत्री तथा बहुसंख्‍यक भारतीय लोगों का अपमान करनेवालों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करने के स्‍थान पर कोर्ट ऐसे लोगों की पिटाई पर देश को भीड़तंत्र के खतरों से पीड़ित बताने लगे, तो यह स्थिति लोकतांत्रिक आधार पर अत्‍यंत अस्‍वीकार्य है।
राष्‍ट्र विरोधी लोगों का मंतव्‍य जानने के लिए विवेकवान भारतीय नागरिकों को किसी न्‍यायालयी या मीडिया प्रमाण की आवश्‍यकता नहीं। अग्निवेश जैसे लोगों का मंतव्‍य उनके धूर्त, कपटी और कलुषित चेहरों से आसानी से समझा जा सकता है। न्‍यायालय की ओर से ऐसे लोगों का बचाव नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि इन्‍हें प्रधानमंत्री और उनके बहुसंख्‍यक समर्थकों का अपमान करने के लिए कठोर दंड दिया जाना चाहिए। यदि न्‍यायालय इस दिशा में कुछ नहीं सोचता तो ऐसे लोगों को जनता ही दंडित करेगी। और इसमें कुछ बुरा भी नहीं।

3 टिप्‍पणियां:

  1. जहाँ ६५ साल एक परिवार ने राज किया हो वहाँ स्थाई स्थान पर रहने वाले
    तंत्र के ठेकेदारों से ऐसी उम्मीद करना व्यर्थ है ... चाहे न्याय व्यवस्था हो या तंत्र ...
    सभी कांग्रेस के लिए कार्य करेंगे अब जनता को देखना है की वो क्या करती है ...

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  2. जनता का जागरूक होना कई ठेकेदारों के लिए महंगा सौदा होगा, इसलिए वे घबरा रहे है। जिस दिन जनता पूर्ण रूप से जाग उठेगी उस दिन जनता की अदालत में एकदम खरा इन्साफ होगा।
    बहुत अच्छी जनजागरण कराती प्रस्तुति

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  3. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, यह इश्क़ नहीं आसान - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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